Thursday, August 31, 2017

अमृता प्रीतम के नाम




अमृता प्रीतम के नाम

तुम फिर आना अमृता
प्रेम की एक 
नई इबारत 
गढ़ने
लिखने ,कहने 
और
उससे बहुत पहले
जीने
प्रेम का
एक -एक लम्हा,

तुम लेकर वही
खुशशक्ल चेहरा,
मोहरा
सवाल पूछती
जवाब देती
दो आँखों  का
पैनापन ,

फिर आना अमृता
कि तुम्हारी
खुली किताब जिंदगी
बंद किताबों में
सबसे ज्यादा
खंगाली जाती है ,

तुम प्रेम का संकीर्तन
साहिर की बिसरी नज़्म
या इफरोज का कैनवास

अब दुनिया तुम्हें
इससे अलग
बांचना चाहती है  ।


-मीना पाण्डेय

Wednesday, August 30, 2017

मीना की मसखरी 😂😂

मीना की मसखरी 😂😂


भक्तों की टेलमटेल
पहुंचा बाबा जेल
भय ,झूठ,पाखंड का
ख़त्म हुआ अब खेल


ख़त्म हुआ अब खेल
निकला झूठा डेरा
बाबा के ठाट-बाट में
दुष्कर्मों का फेरा

दुष्कर्मों का फेरा
बाबा हुआ उदास
सिरसा का राजमहल
न आया उसको रास

न आया उसको रास
अब तो चेत जाओ
ढोंगी निकला बाबा
भक्तों तालियां बजाओ

भक्तो तालियां बजाओ
छोड़ो अंधविश्वास
ऐड़ा भी न डालेगा
अब बाबा को घास

अब बाबा को घास
डालो देख -भाल को
बाबा जेल पहुंचा  
पूरे बीस साल को।


(मीना पांडेय )

Tuesday, August 29, 2017

स्वाद संयुक्ता --भट की दाल का पौष्टिक हलवा


मित्रों सोयाबीन के आकार के दानें मगर चटक काले  रंग की भट की दाल मुख्यतः उत्तराखंड के क्षेत्रों में पायी जाती है।  वहां पर इसकी (चुड़काणी) एक तरह की दाल व् डुबके ( इसे पीसकर) बनाये जाते हैं। आज हम आपके लिए पौष्टिक  भट  की दाल का स्वादिष्ट हलवा लेकर आये हैं।  पढ़िए और जरूर बनाकर खाइए और खिलाइए और हमें भी बताइये कैसा लगा।

भट की दाल का हलवा 

आवश्यक सामग्री -
1 कप भट की दाल
1 /2 कप दूध
1 /2 कप दूध की मलाई
4 चम्मच घी
4 -5 छोटे टुकड़े चुकंदर के
इलायची पाउडर
चीनी स्वादानुसार

बनाने की विधि -सबसे पहले भट की दाल को  10 मिनट के लिए उबाल लें।  अब अच्छे से उसको 2 -3 बार साफ़ पानी से धोएं जब तक उसके छिलके निकल न जाएँ। 

अब भट की दाल सहित सभी सामग्री को मिक्सी में पीस लें।  फिर एक कड़ाई में घी गर्म कर सारी सामग्री को धीमी आँच में भून लें।  अब  बीच -बीच में थोड़ा -थोड़ा घी हलवे में डालते रहें।  हलवा अच्छे से पक जाये तो उसको सुगंध आने लगती है।  अब  आधा चम्मच इलायची पाउडर मिला लें।
काजू व् किशमिश से सजाकर गरमा -गर्म परोसे।

गायत्री घुघत्याल
ग़ाज़ियाबाद , उ. प्र .




