Thursday, November 5, 2020

बांग्ला की सर्वश्रेष्ठ कहानियां

 कहो किताब 

(चयनित प्रविष्टि-1)



साहित्य को समझने के लिए साहित्य के धुरंधरों को पढ़ना होगा। आखिर क्या बात थी कि भारतवर्ष में साहित्य में अबतक सिर्फ एक व्यक्ति को पुरस्कार मिला? जिसका नाम है रविंद्र नाथ ठाकुर। लगभग 100 वर्ष पूर्व बंग्ला के महान साहित्यकार रविंद्र नाथ ठाकुर को विश्व का सर्वोच्च पुरस्कार नोबल पुरस्कार मिला था। बांग्ला जीवन और संस्कृति आज जितनी समृद्ध है उतना ही समृद्ध एक पुस्तक हमारे सामने है। बंग्ला की श्रेष्ठ कहानियां। बांग्ला साहित्य की शिराओं में बंगाली लेखन ने अपूर्व रस का संचार किया है और उसे संसार भर में प्रतिष्ठा दिलाई है ।

         टीवी की दुनिया में दूरदर्शन का बोलबाला जब तक रहा उस समय रविंद्र नाथ ठाकुर ,शरतचंद ,बंकिम चंद्र की कहानी धारावाहिक के रूप में प्रस्तुत किया जाता था और देश का आम जन से लेकर खास जन तक इस तरह की रचनाओं को देखता था। धारावाहिक के रूप में लोग इन रचनाओं को पसंद करते थे और समय से दूरदर्शन के साहित्यिक कार्यक्रम को देखने के लिए लोग अपने घरों में बैठ जाते थे। साहित्य की हर विधा में बांग्ला रचनाकारों ने अपने कलम के जौहर दिखाएं हैं। उनकी इसी साधना ने उन्हें शिखर तक पहुंचाया।


     हिंद पॉकेट बुक्स द्वारा 2012 में बंगला की सर्वश्रेष्ठ कहानियां प्रकाशित हुई। जिसमें बंगाल के 12 रचनाकारों की श्रेष्ठ रचनाएं प्रकाशित हुई। लगभग 150 पेज की पुस्तक में रविंद्र नाथ ठाकुर के अलावा, शरत चंद्र चट्टोपाध्याय, बिभुतिभूषण बंदोपाध्याय, परशुराम, उपेंद्रनाथ गंगोपाध्याय ,ताराशंकर बंधोपाध्याय बनफूल ,मानिक बंदोपाध्याय, सुबोध घोष, नारायण गंगोपाध्याय तथा प्रभात कुमार मुखोपाध्याय आदि की रचनाएं इस पुस्तक में  प्रकाशित हुईं हैं।इन कहानियों का संपादन राधेश्याम पुरोहित जी ने किया है ।मात्र ₹95 की इस पुस्तक में एक से एक लाजवाब कहानियां प्रकाशित की गई है।

           इस पुस्तक की प्रथम कहानी रविंद्र नाथ ठाकुर की *मुन्ना बेटा लौट आया है*। शरत  चंद की लिखी हुई कहानी *अभागी का स्वर्ग* बिभुतिभूषण बंदोपाध्याय जी की लिखी हुई कहानी *विधु मास्टर* परशुराम जी की लिखी कहानी *भूसुंडी का मैदान* उपेंद्र नाथ गंगोपाध्याय की लिखी कहानी *नास्तिक* एक सांस में एक ही बार में मैं पढ़ गया । यह सारी कहानियां लगभग बंगाली पृष्ठभूमि पर लिखी गई है। जहां सामान्य से पात्र द्वारा घर, समाज, देश ,नैतिकता के साथ संदेश देने का प्रयास किया गया है।

                 रात्रि पहर सोने से पहले ताराशंकर बंधोपाध्याय जी की कहानी *नारी और नागिन* बनफूल जी की रचना *निपुणिका* मानिक बंदोपाध्याय जी की रचना जी से *जिसे रिश्वत दी जाती है* सुबोध बोस द्वारा लिखित *अनजानगढ़* नारायण गंगोपाध्याय की लिखी *शेर का चारा* तथा प्रभात कुमार उपाध्याय द्वारा लिखित कहानी *देवी* पढ़ने का शुभ अवसर मिला। 

इन सभी रचनाओं में भी समाज की विसंगतियों पर कुठाराघात करते हुए समाज कैसा होना चाहिए? इस को चित्रित किया गया है। जीवन के 81 वर्षों में जो कुछ रवींद्रनाथ ने लिखा वह विश्व प्रसिद्ध हुआ । शांति निकेतन /विश्व भारती जहां उनका निवास भी रहा । जिसको उन्होंने विश्व स्तर का विश्विद्यालय  बनाया। जहां इंदिरा गांधी का बचपन बीता। जहां महात्मा गांधी का कई बार आगमन हुआ ।उस जगह की माटी से जितनी भी रचनाएं रविंद्र नाथ टैगोर जी ने लिखी में एक से बढ़कर एक थी।

