किताब का नाम-’ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ मूल्य-250/ प्रकाशक- प्रखर गूँज
शिखर चंद जैन जी की रचनाएँ प्रखरगूँज
पब्लिकेशन की पत्रिका ‘साहित्यनामा’ में पढ़कर मैं पहले से ही उनकी प्रशंसक थी. जब मुझे पता
चला कि उनकी एक किताब ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ छपने वाली है, तो
मैं उसके प्रकाशन की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगी और जैसे ही यह अमाजोंन पर
उपलब्ध होने की सूचना मिली, तो मैंने तुरंत ऑर्डर कर दिया.मेरे हाथ
में किताब के आते ही सबसे पहले तो मैं उसके फूलों से सजे मैरून रंग के कवर की सुन्दरता को देखकर
ही सुखद एहसास से घिर गई. फिर किताब के अन्दर शब्दों की छपाई, जो कि सामान्य से अधिक बड़े अक्षरों में है और जहां किसी मुख्य
बात को लिखना था, वहां उसे बोल्ड शब्दों में उभारा गया है, जिससे पढ़ने वालों को तनिक भी अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता.उसके बाद हम आते हैं,पृष्ट
की गुणवत्ता पर, बिलकुल दूधिया रंग के मोटे और चमकदार पृष्ट, जिसको पलटने में आपस में चिपकने की जरा भी असुविधा नहीं होती और पाठक के
पढने का उत्साह दोगुना कर देती है. किताब की प्रेजेंटेशन ने उसमें चार चांद लगा
दिए हैं. वैसे ही जैसे हम किसी रेस्टोरेंट के खाने की तारीफ़ सुनकर जाते हैं और वहां के रख रखाव,सज्जा,वातावरण और अच्छी सर्विस होने से खाना चौगुना
स्वादिष्ट लगता है.
.किताब का शीर्षक ‘ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’ से ही यह स्पष्ट है कि इस किताब का सार है कि यह
ज़िंदगी दोबारा नहीं मिलेगी,यह अनमोल है, इसलिए
हमें इसे बोझ समझ कर नहीं काटना चाहिए, बल्कि इसके एक-एक पल को भरपूर आनंद लेकर
जीना चाहिए. यह किताब जीवन अच्छी तरह और भरपूर जीने की प्रेरणा देने के उद्देश्य
से लिखी गई है.
अब शिखर चंद जी की किताब के अन्दर
लिखे विषय सूची पर आती हूँ, जिसमें एकतीस विषय हैं और हर विषय में भिन्नता और विविधता देखते ही बन पड़ रही है.लेखक ने जीवन के प्रत्येक
पहलू पर विचार करके सुझाव लिखे हैं, जबकि मैंने बहुत सी किताबों में हमारे व्यक्तित्व
के एक ही पहलू पर पूरी किताब लिखी हुई पढी है. इसमें सबसे पहले विषय ’आपकी ज़िंदगी को बदल देंगे ये विचार’ का पृष्ट खोलते ही बोल्ड शब्दों में लिखे ‘बोझिल रिश्तों को तोड़ दें’ पर मेरी नज़र पड़ी. उसमें एक वाक्य ने “यदि कोई व्यक्ति आपके आंसुओं की वजह बनता है तो बार-बार आंसू पोंछने के
बजाय उस व्यक्ति को ही अपने से दूर कर दें”, पढ़ते ही मुझे कुछ पारिवारिक दुखदाई रिश्तों को तोड़ने
पर मेरी इस सोच से कि ‘आखिर खून के रिश्ते तो खून के ही होते हैं,’ दुविधा की स्थिति से मुक्ति मिल गई.जब मुझे मेरी
उलझन से इस किताब में दिए गए सुझाव से मुक्ति मिल सकती है तो आपको क्यों नहीं...!
