एक निष्कलंक 'शरीर यात्रा'
पुस्तक -शरीर यात्रा (आत्मकथा )
लेखक - पद्मश्री डा. यशोधर मठपाल
पृष्ठ -418
मूल्य -400 /-
एक कुशल चित्रकार, पुरातत्ववेता व् लोकसंस्कृति संग्रहालय, भीमताल के संस्थापाल पद्मश्री डा. यशोधर मठपाल की आत्मकथा 'शरीर यात्रा ' मेरे हाथों में है। पुस्तक का शीर्षक ही पाठक को सर्वप्रथम वो दृष्टि दे जाता है जो प्रत्येक पृष्ठ से गुजरते हुए उसके साथ रहती है। लेखक का गीता व् मानस जैसे ग्रंथों का गहन अध्ययन है, इस भौतिक जगत के प्रति उनकी एक विशिष्ट दृष्टि है। 'शरीर यात्रा ' स्वयं में लेखक के दर्शन , मनन,चिंतन के विभिन्न आयामों का ही दर्पण बन हमारे सम्मुख उपस्थित होती है। अपने पूर्वकथन में लेखक इस जगत को दुखालय कहकर सम्बोधित करता है। अतः कर्त्तव्य पथ पर चलते हुए संघर्ष की जो यात्रा लेखक तय करता है उसका लेखा जोखा ही है ये आत्मकथा।
एक चित्रकार के संघर्षशील, सीधे सरल, फक्कड़, घुमन्तु एवं कला साधक जीवन का ब्यौरा बड़ी ही साफगोही से मिलता है यहाँ। सीधी -सपाट बयानी के साथ जब बिना किसी झूठे आवरण का आश्रय लिए लेखक अपने बेहद कष्टकारी परन्तु प्रेरणास्पद जीवन के पहलुओं को पाठक के समक्ष रखते हैं तब पाठक उन्हीं के जीवन संसार का एक हिस्सा स्वयं को भी मानने लगता है। चित्रकार होते हुए भी उन्होंने अपनी आत्मकथा को अनावश्यक रंग -रोगन से दूर रखा है। बाहर -भीतर की यही वास्तविकता उनकी कला में दिखाई देती है। साधारण कलेवर परन्तु उत्कृष्ट छपाई के साथ 418 पृष्ठीय आत्मकथा दस चरणों में विभाजित है। अंतिम दो पारिशिष्टों में लेखक के कुछ अन्य आकस्मिक अनुभवों व् उनकी स्नेहवत्सला माँ की महिमा का वर्णन है तथा अंतिम भाग में लेखक ने अपने जीवन वृत्त को छायाचित्रों के माधयम से दर्शाया है। आत्मकथा का आरम्भ लेखक के इन मार्मिक शब्दों के साथ होता ही है "हाँ , यह आश्चर्य है महा आश्चर्य की जिसके जन्म लेते ही उसकी जननी का दूध बंद हो गया वह सत्तर वर्ष की आयु में अपनी राम कहानी लिखने के लिए जीवित है। "
प्रथम चरण में लेखक अपने जन्म,पालन पोषण व् प्रारंभिक शिक्षा का ब्यौरा देते हुए तत्कालीन कुमाऊं में प्रचलित हस्तशिल्प व् कारीगरी का पाठक से परिचय कराता है। द्वितीय चरण लेखक के स्कूल आने -जाने के रास्ते, छुट्टियों में नैनिहाल जाने की उत्सुकता व् बालयकाल की अन्य स्मृतियों से सम्बंधित है। तीसरे व् चौथे चरण में क्रमशः कुमाऊं के एक खूबसूरत शहर रानीखेत का व् चित्रकला को लेकर लेखक के संकल्प दृढ़ करने से सम्बंधित है। पंचम चरण कला साधना के पथ पर बढ़ते हुए उनके संघर्ष व् त्याग के अर्थ में महत्वपूर्ण है,जिसने भविष्य में उन्हें एक