बालपन की दृष्टि से कबीरदास जी को बांचने के प्रयास में पाठ्य पुस्तक के प्रथम अध्याय में सरल सुबोध और बिना किसी विशेष उपक्रम के वाणी में बस जाने वाले दोहाकार के रूप में उनकी छवि उभरती है। मगर आज जब कबीरदास को उनके समग्र रूप में समझने का प्रयास किया तब वो साहित्य,दलितविमर्श, सामाजिक चेतना, सत्य -अहिंसा,समाज सुधार,अध्यात्म -दर्शन आदि चर्चाओं के केंद्र में दिखाई देते हैं। यधपि उन्होंने जो कहा अपनी फक्कड़ता में कहा जहाँ समाज सुधारक के रूप में प्रविष्ट होने की कोई पूर्वनियोजित सोच नहीं थी तथापि उनका रचनाकर्म उन्हें सामाजिक चेतना के अग्रदूत के रूप में प्रतिष्ठित कर गया। भारतवर्ष की सुदीर्घ काव्य परम्परा में इतना विराट व्यक्तित्व तुलसीदास के अतिरिक्त नहीं मिलता।
उनका जन्म जेष्ठ पूर्णिमा के दिन काशी में हुआ था। कबीरदास के जन्म के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है ,जिनका उल्लेख उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि कबीरदास जुलाहे थे ,कपडा बुनते ,सूत कातते सर्वधर्म समभाव ,अध्यात्म,सात्विकता ,अहिंसा,इतियादी का जो सूत्र तत्कालीन समाज को दे गए वो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। कबीरदास ऐसे समय में उभर कर आये जब भारत मुस्लिम शाषकों के अधीन था। हिंसा व् अत्याचार के बल पर आम जनता द्वारा अपने फरमान मनवाये जाते थे। मुसलमान शासकों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन कराया जाता व् और अवमानना होने पर मौत के घाट उतार दिया जाता।आम हिन्दू जनता पर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे थे। दूसरी तरफ अपनी धर्म विशेष पहचान बनाये रखने के लिए हिन्दुओं में धार्मिक कर्मकांड व् पाखंड का बोलबाला था। व्यभिचार से बचने के लिए कन्याओं की कम उम्र में शादियां की जाती जिससे बाल विवाह जैसी कुरुती समाज में बढ़ने लगी।समाज वर्णभेद ,पाखंड ,छुआछूत जैसी कुरीतियों में जकड़ा हुआ था। कबीर का निरक्षर किन्तु सवेदनशील मन न केवल व्यथित हुआ वरन उस दर्द को आत्मसात कर जो कुछ जाना - चिंतन मनन किया दोहा ,सबद ,रमैनी रूप में बह गया। निम्न जातियों जैसे जुलाहा ,कारीगरों ,धोबी ,हरिजनों के प्रति उच्च जातियों की उपेक्षा व् शोषण एक नवीन आंदोलन का सूत्रपात कर गया। सभी निम्न जातियां अपनी अस्मिता व् स्वाभिमान की बात किसी न किसी रूप में उठा रहे थे । कबीर की वाणी ने उसे न केवल ऊर्जा प्रदान की बल्कि उनमे आत्मविश्वास की भावना का संचार भी किया। डा. राधेश्याम द्विवेदी लिखते हैं " महात्मा कबीर का जन्म ऐसे समय में हुआ ,जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरुप अंधकारमय हो रहा था। "
कबीर मुसलमान धर्म के थे और स्वामी रामानंद का शिष्य बनकर उन्हें हिन्दू धर्म की भी अच्छी समझ हुई। उन्होंने प्रत्येक धर्म की तर्कसंगत बातों को अपनाया तथा अन्धविश्वास व् ढकोसलों का जमकर विरोध भी किया। अपनी रचनाओं के माधयम से न केवल वो धर्मान्धता में जकड़े मुस्लिम समाज पर खुलकर बोलते हैं साथ ही हिन्दुओं में प्रचलित धार्मिक कर्मकाण्ड व् पाखंड पर भी कड़ी चोट करते हैं –