       मात्र 17 वर्ष की उम्र में शरत चंद्र चट्टोपाध्याय लिखने लगे थे ।उनके प्रथम प्रकाशित रचना मंदिर 1909 में लिखी गई थी जिसे *कुंतलीन*  पुरस्कार मिला था। अपने जीवन काल में सन्यासी के बीच में विदेश भ्रमण के लिए भी निकले थे। रंगून में जाकर नौकरी भी की। मुंशीगंज में अनुच्छेद बंगिया साहित्य सम्मेलन शाखा के सभापति भी बने। कोलकाता विश्वविद्यालय से *जगत्तरिणी स्वर्ण पदक*  भी प्राप्त किया। 1936 में ढाका विश्वविद्यालय से डिलीट साहित्याचार की उपाधि भी प्राप्त की। लेकिन उनके नाम के आगे या पीछे कुछ भी  कभी न लिखा गया न उन्होंने कभी कुछ लिखा। किसी ने आज तक  कहीं भी लिखा नहीं देखा। जो उनकी लेखन की सादगी का एक परिचायक है।

      गांव की सादगी का सरल सजीव परिचय  अपनी रचना में देने वाले बिभुतिभूषण बंदोपाध्याय जी ने *पथेर पांचाली* ग्रंथ लिखा। जिसकी वजह से उनको विश्व  लोकप्रियता  साहित्य जगत में हासिल हुई। इस ग्रंथ के कई संस्करण निकले और इसी की वजह से बंगला साहित्य में विभूति बाबू को काफी आधार और यश और सम्मान मिला। पाथेर पांचाली पर बंगला फिल्म जगत में छायाचित्र भी बन चुका है।

लघु हास्य रस आत्मक रचनाओं के जरिए बंगला साहित्य में बेजोड़ रचनाकार ज्ञान गर्व पांडित्य पूर्ण रचनाओं में लेखन करने वाले राजेश्वर बसु जिन्हें लोग परशुराम के नाम से जानते हैं विख्यात रहे । बांग्ला शब्दकोश चलंतिका का संपादन आपके पांडित्य का ही परिचय है। साहित्य और भाषा संस्कार में अपने दो महत्वपूर्ण काम किए। बांग्ला में लाइनों टाइप का प्रवर्तन तथा बंगला उच्चारण की समस्या का समाधान ।यह आपकी ही  अलग देन है।तमिल, तेलुगू ,कन्नड़ हिंदी तथा कई अन्य भाषाओं में भी आपकी रचनाएं अनुदित हो चुकी हैं। और आपको 1955 में रविंद्र पुरस्कार प्राप्त हुआ।

       भागलपुर शहर में वकालत करने वाले उपेंद्रनाथ गंगोपाध्याय जी ने 1913 से लेकर 1925 तक व्यवसाय में रहते हुए भी अदनान लुप्त विख्यात *बांग्ला मासिक विचित्रा* का संपादन किया 1912 में उनकी प्रथम प्रकाशित गर्ल प्रकरण सप्तक और शशि नाथ ने धमाल मचाया। *मात्र 12 वर्ष की उम्र में ही उन्होंने स वह साथी नमक मंगला मासिक में *सांध्य* नामक एक कविता लिखकर पहला साहित्य सृजन प्रारंभ किया था।

*स्मृति कथा* ४ खंड में जो प्रकाशित हुई। उससे उनको साहित्य जगत में एक पहचान मिली। व्यक्तिगत जीवन में सादा जीवन व्यतीत करने वाले मित्र बनाने के शौकीन थे। बंगला पत्रिका  *गल्प भारती* के संपादक भी रहे।

      हास्य रस आत्मक कहानियों के सृजन में एक स्थान रखने वाले बिभुतिभूषण मुखोपाध्याय जी की कई काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। हास्य रस के हिसाब से ही उनकी रचनाओं में संयम, सौंदर्य ,निर्मलता दिखलाई पड़ती है ।जीवन शिल्पी बिभुति भूषण की संयम सुंदर दार्शनिक दृष्टि बनी जीवन की आवश्यकता वेदना को भी रसाग्रही कर देती है। इनकी कहानी सर्टिफिकेट श्रम शक्ति और परिपाक का अद्भुत तरीका प्रस्तुत करती है। इस कहानी को बार-बार पढ़ने का मन करता है।

