संवेदनाओं की सांझी पृष्ठभूमि पर रचा गया उपन्यास-'पाल की तीर्थयात्रा'
प्रकाशन -राजपाल एंड सन्स, दिल्ली
उपन्यासकार -अर्चना पैन्यूली
पृष्ठ -191
पृष्ठ -191
मूल्य -265 /-
संवेदनाओं की कोई भाषा नहीं होती व मुस्कान के बिखरे मोती और आंसुओं के खारेपन को देशों की परिधियां कहाँ कम ज्यादा कर पाती हैं? "वेयर डू आई बेलांग ' व् 'परिवर्तन' के बाद अर्चना पैन्यूली का तीसरा उपन्यास 'पाल की तीर्थयात्रा' राजपाल प्रकाशन से आया है। ये उपन्यास अंग्रेजी तथा हिंदी दोनों भाषाओँ में प्रकाशित है। लेखिका डेनमार्क में निवास करती है तथा मूल रूप से भारत से हैं। दो संस्कृतियों के भिन्न -भिन्न आचार -विचार, मूल्य-आदर्शों के मध्य समान भावनात्मक उथल -पुथल, समान इच्छाओं, सुख -दुःख, घृणा , प्रेम आदि संवेदनाओं की सांझी पृष्ठभूमि पर रचा गया यह उपन्यास कई मायनों में रोचक है। तलाक, पुनर्विवाह, डेटिंग, व् ब्रेकअप की संस्कृति का अभ्यस्त नायक पाल जब अपनी पूर्व पत्नी नीना की पुन्यतिथि पर 108 की. मी. की पैदल यात्रा कर पहुँचने का निश्चय करता है और उसे तीर्थयात्रा का नाम देता है तब पाठक प्रेम को उसकी घिसी -पीटी परिभाषा से अलग कर समझने का प्रयास करने लगता है। एक स्कॉटिश नागरिक पाल की मुलाकात भारतीय मूल की डेनमार्क में जन्मी नीना से होती है। दोनों विवाह का निश्चय करते हैं। दोनों के ही अपने पूर्वविवाह से दो बेटियां हैं। विवाह के बाद की स्थितियां तलाक, नीना के कैंसर से ग्रसित होने, नीना की मृत्यु आदि से जूझता हुआ अन्ततः पाल अपनी तीर्थयात्रा पूर्ण करता है।
लेखिका ने पाल का चरित्र बड़ी ही कुशलता से गढ़ा है। एक साधारण नायक जो अपने भीतर की छोटी -छोटी कमजोरियों से अक्सर न केवल दो -चार होता रहता है बल्कि संवेदना के स्तर पर, होने वाली घटनाओं के प्रति बेहद आम और प्राकर्तिक प्रतिक्रिया भी देता है। बस एक बात, लेखिका यदि नीना व् पाल के वास्तविक प्रेम व् अंतरंगता के कुछ और पल पाठकों के सामने रख पाती तब शायद पूर्व पति या प्रेमी द्वारा पैदल यात्रा के इतने बड़े निर्णय को अधिक बल मिलता। उपन्यास की भाषा प्रभावशाली है। घटनाओं का सूक्ष्म चित्रण पाठक को देर तक पात्रों से जोड़े रखता है। एक रोचक उपन्यास के लिए लेखिका को बधाई।
मीना पाण्डेय

