(१ )
फिर देर तक
गूंजते रहे नारे
ऑंखें पत्थर हुई
गले रुंधियाँ गए
और शहर
सोया रहा
बहरे की नींद
फिर देर तक
हुए जगराते
देवी बना
पूजी गयी
कन्याएं
ढलती रात
के साथ
ढलती रही
उम्मीदें
वो उंघती आंख
और बेतरतीब
बालो वाली
लड़कियाँ
चीखती रहीं
और शहर
सोया रहा
बहरे की नींद।
(२ )
फुसफुसाहट ने
सीख लिया है
बोलना, चिल्लाना ,
नारे लगाना ,अच्छा लगा
गुलाब सींचे जाते हैं
और
उपेक्षित भूमि पर
स्वतः उग आता है
कैक्टस
उगाना नहीं पड़ता
इक्कीसवीं सदी के
असंख्य विमर्शों की तरह
तुम्हारे चेहरे पर भी
उग आये हैं होंठ,
अच्छा लगा
मगर अब
इसके बाद
बेहया
चरित्रहीन और
देशद्रोही
जैसे तमगे तुम्हें
भोगने होंगे
खुद पर
अब तुम
बाद की बात से
डरती नहीं हो
लड़ती हो खुलकर , अच्छा लगा
अच्छा लगा
इस चुप्पी के भीतर
पसरी पड़ी
मर्यादाओँ की
असंख्य बेड़ियों पर
मार दी है तुमने
आह !
साहस की पहली
हथौड़ी।
-मीना पाण्डेय
फिर देर तक
गूंजते रहे नारे
ऑंखें पत्थर हुई
गले रुंधियाँ गए
और शहर
सोया रहा
बहरे की नींद
फिर देर तक
हुए जगराते
देवी बना
पूजी गयी
कन्याएं
ढलती रात
के साथ
ढलती रही
उम्मीदें
वो उंघती आंख
और बेतरतीब
बालो वाली
लड़कियाँ
चीखती रहीं
और शहर
सोया रहा
बहरे की नींद।
(२ )
फुसफुसाहट ने
सीख लिया है
बोलना, चिल्लाना ,
नारे लगाना ,अच्छा लगा
गुलाब सींचे जाते हैं
और
उपेक्षित भूमि पर
स्वतः उग आता है
कैक्टस
उगाना नहीं पड़ता
असंख्य विमर्शों की तरह
तुम्हारे चेहरे पर भी
उग आये हैं होंठ,
अच्छा लगा
मगर अब
इसके बाद
बेहया
चरित्रहीन और
देशद्रोही
जैसे तमगे तुम्हें
भोगने होंगे
खुद पर
अब तुम
बाद की बात से
डरती नहीं हो
लड़ती हो खुलकर , अच्छा लगा
अच्छा लगा
इस चुप्पी के भीतर
पसरी पड़ी
मर्यादाओँ की
असंख्य बेड़ियों पर
मार दी है तुमने
आह !
साहस की पहली
हथौड़ी।
-मीना पाण्डेय