Sunday, August 27, 2017

हिंदी फिल्म जगत को कत्थक गुरुओं का योगदान



     कत्थक नृत्य उत्तर भारत की शास्त्रीय नृत्य शैली के रूप में विश्वविख्यात है। इसका सम्बंध मूलतः मन्दिरों से माना जाता है जहाँ पर कथा वाचक विभिन्न पौराणिक ऐतिहासिक संदर्भो व कथाओं को गाकर अभिनय के साथ प्रस्तुत किया करते थे मुगलों म  के शासन काल में यह नृत्यकला मन्दिरों  से निकल कर नवाबों के दरबारों व महफ़िलों   की शोभा बनकर रह गई और यहीं से इस नृत्य में श्रृंगारिकता ने प्रवेश पाया। बिट्रिश शासन काल तो भारतीय कलाओं विशेषकर संगीत व नृत्य की दृष्टि से अवोन्नति का काल माना जाता है। फिर भी कुछ हिन्दू राजाओं व मुस्लिम नवाबों के दरबारों में यह नृत्य कला अबाध गति से चलती रही और  सीमित क्षेत्र होने के कारण जनसाधारण से कट गई। इसी कालखण्ड में तवायफों के कोठों से भी कथक के बोलों की आवाज सुनाई पड़ने लगी। लखनऊ की जोहराबाई और गौहरजान आदि तवायफों का ज़िक्र कथक की विकास यात्रा में देखने को मिलता है। ये दोनों ही महाराज बिन्दादीन जी की गंडाबंध शागिर्द थीं।  तवायफों की दहलीज पर आने मात्र से समाज में इस नृत्य की छवि धूमिल हुई और इसके चलते इसे भोगविलासी नृत्य व निकृष्ठ श्रेणी के नाच के रूप में देखा जाने लगा।  20 वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध का काल शास्त्रीय नृत्य शैलियों के उन्नति का काल माना जाता है। इस काल में अनेक महान विभूतियों द्वारा इन नृत्य शैलियों को समाज में प्रतिष्ठा दिलाने व लोकप्रिय बनाने हेतु विभिन्न माध्यमों से प्रयास किए गए जिसके परिणामस्वरूप ये नृत्य शैलियाँ समाज में सम्मानजनक रूप में प्रतिष्ठित हुई। इन माध्यमों में फिल्में एक सशक्त माध्यम के रूप में सामने आती हैं।

