Wednesday, November 18, 2020

"आधे अधूरे"-मोहन राकेश

  "आधे अधूरे"






मेरी प्रिय पुस्तक "आधे अधूरे"
नाटककार - मोहन राकेश
राधाकृष्ण प्रकाशन 1969

अभी तक के जीवन में मुझे सबसे उत्तम और सर्वश्रेष्ठ पुस्तक मोहन राकेश जी द्वारा रचित नाटक आधे अधूरे लगा। इसको पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है एक के बाद एक दृश्य आंखों के सामने घटित हो रहे हैं जैसे चलचित्र में नायक और नायिका का प्रेम प्रसंग और नोकझोंक के माध्यम से जो तकरार दिखाया जाता है ठीक उसी तरह हमें आधे अधूरे पढ़ते हुए आनंद आता है।
 यह एक ऐसी घटना है जो हमारे समाज में आसपास दिख जाती है। मध्यम वर्ग के घर में ऐसी स्थिति अकारण ही देखने को मिलती है । पूरे नाटक में भी सभी पात्रों में पूर्णता कहीं दिखाई नहीं देती है सभी अपूर्ण और विघटित ही नजर आते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं मोहन राकेश जी का शीर्षक आधे अधूरे सार्थक है।
  आधे अधूरे का सर्वप्रथम मंचन दिल्ली में दिशांतर द्वारा ओम शिवपुरी के निर्देशन में फरवरी 1969 ईस्वी में हुआ।निर्देशक ओम शिवपुरी ने इस नाटक के विषय में इस नाट्य कृति के आमुख में लिखा है कि "आधे अधूरे मुझे समकालीन जिंदगी का पहला सार्थक हिंदी नाटक लगता है। यह मौजूदा जीवन की विडंबना के कुछ एक सघन बिंदुओं को रेखांकित करता है।"

 मोहन राकेश जी के नाटकों में हमें मध्यवर्ग की पारिवारिक बिखराव, द्वंद्व, कुंठा, घुटन, अधूरापन और विघटन देखने को मिलती है। 
  आधे अधूरे के बारे में महेश आनंद जी का कथन है कि "यह नाटक विघटित होते हुए मध्यवर्गीय परिवार में व्याप्त कुंठाजन्य घुटन और उससे मुक्त होने की विवशता को पेश करता है। इसी के माध्यम से राकेश ने स्त्री-पुरुष के संबंधों के साथ असामंजस्य के प्रश्नों को भी उभारा है।"




       सभी एक घर में रहने के बावजूद अलग-थलग पड़े हुए हैं इसी परिप्रेक्ष्य में सवित्री एक स्थान पर कहती है - "असल में आदमी होने के लिए यह जरूरी है कि उसमें अपना एक मादा अपनी एक शख्सियत हो उसका पति नाम के अलावा कुछ नहीं केवल मांस का लोथड़ा है।"
सावित्री के कथन में -" मेरे पास अब बहुत दिन नहीं है जीने को, पर जितने हैं उसे इसी तरह और निभाते हुए नहीं काटूंगी। मेरे करने से जो कुछ हो सकता था इस घर का वह हो चुका आजतक। मेरी ओर से यह अंत है उसका निश्चिंत अंत।"
महेंद्र नाथ नाटक में एक स्थान पर कहते हैं कि "मैं इस घर में एक रबड़ स्टैंप भी नहीं सिर्फ एक रबड़ का टुकड़ा हूं बार-बार घिस जाने वाला रबड़ का टुकड़ा इसके बाद क्या कोई मुझे बता सकता है ? एक भी ऐसी वजह क्यों मुझे रहना चाहिए इस घर में।"

 इस तरह हम पूरे नाटक में सभी पात्रों में एक अधूरापन और खोखलापन देखते हैं।

नाटक की सार्थकता की हम बात करें तो नाटक पढ़ते हुए हमें ऐसा लगता है कि हम आसपास की किसी घर में हो रही द्वंद्व स्थिति को देख रहे हैं। नाटक में कहीं भी उबाऊपन पढ़ने से महसूस नहीं होता है बल्कि जैसे-जैसे पढ़ते जाते हैं रोचकता तीव्र गति से और बढ़ती जाती है। शुरू में तो ऐसा लगता है कि महेंद्रनाथ ही सारा दोषी है जो घर में बैठा रहता है और सावित्री काम पर जाती है, घर भी संभालती है परंतु अंत तक जाते-जाते मालूम होता है कि सावित्री को महेंद्रनाथ में एक अधूरा पुरुष दिखाई देता है और वह सभी में एक पूर्ण पुरुष की तलाश करती रहती है परंतु उसे किसी में भी एक पूर्ण पुरुष नजर नहीं आता। यही कारण है कि वह अंत तक उसी घर में लड़ाई झगड़ा के बावजूद, मानसिक तनाव के बावजूद रह रही हैं।
परिवार जिससे चलती है स्त्री और पुरुष। जब उसी दोनों में संघर्ष हो तो परिवार का बिखरना लाजमी है और इसे ही मोहन राकेश जी ने आधे अधूरे नाटक में दिखाया है कि यहां पर सभी कुछ आधा अधूरा सा है। 
सबसे रोचक मुझे अशोक -किन्नी  और किन्नी- बिन्नी की बातों के संवाद में जब तर्क वितर्क होता है तब लगता किन्नी उस घर में रहकर जिद्दी हो गई है वहीं अशोक कुछ करना चाहता लेकिन कर नहीं पाता है, ठीक महेंद्रनाथ अपने पिता की तरह को शुरू में व्यवसाय शुरू किए जो डूब गया तो हार मान गए ।
इस तरह हम देखते हैं आधे अधूरे मोहन राकेश जी के द्वारा रचित नाटक आज भी प्रासंगिक है। यही कारण है कि आज भी नाटक मंच पर इसकी प्रस्तुति देखने को मिल जाती हैं। और यही कारण है कि मुझे लगता है इसे बार-बार पर हूं और अन्य लोगों को भी इस नाटक को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।


संतोष कुमार वर्मा ' कविराज '
कांकिनाड़ा, कोलकाता
उत्तर 24 परगना
पश्चिम बंगाल
संपर्क सूत्र - 09681835197
ईमेल - skverma0531@gmail.com

मोहन राकेश कृत ' आषाढ का एक दिन '

 मोहन राकेश कृत ' आषाढ का एक दिन '




अपने जीवन के वर्तमान समय तक मैंने जितनी भी पुस्तकें पढ़ी है उनमें सबसे श्रेष्ठ और उत्तम किताब मोहन राकेश कृत ' आषाढ का एक दिन ' नाटक  मुझे बेहद आकर्षित करती है । इसका पहला कारण यह है कि ' आषाढ का एक दिन ' महाकवि कालिदास के निजी जीवन पर आधारित है साथ ही इस नाटक का परिवेश ऐतिहासिक होने के अतिरिक्त आज की आधुनिक समस्याओं से अवगत करवाने में पूर्ण रूप से सक्षम है । दूसरी बात यह है कि इस नाटक में कालिदास कोई तपस्वी साधु या संत नहीं है बल्कि वह एक दुर्बल और साधारण व्यक्ति है जो कर्तव्य हीन , ज्ञान शून्य, स्वार्थी , पलायनवादी, आत्मसीमित कवि के रूप प्रस्तुत होता है। नाटककार मोहन राकेश ने विश्व प्रसिद्ध कवि कालिदास को कल्पना और मिथ की मदद से एक आधुनिक सजीव चरित्र का निर्माण किया है जो सृजन शक्तियों का प्रतीक है।

