उस दिन एक मित्र के यहाँ से
लौटकर मैंने अपनी पुस्तकों की सुसज्जित अलमारी अस्त-व्यस्त कर दी। यही होता है
मेरे साथ, जब लोग बोलते हैं उन्हें
चुपचाप सुनना अच्छा लगता है और ये सोचना भी की काश मैं भी ऐसे ही तरह -तरह की
दुनियादारी की बातें इतने चुटीले अंदाज में कर पाती । शायद यही कारण है की अपने उम्र की
अन्य महिलाओं के लिए मेरी सीधी सपाट बातों में कोई रस नहीं होता।अब समझ में आने लगा है की लम्बी -लम्बी मसालेदार बातों को
एक सपाट पंक्ति में बोल देने की मेरी आदत ही मुझे महिलाओं की टोली में अरोचक बना देती
है। कब ? क्या ? कहाँ से बात शुरू की जाये ? मेरे लिए सबसे
बड़ा प्रश्न रहा है। अतः कुछ
आत्मीयजनों को छोड़कर क्या बोलूं वाली स्थिति मेरे साथ गाहे –बगाहे आ ही जाती है। अब कल
की ही बात है बस
स्टॉप पर स्कूल बस की प्रतीक्षा करती महिलाओं की टोली खूब हँस -हँस कर बतिया रही थी। हेलो -हाय के बाद जब
मैंने बोलना शुरू किया, तब पूछ बैठी - 'बस नहीं आयी अभी ?'
'नहीं आयी भई ...... नहीं आयी। तुम्हें दिखता नहीं क्या ? तभी खड़ी
है नहीं तो क्यों खड़ी रहती?'
नहीं! ये उत्तर उन महिलाओं का नहीं था। उन्होंने तो 'न ' में सर हिला दिया। जवाब तो मेरी न समझी ने दिया
मुझे पलटकर, ये भी कोई पूछने की बात थी कुछ ढंग का पूछती ,कुछ ऐसा जिससे अगली किसी बात का सिरा खुलता, जिस पर सजी -संवरी बाफुरसत महिलाएं ठहाका लगा पाती और बस के आने तक कुछ
वक्त ही निकल जाता।
बहरहाल , मैं भी एक सामाजिक प्राणी हूँ ,समाज में
उठना -बैठना ,लोगो से बात करना, घुलना -मिलना मुझे भी अच्छा लगता
है। पर जाने क्या बात है की बात नहीं हो पाती। अन्य औपचारिक मुलाकातों में तो में
निर्भीकता से अपनी बात रखती रही हूँ ,महिलाओं की टोली में ही जाने
क्यों हवा खराब हो जाती है? और ऐसी किसी
भी मंडली से लौटकर सीधा अपनी पुस्तकों की अलमारी खंगालती हूँ। शायद कहीं ,किसी ने लिखा हो 'बात कहाँ से शुरू की जाये ?’
इस मामले में कुछ लोग बाजी मार गए हैं,बोलने बतियाने में इनका कोई जवाब नहीं होता। ऐसे लोग आपके मुँह से बातें उधार लेकर भी अपना तमगा लगाकर बेच देते हैं। कुछ लोगो को ये गुण ईश्वर उपहार में मिलता है और कुछ एक को विरासत में। एक बात को तीन -तीन बार वो भी पूरे आत्मविश्वास से कहने के हुनर का जवाब नहीं। इन से बात बनाने में कोई दो हाथ कर के तो देखे ,मजाल है उनके बतियाते कोई अपनी बात बीच में घुसेड़ सके। गलती से कहीं फोन लगा बैठे तो जनाब किसकी मजाल के उनके बोलते एक शब्द भी बोल पाए, फोन रखने की घोषणा के बाद भी बोलते रहने का फितूर भी लाजवाव ही ठहरा। कभी- कभार उन्हें टोककर भी देखिए पूरी की पूरी मार्केटिंग तकनीक समझा देंगे आपको,' अपनी बात पूरी रखनी है चाहे जैसे भी। ' मगर हमारी तरह क्या बोलूं , और कब इस उलझन से तो ये खानदानी रोग बेहतर है और हमारे जैसे सामाजिक मौनियों के लिए तो ये रोग कहाँ हुआ ,खानदानी हुनर हुआ।
अब बात जहाँ बात की है तब बात -बात में भी फर्क है जनाब। कुछ बातें तरकस में से तीर की तरह छूटती हैं और जाकर बींध देती है सामने वाले का सीना , कुछ बातें उबलते माड़ में से भाप सी उठकर पलभर में लोगो के नथुनों तक पहुंच जाती हैं। कुछ बातें गरीब की रोटी सी हलक में ही अटक कर रह जाती हैं कभी नीचे नहीं उतरती और कुछ बातें पूराने संदूक के उजाड़ कोने में दुबकी पड़ी रहती हैं ताउम्र। बातें गुलाब होती हैं ,बातें काँटों सी चुभ भी जाती हैं और जुगनू की तरह अँधेरे में रास्ता भी दिखाती हैं। बात -बात में फर्क तो यक़ीनन है साहब। खैर बात न कर पाने वालों को ईश्वर ने लिखने का हुनर बक्शा है। वहां नहीं तो यहीं दो -दो हाथ सही।
-मीना पाण्डेय

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ReplyDeleteMeena ji bahut badiya
ReplyDeleteबातें गुलाब होती हैं ,बातें काँटों सी चुभ भी जाती हैं और जुगनू की तरह अँधेरे में रास्ता भी दिखाती हैं। sahi kaha aapne. bahut achha likha
ReplyDeleteThanks to all
ReplyDeleteबहुत उम्दा
ReplyDelete👌
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