Wednesday, November 18, 2020

"आधे अधूरे"-मोहन राकेश

  "आधे अधूरे"






मेरी प्रिय पुस्तक "आधे अधूरे"
नाटककार - मोहन राकेश
राधाकृष्ण प्रकाशन 1969

अभी तक के जीवन में मुझे सबसे उत्तम और सर्वश्रेष्ठ पुस्तक मोहन राकेश जी द्वारा रचित नाटक आधे अधूरे लगा। इसको पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है एक के बाद एक दृश्य आंखों के सामने घटित हो रहे हैं जैसे चलचित्र में नायक और नायिका का प्रेम प्रसंग और नोकझोंक के माध्यम से जो तकरार दिखाया जाता है ठीक उसी तरह हमें आधे अधूरे पढ़ते हुए आनंद आता है।
 यह एक ऐसी घटना है जो हमारे समाज में आसपास दिख जाती है। मध्यम वर्ग के घर में ऐसी स्थिति अकारण ही देखने को मिलती है । पूरे नाटक में भी सभी पात्रों में पूर्णता कहीं दिखाई नहीं देती है सभी अपूर्ण और विघटित ही नजर आते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं मोहन राकेश जी का शीर्षक आधे अधूरे सार्थक है।
  आधे अधूरे का सर्वप्रथम मंचन दिल्ली में दिशांतर द्वारा ओम शिवपुरी के निर्देशन में फरवरी 1969 ईस्वी में हुआ।निर्देशक ओम शिवपुरी ने इस नाटक के विषय में इस नाट्य कृति के आमुख में लिखा है कि "आधे अधूरे मुझे समकालीन जिंदगी का पहला सार्थक हिंदी नाटक लगता है। यह मौजूदा जीवन की विडंबना के कुछ एक सघन बिंदुओं को रेखांकित करता है।"

 मोहन राकेश जी के नाटकों में हमें मध्यवर्ग की पारिवारिक बिखराव, द्वंद्व, कुंठा, घुटन, अधूरापन और विघटन देखने को मिलती है। 
  आधे अधूरे के बारे में महेश आनंद जी का कथन है कि "यह नाटक विघटित होते हुए मध्यवर्गीय परिवार में व्याप्त कुंठाजन्य घुटन और उससे मुक्त होने की विवशता को पेश करता है। इसी के माध्यम से राकेश ने स्त्री-पुरुष के संबंधों के साथ असामंजस्य के प्रश्नों को भी उभारा है।"




       सभी एक घर में रहने के बावजूद अलग-थलग पड़े हुए हैं इसी परिप्रेक्ष्य में सवित्री एक स्थान पर कहती है - "असल में आदमी होने के लिए यह जरूरी है कि उसमें अपना एक मादा अपनी एक शख्सियत हो उसका पति नाम के अलावा कुछ नहीं केवल मांस का लोथड़ा है।"
सावित्री के कथन में -" मेरे पास अब बहुत दिन नहीं है जीने को, पर जितने हैं उसे इसी तरह और निभाते हुए नहीं काटूंगी। मेरे करने से जो कुछ हो सकता था इस घर का वह हो चुका आजतक। मेरी ओर से यह अंत है उसका निश्चिंत अंत।"
महेंद्र नाथ नाटक में एक स्थान पर कहते हैं कि "मैं इस घर में एक रबड़ स्टैंप भी नहीं सिर्फ एक रबड़ का टुकड़ा हूं बार-बार घिस जाने वाला रबड़ का टुकड़ा इसके बाद क्या कोई मुझे बता सकता है ? एक भी ऐसी वजह क्यों मुझे रहना चाहिए इस घर में।"

 इस तरह हम पूरे नाटक में सभी पात्रों में एक अधूरापन और खोखलापन देखते हैं।

नाटक की सार्थकता की हम बात करें तो नाटक पढ़ते हुए हमें ऐसा लगता है कि हम आसपास की किसी घर में हो रही द्वंद्व स्थिति को देख रहे हैं। नाटक में कहीं भी उबाऊपन पढ़ने से महसूस नहीं होता है बल्कि जैसे-जैसे पढ़ते जाते हैं रोचकता तीव्र गति से और बढ़ती जाती है। शुरू में तो ऐसा लगता है कि महेंद्रनाथ ही सारा दोषी है जो घर में बैठा रहता है और सावित्री काम पर जाती है, घर भी संभालती है परंतु अंत तक जाते-जाते मालूम होता है कि सावित्री को महेंद्रनाथ में एक अधूरा पुरुष दिखाई देता है और वह सभी में एक पूर्ण पुरुष की तलाश करती रहती है परंतु उसे किसी में भी एक पूर्ण पुरुष नजर नहीं आता। यही कारण है कि वह अंत तक उसी घर में लड़ाई झगड़ा के बावजूद, मानसिक तनाव के बावजूद रह रही हैं।
परिवार जिससे चलती है स्त्री और पुरुष। जब उसी दोनों में संघर्ष हो तो परिवार का बिखरना लाजमी है और इसे ही मोहन राकेश जी ने आधे अधूरे नाटक में दिखाया है कि यहां पर सभी कुछ आधा अधूरा सा है। 
सबसे रोचक मुझे अशोक -किन्नी  और किन्नी- बिन्नी की बातों के संवाद में जब तर्क वितर्क होता है तब लगता किन्नी उस घर में रहकर जिद्दी हो गई है वहीं अशोक कुछ करना चाहता लेकिन कर नहीं पाता है, ठीक महेंद्रनाथ अपने पिता की तरह को शुरू में व्यवसाय शुरू किए जो डूब गया तो हार मान गए ।
इस तरह हम देखते हैं आधे अधूरे मोहन राकेश जी के द्वारा रचित नाटक आज भी प्रासंगिक है। यही कारण है कि आज भी नाटक मंच पर इसकी प्रस्तुति देखने को मिल जाती हैं। और यही कारण है कि मुझे लगता है इसे बार-बार पर हूं और अन्य लोगों को भी इस नाटक को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।


संतोष कुमार वर्मा ' कविराज '
कांकिनाड़ा, कोलकाता
उत्तर 24 परगना
पश्चिम बंगाल
संपर्क सूत्र - 09681835197
ईमेल - skverma0531@gmail.com

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