Thursday, October 13, 2022

अनुभव सम्पन्नता का कथा साहित्य



   
शैलेश मटियानी का जन्म 14 अक्टूबर, 1931 को अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना गांव में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। मटियानी जी जब बारह वर्ष (1943) के ही थे तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया। माता-पिता की मृत्यु के बाद वे चाचा के बूचड़ खाने  में काम करने लगे। बहुत संघर्षों के बाद उन्होंने हाईस्कूल तक की अपनी पढ़ाई किसी तरह पूरी की‌। बचपन से ही वे  लेखक बनना चाहते थे। सन 1950 से उन्होंने कविताएं, कहानियां लिखना शुरू कर दिया। शुरुआत कविताओं से की फिर कहानियां लिखने लगे। जीवन के संघर्षों और उज्जवल भविष्य की चाह में एक दिन अचानक अल्मोड़ा में अपने छोटे भाई-बहन को अकेला छोड़ बालक रमेश मटियानी 1951 में दिल्ली आ गए और ‘अमर कहानी’ के संपादक आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहां रुके। उसके बाद कई शहरों में किस्मत आजमाने के बाद वे बंबई चले गए।  फिर पांच-छह वर्षों तक उन्हें फुटपाथों पर सोना, फेंके हुए भोजन खाना,  भिखांड़यों व पाकेटमारों की संगत में बैठना जैसे कई अनुभवों से गुजरना पड़ा। वहां एक जगह प्लेटें साफ करने का काम मिला और अगले साढ़े तीन साल तक वे वहीं रहे और काम के साथ-साथ लिखते भी रहे। बाद में वे इलाहाबाद आ गए।
शैलेश मटियानी का आरंभिक जीवन किसानी और जुआरी के बेटे और बूचड़ के भतीजे होने के कारण संघर्ष और उपेक्षा के अनुभवों से संपन्न रहा। उसके बाद दिल्ली मुंबई में किए गए संघर्ष, आपराधिक और विभत्स दुनिया के अनुभव उनके अनुभव  जगत को  विकसित करते गए। इस क्रम में आर्थिक संकटों, भावनात्मक संघर्ष और प्रतिकार के कड़वे अनुभव उनके कथा साहित्य में सर्वथा व्याप्त हैं। उनके जैसी अनुभव संपन्नता और भोगे हुए यथार्थ का चित्रण हिंदी कथा साहित्य जगत में और कहीं मिलना दुर्लभ है। उनके कथा साहित्य की यही विशेषता उन्हें एक उत्कृष्ट लेखक के रूप में हिन्दी जगत में प्रतिस्थापित करती है। एक कथाकार के रूप में शैलेश मटियानी अपने कथा साहित्य के माध्यम से सामाजिक व आर्थिक रूप से शोषित और पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते हैं। उनके कथा साहित्य में आर्थिक संकट भोंगते निम्नवर्गीय लोग, घर से प्रेम संबंधों में भागी स्त्रियों का दुर्भाग्य, जातिगत रूप से निम्न स्थिति प्राप्त पात्र और भुखमरी तथा अभावग्रस्त जीवन भोंगने को विवश अति निम्न स्तरीय लोग तथा अपराध जगत  के पीछे की दारूण सच्चाईयों से दो-चार होते लोगों का यथार्थ अभिव्यक्त हुआ है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने शोषित और पीड़ित आम आदमी को चित्रित किया है। उनका पहला उपन्यास 'बोरीवली से बोरीबंदर तक'  निम्न स्तरीय आम आदमी के संघर्ष और बम्बई की झुग्गी बस्तियों से जुड़े अनुभव की गाथा बनकर उभरा है। वहां घर से भगा कर लाई गई और बेच दी गई स्त्रियों का त्रासद जीवन है तो अपराध जगत में लिप्त गंदी गलियों की सच्चाई भी। उपन्यास बताता है कि गंदी गलियों और अपराधिक जीवन के पीछे का सच हमेशा गंदा नहीं होता। 'हौलदार' उपन्यास के माध्यम से वे कुमाऊंनी समाज में गहरे तक उतरे जातिवाद और वर्णवाद के संस्कारों को उजागर करते हैं और सदियों से चले आ रहे ब्राह्मण तथा क्षत्रिय समाज के मध्य उपजे अंतर्द्वंद को रेखांकित करने का प्रयास करते हैं। 'सावित्तरी' उपन्यास की सावित्तरी भी एक निम्न वर्गीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जो सिर्फ इसलिए लोगों की गंदी नजर और फब्बतियों का शिकार बनती है क्योंकि वह दिखने में आकर्षक है और लोगों के घरों में काम करती है।
शैलेश मटियानी के कथा साहित्य  में संवेदना और मार्मिकता का एक अलग स्तर दिखाई देता है। यही उनकी विशेषता भी है और कुछ आलोचकों की नजर में यही उनकी सीमा भी। शैलेश
शैलेश की कहानियों में कुमाऊं का जनजीवन, परिवेश, संस्कृति और वहां का दुर्गम यथार्थ परिलक्षित होता है। 'हौलदार', 'चिट्ठी रसैन', 'गोपुली  गफुरन' इत्यादि इसी तरह के उपन्यास हैं जहां कुमाऊं का जनजीवन और वहां की जटिलताएं अपने पूरे विस्तार के साथ उपस्थित होती हैं। इसी तरह अर्धांगिनी, किसी से ना कहना, कालिका अवतार, लीक, पोस्टमैन, बाली-सुग्रीव, दशरथ, प्रेतात्मा इत्यादि उनकी ऐसी कहानियां हैं जो पहाड़ के जनजीवन को पाठकों के सम्मुख रखती हैं। शैलेश मटियानी उन गिने-चुने कथाकारों में है जो पहाड़ के बाहरी सौंदर्य, पर्वतों, नदियों और वनों पर मोहित नहीं होते बल्कि वहां के कड़वे यथार्थ को भी अपने कथा साहित्य के माध्यम से सामने रखते हैं। कुमाऊं के लोक जीवन में व्याप्त मान्यताएं, रूढ़िवादिता, वर्ण व जातिवाद के गहरी संस्कार बखूबी उनके कथा साहित्य में उभर कर आए हैं। शैलेश मटियानी कथाकार के रूप में संवेदनात्मक और भावनात्मक आधार पर पाठक को अपने साथ जोड़ते हैं। यह भावनात्मक आधार वह अपनी बेहद सरस और मार्मिक भाषा में सिद्धहस्तता से निर्मित करते हैं। आज उनका जंयती है।