      भारतवर्ष में नृत्य को संगीत कला के अन्तर्गत रखा गया है। आचार्य शारंगदेव ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ  संगीत रत्नाकर  में कहा है-- गीत वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं संगीत मुच्यते।  अर्थात गायन वादन और नृत्य ये तीनों ही मिलकर संगीत कहे जाते हैं। भारतीय फिल्मों का नृत्य संगीत से चोली दामन का साथ रहा है। यदि हम हिन्दी फिल्मों के इतिहास पर एक दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि 3 मई सन् 1913 को स्व0 दादा साहब फालके के द्वारा निर्मित प्रथम भारतीय मूक फिल्म राजा हरिश्चन्द्र का प्रदर्शन हुआ और फिर सन् 1929 में विश्व की पहली बोलती फिल्म यूनिवर्सल पिक्चर्स की मैलोडी आफ लव प्रदर्शित हुई। इसकी सफलता से भारतीय फिल्म निर्माताओं को प्रेरणा मिली और आदेशिर मारवान ईरानी की इम्पीरियल मूवी टोन कम्पनी के द्वारा पहली सवाक् फिल्म आलमआरा बनी। जिसका पहला प्रदर्शन 14 मार्च 1931 को बम्बई के मैजेस्टिक सिनेमा घर में किया गया । इस फिल्म में 6 गाने थे इस प्रकार फिल्मों में गीत संगीत का सफर 6 गीतो से शुरू होकर 1932 में बनी इन्द्रसभा में 71 गाने तक पहुँच गया। किसी फिल्म में 71 गाने होने का कीर्तिमान आज भी कायम है। यहाँ मैं यह भी बताती चलूँ कि बोलती  फ़िल्मों  के शुरूआती दौर में फिल्म संगीत राग रागिनियों  व शास्त्रीय शैलिया पर आधारित था। फिल्मों में जहाँ से गीत संगीत का प्रचलन शुरू हुआ सम्भवतः वहीं से नृत्यों ने भी प्रवेश पाया और नृत्य सम्बंधी कई सम्भावनाऐं बनती चली गई। अभिनेता व अभिनेत्री के लिए कुशल नृत्यांगना होना अतिरिक्त योग्यता मानी जाने लगी। फलस्वरूप नृत्य में पारंगत अनेक कलाकारो का फिल्मी संसार में पदार्पण हुआ साथ ही कुशल नृत्य निर्देशकों की भी माँग उत्तरोत्तर लगी। हिन्दी भाषी प्रदेशों की प्रतिनिधी शास्त्रीय नृत्य शैली कत्थक होने के कारण उन दिनांे फिल्मों में कत्थक का जम कर प्रयोग हुआ। यह वह समय था जिस समय सम्पूर्ण देश राजनैतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा था जिसका प्रभाव कला संस्कृति पर भी पड़ा। कलाकारों को इस समय वो यश व कीर्ति नही मिल पा रही थी जिसके वह हकदार थे। न ही उन्हें खुल कर अपनी प्रतिभा को दिखाने का अवसर ही मिल पा रहा था और शायद फिल्मों की बढ़ती हुई लोकप्रियता ने कहीं इन कलाकारों को यह भी अहसास कराया होगा कि एक लम्बे समय तक सीमित क्षेत्र व बन्धन में रह रहे कलाकारों व नृत्य दोनो को फिल्मों से विस्तार मिल सकेगा। अतः ऐसा प्रतीत होता है कि  अपनी कला को बचाए रखने व उसके उत्तरोत्तर विकास के लिए इन कलाकारों ने फिल्मों को माध्यम बनाया होगा। इस प्रकार जहाँ एक ओर फिल्मों को कुशल नृत्यकार व नृत्य निर्देशक मिले वहीं दूसरी ओर फिल्मों ने कथक को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।




 हिन्दी  फिल्मों में शास्त्रीय नृत्य कत्थक को महत्वपूर्ण स्थान प्रदान करने का श्रेय मुख्य रूप से लास्य सम्राट पं0 लच्छू महाराज, नटराज पं0 गोपीकृष्ण नृत्य साम्राज्ञी सितारा देवी पं0 ज्ञान शंकर पं0 गौरी शंकर रोशन कुमारी पं0 बिरजू महाराज आदि को जाता है। फिल्मों के शुरूआती दौर के नृत्य घरेलू जैसे औरतों का दादरा आदि या साधारण नृत्य जैसे- पल्टा लेकर घूम जाना- हाथ इधर-उधर हिला देना अथवा धीरे-धीरे कटि को आकम्पित करना जैसे होते थे। इन कलाकारों ने बड़े ही मर्यादित- कल्पनाशील व प्रयोगधर्मी नृत्यनिर्देशक के रूप में फिल्म जगत में अपनी पहचान बनाई। वर्तमान में फिल्मों में नृत्य निर्देशकों को जो सम्मान प्राप्त है उसका श्रेय भी मुख्य रूप से इन्हीं महानायकों  को जाता है। 
    लखनऊ घराने के शीर्षस्थ कलाकार लास्य सम्राट पं0 लच्छू महाराज का फिल्मी जीवन उपलब्धियों से भरा रहा । उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन में लगभग 150 फिल्मों में नृत्य निर्देशन किया। वे सिने डांस डायरेक्टर्स ऐसोसियेशन के अध्यक्ष भी रहे। । महाराज जी द्वारा नृत्य निर्देशित फिल्मों में मुख्य रूप से कैदी- रामराज्य घुँघरू परख  बारादरी काले बादल तमाशा शिकवा  मुगल  आजम  मुझे जीने दो तीसरी कसम एक ही रास्ता महल पर्वत में अपना डेरा वारिस  भरत मिलाप काला पानी ये दिल किसको दूँ  पाकीज़ा एक नज़र गाइड और जीवन मृत्यु शामिल हैं। महाराज जी  द्वारा नृत्य निर्देशित नृत्य संरचनाओ को देखने से लगता है कि वह फिल्मों में विषय के अनुकूल ही नृत्य तैयार किया करते थे। शास्त्रीय विषय में उन्होंने जहाँ एक ओर कथक के बोल व परन आदि का इस्तेमाल किया है वहीं अन्य विषयक नृत्यों में कथक के सुकोमल अंगभंगिमाओं का नपातुला इस्तेमाल कर उन नृत्यों को अलग पहचान दी। मुगल ए आजम, पाक़ीजा, कैदी, राम राज्य, घुँघरू भरत मिलाप गाइड आदि फिल्में इसकी उत्कृष्ट उदाहरण हैं। जीवन मृत्यु महाराज जी की अन्तिम फिल्म थी। एक अभिनेता के रूप में उन्होंनेन  फिल्म ’तपस्या’ तथा ’गुजारा’ में क्रमशः माण्डप ऋषि व नायिका के पिता का अभिनय किया।