प्रस्तुत नाटक तीन अंकों में विभाजित है। समय का अंतराल होने पर भी प्रहमयी कथानक में बनी है। जिज्ञासा और कौतूहल पाठको में बरकार बनी हुई है। नाटक की शुरूआत मल्लिका के झोपड़ी से होती है। आषाढ़ की पहली बारिश में भींग कर वह आती है और अपनी माँ से अपना अनुभव को बताती है : " मुझे भींगने का तनिक भी खेद नहीं है। भींगती नहीं तो आज मैं वंचित रह जाती.... मेरा तो शरीर भी निचुड़ रहा है। मां। कितना पानी इन वस्त्रों ने पिया है। ओह ! सौन्दर्य का ऐसा साक्षात्कार मैंने कभी नहीं किया। जैसे वह सौन्दर्य अस्पृश्य होते हुए भी मांसल हो ।" मल्लिका इस नाटक की नायिका कालिदास से बेहद प्रेम करती है। उसका प्रेम भावनामयी है। इसलिए वह कालिदास को उज्जैन भेजने के लिए प्रेरित करती है ताकि उसका सृजन क्षेत्र इस ग्रामीण क्षेत्र में संकुचित ना हो जाए। कालिदास उज्जैन जाकर एक महान कवि अवश्य बन जाता है वह अपनी प्रेयसी मल्लिका को केवल सहानुभूति ही दे पाता है और कुछ भी नहीं। वह गुप्त सम्राट का राज कवि और फिर कश्मीर का शासक बन जाता है। लेकिन गांव की सरस प्रकृति और मल्लिका का सहज स्वाभाविक प्रेम की मादक स्मृति उसे फिर से गांव की पर्वतीय प्रकृति में वापस ले आता है मल्लिका उस समय विलोम की पत्नी और एक बेटी की मां बन जाती है। वह कालिदास के साथ जाना चाहती है किन्तु मां की ममत्व उसे उसके घर में बांध देती है। उधर प्रियंगु मंजरी भी कालिदास की बेचैनी को समझती है पर वह इसे मल्लिका की तरह मन पर भावनाओं को नहीं आने देती है।




इस नाटक की प्रासंगिकता आज के सन्दर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण है। कालिदास के व्यक्तित्व और व्यवहार के माध्यम से नाटककार ने उसके अहम का विस्फोट बताया है यानि कि पुरुष स्वभाव से ही आत्मवादी और अहम पीड़ित रहा करता है। वह मात्र अपने लिए जीना जानता है। घर परिवार या स्त्री से सम्बन्ध भी वह अपने अहम की तृप्ति के लिए ही स्थापित किया करता है। इसी कारण कालिदास जैसा व्यक्ति अकेलेपन में जीने को मजबूर हो जाता है। दूसरी बात यह सामने आती है कि व्यक्ति का अन्तर्द्वन्द व्यक्ति को कुंठित बना देता है। नाटककार ने यह भी प्रकाश डालने का प्रयास किया है कि राज्यश्रय और राजनीति सर्जक कलाकार की सृजन प्रतिभा को न केवल कुंठित करके रख देती है, बल्कि तोड़कर रख देती है। इस नाटक में स्त्री सम्बन्धी समस्या आधुनिक युग बोध में सार्थक रूप से उभर कर सामने आई है। मल्लिका रूपी आधुनिक स्त्री का चित्रण हुआ है । वह कहती है : " मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है। वह उसे नष्ट करना चाहती है तो किसी को उस पर आलोचना करने का क्या अधिकार है ? " जितना प्रेम वह कालिदास से करती है उतनी ही घृणा विलोम से करती है। परन्तु वह अपनी परिस्थिति के लिए कहीं भी कालिदास को नहीं ठहराती है।

1959 ई. में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नाटक होने  के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1971 ई. में निर्देशक मनि कौल ने इस पर आधारित एक फिल्म बनाई जिसने आगे जाकर साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार जीत लिया। इस नाटक को आधुनिक युग का प्रथम नाटक भी कहा जाता है।

और अंत में गोविन्द चातक के शब्दों में मैं यही कहना चाहती हूं कि " आज के सन्दर्भ मे कालिदास इसलिए सार्थक लगता है उसे हम अपने युग की विडंबनाओ के बीच खड़ा पाते हैं। समस्या मूलतः अलगाव और विच्छिन्नता की है। अपने मूल और परिवेश से उखाड़ कर वह अकेलेपन, संत्रास और संबंधहीनता के जिस वातावरण में धकेल दिया जाता है, वह आधुनिक मानव की नियति बन गया है।"



अनीता कुमारी ठाकुर
कार्यरत : शिक्षिका ( मटिया बुर्ज कॉलेज, कोलकाता पश्चिम बंगाल )
पता : पी - 156, ब्रह्म समाज लेन
         कोलकाता 700024
          पश्चिम बंगाल
संपर्क नंबर : 9903196750
ईमेल आईडी : anitathakur45632@gmail.com

अमृतलाल नागर जी का उपन्यास 'भूख'


'भूख' 



मैं अब तक हिंदी की कविताओं, कहानियों और उपन्यासों की लगभग तीन सौ पुस्तकें पढ़ चुका हूँ और इतनी बड़ी फ़ेहरिस्त में से किसी एक किताब का नाम बता पाना यद्यपि कोई आसान काम नहीं है, तथापि यदि किसी एक ही किताब का नाम लेना हो तो मैं हिंदी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार अमृतलाल नागर जी के उपन्यास 'भूख' का नाम लूँगा। क्योंकि मुझे लगता है भूख ही वह पुस्तक हो सकती है जिसे मैं अपनी पसंद की पुस्तकों में सर्वोपरि रख सकता हूँ। आज से दस वर्ष पहले अपनी स्नातक की पढ़ाई के दौरान मैंने यह उपन्यास पढ़ा था और तब से अब तक लगभग पाँच बार इस उपन्यास को पढ़ चुका हूँ। इस उपन्यास का कथानक सन् 43 के बंग-दुर्भिक्ष पर आधारित है। उन दिनों जब बंगाल में यह भीषण अकाल पड़ा था, नागर जी बम्बई में अपने फ़िल्म लेखन के कार्य में व्यस्त थे। लेकिन प्रतिदिन समाचार पत्रों में बंगाल के अकाल की झकझोर कर रख देने वाली ख़बरों को पढ़-पढ़कर नागर जी इतने द्रवित हो उठे थे कि उन्होंने बंगाल जाकर स्वयं वहां की स्थिति को अपनी आँखों से देखने का निर्णय लिया। तदुपरांत उस अकाल में मनुष्य की चरम दयनीयता और परम दानवता के दृश्य नागर जी ने कलकत्ता जाकर वहां की सड़कों पर अपनी आँखों से देखे थे।

