हिंदी कथा साहित्य के इतिहास का एक अनूठा अध्याय है गौरा पंत शिवानी। उनकी कहानियों में पहाड़ व वहां का परिवेश अत्यंत मुखर रुप में सामने आया है इसीलिए उन्हें देव भूमि उत्तराखंड की लेखिका के रूप में भी जाना जाता है।इस ओर उनकी कहानियों पर कुमाऊं के प्रति विशेष लगाव दृष्टिगोचर होने के आरोप लगते रहे मगर यह भी सत्य है कि शिवानी हिन्दी की सबसे ज्यादा पड़ी जाने वाली लेखिकाओं में हैं।कहानी के क्षेत्र में पाठकों की रुचि को निर्मित करना तथा कहानी को केंद्रीय विधा के रूप में विकसित करने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनकी कहानियों को बार-बार पढ़ने की जिज्ञासा होती है।
गौरा पंत शिवानी का जन्म १७ अक्टूबर १९२३ को राजकोट, गुजरात मे हुआ था। इनकी शिक्षा-दीक्षा शन्तिनिकेतन में हुई।शिवानी की कृतियों में अगर नारी चित्रण की बात की जाए तो उनकी कहानियों में स्त्री की व्यथा और सामाजिक बंधनों से जूझती स्त्रीयों को बड़े ही सजीवता व संजीदगी से उकेरा गया है।उनकी कलम मन की गहरे, भीतर तक जाकर अंदर की व्यथा, दर्द, प्रेम की पीर को आंखों तक पहुंचाने का काम करती है।
शिवानी की कहानियों में विविधता होने के बावजूद भी उनकी कहानी के केंद्र में नारी ही रही है। चाहे वह नारी की सामाजिक दशा हो चाहे सांस्कृतिक, धार्मिक रुढ़ियों को झेलती स्त्री हो, चाहे पुरुष के अहंकार के आगे खड़ी विवश स्त्री।उनकी कहानियों में मुख्यतः मध्यम वर्गीय नारी चरित्रों का चित्रण अधिक मिलता है,चाहे वह कस्बाई हो , नगरीय या महानगरीय।
नारी सम्वेदनाओं को चित्रित करते हुए शिवानी के दो दर्जन से ज्यादा कृतियां हैं जिनमें सुरंगमा, भैरवी,कालंदी ,अपराधिनी,मायापुरी , चौदह फेरे, रतिविलाप, विषकन्या, कस्तूरी मणिमाला की हँसी, आदि प्रमुख हैं।
नारी सम्वेदनाओं को चित्रित करते हुए शिवानी के दो दर्जन से ज्यादा कृतियां हैं जिनमें सुरंगमा, भैरवी,कालंदी ,अपराधिनी,मायापुरी , चौदह फेरे, रतिविलाप, विषकन्या, कस्तूरी मणिमाला की हँसी, आदि प्रमुख हैं।
शिवानी कृत "जिलाधीश"" अपराजिता" वह उपहार उनकी मुख्य कृतियों में से हैं, जिन में नारियों का चित्रण आर्थिक रुप से संपन्न, आत्मनिर्भर और शिक्षित के रूप में किया गया है फिर भी शिवानी ने अपनी कहानी के माध्यम से अनेक प्रकार की समस्याओं के बीच नारी की विवशता का बड़ी ही सजीवता से चित्रण किया है। उनकी 'जिलाधीश 'कहानी की पात्र 'सुमन 'भी अत्यधिक प्रतिभावान, शिक्षित ,आत्मनिर्भर होते हुए भी विवाह संबंधी प्रश्नों से गुजरती विवश चित्रित हुई है, उसी प्रकार अपराजिता कहानी की नायिका आरती भी जिलाधिश की नायिका सुमन की भांति ही सामाजिक रुढ़ियों का दंश झेलती ही चित्रित हुई है। इन कहानियों की नायिकाएं शिक्षित होते हुए भी पुरुष के सम्मुख लाचार व विवश दिखाई दी हैं। पुरुषप्रधान समाज में मात्र सेवा, त्याग, समर्पण की पर्याय समझी जाने वाली स्त्रियों की दशा को उन्होंने बखूबी अपनी कृतियों के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया है।शिवानी ने अपनी कहानियों में मध्यम एवं निम्न वर्गीय जीवन से संबंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं से दो -चार होती नारी पात्रों का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है। उनकी 'श्राप' कहानी की पात्र दिव्या भी कुछ ऐसे ही दंश को झेलकर दहेज की भेंट चढ़ जाती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि शिवानी की कहानियां स्त्री को स्त्री होने का बोध कराती हैं। जिस रचनाकार का अनुभव क्षेत्र इतना व्यापक हो उनकी रचनाओं में विविधता सर्वाधिक स्वाभाविक है।
किरन पंत