फिल्मी दुनिया में सबसे कम उम्र के नृत्य निर्देशक होने का गौरव प्राप्त करने वाले पं0 गोपी कृष्ण का फिल्म जगत में पदार्पण मात्र 14 वर्ष की उम्र में फिल्म ‘साकी’ के नृत्य निर्देशन से हुआ। जिसमें उन्होंने दिलीप कुमार और मधुबाला को नृत्य सिखाया। फिल्म में मधुबाला का नृत्य देखकर अच्छे-अच्छे नृत्य निर्देशक आश्चर्यचकित रह गए। उन दिनों नृत्य में कमजोर मानी जाने वाली अभिनेत्री मधुबाला को गोपीकृष्ण के कुशल नृत्य निर्देशन से एक नृत्यांगना के रूप में पहचान मिली। फिर सन् 1950 में बनी व 1955 में रिलीज हुई फिल्म झनक-झनक पायल बाज में तो उन्होंने अपने नृत्यकौशल से दर्शकों  को ऐसा अभिभूत किया कि अब उनके पास फिल्मों का तांता लग गया। इस फिल्म के सम्बन्ध में ऐसा संदर्भ आता है कि निर्माता व्ही0 शान्ताराम की इच्छा थी कि वह पूरी तरह कथक पर आधारित कोई फिल्म बनाऐं। नर्तक गोपीकृष्ण को देखने के बाद उन्होंने फिल्म की कहानी तैयार करवाई। उस समय गोपीकृष्ण मात्र 17 वर्ष के थे जो फिल्म की नायिका संध्या के मुकाबले छोटे थे इसलिए निर्माता ने दो वर्ष की प्रतीक्षा के बाद फिल्म शुरू की।  इस फिल्म में अपने नृत्यकौशल द्वारा गोपीकृष्ण ने यह सिद्ध कर दिखाया कि कत्थक दरबारों व महफिलों का नृत्य नहीं  बल्कि शुद्ध शास्त्रीय नृत्य है। उनके द्वारा नृत्य निर्देशित फिल्मों में साकी आम्रपाली संघर्ष सूरज नाचघर कामदेवरति फूलों की सेज सम्पूर्ण रामायण अन्नदाता हर हर महादेव मेरी सूरत तेरी आँखें एन इवनिंग इन पेरिस चंदन का पलना उमरावजान राकी तृषाग्नि जिद्ी आँधिया परिणिता बागी संगदिल शगूफा चाचा चैधरी चिन्गारी गोलकुण्डा का कंैदी लहरें फिर वही दिल लाया हूँ हमराज किनारा सुरसंगम जब प्यार किसी से होता है रज़िया सुल्तान महबूबा नाचेमयूरी प्रमुख हैं। जय विक्रान्ता उनकी अन्तिम नृत्य निर्देशित फिल्म थी। एक नृत्य निर्देशक के अतिरिक्त पं0 गोपीकृष्ण ने झनक झनक पायल बाजे नाचघर कामदेवरति फूलों की सेज सम्पूर्ण रामायण मुगल  आजम अन्नदाता आधियाँ परिणिता में एक कुशल अभिनेता व नर्तक के रूप में भी अपनी विशिष्ठ पहचान बनाई। उन्होंने फिल्म जगत में नृत्य के दृश्यांे को फिल्माने के लिए कई नए प्रयोग भी किए। जिनमें प्रणय व स्वप्न दृश्यांे वाले गीतों में नृत्य को स्लो मोशन में दिखाने की बात हो या फिर समूह नृत्यों को फीचर के रूप में फिल्माने का लोकप्रिय चलन, ये सब फिल्म जगत को उन्हीं की देन है। कत्थक जगत को दी गई सेवाओं के लिए उन्होंने पद्मश्री सम्मान से भी सम्मानित किया गया। सितारा देवी नाम के ही अनुरूप अपने ज्ञानप्रकाश से नृत्य जगत व फिल्म जगत को प्रकाशमय करने वाली सम्भवतः पहली घरानेदार नृत्यागना हैं। जिनका फिल्म जगत में पदार्पण लगभग 13 वर्ष की उम्र में निर्माता निर्देशक निरंजन शर्मा की 