मीना पाण्डेय 

Thursday, October 6, 2022

शेखर जोशी- हिन्दी कहानी का जादूगर


कथाकार शेखर जोशी हमारे बीच नहीं रहे। गत 4 अक्टूबर को 90 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया। शेखर जोशी हिन्दी कथा साहित्य के ऐसे अप्रतिम हस्ताक्षर रहे जिन्होने कोई उपन्यास तो नहीं  लिखा मगर केवल 60-65 कहानियां लिखकर हिन्दी कथा साहित्य में अपना एक विशेष स्थान सुनिश्चित कर लिया। प्रस्तुत है शेखर जोशी की कुछ प्रमुख कहानियों पर मेरी बात-




कोसी का घटवार- ' कोसी का घटवार ' शेखर जोशी की अत्यंत चर्चित कहानियों में है। यह सर्वप्रथम ' कल्पना ' पत्रिका के प्रकाशित हुई। यह पर्वतीय क्षेत्र कुमाऊं की प्रेम कथा है जिसे अदभुत सादगी से दर्शाया गया है। कथाकार सूरज प्रकाश अपने आलेख ' प्रेम न बाड़ी ऊपजे' में इस कहानी पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं- 
" ......शेखर जोशी ने बिन कुछ कहे, बिना किसी संवाद के दोनों पात्रों के बीच में प्रेम के जिस उच्च शिखर को छुआ है, हमारी आंखें नम हो जाती हैं।हम कहानी के नायक गुसाईं सिंह के साथ हो जाते हैं।हम सोचने लगते हैं कि अगर हम उसकी जगह होते तो हम भी यही करते,जो उसने किया है।"
वे आगे लिखते हैं- 

" शेखर जोशी की इस दुर्लभ कहानी में कहीं पर भी प्रेम शब्द नहीं आया है।कहीं पर भी दोनों पात्रों ने आंखें नहीं मिलाई हैं। दोनों ने एक दूसरे को छुआ भी नहीं है।न ही कोई वादा किया है और ना किसी किस्म की कसमें खाई हैं। उसके बावजूद यह प्रेम की दुर्लभ कहानी लगती है।"