द्वितीय महायुद्ध में उलझी हुई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और निहित स्वार्थों से परे अफ़सरों और व्यापारियों के षड्यंत्रों के चलते हज़ारों लोग भूखों तड़प-तड़पकर मरने को विवश हुए, सैकड़ों गृहिणियाँ वैश्याएँ बना दी गईं और सैकड़ों बच्चे गुलामों की तरह दो मुट्ठी चावल के मोल बिक गये। इस उपन्यास में नागर जी ने यह सब कुछ अंकित किया है। यह उपन्यास आपको अंत तक बाँधे रखेगा और इसे पढ़ते समय आपको लगेगा कि सब कुछ आपकी आँखों के सामने ही घटित हो रहा है। साथ ही इस उपन्यास में ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जिन्हें पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएँगे और कई जगहों पर आपकी आँखें छलक उठेंगी। इस उपन्यास को पढ़कर आप समझ पाएँगे कि भूख में कितनी ताकत होती है। भूख बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को भी उन्मादी बनाकर उससे कैसे-कैसे कुकृत्य करवा सकती है? देखें -

'अकाल शुरू होने से दो महीने पहले बेनी का विवाह हुआ था। वह अपनी पत्नी के सौंदर्य पर मुग्ध था। उसकी पत्नी भी उसे जी जान से चाहती थी। लेकिन ब्याह की मेहंदी का रंग अभी फीका भी नहीं पड़ा था कि अकाल शुरू हो गया और मृत्यु की विभीषिका सारे गाँव को निगलने लगी। फिर एक दिन जब निरन्तर चार दिनों तक भूख से लड़ने के बाद उसकी पत्नी अपनी मृत्यु की अंतिम साँसें ले रही थी तो बेनी ने सोचा कि यदि यह मर गई तो मुझसे सदा के लिए बिछड़ जाएगी और इसे कुत्ते खा जाएँगे। अतः मुझे इसे ऐसी जगह छिपाकर रखना चाहिए जहाँ इसे कुत्ते न देख पाएँ। फिर अचानक बेनी को खयाल आता है कि मुझे इसे अपने कलेजे में ही छिपाकर रखना चाहिए। यह विचार आते ही बेनी गंडासा उठाता है और मृत्यु शय्या पर पड़ी अपनी पत्नी के प्राण निकलने से पूर्व ही उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर डालता है। फिर पत्नी को कलेजे में छिपाकर रखने के लिए उसके शव के छोटे-छोटे टुकड़ों को मुँह में भरकर उन्हें चबाने लग जाता है।; 

ऐसा ही उन्माद भरा एक दूसरा उदाहरण देखिए -

'गाँव के मंदिर में एक पुजारी अपनी पत्नी, चार बच्चों, विधवा बहन, एक गाय और उसके बछड़े के साथ रहता था। अकाल पड़ने पर दाने-दाने को मोहताज पुजारी कई दिनों तक सपरिवार भूख से लड़ता रहा। लेकिन गाँव के दूसरे बच्चों की तरह अपने बच्चों को भी दिन पर दिन मौत के मुँह में जाता देख एक दिन साहस खो बैठता है और अपनी पत्नी और बहन को गाँव के अनाथालय, जहाँ से औरतें शहर ले जाकर बेच दी जाती थीं, में पहुँचाकर चार मुट्ठी चावल लाने का निश्चय करता है। इस बात का पता चलते ही पुजारी की पत्नी और विधवा बहन अपने तन की धोतियाँ उतारकर घर में फाँसी लगा लेती हैं। पुजारी जब अनाथालय के आदमियों के साथ घर लौटता है तो अपनी पत्नी और बहन के रूप में दो नंगी टंगी हुई लाशों को पाता है और पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है। वह मरना चाहता है, लेकिन बच्चों का मुँह देखकर उसे जीने के लिए बाध्य होना पड़ता है। इसी तरह लगातार भूख से लड़ते हुए कुछ और दिन बीत जाने पर जब एक दिन भूख असह्य हो उठती है और भूखे बच्चों का पेट भरने का पुजारी को कोई चारा नहीं दिखता तो घर में रखीं देवी-देवताओं की मूर्तियाँ फेंककर पुजारी अपनी गाय को ही मारकर उसके माँस से अपने बच्चों का पेट भरने का फ़ैसला करता है। युगों-युगों से बंधे मन को, हिंदुत्व और ब्राह्मणत्व की चेतना को पुजारी की भूख झटका देकर तोड़ देती है और पुजारी गंडासे के एक ही वार से गाय की गर्दन उसके धड़ से अलग कर देता है। लेकिन गो-वध के पश्चात उसकी चेतना लौट आती है और वह पुनः पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है और अपने बच्चों सहित स्वयं भी विष पीकर आत्महत्या का विचार कर बैठता है। चारों बच्चों को विष पिलाकर जैसे ही पुजारी विष पीने के लिए अपना मुँह खोलता है, भूख से वह बछड़ा रम्भाने लगता है जिसकी माँ की पुजारी हत्या कर चुका होता है। पुजारी विष नहीं पी पाता और ज़ोर से चीखता हुआ वहाँ से बाहर दौड़ पड़ता है। पुजारी विक्षिप्त हो जाता है।'

उपन्यास में इस तरह की उन्माद भरी अनेक घटनाएँ हैं। कई ऐसी घटनाएँ भी हैं, जिन्हें पढ़कर आप बुरी तरह संवेदना से भर उठेंगे। जैसे, एक आठ साल की बच्ची की मृत्यु पर जैसे ही उसके पिता और चाचा उसे चिता की लकड़ियों पर लिटाते हैं, अचानक गिद्धों का एक झुंड लड़की के शव पर टूट पड़ता है। पिता और चाचा को जान बचाने के लिए वहाँ से दौड़कर अलग होना पड़ता है। ऐसी ही एक दूसरी घटना में एक वृद्धा को कहीं से एक मुट्ठी चावल मिल जाते हैं। भूख से पीड़ित वह वृद्धा उन चावलों को कच्चा ही चबाने लग जाती है। लेकिन कई दिनों तक खाली पेट रहने के बाद कच्चे चावल उसे हजम नहीं होते और वह वमन कर देती है। लेकिन उन चावलों का मोह, जो उसने बड़ी मुश्किल से कहीं से पाए थे, वृद्धा नहीं छोड़ पाती और वमन किये गये चावलों को पुनः उदरस्थ करने लगती है।

बंगाल के अकाल में भूख ने मौत का जो तांडव किया था, इस उपन्यास में नागर जी ने उसका सजीव चित्रण किया है। 'भूख' नागर जी का पहला उपन्यास है, जो सन् 1946 में 'महाकाल' शीर्षक से भारती भंडार, लीडर प्रेस, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था। इसके बाद सन् 1970 में 'भूख' शीर्षक के साथ राजपाल एण्ड सन्स से प्रकाशित हुआ। शीर्षक बदलने की वजह यह रही कि 'महाकाल' नाम सुनते ही बहुत से लोग इसे पौराणिक उपन्यास समझने लगते थे। अतः प्रकाशक के इस आग्रह पर कि शीर्षक बदल देना चाहिए, नागर जी ने इसे 'भूख' शीर्षक दिया।