"कंकड़ पत्थर जोड़ के ,मस्जिद ली चिनाय।
चढ़ कर मुल्ला बांग दे ,क्या बहिरा हुआ खुदाय।
"माला फेरत जग भया ,फिरा न मन का फेर।
कर का मन का डार दे,मनका -मनका फेर।
कबीर राम की उपासना करते है ,मगर कबीर के राम धनुषधारी -रघुनन्दन राम नहीं हैं। उनके राम तो सत,चित,आनंद स्वरुप परमात्मा हैं जो आडम्बर से नहीं सत्कर्म व् आतंरिक पवित्रता से प्राप्त किये जा सकते हैं। अपनी रचनाओं में वे मूर्तिपूजा का खंडन करते भी नजर आते हैं। यथा -
"पाहन पूजे हरी मिलै ,तो मैं पूजों पहार।
वा ते ता चाकी भली, पीसी खाय संसार।
कबीरदास अपने हरि (परमात्मा ) तक पहुंचने का बहुत ही सुगम मार्ग बताते हैं,यही सुगमता और सरसता उनकी शब्दावली और भाषा में भी दिखाई देती है। भाषा की यही बोधगम्यता उन्हें जनमानस में लोकप्रिय बनाती है। यही कारण है की कबीरदास के दोहे साक्षर -निरक्षर गांव -नगर ,देश -विदेश सभी तक अपनी पहुंच बनाने में सर्वथा सफल दिखाई देते है। डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं "सहज सत्य को सहज ढंग से वर्णन करने में कबीर अपना प्रतिद्वन्दी नहीं जानते...... । "
गृहस्थ जीवन जीते हुए ,अपने व्यवसाय से रिक्त समय में सत्संग व् मनन चिंतन के माध्यम से कबीर अध्यात्म व् सत्मार्ग की ओर समाज को ले जाने का उत्कृष्ट उदाहरण सामने रखने का जो कार्य करते है वो विरले ही देखने को मिलता है ।
सात्विक प्रवृतियों के प्रबल पक्षधर कबीर हिंसा, पशु हत्या व् मांसहार का जमकर विरोध करते हैं और मन को नियंत्रित कर माया के जंजाल से बचाकर रखने की सीख देते हैं । मांसहार का खंडन करते हुए वे लिखते हैं -
"बकरी पाती खात है , ताकि काड़ी खाल।
जो नर बकरी खात है ,उनका कवन हवाल। "
'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय " कहते हुए एक तरफ पुस्तक ज्ञान से अनुभव ज्ञान को अधिक महत्व देते नजर आते है तो दूसरी तरफ प्रेम की परिभाषा को असीमित विस्तार देते। मगर कबीर का प्रेम प्रेयसी को रिझाता पागल प्रेम भर नहीं वरन निर्बलों ,मूक पशुओं ,व् मानवजाति के प्रति प्रेम का पक्षधर है।
हिन्दुओं में प्रचलित वर्णव्यवस्था पर भी कबीर एक स्वभोगी की हैसियत से खुलकर बोलते है। उनका मानना था की जनम के आधार पर किसी को उच्च या निम्न नहीं कहा जा सकता , मानव कर्म ही है जो समाज में प्रतिष्ठा या पतन के लिए उत्तरदायी है। उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा दलितों में स्वाभिमान जगाने का कार्य किया है।
अंत में जैसाकि प्रो. महावीर सरन जैन लिखते है " कबीर का सारा जीवन सत्य की खोज तथा असत्य के खंडन में व्यतीत हुआ है। " कबीर अपनी इस यात्रा में संतमति से मानवजाति को सदगति की तरफ ले जाने वाले विनम्र संत व् दिशाविहीन समाज को दिशा दिखाते एक श्रेष्ठ दोहाकार के रूप में नजर आते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
मीना पांडेय
एम् -3 ,सी -61 वैष्णव अपार्टमेंट
शालीमार गार्डन एक्स-2
साहिबाबाद ,गाज़ियाबाद -201005 (यू पी )