1934 में बनी फिल्म उषाहरण में नृत्यांगना के रूप में हुआ। अपने फिल्मी जीवन में उन्होंने लगभग बीस-बाईस फिल्मों में बतौर नायिका व नृत्यांगना के रूप में कार्य किया। जिनमें प्रमुख रुप से उषाहरण  वतन  नगमा  होली  रोटी धीरज हलचल मदर इंडिया सोसाईटी दुख -सुख  नदी किनारे स्वामी व अंजली आदि शामिल हैं। फिल्म नग़मा में उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ। हिन्द पिक्चर्स फिल्म कम्पनी प्रारम्भ कर सितारा देवी ने कुछ फिल्मों का भी निर्माण किया। 50 के दशक में फिल्मांे से सन्यास लेने वाली सितारा देवी की अन्तिम फिल्म अन्जली थी। कत्थक नृत्य में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए उन्होंने पद्मश्री से सम्मानित किया गया। नृत्यजगत में शंकर के नाम से जाने जाने वाले पं0 ज्ञान शंकर का फिल्मों में प्रवेश 1947 के आसपास हुआ। उन्होंने लगभग 180 हिन्दी व पंजाबी फिल्मों में नृत्य निर्देशन दिया। जिनमें बावरे नैन अफसाना- अमृतमंथन- अहसान- मै शादी करने चला -पाकेटमार प्रीत के गीत- सावन भादो- पवन बसंती प्रमुख हैं। पवन बसंती इनकी आखिरी फिल्म थी। ज्ञान शंकर ने अफसाना व पवन बसंती में अभिनय भी किया।
    कथक के जयपुर घराने के सुविख्यात नृत्याचार्य पं0 गौरी शंकर का भी सिने जगत को अविस्मरणीय योगदान रहा। उनके द्वारा नृत्य निर्देशित फिल्मों में मुख्य रूप से तीन बŸाी चार रास्ते परछाई वीरअर्जुन जलपरी आदि शामिल हैं। इसी घराने की सुविख्यात  नृत्यांगना रोशन कुमारी ने झांसी की रानी- मिर्जा गा़लिब- वारिस- परिणिता बसंतबहार- जलसाघर- औलाद अयोध्यापति आदि अनेक चलचित्रों के माध्यम से अपनी विशिष्ठ पहचान बनाई।                     
      वर्तमान समय में कत्थक नृत्य के पर्याय बन चुके पं0 बिरजू महाराज ने शतरंज के खिलाड़ी- देवदास जैसी फिल्मों में नृत्य निर्देशन कर एक लम्बे अन्तराल के बाद फिल्मों में नृत्यों को पुनः कलात्मकता प्रदान की। इन महान कलाकारो ने जहाँ एक ओर अपने अथक परिश्रम द्वारा सामान्य फिल्मी कथानको को अपने नृत्य- निर्देशन व अभिनय के माध्यम से समृद्ध कर फिल्म जगत में अपना उदाहरण प्रस्तुत किया वही कत्थक नृत्य को जनसाधारण से जोड़ने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य भी किया। इसका परिणाम यह हुआ की इस नृत्य कला के प्रति जो एक नकारात्मक सोच समाज की बन गई थी उसमें परिवर्तन आया और बिना किसी हिचकिचाहट के लोग इन नृत्यांे को मंच पर प्रस्तुत कर स्वयं को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। पहले की नृत्य रचनाऐं अधिकांशतः शास्त्रीय संगीत पर आधारित होती थी या फिर शुद्ध शास्त्रीय न भी हो तो शिष्ट जरूर होती थी। उनमें प्रयुक्त वेशभूषा व अंगभंगिमाओ की दृष्टि से भी वह आज की फिल्मों से कई दर्जे ऊपर है। पं0 