'भूख' उपन्यास के रचनाकार अमृतलाल नागर जी का जन्म एक  सुसंस्कृत गुजराती परिवार में 17 अगस्त, 1916 ई. को गोकुलपुरा, आगरा, उत्तर प्रदेश में उनकी ननिहाल में हुआ था। उनके पितामह पण्डित शिवराम नागर 1895 ई. से लखनऊ आकर बस गए थे। उनके पिता पण्डित राजाराम नागर की मृत्यु के समय नागर जी कुल 19 वर्ष के थे। नागर जी ने शुरुआत में 'मेघराज इंद्र' नाम से कविताएँ लिखीं, 'तसलीम लखनवी' नाम से व्यंग्यपूर्ण लेख व निबंध लिखे। कहानियों के लिए अमृतलाल नागर मूल नाम रखा। नागर जी ने अनेक उपन्यास, कहानी-संग्रह, नाटक व व्यंग्य लिखे। उन्होंने रेडियो-नाटक, रिपोर्ताज, निबन्ध, संस्मरण, अनुवाद, बाल साहित्य आदि के क्षेत्र में भी बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। यद्यपि साहित्य जगत् में उन्हें उपन्यासकार के रूप में ही सर्वाधिक ख्याति प्राप्त हुई तथापि उनका हास्य-व्यंग्य लेखन भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। नागर जी को अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। उन्हें उनके उपन्यास 'अमृत और विष' पर 1967 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। 23 फ़रवरी, 1990 को नागर जी पंचतत्त्व में विलीन हो गये।

 

यदि आप यह लेख पढ़ रहे हैं तो मेरा आपसे आग्रह है कि आप एक बार इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ें। 'भूख' बंगाल के अकाल की समस्या का चित्रण करते हुए मृत्यु की रोमांचकारी गाथा के साथ जीवन की महत्ता का वर्णन करने वाला एक ऐसा उपन्यास है, जिसे न पढ़ना इस उपन्यास के साथ नहीं बल्कि बतौर पाठक आपका अपने ही साथ अन्याय होगा। मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि इस मर्मस्पर्शी उपन्यास को पढ़ने के बाद आप अपने घर में अन्न का एक भी दाना बर्बाद करने अथवा होने देने से पहले एक बार सोचेंगे ज़रूर। नागर जी की स्मृतियों को नमन !

     

आदित्य कुमार राय

कविताओं की दो किताबें एक उपन्यास ‘श्वान पुराण’ प्रकाशित।

संप्रति : सेल्फ इम्प्लॉयड।

पता : ग्राम- सेमलपुरा, पोस्ट- शहदौरा

तहसील- किच्छा, ज़िला- ऊधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड

संपर्क : 06397518112

मेल : adityarai1008@gmail.com



Sunday, November 8, 2020

शत प्रतिशत-कहो किताब


 शत प्रतिशत

लेखिका - डाॅ. हंसा दीप

प्रकाशक - किताबगंज प्रकाशन, राजस्थान

संस्करण - प्रथम, 2020

संपादन - डाॅं. प्रमोद सागा


किताब शत प्रतिशत कहानियों पर आधारित किताब है। यह किताब संवेदनशीलता, भावनात्मकता के विभकन्न रंगों को दर्शाती है। समाज के आयाम बताती है। अहसासों जज्बातों को उजागर करती है।




कहानी 'शत प्रतिशत' में साशा नाम का किरदार है। कहानी में पात्र व्यथित है, परेशान है। एकमात्र उसकी मित्र लीसा ही उसे दिलासा देती है। लीसा को अपनी बांहों मे भरकर साशा रोता है। वह भी रोती है जोर-जोर से। दिल दहल रहा था उसका। दोनों के कांपते शरीर एक दूसरे को सांत्वना देते हैं। एक ट्रक एक्सीडेंट के  बाद साशा के व्यवहार में परिवर्तन आता है। अब एक नयी सोच के साथ शत प्रतिशत परिवर्तित व्यक्ति था साशा। कहानी इंसान की जिंदगी में परिवर्तन की बात कहती है। कहानी 'पन्ने जो पढ़े नहीं, में बताया गया है कि इंसान किस प्रकार से अपने अहसानों का प्रतिफल लेता है अपनी ही शिष्या के जिस्म से खेलकर। कहानी समझाती है कि इंसान वक्त आने पर अपने अहसानों का स्वयं ही चुकता कर लेता है। कहानी 'पूर्णविराम से पहले' बताती है कि किस तरह बिना किसी जान पहचान के भी बस परिचालिका एक शिक्षिका यात्री से टिकिट के पैसे नहीं लेती है। रोचक है जानना कि वह पैसे क्यों नहीं लेती है। 'कहानी 'कुकडँ कूँ' का अंदाज जुदा है। कहानी में मुस्कुराता चेहरा है। विशेष अभी शेष है' में लगता है कि जीवन में भले ही बहुत कुछ किया गया है फिर भी विशेष अभी शेष है, यानि काफी कुछ करने के लिए छूटा हुआ है। यह एक अलग तरह की काफी रोचक कहानी है। कहानी एक टुकड़ा समय का' में अपने पिता की चिता को अग्नि देते हुए, उसकी आंखों में जीत को बताया है। 'रायता' कहानी काफी रोचक व पठनीय है एक अलग पहलू को दर्शाती है। कहानी 'उसकी मुस्कान' मुस्कुराती हुए अपनी बात रखती है। कहानी 'प्रोफेसर साहब बताती है कि हमे अपने राइटस और डयूटीज के बारे में समझना चाहिए व जागरूक नागरिक बनना चाहिए। कहानी में एक प्रोफेसर साहब व छात्रा है जिसका नाम रश्मि है। वह प्रोफेसर साहब से शि़क्षा पाती है। एक दिन प्रोफेसर साहब ही उसकी अस्मिता को तार-तार कर देते है। और अहसानों के बोझ तले दबी रश्मि उस अनुचित व गलत का विरोध भी नहीं कर पाती। कहानी 'पूर्णविराम' में दो महिलाओं की बातों को दर्शाया गया है। कैसे हम किसी को भी बिना उसके जाने पहचाने गलत समझ लेते है। कुछ भी आखिर क्यों, क्यों जरूरत होती है इन सबकी। कहानी कुकडँ कूँ में गोलू ओर आलिया नाम के किरदार है। माही मां का मुस्कुराता हुआ चेहरा जो कह रहा था - यह कुकडूँ कूँ है बहू, इसे कोई सिखाता नहीं सब अपने आप सीख जाते हैं। कहानी विशेष अभी शेष है में सत्तर साल के आदेश बाबू सोच रहे है कि इतने साल कैसे निकले। कहानी में आदेश बाबू खुश थे। अब उन्होंने उम्र के नंबरों को दोहराना बंद कर दिया था। चिकू के चिकूपन से उन्हें प्यार हो जाता है। बहू के चिड़चिड़ाहट की वजह समझने लगे थे वे। डुग्गू के फोन से चिपकने की आदत को वक्त की जरूरत समझ कर अपना लेते है। सोचते है कि जीवन मिला है तो हर पल क्यों न जी लिया जाए। वे मरना नहीं चाहते, अभी तो बहुत कुछ शेष है जो उन्हें करना है। अब हर एक दिना नया होता है। और अपनी उपयोगिता को समझना, अपने योगदान को सराहता, अपनी विवशताओं पर हंसाता। सच अलग रूप अब सबके सामने था। जो शेष था वह बहुत विशेष था। कहानी एक टुकड़ा समय का में अपने पिता की चिता को अग्नि देते हुए, उसकी आंखों में जीत बताया है। प्रयाग आंसुओं के बीच कह रहा था अपने मन में - ‘‘आप रूके थे क्या मेरे लिए पांच मिनट’’ उसकी आंखों में जीत थी। उसका अपना समय था यह, एक पल की जीत ने सारे जीवन भर का बदला ले लिया था। जीवन भर की हताशा को धो दिया था। अब वे पांच मिनट उसके अपने थे। कौन बड़ा, कौन छोटा, पिता की चिता की अग्नि में वह सब कुछ जल चुका था। कहानी भूमि पात्र के इर्द गिर्द घूमती है। संवाद बहुत अच्छे है। कसम से, मेरे जमाने में यह सब होता न तो मैं तो