     राजनीति से साहित्य जगत में आने वाले ताराशंकर बंधोपाध्याय जी पहले दर्जे के लेखक माने जाते हैं। जो बंगला कथा साहित्य में अपनी पैनी निगाह गहरी पर वे क्षण शक्ति तथा मौलिक दृष्टिकोण से रचनाओं को जीवित और यथार्थ बनाने में महारत हासिल किए हुए थे। साहित्य साधना के लिए उन्हें सड़क स्मृति पुरस्कार 1940 में मिला था। आरोग्य निकेतन उपन्यास के लिए उन्हें रविंद्र पुरस्कार 55_56 में मिला। कहानी नाटक उपन्यास के जरिए वह बंगला साहित्य में जाने जाते हैं। अपने चुटकुले कटाक्ष के द्वारा अपने पात्रों के जरिए वह बहुत कुछ कह जाते हैं।

     बिहार के पूर्णिया जिले में जन्मे बलाई चांद मुखोपाध्याय यह का उपनाम *बनफूल* है जो बनफूल के नाम से ही लिखा करते हैं । छोटी-छोटी कहानियां के जरिए बड़ी-बड़ी बातें कहना उनके लेखन का कमाल है। उनका मानना है कि कहानी जितनी छोटी होती है वह जीवन के बेहद और गंभीर सत्य को प्रकट करने का ताकत रखती है। कितना कम कहकर कितना जगह ज्यादा प्रकट किया जा सकता है।इस पर वे विश्वास करते थे। इस परीक्षा में हमेशा उत्तीर्ण रहे हैं और उनके कई ग्रंथों का प्रकाशन भी हो चुका है।

         जीवन दर्शन में मानिक बाबू मार्क्सवाद में विश्वास रखते थे और प्रगतिशील लेखक रहे। संथाल परगना के दुमका में जन्मे मानिक बंदोपाध्याय जी ने 50 उपन्यास एक नाटक 16 कहानी संकलन दो श्रेष्ठ कहानियों का संकलन कुल 69 पुस्तकों का प्रकाशन उन्होंने करवाया। उनके कुल कहानियों की संख्या लगभग 192  रहीं ।वस्तु आदि शक्तिशाली कहानीकार और उपन्यासकारों में मानिक बंदोपाध्याय का नाम बांग्ला साहित्य में लिया जाता है ।प्रागैतिहासिक प्रसिद्ध रचनाएं कि उन्होंने लिखी है ।उनके उपन्यासों का अंग्रेजी, चीनी, रूसी और चेक भाषा में अनुवाद भी हो चुका है ।उनके व्यक्तित्व और जीवन बोध ने उनकी विचलित दृष्टि भंगी ने उनके साहित्य को एक विशिष्टता प्रदान की है।

हजारीबाग में जन्मे सुबोध घोष जी ने आनंद बाजार पत्रिका के संपादक मंडल में रहते हुए संबोधित करते हुए कोलकाता ही अपना निवास  स्थान बनाए रखा ।छोटी-छोटी कहानियों के द्वारा वे समाज की विसंगतियों पर हमेशा वार करते रहे ।आदिवासी समाज पर उन्होंने बहुत कुछ लिखा महाभारत के प्रेमाख्यान पर और लंदन पर उन्होंने *भारतेर* प्रेम कथा भी लिखी।

             पश्चिम दिनाजपुर के नारायण गंगोपाध्याय नदी, गांव को अपनी रचना धर्मिता में लेकर आए ।क्लासिक और रोमांटिक शिल्प का संबंध में उनकी रचनाओं में देखने में मिलता है। भारतवर्ष मासिक पत्रिका में धारावाहिक उपन्यास *उपनिवेश* लिखकर साहित्यिक रसिक समाज में प्रतिष्ठित हुए उन्होंने कई ग्रंथों की रचनाएं भी की।

    वर्धमान जिले के प्रभात कुमार मुखोपाध्याय मूलतः वकालत के कार्य से जुड़े रहे। बरिस्टर बने कानून विभाग के अध्यापक भी रहे । *मानसी और मर्म वाणी* मासिक पत्रिकाओं का संपादन भी बहुत समय तक किया *करी किंतु* उन्होंने लिखा।

       साहित्य क्या होता है इसे जानने समझने के लिए साहित्यिक कृतियों का पढ़ना अति आवश्यक है ।मुझे तो पढ़ने का बहुत शौक है। प्रतिदिन कम से कम 300 से 500 पेज की रचनाओं को पढ़ना अपना प्रतिदिन का व्यवहार बना लिया है। जब तक पढ़ना न लूं  चैन नहीं मिलता। ईश्वर से प्रार्थना हमेशा यही होती है जितनी जिंदगी उसने मुझे प्रदान की है वह पढ़ने में लगा पाऊं  और पढ़ने के बाद लोगों को यह बताने में लगे कि तुम भी पढ़ो। ज्ञान अर्जन करना है तो पढ़ना अनिवार्य है।



सुधीर सिंह सुधाकर

 राष्ट्रीय संयोजक

 मंजिल ग्रुप साहित्यिक मंच

 दिल्ली


मो ---७७०३८०२१२१

No comments:

Post a Comment