Sunday, April 21, 2019

डॉ रमेश चन्द्र साह को पढ़ते हुए

                    अंतर्मुखी किंतु स्वयं से संवाद के स्तर पर बातूनी चरित्र


डॉ रमेश चन्द्र साह के कथा चरित्रों की विशेषता है कि वह अंतर्मुखी होते हुए भी  स्वयं से वार्तालाप के स्तर पर बेहद वाचाल प्रतीत होते हैं। उपन्यास आखरी दिन का नायक कथा के भीतर मुख से बहुत अधिक कुछ बोलता दिखाई नहीं देता परंतु स्वयं से उसका संवाद बिना किसी व्यवधान के निरंतर जारी रहता है। यही प्रवृत्ति हम उपन्यास आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू वह पुनर्वास में भी देखते हैं, जहां पर नायकों का स्वयं के साथ एक निरंतर संवाद चलता रहता है। मन व मस्तिष्क के मध्य यह संवाद चिंतन की कई परतें खोलता है। यह आत्मलाप कथा की आवश्यकता भी है। इसी के माध्यम से उपन्यास अपना रचनात्मक विस्तार पाता है। यह संवाद कभी स्थिति और परिस्थितियों को एक दर्शक के रूप में देखते हुए उन पर परिहास करता दिखाई देता है।यथा उपन्यास आखिरी दिन-

" मैं अपने को डराने की हरचंद कोशिश कर रहा हूं, यह देखकर मुझे हंसी आ रही है। पता नहीं, क्या बात है कि मुझे डर जैसा महसूस ही नहीं हो पा रहा है। यह मुझे भगवान जाने हो क्या गया है। मैं डर नहीं रहा हूं-  जबकि डरना स्वाभाविक है। क्या यह चिंता की बात नहीं है? क्या मुझे इस पर खुश होना चाहिए? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मेरी समझ भी जैसे मेरी घड़ी की तरह ही बंद हो गई है। जाने कैसे। अभी  पिछले माह ही तो मैंने नया सेल लगवाया था इसमें। हो सकता है, सीलन घुस गई हो इसमें या फिर बेहोशी के दौरान यह गिर पड़ी हो जमीन पर। मगर ताज्जुब की बात है कि वे और तो अपने जाने मुझे अच्छी तरह से नंगा कर गए। वो घड़ी ही जाने क्यों रह जाने दी मेरे पास उन्होंने। शायद उनका ध्यान ही नहीं गया इस पर,या भूल गए। या फिर जान-बूझकर छोड़ गए की घड़ी पास में ना होने से घड़ी पास में हो ना कहीं ज्यादा तकलीफ दे होगा इस आदमी के लिए। हथकड़ी का काम की इसकी घड़ी ही कर देगी देख देख कर तड़पेगा।"

 तो कहीं जीवन जगत की  परिघटनाओं को अत्यंत दार्शनिक चश्मे से देखने लगता है।यथा आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू उपन्यास में विभूति बाबू का यह अत्मसंवाद -
" अभी यह खामखयाली नहीं तो क्या है? आखिर किसने जिया यह जीवन- अगर, मैंने ही नहीं तो? और यह कह कौन रहा है? कौन है यह 'मैं ', जिसे अपना सारा जिया- करा भी अपना जिया- करा जैसा नहीं लगता? मैं अगर इतना ही अलग और ऊपर हूं तो फिर क्यों इतना कलप रहा हूं? क्यों अपने साथ एक घड़ी चैन से नहीं बीता पाता मैं? क्यों मैं इधर कुछ दिनों से रात में सोने जाते हुए भी डरने लगा हूं और सुबह जागते हुए भी? क्यों,आखिर क्यों, आजकल रोज बिला नागा अपने ही एक और बदसूरत चेहरे से मुठभेड़ होती है ? जैसे आज तक कभी अपनी शक्ल ही ना देखी हो आईने में। तो क्या यहीं हूं मैं कुल मिलाकर? अपना ही व्यंग-विद्रूप?
 स्वयं के साथ नायक का यह संवाद लेखक को यह अवकाश देता है कि वह अपने सांस्कृतिक संदर्भ व दर्शन संबंधित ज्ञान से उपन्यास की कथावस्तु को समृद्ध कर सके। अपने कथा साहित्य में दार्शनिक चिंतन के विषय में बोलते हुए  एक साक्षात्कार के दौरान डॉ साह कहते हैं - 
"आम हिंदुस्तानी के लिए ज्ञान का मतलब आत्मज्ञान होता है, नॉलेज इंडस्ट्री नहीं। सामान्य से सामान्य आदमी में भी दार्शनिक संस्कार होता ही है ।वही मुझमें भी है। जीवन की स्वाभाविक दिशा, परिणति के रूप में वह रचनाओं में भी आएगा ही।"
 चिंतन का यह विस्तार डॉ रमेश चंद्र शाह के कथा साहित्य में प्रमुखता से उभर कर आया है। यही बौद्धिक चेतना वह दार्शनिक दृष्टिकोण लेखक की अध्ययन शीलता, बौद्धिकता को रेखांकित करता है। डॉ साह के पास आलोचनात्मक दृष्टि है तथा चिंतनशील परंपरा भी। यही दो चीजें उनके संपूर्ण कथा साहित्य को एक अलग स्थान प्रदान करती हैं। अपने उपन्यासों में लेखक जीवन की छोटी -बड़ी स्थितियों व घटनाओं का बेहद गहराई से विश्लेषण करता हुआ चिंतन की जिस उच्चता का स्पर्श अपने उपन्यासों में करता है वह पाठक से भी उत्कृष्ट ज्ञान व चिंतनशीलता की अपेक्षा रखता है। दार्शनिक चेतना का यही विस्तार कहीं-कहीं उनके लेखन को सामान्य पाठक के लिए दुसाध्य भी बना देता है। परंतु यही रचनात्मकता की वास्तविक कसौटी भी है कि वह पाठक को हर बार और अधिक गहनता से चिंतन के लिए प्रेरित करें।यथा- उपन्यास आखिरी दिन का यह कथन-
"  वह मेरा सिर धड़ से अलग करने की सोच सकते हैं। सोच क्या, कर भी सकते हैं अपनी समझ से।उन्हें क्या पता मेरे सिर की सरहदें अब इस कदर फैल चुकी हैं कि उनके सिर के भी आर-पार होकर गुजर गई हैं। काश! मैं वो सब कुछ उन्हें बता सकता जो इस मकान ने मुझे बताया। काश, में उन्हें वह सब दिखा और सुना सकता।क्यों नहीं वह मुझे थोड़ी सी मोहलत और बख्श देते!"
 इसी तरह आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू उपन्यास का यह कथन उनकी दार्शनिक चिंतन शीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है-

" वह जन्मा, वह जिया वह मर गया'- देखा जाए तो हर जीवनी का कुल निचोड़ क्या इतना ही हाथ नहीं लगता? तो क्या यही आत्मकथा है? आखिर क्या कारण है कि हमें वही चीजें, वही लोग और वही जगहें अपनी तरफ खींचती हैं जो हमसे काफी अलग वह काफी दूर हों? यह बात दूसरी है कि लोट फिर कर हम आते तो अंततःअपने ही पास हैं। इसका मतलब.... क्या यही नहीं हुआ की  अपने में लौटने के लिए,अपना बासीपन झाड़ने के लिए भी, अपने से बाहर निकलना जरूरी होता है? पर क्या हम बाहर निकल कर भी सचमुच बाहर निकल पाते हैं? अपने को एकदम पीछे छोड़कर? अपने को एकदम भूल कर?"

मीना पांडेय