विश्वसुंदरी बन जाती

.....ना ना अमेरिका की राष्ट्रपति बन जाती

और नहीं तो क्या।

कहीं दिल मिले थे कहीें दिल जले थे। बहुत कुछ कहा गया था, बहुत कुछ कहा जाएगा। बात  जो निकली, लंबा सफर तय कर चुकी थी। कहानी उसकी मुस्कान बुलबुल नाम के पात्र के इर्द गिर्द घूमती है। पात्र अपने पिता को कहती है कि वह सामान्य बच्ची नहीं है वह पिता की और उस बूढ़े की बैसाखी है। शब्द एक सामान्य बच्ची के नहीं है। उनकी बेटी खास थी कि वे उसके सामने स्वयं को छोटा महसूस करने लगे। इतना छोटा कि वह उनका पिता हो और वे स्वयं उसकी संतान। बुलबुल मुस्कुराती है। वैसी ही मुस्कान जैसी बचपन मेें देती थी जब उसकी मनपसंद की कोई चीज उसके पप्पा के हाथों में होती थी। कहानी प्रोफेसर साहब दादाजी और उनकी पोती अनामिका की कहानी है बहुत ही रोचक और अनूठे अंदाज में लिखी गई है। कहानी में राइट्स और ड्यूटीज के मध्य अंतर समझाया गया है। प्रोफेसर साहब अपनी पोती को पढ़ाते है। प्रोफेसर साहब के सामने उनकी पीएच0डी0 की छात्रा नहीं थी बल्कि उनकी पोती थी। जो हाथ में काॅपी कलम लिए कुर्सी के हत्थे से सिर टिकाकर अपना झपकी लेने का अधिकार पा चुकी है। प्रोफेसर साहब लंबी सांस लेते हुए अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे।


यह किताब क्यों पढ़ी जानी चाहिएः-

किताब शत प्रतिशत सभी पाठकों को पढ़नी चाहिए। भावनाऐं , संवेदनशीलता, कलात्मकता, रोचकता, दिल में उमड़ती भावनाऐं, अहसासों की डोर थामें चलती जिंदगी को समझने के लिए, खिलखिलाती धूप जैसी कहानियां बीते वक्त के पन्नांे को पलटने में मदद करती है। जिससे पाठक अपना जुड़ाव महसूस करते है। पाठकों में यह किताब शुरूआत से अंत से रोचकता बनाए रखती है।


मनीष माना

अधिवक्ता व साहित्यकार

हनुमान नगर,

अग्रवाल गर्ल्स काॅलेज के पास,

गंगापुर सिटी - 322201

राजस्थान

मो0नं0 - 09928075267


 



 



 



 


 


Friday, November 6, 2020

राग दरबारी- श्री लाल शुक्ल

 राग दरबारी

कहो किताब ( चयनित प्रविष्टि-2)




आकाश वाणी लखनऊ के स्टूडियों में पधारे श्री लाल शुक्ल को पहली बार मैंने देखा। उनके साक्षात्कार की-रिकार्डिंग मुझे ही करनी थी। 40-45 मि0 की अवधि में जो मेरा अनुभव रहा, वह मेरे जीवन की बहुमूल्य थाती है। तेज़ तर्रार जु़बान और बेधड़क होकर बोलने का अन्दाज़ लिए श्री लाल शुक्ल को सुनने के लिए स्टूडियों में मेरे बहुत से साथी आ जुटे थे।

काफ़ी समय बाद शुक्ल जी पुस्तक ‘राग दरबारी’ मेरे हांथ लगी। हाथ में पुस्तक क्या आई जिज्ञासा और उत्सुकता ने मुझे जकड़ लिया जल्दी-जल्दी किताब पढ़कर ही दम लिया। इस बात को कई वर्ष बीत गए पर जब कभी भी यह पुस्तक मेरे हाथ में आई मैं उसे कहीं से भी पढ़ना शुरू कर देती हूँ और किताब छोड़ने का मन ही न करता। मैं क्या कहूँ इसकी बानगी आप ही देख लीजियें-

‘सनीचर अब तक बैठक में आ गया था। समझाते हुआ बोला ऐसी बात नहीं निकालनी चाहिये मुँह से धरती धरती चलो, आसमान की छाती न फाड़ो। आखिर कुसहर ने तुम्हे पैदा किया है।’

‘छोटे ने भुनभुना कर कहा- ‘कोई हमने स्टाम्प लगाकर दस्तखत की थीं कि हमें पैदा करो चले साले कही के पैदा करने वाले।’

बद्री बोले, बहुत हो गया छोटे अब ठन्ठे हो जाओ’

सबसे बड़ी खूबी भाषा की है। शुक्ल जी के शब्दों से चित्र खिंचता चला जाता है। गाँव का दृश्य आँखों के सामने फ़िल्म की रील की तरह आगे बढ़ता जाता है। पढ़ने वाला इतना डूब जाता हैं कि वह स्वयं पुस्तक का एक पात्र बन जाता है। वे शब्द, वे मुहावरे, यहाँ तक गाली गुफ़्तारी भी धड़ल्ले से उपन्यास को गति देते हैं। पाठक इस गति की रफ़्तार को पकड़ने की कोशिश करता है। उपर लिखित चन्द लाइनों से एक ऐसा चित्र बन जाता है कि पाठक प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है।

परिवेश को चित्र उकेरने में शुक्ल जी को महारथ हासिल है। पाठक पढ़ते-पढ़ते उन परिस्थितियों में खो जाता है। इतने बड़े उपन्यास में न जाने कितने दृश्य सामने आते हैं, परन्तु एक घटना के आरम्भ होने और समाप्त होने के बीच में लेखक ने ज़रा भी स्पेस नहीं छोड़ा है, होता यह है कि ज्यों-ज्यों हम आगे पढ़ते जाते हैं, रफ़्तार तेज़ और तेज होती चली जाती है। 335 पृष्ठ का यह उपन्यास ‘राग दरबारी’ मात्र उपन्यास ही नहीं है, यह एक प्रमाणिक सत्य का दस्तावेज़ लगता है। यह भारत के उस समय के गावँ, निवासी, परिस्थितियाँ, और हालात का सजीव चित्र लगता है।