गोपी कृष्ण के इस विषय पर विचार कुछ इस प्रकार है- -कि मेरे द्वारा निर्देशित फिल्मों की मुजरेंवालियाँ भी आज के शरीफ घरो की बहू - बेटियांे से अधिक शालीन नृत्य किया करती थी उदाहरण के लिए आप फिल्म उमरावजान देख सकते हैं- वर्तमान में संचार माध्यमों के बढ़ते प्रभाव से व्यक्ति का दुनिया से सीधा सम्पर्क स्थापित हो गया जिसका परिणाम यह देखने में आता है कि पाश्चात्य संस्कृति की ओर हम ज्यादा आकृष्ट हुए हैं। ऐसा कहा जाता है कि फिल्में समाज का आईना होती है अतः इसके प्रभाव से फिल्मे भी अछूती न रह पाई । जिसकी परिणति फिल्मों में 
प्रदर्शित  नग्न बेहुदा अर्थहीन नृत्यो के रूप में प्रायः देखने को मिलती है। जिन्हें परिवार के साथ बैठकर देखा नहीं जा सकता है और यदि कहीं किसी रूप में शास्त्रीय नृत्य को स्थान भी दिया गया है तो उसे तोड़ मरोड़कर विकृत रूप में उसकी आत्मा को नष्ट करके। और हाँ एक जो परम्परा फ्यूजन की चल पड़ी है वह अपने आप में एक कन्फ्यूजन जान पड़ता है। क्यों न हो वर्तमान में तो कुछ लीक से अलग करके पहचान बनाने की होड़ जो लगी है। पं0 लच्छू महाराज का वर्तमान नृत्य के सम्बंध में मानना था कि ’’आज पर्दे पर दिखाया जाने वाला नृत्य वस्तुतः असांस्कृतिक व अर्थहीन है मनोरंजन के नाम पर कामोŸोजक नृत्य पेश किए जाते है। बेतुके तरीके से पैर पटकना- कूल्हे मटकाना -वक्ष दिखाना और अंग प्रदर्शन यानि शरीर को आगे पीछे दांये बांये घुमाना । रिद्म के साथ हवा में हाथ पैर चलाऐ जाते हैं जिनका कोई अर्थ नहीं होता- लोक नृत्यों के नाम पर रंबा संबा दिखाया जाता है बेतुके यौन प्रर्दशन की भरमार आ गई है। और ये नृत्य ही फिल्मी नृत्य बन कर रह गया है।
फिल्मी नृत्यों की इस स्थिति से आप और हम सभी भली-भांति परिचित हैं। माना कि फिल्म एक व्यवसाय है लेकिन व्यवसाय के भी अपने कुछ नैतिक मापदण्ड होते है जो उसे उन्नति की ओर ले जाते है। यदि हम फिल्मों के इतिहास को समझने का प्रयास करते है तो पाते हैं कि उस समय के कलाकारों व निर्देशकों ने भी इसे निश्चित रूप से व्यवसाय के रूप में अपनाया और बड़े ही शिष्ट ढंग से नृत्यों का परिचय रखते हुए फिल्मों के कथानकों की माँग को पूरा किया।
उन्होंने अपनी कला के साथ कभी भी हल्के दर्जे का समझौता नहीं किया। तभी तो वह नृत्य गीत आज की चकाचैंध वाली सभ्यता के बीच आज भी ज़िन्दा है। परन्तु अब तो इनकी स्थिती बड़ी ही भयावह है। आज फिल्मों में एक तरह का सांगीतिक प्रदूषण देखने को मिल रहा है। फिल्मों में नृत्यों के गिरते हुए स्तर से सभी कथक कलाकार व विद्धान चिन्तित है और समय-समय पर उनका दर्द उनके वक्तव्यों के माध्यम से सामने आता रहा है। अब प्रश्न यह उठता है कि इसके लिए जिम्मेदार कौन है क्या निर्माता निर्देशक नृत्य निर्देशक, नर्तक या फिर दर्शक