 गुसाईं सिंह फौज से रिटायर होकर किसी नदी के घट पर अनाज पीसने का कार्य करता है। उसे महसूस होता है अकेलापन उसके जीवन में स्थाई हो चुका है। फ़ोंज की पेंट को देखकर उसे ध्यान आता है जिस पैंट की शान देखकर वो फोंज में भर्ती हुए था उसी ने बदले में स्थाई अकेलापन उसके जीवन में लिख दिया। फौज की नौकरी के कारण ही उसकी प्रेमिका लछमा से उसका ब्याह नहीं हो पाया था। उसके बाद गुसाईं सिंह ने आजीवन अविवाहित रहने का फैसला कर लिया और नौकरी में रहते15 वर्षों तक गाव की तरफ मुड़ कर नहीं देखा। अतीत से गुसाईं सिंह वर्तमान में पहुंचता है। घट पर पानी का बहाव काम है। घट में बहुत धीरे धीरे पिसाई हो रही है।काफी पिसान एकत्र हो गया है। उसी दौरान एक युवती सर पर पीसान का थैला लिए घट पर आती है। गुसाईं सिंह देखता है कि वो लछमा ही है।उसे पता चलता है कि लछमा विधवा होकर मायके आ गई है । दोनों के बीच कुछ ओपचारिक बातें होती हैं और गुसाईं बारी में लगे पिसान में से उसका पिसान घट में पहले लगा देता है । पुरानी सारी बातें भूल वह अपनी पूर्व प्रेमिका व उसके भूख से मचलते पुत्र के लिए गुसाईं सिंह ना केवल चाय व रोटियां बनाता है बल्कि उनकी परेशानी देख कुछ पैसे भी उसकी तरफ बढ़ाता है। गुसाईं के प्रेम की ये सादगी और ईमानदारी पाठक को मोह लेती है।उसे लगता है  उस स्थिति में होता तो वह भी यही करता। पहाड़ी पृष्ठभूमि में वहां के जीवन व संघर्ष के मध्य निस्वार्थ प्रेम की ये उत्कृष्ट कथा एक मीठी टीस भीतर छोड़ जाती है।
यहां एक कहानी के दो अंत एक साथ चलते हैं।एक कहानी के भीतर और एक पाठक के भीतर।पाठक चाहता है दोनों परम्पराओं, रूढ़ियों से होड़ ले। और ये भी कि गुसाईं सिंह जाती हुई लछमा को आवाज देकर रोक ले।
'कोसी का घटवार ' कहानी की कथावस्तु पर बालकृष्ण पांडेय लिखते हैं -
"कुछ शाश्वत समस्याओं को उठाते हुए आंचलिक मूल्य मान्यताओं की सीमा का भी ध्यान रखा गया है, अन्यथा कोसी का घटवर में गहरे रोमानी स्पर्श के स्तर पर लछमा और गुसाईं घटवार का पुनर्मिलन इतना नीरस  और उद्देश्हीन न होता।"

शेखर जोशी उस सिरे पर कहानी को छोड़ देते हैं जहां पर पाठक का कहानी से उबारना सहज नहीं होता। यही एक बड़े कहानीकार की विशेषता भी है जो कहानी में पाठक के लिए भी स्पेस छोड़ता है। और यही विशेषता कोसी का घटवार को एक बड़ी कहानी बनाती है। सीमा मोर्य का कथन इस ओर समीचीन है- 
' यह कहानी विषय वस्तु से,अपने व्यवहार से पाठकों में परंपरा और रूढ़ियों के प्रति द्वंद जगाती हुई नवीनता के स्वीकार का आग्रह प्रस्तुत करती है।द्वंद कहानी में नहीं पाठक के मन में चलता है - परंपरा से विद्रोह भी कहानी में नहीं, पाठकों के मन में घटता है।कहानी में वर्णित प्रेम की असफलता, द्वंद की विशिष्टता के स्तर पर कहानी की सफलता में बदल जाती है।' 

हलवाहा- हलवाहा शेखर जोशी की उन कहानियों में है, जो की किसान जीवन पर आधारित है। कहानी की पृष्ठभूमी चूंकि कुमाऊं क्षेत्र की है अतः वहां के जातिगत समीकरण विशेषकर गल चलाने के सवाल पर उभर कर आए हैं। कुमाऊं क्षेत्र में यह मान्यता है कि उच्च जातीय ब्राह्मण हल नहीं चलाते। कहानी का नायक जीवानंद है जो की जाति से ब्राह्मण है। हलवाहा कहानी पर्वतीय क्षेत्रों के गांव का बदलता हुए यथार्थ दर्शाने का प्रयत्न करती है। जीवानंद की परिस्थितियां उसे परंपरा से होड़ लेने के लिए प्रेरित करती हैं। जीवानंद का किसान बनना पुरातन मूल्यों व धारणाओं के विरूद्ध एक नया कदम है।इस तरह शेखर जोशी समाज के शिथिल पड़ गए ढर्रों पर प्रहार तो करते हैं मगर उनका पथ राजनीतिक ना होकर सांस्कृतिक अधिक है। भाषा व शैली के स्तर पर कहानी सहज व सरल है।कहानी के माध्यम से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के जीवन व मान्यताओं के विषय में जानकारी मिलती है।