साहित्य आकादमी पुरस्कार पाने वाला उपन्यास ‘राग दरबारी’ बड़ी निर्ममता से भारतीय समाज से एक परदा उठाता है। जिसके पीछे की सच्चाई अपने समग्र मूल रूप में सामने खड़ी दिखती है। पाठक सच्चाई को कैसे नकारे? कैसे आज़ाद भारत के वजूद को आत्म सात करें? व्यंग और सच्चाई का इतना सुन्दर उदाहरण हमें हिन्दी साहित्य में कहीं ढूँढ़े न मिलेगा। सच्चाई तो यह है कि सन् 1969 में इस उपन्यास का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण साहित्यिक घटना है। शुक्ल जी ने उपन्यास में एक ऐसे सच को उजागर किया हैं जो हमें चौंका देता है। आज़ादी के बरसों बाद सुख सुविधाओं से वंचित गाँव, जहाँ जंगल राज है, जहा-नियम कानून कुछ भी मायने नहीं रखते है, वह आज भी विद्यमान है, जबकि यह गाँव शहर से बहुत दूर नहीं है। कहावत ‘दिये तले अँधेरा’ चरितार्थ होती है।

मैं, राज कमल प्रकाशन को भी भाग्यशाली मानती हूँ; जिन्होंने इस उपन्यास के प्रकाशन का दायित्व निभाया। प्रकाशक के सहयोग से ही अपनी रचना का सुन्दरम रूप पाठकों के सामने लाया जा सकता है लेखक। ‘राग दरबारी’ जिस रूप में हमारे सामने है; उसके लिए प्रकाशक को साधुवाद।

हर भारतीय को यह उपन्यास पढ़ना चाहिए सामाजिक परिस्थितयाँ कितनी कुरूप हो सकती, यह सबको जानना चाहिये। गाँव के जिन घाघ पात्रों द्वारा आज़ादी की धज्जियाँ उड़ाकर रख दी जाती हैं-उनके कारनामों को लोग जानें और समझे। हर नौजवान इस उपन्यास को पढ़े, यद्यपि अब 70 वर्ष बीत रहें हैं आज़ादी के, फिर भी हमारे चारों ओर जो कुछ हो रहा है क्या वह इस उपन्यास के अंश में हमे नहीं मिलेगा? लोग पढ़ेें और इस बात का आकलन करें कि हमने कितनी प्रगति की है?

अफ़सोस तो इस बात का हैं कि आज कल पठन-पाठन का चलन बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, आज हम सब कुछ भूल कर लैपटाप, इन्टरनेट, और मोबाइल में उलझे हुए है। बड़े हो रहे बच्चे, युवा लड़के-लड़कियों ने पुस्तकों से दूरी बना ली है, यह दुःखद है। - नया सीखें, जाने, समझें पर अपनी विरासत को सहेजने के लिए भी चिन्तित रहें। पूरा का पूरा उपन्यास लगता है कि क़िस्सा गोई की फितरत के लपेटे में है।

एक बानगी देखिये-

'नवाब साहब सिर पीटने लगे चारों तफर एलान किया गया। ‘कोई शहज़ादे को चंगा कर दे। अन्त में एक बुजुर्ग हकीम आये, शहज़ादे को देख कर बोले- जहाँ पनाह आधी रियासत और शहज़ादी नहीं चाहिये। मेरी तो बस दरख़्वास्त मान ली जाए फिर शहज़ादे को चंगा करने का जिम्मा हमारा। दरख़्वास्त पेश करने के लिए तख़्लिया चाहिये। नवाब साहब भी वहाँ से हट गए। बेगम साहिबा हकीम साहब के सामने पेश की गयीं। हकीम ने कड़ी निगाह से बेगम को देखा, और कहा अगर शहज़ादे की जान प्यारी हैं तो साफ़ साफ बताइयेगा, यह शहज़ादा किसका लड़का है किसके लुत्फ़ से पैदा हुआ है-......... (और अन्त का वाक्य)........ उठबे भिश्ती की औलाद ..... और शहज़ादा उठकर बैठ गया।’

पाठक सांस रोके सारे प्रकरण को पढ़ जाता है पढ़ने वाले की उत्सुकता का ग्राफ़ शीर्ष पर पहुँच जाता है।

एक और उदाहरण प्रस्तुत है -

‘सारी बात रंगनाथ के समझ में आ गयी। नाम-ज़दगी का पर्चा आज ही दाख़िल किया जायेगा। अभी अभी इसवी वक़्त-सनीचर ने जोश से कहा-पर्चा पहले दाखिल करूँगा, नहाऊँगा बाद में। उसने चलताऊ नज़र गाँठ बाँधने वाले को देखने के लिए डाली कि उस पर रोआब पड़ा कि नहीं। पर नतीजा साफ था, सनीचर केे रोआब का असर सनीचर तक ही रह गया। जैसा कि हिन्दुस्तान का एशिया और अफ्रीका की नेता गीरी करने का दावा। वह इतमिनान से कहने लगा चलो अच्छा है तुम्ही प्रधान बन जाओं। किसी न किसी को तो होना ही है। हिकारत के साथ उसने कहा, गाँव पचायत क्या है? सरकारी चोचला।

यह उपन्यास आम आदमी को क्यों आकर्षित करता है- इसके मूल में है इसकी भाषा। ज़िन्दगी उदास-ग़मग़ीन माहौल से बचती बचाती हल्की-फुलकी टकसाली भाषा का रस लेना चाहती है जो इस उपन्यास में भरपूर है। अबे, तबे, साले, ससुरे शब्द जो आम आदमी से जुड़े रहते हैं, उसकी ज़बान पर रहते हैं, वह वही सुनना चाहता है। इस अनोखी भाषा ने, दुःख, अवसाद, घृणा क्रोध को बखूबी संवारा है। सबसे मज़े की बात तो यह है कि शायद लेखक ने यह बात नहीं सोची होगी, वह एक उपन्यास रचने जा रहा है- ऐसा लगता है कि गाँव की चैपाल में कोई व्यक्ति बैठा है और वह सब लिखता जा रहा है, जो वहाँ हो रहा है। झूठ, बेइमानी, दंगा, फ़साद, चोरी-चकारी, छल कपट, प्रेम,घृणा सब कुछ अपने मूल रूप में काग़ज पर उतरता जा रहा है। इस पुस्तक का कथानक एक ख़ास रिदम में क़दम ताल करता हुआ आगे बढ़ता जाता है।

इस उपन्यास को पढ़ते पढ़ते अगर किसी अन्य काम के लिए उठना पड़ जायें, तो बड़ा अखरता है। जब हम दूसरे काम में लगे रहते हैं, हमारा मन उपन्यास के छोड़े हुए अंश में अटका रहता है। आगे क्या होगा यह जानने के लिए मन वहीं अटका रहता है, यह बात मैंने अपने अनुभव से जानी।

अक्सर लोग यह भूल कर बैठते हैं कि यह व्यंग कथा है, पर नहीं ऐसा नहीं है, एक गाँव जो आज़ादी के बाद तमाम सुख सुविधाओं से बंचित है, जैसे-जैसे हालातों से वहाँ के लोगों को दो चार होना पड़ता है, यह सब उस गाँव की हक़ीकत है। शुक्ल जी ने इसी सच्चाई को अपनी क़लम की मार्फ़त हम तक पहुँचाया है। उन नारों और वायदों को झुठलाया हैं जिन्होंने भोली जनता को भ्रमित किया है। सच पूछा जाय तो हर कोण से हकीकत को शीशे में उतारने, और उससे हमें रुबरू कराने का सफल प्रयोग किया है लेखक ने। कैसी अजीब बात है, देश एक लम्बा सफ़र तय कर चुका है, परन्तु ‘राग दरबारी’ आज भी प्रासंगिक है।