डा0 दीपा जोशी
कत्थक नृत्यांगना 

राष्ट्रीय ख्याति के बीसवे अम्बिकाप्रसाद दिव्य पुरस्कारों हेतु पुस्तकें आमंत्रित ।


"साहित्य सदन" भोपाल द्वारा राष्ट्रीय ख्याति के बीसवे अम्बिकाप्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारों हेतु साहित्य की अनेक विधाओं में पुस्तकें आमंत्रित की गई हैं । उपन्यास , कहानी , कविता , व्यंग , निबन्ध एवं बाल साहित्य विधाओं पर प्रत्येक के लिए इक्कीस सौ रुपये राशि के पुरस्कार प्रदान किये जायेंगे । दिव्य पुरस्कारों हेतु पुस्तकों की दो प्रतियाँ , लेखक के दो चित्र एवं प्रत्येक विधा की प्रविष्टि के साथ 200 /- दो सौ रुपये प्रवेश शुल्क भेजना होगा । हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों की मुद्रण अवधि 1 जनवरी2015 से लेकर 31 दिसम्बर 2017 के मध्य होना चाहिये । राष्ट्रीय ख्याति के इन प्रतिष्ठापूर्ण चर्चित दिव्य पुरस्कारों हेतु प्राप्त पुस्तकों पर गुणवत्ता के क्रम में दूसरे स्थान पर आने वाली पुस्तकों को दिव्य प्रशस्ति पत्रों से सम्मानित किया जायेगा ।
अन्य जानकारी हेतु मोबाइल नं. 09977782777 और दूरभाष : 0755-2494777 , एवं ईमेल : jagdishkinjalk@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है ।
पुस्तकें भेजने का पता है :
श्रीमती राजो किंजल्क ,
साहित्य सदन ,
145-ए , सांईनाथ नगर , सी सेक्टर ,
कोलार रोड , भोपाल - 462042
पुस्तकें प्राप्त करने की अंतिम तिथि 30 दिसम्बर 2017 है ।
कृपया प्रेषित पुस्तकों पर पेन से कोई भी शब्द न लिखें ।



जगदीश किंजल्क 
संयोजक: दिव्य पुरस्कार 
साहित्य सदन,145-ए,
सांईनाथ नगर ,
सी-सेक्टर, कोलार रोड,
भोपाल-462042
संपर्क-09977782777 / 0755-2494777