किताब के दूसरे अध्याय में ‘कैसे बढाएं विलपावर’ पर आपको तथ्यपरक
सुझाव मिलेंगे. तीसरे अध्याय में हम सभी खुश तो रहना चाहते हैं,लेकिन कैसे रहें,इसका जवाब आपको ‘खुशी ऐसे मिलती है’ शीर्षक के अंतर्गत
मिलेगा. ऐसी बहुत सारे कार्य हैं जिनके नुकसान न जानने के कारण हम उसमें लिप्त रहते हैं और अपनी ऊर्जा और समय
बारबाद करते हैं,इन सबका जवाब इस किताब में है. चावल का एक दाना
पका देखकर हम समझ जाते हैं कि सारे चावल पक गए हैं,इसलिए
इतने उदाहरणों से ही पूरी किताब समझ में आ जानी चाहिए, क्योंकि
प्रत्येक विषय के बारे में जानकारी देना संभव नहीं है.
लेखक द्वारा हर प्रकार की आपकी मानसिक और सामाजिक
उलझनें जिनके सुझाव आप किसी पत्र- पत्रिका में भेजकर पूछते हैं या उनमें ढूंढते
हैं, किसी काउंसलर या
मनोचिकित्सक के पास जाते हैं, गुरुओं के प्रवचन सुनने जाते हैं’, जिससे समय,
ऊर्जा और धन की भी बरबादी होती है, वे सब एक ही पुस्तक में लिखी हुई मिल जाए तो इससे अच्छी बात क्या है.पत्रिकाएँ
या समाचार पत्र तो हम पढ़कर बेकार समझकर रद्दी में बेच देते हैं, लेकिन किताब तो आप जीवन-पर्यंत अपने पास रख सकते हैं.
हमें पता होना चाहिए कि यदि हमारा मनोबल (विल
पावर ) जो हमारे मन से जुड़ा है,मज़बूत हो तो शारीरिक बीमारियों का असर हमारे मन पर नहीं पड़ता और शारीरिक
बीमारियों का इलाज पूरी तरह से डॉक्टर कर सकते हैं, लेकिन मानसिक बीमारी का इलाज पूरी तरह मनोचिकित्सक नहीं कर सकता और इस
बीमारी का हमारे शरीर पर असर अवश्य पड़ता है.हम बड़ी से बड़ी शारीरिक
बीमारी को और बड़ी से बड़ी तकलीफ को अपने मजबूत मनोबल से ठीक कर सकते हैं, उसके लिए हमें प्रयास करना पड़ता है. यह मेरा नहीं मनोचिकित्सकों का कहना
है.हम मानसिक बीमारी अवसाद के होने पर मनोचिकित्सक के पास जाते हैं तो वह दवा के साथ हमें अच्छी
किताबें पढने के लिए और अच्छे मित्र बनाने की सलाह देते हैं,क्योंकि दवा कुछ प्रतिशत ही असर करती
है और अच्छी किताबें और मित्रों का साथ हमारा मनोबल बढाता है,जिससे इस बीमारी को ठीक
करने में अधिक योगदान होता है, इसलिए हमें किताबें अवश्य पढनी चाहिए , खासकर जो हमारी नकारात्मक सोच से उपजी समस्या को
सकारात्मक सोच में बदलने के उपायों पर लिखी गयी हों.
अपनी किताब में लेखक ने
केवल अपने ही विचार नहीं रखे,बल्कि बहुत सारे महान दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों के विचारों के साथ अनेक उदाहरणों को भी सम्मलित करके उसे तथ्यों समेत
वास्तविकता की कसौटी पर भी खरा उतारा है. यही नहीं खुद की या अन्य किसी दूसरे के
लिखे गए शेर, जिन्हें
पढ़कर पाठक का भरपूर मनोरंजन भी होता है , इन सबको पढ़कर महसूस होता है कि लेखक ने लिखने से
पहले सभी विषयों पर गहन अध्ययन किया है.
इस किताब की सबसे अच्छी बात तो यह है कि
इसकी भाषा बोलचाल वाली सरल भाषा है,जिसमे क्लिष्टता नाम मात्र को भी नहीं है,इसलिए इसे साधारण से साधारण पढ़ा-लिखा इंसान भी पढ़
सकता है.मैंने और भी हिन्दी और अंग्रेज़ी में इस तरह की किताबें पढी हैं,लेकिन भाषा की क्लिष्टता के कारण पढना
इतना सरल नहीं लगा.