शुक्ल जी ने अपनी बहुत सी रचनाओं से हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया है और ‘राग दरबारी’ श्री लाल शुक्ल का पर्याय बन गया है। हक़ीकत की तुला पर खरा उतारने वाला, उपन्यास ‘राग दरबारी’ आज भी आम आदमी की पसन्द का नम्बर वन उपन्यास है-इसमें तनिक भी सन्देह नहीं।




श्रीमती शरदा लाल

(अवकाश प्राप्त कार्यक्रम अधिशासी

आकाशवाणी, लखनऊ)

499/183, गोकरन नाथ रोड

डालीगंज, लखनऊ-226020

मो0नं0: 9935638020

 

Thursday, November 5, 2020

बांग्ला की सर्वश्रेष्ठ कहानियां

 कहो किताब 

(चयनित प्रविष्टि-1)



साहित्य को समझने के लिए साहित्य के धुरंधरों को पढ़ना होगा। आखिर क्या बात थी कि भारतवर्ष में साहित्य में अबतक सिर्फ एक व्यक्ति को पुरस्कार मिला? जिसका नाम है रविंद्र नाथ ठाकुर। लगभग 100 वर्ष पूर्व बंग्ला के महान साहित्यकार रविंद्र नाथ ठाकुर को विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार नोबल पुरस्कार मिला था। बांग्ला जीवन और संस्कृति आज जितनी समृद्ध है उतना ही समृद्ध एक पुस्तक हमारे सामने है। बंग्ला की श्रेष्ठ कहानियां। बांग्ला साहित्य की शिराओं में बंगाली लेखन ने अपूर्व रस का संचार किया है और उसे संसार भर में प्रतिष्ठा दिलाई है ।

         टीवी की दुनिया में दूरदर्शन का बोलबाला जब तक रहा उस समय रविंद्र नाथ ठाकुर ,शरतचंद ,बंकिम चंद्र की कहानी धारावाहिक के रूप में प्रस्तुत किया जाता था और देश का आम जन से लेकर खास जन तक इस तरह की रचनाओं को देखता था। धारावाहिक के रूप में लोग इन रचनाओं को पसंद करते थे और समय से दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम को देखने के लिए लोग अपने घरों में बैठ जाते थे। साहित्य की हर विधा में बांग्ला रचनाकारों ने अपने कलम के जौहर दिखाएं हैं। उनकी इसी साधना ने उन्हें शिखर तक पहुंचाया।


     हिंद पॉकेट बुक्स द्वारा 2012 में बंगला की सर्वश्रेष्ठ कहानियां प्रकाशित हुई। जिसमें बंगाल के 12 रचनाकारों की श्रेष्ठ रचनाएं प्रकाशित हुई। लगभग 150 पेज की पुस्तक में रविंद्र नाथ ठाकुर के अलावा, शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, बिभुतिभूषण बंदोपाध्याय, परशुराम, उपेंद्रनाथ गंगोपाध्याय ,ताराशंकर बंधोपाध्याय बनफूल ,मानिक बंदोपाध्याय, सुबोध घोष, नारायण गंगोपाध्याय तथा प्रभात कुमार मुखोपाध्याय आदि की रचनाएं इस पुस्तक में  प्रकाशित हुईं हैं।इन कहानियों का संपादन राधेश्याम पुरोहित जी ने किया है ।मात्र ₹95 की इस पुस्तक में एक से एक लाजवाब कहानियां प्रकाशित की गई है।

           इस पुस्तक की प्रथम कहानी रविंद्र नाथ ठाकुर की *मुन्ना बेटा लौट आया है*। शरत  चंद की लिखी हुई कहानी *अभागी का स्वर्ग* बिभुतिभूषण बंदोपाध्याय जी की लिखी हुई कहानी *विधु मास्टर* परशुराम जी की लिखी कहानी *भूसुंडी का मैदान* उपेंद्र नाथ गंगोपाध्याय की लिखी कहानी *नास्तिक* एक सांस में एक ही बार में मैं पढ़ गया । यह सारी कहानियां लगभग बंगाली पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। जहां सामान्य से पात्र द्वारा घर, समाज, देश ,नैतिकता के साथ संदेश देने का प्रयास किया गया है।

                 रात्रि पहर सोने से पहले ताराशंकर बंधोपाध्याय जी की कहानी *नारी और नागिन* बनफूल जी की रचना *निपुणिका* मानिक बंदोपाध्याय जी की रचना जी से *जिसे रिश्वत दी जाती है* सुबोध बोस द्वारा लिखित *अनजानगढ़* नारायण गंगोपाध्याय की लिखी *शेर का चारा* तथा प्रभात कुमार उपाध्याय द्वारा लिखित कहानी *देवी* पढ़ने का शुभ अवसर मिला। 

इन सभी रचनाओं में भी समाज की विसंगतियों पर कुठाराघात करते हुए समाज कैसा होना चाहिए? इस को चित्रित किया गया है। जीवन के 81 वर्षों में जो कुछ रवींद्रनाथ ने लिखा वह विश्व प्रसिद्ध हुआ । शांति निकेतन /विश्व भारती जहां उनका निवास भी रहा । जिसको उन्होंने विश्व स्तर का विश्विद्यालय  बनाया। जहां इंदिरा गांधी का बचपन बीता। जहां महात्मा गांधी का कई बार आगमन हुआ ।उस जगह की माटी से जितनी भी रचनाएं रविंद्र नाथ टैगोर जी ने लिखी में एक से बढ़कर एक थी।

       मात्र 17 वर्ष की उम्र में शरत चंद्र चट्टोपाध्याय लिखने लगे थे ।उनके प्रथम प्रकाशित रचना मंदिर 1909 में लिखी गई थी जिसे *कुंतलीन*  पुरस्कार मिला था। अपने जीवन काल में सन्यासी के बीच में विदेश भ्रमण के लिए भी निकले थे। रंगून में जाकर नौकरी भी की। मुंशीगंज में अनुच्छेद बंगिया साहित्य सम्मेलन शाखा के सभापति भी बने। कोलकाता विश्वविद्यालय से *जगत्तरिणी स्वर्ण पदक*  भी प्राप्त किया। 1936 में ढाका विश्वविद्यालय से डिलीट साहित्याचार की उपाधि भी प्राप्त की। लेकिन उनके नाम के आगे या पीछे कुछ भी  कभी न लिखा गया न उन्होंने कभी कुछ लिखा। किसी ने आज तक  कहीं भी लिखा नहीं देखा। जो उनकी लेखन की सादगी का एक परिचायक है।

      गांव की सादगी का सरल सजीव परिचय  अपनी रचना में देने वाले बिभुतिभूषण बंदोपाध्याय जी ने *पथेर पांचाली* ग्रंथ लिखा। जिसकी वजह से उनको विश्व  लोकप्रियता  साहित्य जगत में हासिल हुई। इस ग्रंथ के कई संस्करण निकले और इसी की वजह से बंगला साहित्य में विभूति बाबू को काफी आधार और यश और सम्मान मिला। पाथेर पांचाली पर बंगला फिल्म जगत में छायाचित्र भी बन चुका है।