Saturday, August 26, 2017

रंगमंच कार्यशाला




उत्तराँचल भ्रातृ समिति के तत्वाधान में शालीमार गार्डन एक्स (गाजि) में विगत रविवार को रंगमंच कार्यशाला श्रंखला की चौथी कड़ी श्री राकेश शर्मा के नेतृतव में संपन्न हुई।  राकेश शर्मा जिनकी रंगमंच की शुरुआत सन १९८३  से दिल्ली की जानी- मानी रंगमंच कलाकार श्रीमती मोहनी माथुर जिन्होंने कई फिल्मो जिसमे मकड़ी, हे राम सहित कई टी वी धारावाहिकों में कार्य किया है, के सानिध्य में शुरू हुआ। वर्तमान में राकेश शर्मा हिंदी एकेडमी, साहित्य कला परिषद व सी. सी. आर. टी. के साथ कार्य कर रहे हैं.

रंगमंच की इस कार्यशाला में बच्चों को दृश्य बंधन पर कार्य कराया गया व किसी चरित्र का अभिनय कैसे किया जाय इन बारीकियों में प्रशिक्षण दिया गया जैसे बाप-बेटा, दादी-पोता, चोर-पुलिस आदि पर संवाद व प्रतिक्रिया इत्यादि प्रमुख रही.


किरन पांडेय पंत की दो कविताएँ

एक शब्द वक़्त बेवक़्त मेरे इर्द गिर्द रहता है| 
या टूट के बिखरा हुआ
या रूप सा निखरा हुए 
एक दर्द की बारिश मे सींचा हुआ गुलाब लगे 
तो एक प्रेम की बोछार मे भीगा हुआ गुलाब लगे ;
एक विगत स्वप्न से आहत सा 
एक भावी स्वप्न मे खोया सा ;
प्रेम को मैंने जीते देखा है 
प्रेम को मैंने मरते भी 
प्रेम को मैंने हँस ते देखा है 
प्रेम को मैंने रोते भी 
अगर माने यही प्रेम की सम्पूर्णता का सार है।
तो मान लीजिये ऐसा प्रेम कभी मरता नहीं।
जनम लेता हर युग मे सौ बार है।


2
अरुणा शानबाग को श्रद्धांजली -
क्या ज़िन्दगी थी वो, क्या मौत है
सब का साथ था ये और बात है
सोई रही मैं बरस के बरस
क्या जवानी थी वो,क्या बुढ़ापा है।
रूह कुचल चुकी थी 
साँस रह रह के चल रही थी
फिर भी मन के भीतर
कोई बात चल रही थी
क्या सैतान था वो,क्या इंसान है ये
जा रही हूँ छोड़ के मेरे अपने है कुछ 
खून का न सही रूह का रिश्ता है
मगर जा रही हूँ छोड़ के
क्या दुनिया थी वो, क्या दुनिया होगी वो।


किरन पांडेय पंत 
हल्द्वानी ,उत्तराखंड 

कुछ बातें


कुछ बातें तरकस में से तीर की तरह छूटती  हैं और जाकर बींध  देती है सामने वाले का सीना , कुछ बातें उबलते माड़ में से भाप सी उठकर पलभर में लोगो के नथुनों तक पहुंच जाती हैं। कुछ बातें गरीब की रोटी सी हलक में ही अटक कर  रह जाती हैं कभी नीचे नहीं उतरती और कुछ बातें पूराने संदूक के उजाड़ कोने में दुबकी पड़ी रहती हैं ताउम्र। बातें गुलाब होती हैं ,बातें काँटों सी चुभ भी जाती हैं और जुगनू की तरह अँधेरे में रास्ता भी दिखाती हैं। बात -बात में फर्क तो यक़ीनन है साहब। खैर बात कर पाने वालों को ईश्वर ने लिखने का हुनर बक्शा है। वहां नहीं तो यहीं दो -दो हाथ सही।