उत्कृष्ट चित्रकार के रूप में पविष्ट किया। षष्ठम चरण की सबसे पड़ी घटना लेखक का विवाह है। सप्तम चरण उनके शोध कार्य व् पुरातत्व खोजों से जुड़ा है। अष्ठम चरण भोपाल में राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में नौकरी से जुड़े अनुभवों तथा विभिन्न यात्राओं से सम्बंधित है। नवम चरण के प्राम्भ में लेखक अपने गृह नगर वापस लौटते हैं और संस्कृति संग्रहालय की भावभूमि तैयार होती है। इसी चरण के अंत में उनकी विदेश यात्राओं का रोचक वर्णन है। दशम चरण पुस्तक का सबसे लम्बा चरण है। शरीर यात्रा सिद्धांतों पर जीवन जीने वाले एक कर्मठ, साहसी, एक आम इंसान की आत्मकथा है। अपने पूर्वकथन में लेखक आत्मकथा को अहंकार पुष्ठन मानते हैं परन्तु नई पीढ़ी के प्रेरणा ग्रहण करने के अर्थ में इसकी उपयोगिता स्वीकार्य करते है। इस ओर अपने उदेश्य में वे सर्वतः सफल होते दिखाई दिए हैंं। यदा कदा स्वयं तथा अन्य चरित्रों के वर्णन में व्यंग्य -मिश्रित अभिव्यक्ति रोचकता पैदा करती है। ;यहाँ कुमाऊं अंचल की खुशबू तो है ही लेकिन वहां के रीति -रिवाजों , खान -पान व् परिवेश का विस्तृत परिचय सम्पूर्ण भारत के लोकजीवन को समझने की दृष्टि से इस पुस्तक को सर्वग्राह्य बनाता है। एक निष्कलंक ;शरीर यात्रा' के लिए लेखक को बधाई।
चर्चाकार -मीना पाण्डेय
पुस्तक -शरीर यात्रा (आत्मकथा )
लेखक - पद्मश्री डा. यशोधर मठपाल
पृष्ठ -418
मूल्य -400 /-
एक कुशल चित्रकार, पुरातत्ववेता व् लोकसंस्कृति संग्रहालय, भीमताल के संस्थापाल पद्मश्री डा. यशोधर मठपाल की आत्मकथा 'शरीर यात्रा ' मेरे हाथों में है। पुस्तक का शीर्षक ही पाठक को सर्वप्रथम वो दृष्टि दे जाता है जो प्रत्येक पृष्ठ से गुजरते हुए उसके साथ रहती है। लेखक का गीता व् मानस जैसे ग्रंथों का गहन अध्ययन है, इस भौतिक जगत के प्रति उनकी एक विशिष्ट दृष्टि है। 'शरीर यात्रा ' स्वयं में लेखक के दर्शन , मनन,चिंतन के विभिन्न आयामों का ही दर्पण बन हमारे सम्मुख उपस्थित होती है। अपने पूर्वकथन में लेखक इस जगत को दुखालय कहकर सम्बोधित करता है। अतः कर्त्तव्य पथ पर चलते हुए संघर्ष की जो यात्रा लेखक तय करता है उसका लेखा जोखा ही है ये आत्मकथा।
एक चित्रकार के संघर्षशील, सीधे सरल, फक्कड़, घुमन्तु एवं कला साधक जीवन का ब्यौरा बड़ी ही साफगोही से मिलता है यहाँ। सीधी -सपाट बयानी के साथ जब बिना किसी झूठे आवरण का आश्रय लिए लेखक अपने बेहद कष्टकारी परन्तु प्रेरणास्पद जीवन के पहलुओं को पाठक के समक्ष रखते हैं तब पाठक उन्हीं के जीवन संसार का एक हिस्सा स्वयं को भी मानने लगता है। चित्रकार होते हुए भी उन्होंने अपनी आत्मकथा को अनावश्यक रंग -रोगन से दूर रखा है। बाहर -भीतर की यही वास्तविकता उनकी कला में दिखाई देती है। साधारण कलेवर परन्तु उत्कृष्ट छपाई के साथ 418 पृष्ठीय आत्मकथा दस चरणों में विभाजित है। अंतिम दो पारिशिष्टों में लेखक के कुछ अन्य आकस्मिक अनुभवों व् उनकी स्नेहवत्सला माँ की महिमा का वर्णन है तथा अंतिम भाग में लेखक ने अपने जीवन वृत्त को छायाचित्रों के माधयम से दर्शाया है। आत्मकथा का आरम्भ लेखक के इन मार्मिक शब्दों के साथ होता ही है "हाँ , यह आश्चर्य है महा आश्चर्य की जिसके जन्म लेते ही उसकी जननी का दूध बंद हो गया वह सत्तर वर्ष की आयु में अपनी राम कहानी लिखने के लिए जीवित है। "
प्रथम चरण में लेखक अपने जन्म,पालन पोषण व् प्रारंभिक शिक्षा का ब्यौरा देते हुए तत्कालीन कुमाऊं में प्रचलित हस्तशिल्प व् कारीगरी का पाठक से परिचय कराता है। द्वितीय चरण लेखक के स्कूल आने -जाने के रास्ते, छुट्टियों में नैनिहाल जाने की उत्सुकता व् बालयकाल की अन्य स्मृतियों से सम्बंधित है। तीसरे व् चौथे चरण में क्रमशः कुमाऊं के एक खूबसूरत शहर रानीखेत का व् चित्रकला को लेकर लेखक के संकल्प दृढ़ करने से सम्बंधित है। पंचम चरण कला साधना के पथ पर बढ़ते हुए उनके संघर्ष व् त्याग के अर्थ में महत्वपूर्ण है,जिसने भविष्य में उन्हें एक उत्कृष्ट चित्रकार के रूप में पविष्ट किया। षष्ठम चरण की सबसे पड़ी घटना लेखक का विवाह है। सप्तम चरण उनके शोध कार्य व् पुरातत्व खोजों से जुड़ा है। अष्ठम चरण भोपाल में राष्ट्रीय मानव संग्रहालय में नौकरी से जुड़े अनुभवों तथा विभिन्न यात्राओं से सम्बंधित है। नवम चरण के प्राम्भ में लेखक अपने गृह नगर वापस लौटते हैं और संस्कृति संग्रहालय की भावभूमि तैयार होती है। इसी चरण के अंत में उनकी विदेश यात्राओं का रोचक वर्णन है। दशम चरण पुस्तक का सबसे लम्बा चरण है। शरीर यात्रा सिद्धांतों पर जीवन जीने वाले एक कर्मठ, साहसी, एक आम इंसान की आत्मकथा है। अपने पूर्वकथन में लेखक आत्मकथा को अहंकार पुष्ठन मानते हैं परन्तु नई पीढ़ी के प्रेरणा ग्रहण करने के अर्थ में इसकी उपयोगिता स्वीकार्य करते है। इस ओर अपने उदेश्य में वे सर्वतः सफल होते दिखाई दिए हैंं। यदा कदा स्वयं तथा अन्य चरित्रों के वर्णन में व्यंग्य -मिश्रित अभिव्यक्ति रोचकता पैदा करती है। ;यहाँ कुमाऊं अंचल की खुशबू तो है ही लेकिन वहां के रीति -रिवाजों , खान -पान व् परिवेश का विस्तृत परिचय सम्पूर्ण भारत के लोकजीवन को समझने की दृष्टि से इस पुस्तक को सर्वग्राह्य बनाता है। एक निष्कलंक ;शरीर यात्रा' के लिए लेखक को बधाई।
चर्चाकार -मीना पाण्डेय

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