लघु हास्य रस आत्मक रचनाओं के जरिए बंगला साहित्य में बेजोड़ रचनाकार ज्ञान गर्व पांडित्य पूर्ण रचनाओं में लेखन करने वाले राजेश्वर बसु जिन्हें लोग परशुराम के नाम से जानते हैं विख्यात रहे । बांग्ला शब्दकोश चलंतिका का संपादन आपके पांडित्य का ही परिचय है। साहित्य और भाषा संस्कार में अपने दो महत्वपूर्ण काम किए। बांग्ला में लाइनों टाइप का प्रवर्तन तथा बंगला उच्चारण की समस्या का समाधान ।यह आपकी ही  अलग देन है।तमिल, तेलुगू ,कन्नड़ हिंदी तथा कई अन्य भाषाओं में भी आपकी रचनाएं अनुदित हो चुकी हैं। और आपको 1955 में रविंद्र पुरस्कार प्राप्त हुआ।

       भागलपुर शहर में वकालत करने वाले उपेंद्रनाथ गंगोपाध्याय जी ने 1913 से लेकर 1925 तक व्यवसाय में रहते हुए भी अदनान लुप्त विख्यात *बांग्ला मासिक विचित्रा* का संपादन किया 1912 में उनकी प्रथम प्रकाशित गर्ल प्रकरण सप्तक और शशि नाथ ने धमाल मचाया। *मात्र 12 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने स वह साथी नमक मंगला मासिक में *सांध्य* नामक एक कविता लिखकर पहला साहित्य सृजन प्रारंभ किया था।

*स्मृति कथा* ४ खंड में जो प्रकाशित हुई। उससे उनको साहित्य जगत में एक पहचान मिली। व्यक्तिगत जीवन में सादा जीवन व्यतीत करने वाले मित्र बनाने के शौकीन थे। बंगला पत्रिका  *गल्प भारती* के संपादक भी रहे।

      हास्य रस आत्मक कहानियों के सृजन में एक स्थान रखने वाले बिभुतिभूषण मुखोपाध्याय जी की कई काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। हास्य रस के हिसाब से ही उनकी रचनाओं में संयम, सौंदर्य ,निर्मलता दिखलाई पड़ती है ।जीवन शिल्पी बिभुति भूषण की संयम सुंदर दार्शनिक दृष्टि बनी जीवन की आवश्यकता वेदना को भी रसाग्रही कर देती है। इनकी कहानी सर्टिफिकेट श्रम शक्ति और परिपाक का अद्भुत तरीका प्रस्तुत करती है। इस कहानी को बार-बार पढ़ने का मन करता है।

     राजनीति से साहित्य जगत में आने वाले ताराशंकर बंधोपाध्याय जी पहले दर्जे के लेखक माने जाते हैं। जो बंगला कथा साहित्य में अपनी पैनी निगाह गहरी पर वे क्षण शक्ति तथा मौलिक दृष्टिकोण से रचनाओं को जीवित और यथार्थ बनाने में महारत हासिल किए हुए थे। साहित्य साधना के लिए उन्हें सड़क स्मृति पुरस्कार 1940 में मिला था। आरोग्य निकेतन उपन्यास के लिए उन्हें रविंद्र पुरस्कार 55_56 में मिला। कहानी नाटक उपन्यास के जरिए वह बंगला साहित्य में जाने जाते हैं। अपने चुटकुले कटाक्ष के द्वारा अपने पात्रों के जरिए वह बहुत कुछ कह जाते हैं।

     बिहार के पूर्णिया जिले में जन्मे बलाई चांद मुखोपाध्याय यह का उपनाम *बनफूल* है जो बनफूल के नाम से ही लिखा करते हैं । छोटी-छोटी कहानियां के जरिए बड़ी-बड़ी बातें कहना उनके लेखन का कमाल है। उनका मानना है कि कहानी जितनी छोटी होती है वह जीवन के बेहद और गंभीर सत्य को प्रकट करने का ताकत रखती है। कितना कम कहकर कितना जगह ज्यादा प्रकट किया जा सकता है।इस पर वे विश्वास करते थे। इस परीक्षा में हमेशा उत्तीर्ण रहे हैं और उनके कई ग्रंथों का प्रकाशन भी हो चुका है।

         जीवन दर्शन में मानिक बाबू मार्क्सवाद में विश्वास रखते थे और प्रगतिशील लेखक रहे। संथाल परगना के दुमका में जन्मे मानिक बंदोपाध्याय जी ने 50 उपन्यास एक नाटक 16 कहानी संकलन दो श्रेष्ठ कहानियों का संकलन कुल 69 पुस्तकों का प्रकाशन उन्होंने करवाया। उनके कुल कहानियों की संख्या लगभग 192  रहीं ।वस्तु आदि शक्तिशाली कहानीकार और उपन्यासकारों में मानिक बंदोपाध्याय का नाम बांग्ला साहित्य में लिया जाता है ।प्रागैतिहासिक प्रसिद्ध रचनाएं कि उन्होंने लिखी है ।उनके उपन्यासों का अंग्रेजी, चीनी, रूसी और चेक भाषा में अनुवाद भी हो चुका है ।उनके व्यक्तित्व और जीवन बोध ने उनकी विचलित दृष्टि भंगी ने उनके साहित्य को एक विशिष्टता प्रदान की है।

हजारीबाग में जन्मे सुबोध घोष जी ने आनंद बाजार पत्रिका के संपादक मंडल में रहते हुए संबोधित करते हुए कोलकाता ही अपना निवास  स्थान बनाए रखा ।छोटी-छोटी कहानियों के द्वारा वे समाज की विसंगतियों पर हमेशा वार करते रहे ।आदिवासी समाज पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा महाभारत के प्रेमाख्यान पर और लंदन पर उन्होंने *भारतेर* प्रेम कथा भी लिखी।

             पश्चिम दिनाजपुर के नारायण गंगोपाध्याय नदी, गांव को अपनी रचना धर्मिता में लेकर आए ।क्लासिक और रोमांटिक शिल्प का संबंध में उनकी रचनाओं में देखने में मिलता है। भारतवर्ष मासिक पत्रिका में धारावाहिक उपन्यास *उपनिवेश* लिखकर साहित्यिक रसिक समाज में प्रतिष्ठित हुए उन्होंने कई ग्रंथों की रचनाएं भी की।

    वर्धमान जिले के प्रभात कुमार मुखोपाध्याय मूलतः वकालत के कार्य से जुड़े रहे। बरिस्टर बने कानून विभाग के अध्यापक भी रहे । *मानसी और मर्म वाणी* मासिक पत्रिकाओं का संपादन भी बहुत समय तक किया *करी किंतु* उन्होंने लिखा।

       साहित्य क्या होता है इसे जानने समझने के लिए साहित्यिक कृतियों का पढ़ना अति आवश्यक है ।मुझे तो पढ़ने का बहुत शौक है। प्रतिदिन कम से कम 300 से 500 पेज की रचनाओं को पढ़ना अपना प्रतिदिन का व्यवहार बना लिया है। जब तक पढ़ना न लूं  चैन नहीं मिलता। ईश्वर से प्रार्थना हमेशा यही होती है जितनी जिंदगी उसने मुझे प्रदान की है वह पढ़ने में लगा पाऊं  और पढ़ने के बाद लोगों को यह बताने में लगे कि तुम भी पढ़ो। ज्ञान अर्जन करना है तो पढ़ना अनिवार्य है।



सुधीर सिंह सुधाकर

 राष्ट्रीय संयोजक

 मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच

 दिल्ली


मो ---७७०३८०२१२१