यह भी सर्वविदित है कि किसी का भी जीवन हमेशा सामान्य नहीं रहता.सभी के
जीवन में कभी न कभी ऐसा समय आता है जब वह समस्याओं से घबडाकर अवसाद से घिर जाता
है.मुझे एक व्यक्तिगत घटना याद आ गई है,जो मैं यहाँ साझा करना चाहूंगी.एक बार मुझे भी
अवसाद ने घेर लिया था.मेरी बेटी ने एक किताब मेगालिविंग ( Megaliving ), जिसके लेखक रोबिन शर्मा’हैं,’ मुझे पढने को दी. उसका पहला पृष्ट खोलते ही मेरी
नज़र बोल्ड शब्दों में लिखी एक पंक्ति पर पड़ी,’कंट्रोल योर थॉट,इट विल कंट्रोल योर माइंड.कंट्रोल योर
माइंड, इट विल कंट्रोल योर बौडी’. अर्थात अपने विचारों को कंट्रोल कर लेंगे तो अपने शरीर पर भी हमारा
कंट्रोल रहेगा.आपको जानकार आश्चर्य होगा कि यह पढ़ते ही मेरे मन
में सकारात्मक विचार आने के कारण मैं ऊर्जा से भर उठी और थोड़ी देर पहले जिस शरीर की कमजोरी से मैं उठ नहीं
पा रही थी उसमें ताकत आ गयी और मैं सामान्य हो गयी.इतनी ताकत होती है इस तरह की
किताबों में.
आज लॉकडाउन के समय घर में बंद रहने से जो मनुष्य ‘सोशल एनीमल’ माना जाता है,
अब सोशल डिस्टेंसिंग के कारण सिर्फ
पिंजरे में बंद एनीमल होकर रह गया है,
इसलिए अकेलेपन और खालीपन के कारण अवसाद से
घिर रहा है,यहाँ तक कि आत्महत्या तक कर रहा है.ऐसे में इस तरह
की मनोबल मजबूत करके के लिए प्रेरित करने वाली किताबें पढनी बहुत ज़रूरी है.लॉकडाउन
खुलने के बाद भी अपनी खुशी के लिए किसी पर निर्भरता कभी सुखद परिणाम नहीं देती,इसलिए ऐसी किताबों से मित्रता करनी आवश्यक है,क्योंकि
ये कभी हमारा साथ नहीं छोड़ेगी.बल्कि अपने किसी परिचित को भी किसी अवसर पर या वैसे
ही यह किताब उपहार स्वरुप देंगे, तो उनके लिए इससे अधिक अनमोल उपहार कुछ भी
नहीं होगा.
रही बात किताब के मूल्य की ,यह दो सौ पचास की किताब है,जिसमें कुल मिलाकर एक सौ दस पृष्ठ हैं, जो कि इसकी गुणवत्ता के सामने कुछ भी नहीं
है.हम एक कपड़ा खरीदते हैं तो पसंद आने पर अधिक मूल्य होने पर भी खरीदने से अपने को
रोक नहीं पाते,जो
सिर्फ हमारे शरीर के बाहरी आवरण को खूबसूरत बनाता है,लेकिन एक किताब, जिसके लिए कहा जाता है कि वह हमारा अकेलेपन का सबसे अच्छा मित्र है, जो हमारे मनोरंजन के साथ हमारे ज्ञान की
भी वृद्धि करता है,उसे खरीदते समय हम उसके मूल्य के लिए, इतना सोच-विचार करते हैं,
यह हमारी गलत सोच का
ही परिणाम है. सारी समस्या तो हमारे नकारात्मक सोच का ही परिणाम है, जिसको बदलने के लिए हमें सकारात्मक सोच पैदा करने
की सीख देने वाली किताबें पढनी चाहिए.
अभी तीन चार वर्षों में कई नई प्रकाशन संस्थाएं खुली हैं,लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से ‘प्रखरगूंज’ प्रकाशन का कोई मुकाबला नहीं है.इस प्रकाशन की संचालिका ’नीलू सिन्हा जी’ बहुत कर्मठ महिला
हैं,जिन्होंने अपनी मेहनत, लगन
और कार्य के प्रति सच्चाई और एकनिष्ठता के कारण बहुत थोड़े समय में प्रसिद्धि पा ली
है.
सुधा कसेरा,
सिकंदराबाद