दाज्यू- वर्ग भेद व स्वार्थ आधारित रिश्तों की पृष्ठभूमि पर लिखी गई शेखर जोशी की कहानी दाज्यू एक उत्कृष्ट कहानी है। पहाड़ों के संघर्षमय जीवन व बेरोजगारी के चलते नौजवान रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ आ जाते हैं।मगर अपने गांव,घर की याद सदैव उन्हें व्यथित करती है। ऐसे में अपने क्षेत्र से संबंधित व्यक्ति से परदेश में मिलना उसे आत्मीयता से भर देता है। दाज्यु कहानी में भी मदन, जगदीश बाबू के प्रति वही आत्मीयता महसूस करता है। उन्हें बड़े भाई के समान मानते हुए दाज्यू संबोधन का प्रयोग उनके लिए करता है। शहर में नए होने के कारण पहले पहल तो मदन की आत्मीयता व दा संबोधन उन्हें नहीं अखरता मगर बाद में जब शहर में उनका परिचय प्रगाढ़ हो जाता है उन्हें एक रेएसटोरेंट के बेरे का आत्मीय दाज्यू संबोधन अखरने लगता है।मदन की भावनाओं को नज़रंदाज़ कर जगदीश बाबू उसे जोर से डांट देते हैं।
दाज्यू कहानी हमारे समाज में फैले वर्ग भेद का कटु यथार्थ है।कहानी में आज के समाज में सम्बन्धों के खोखलेपन व स्वार्थ आधारित रिश्तों को दर्शाया गया है। कहानी में कहानीकार का भोगा हुआ यथार्थ परिलक्षित होता है जो नई कहानी की एक मुख्य प्रवृति रही है। शेखर जोशी स्वयं पहाड़ से संबंध रखते हैं और वहां के संघर्ष व समस्याओं से भलीभांति परिचित भी हैं। पहाड़ों से महानगरों की तरफ आए नौजवानों की मनोवृत्ति के वे भुक्तभोगी हैं।मदन पहाड़ और अपने परिवेश के प्रति नराई का प्रतीक है।दूसरी तरफ वर्गीय संस्कारों के जगदीश बाबू अपने मान अपमान के प्रति चौकन्ना रहने वाले उन चेहरों में शुमार हैं जो सुविधा व हैसियत के अनुसार संबंधों का निर्वाह करते हैं।वर्ग भेद की गहरी जड़ें अपने क्षेत्र, परिवार के व्यक्ति को भी अपना नहीं रहने देती।

गलता लोहा- गलता लोहा कहानी  भारतीय समाज में गहरे तक धसी जाति व वर्ण व्यवस्था पर करारा प्रहार है।बिना किसी अनावश्यक आख्यान के लेखक सांकेतिक रूप से जाति व्यवस्था की जड़ों पर पात्रों द्वारा घन की लगातार चोट लगवाता है।रोचक बात यह है कि कहानी के भीतर  जाति व्यवस्था पर ओपचारिक रूप से कोई टिपण्णी लेखक द्वारा नहीं की गई है। संकेतों के आधार पर शेखर जोशी बड़ी मजबूती से अपनी बात पाठक के सम्मुख रखते हैं।यह एक कुशल कहानीकार की पहचान है।इस ओर कहानी का शीर्षक गलता लोहा भी सांकेतिक रूप से उत्कृष्ट है।

उस्ताद- उस्ताद एक ऐसे कारखाना मजदूर की कहानी है जो जीवन का एक बड़ा हिस्सा कारखाने की मशीनों के साथ दो-दो हाथ करते बीता है। इन वर्षों जो थोडा बहुत सहेजने लायक उसने कमाया उसमें सबसे महत्वपूर्ण है उसकी उस्तादी जो नए कर्मचारियों को काम सीखा उसने प्राप्त की है। भाषा के स्तर पर कहानी जितनी सादगी लिए हुए है विचार के स्तर पर कारखाना मजदूरों की छोटी- छोटी आशा निराशाओं, सुख दुख व उनके कार्य क्षेत्र में प्रचलित युक्तियों पर गहरी सेंध लगाती है। कहानीकार बड़ी सादगी से
अपने कहन कोशल से कारखाना मजदूरों के मध्य उस्ताद नाम से प्रचलित पात्र के व्यक्तित्व के बेहद सूक्ष्म पक्ष उद्घाटित करता है।उस्ताद एक तरफ उस्ताद होने की प्रस्थिति के प्रति सजग दिखाई देते हैं दूसरी तरफ उस भूमिका के प्रति असुरक्षा का भाव कहानी का मूल है। उस्ताद मजदूरों को काम सिखाते हुए भी तुरुप का इक्का अपने पास संभाले रखना चाहता है ताकि उसकी उस्तादी पर खतरा ना मडराए।उस्ताद द्वारा वल्टेमिंग बांधने की कारीगरी लेखक से छिपा जाना तथा कहानी के अंत में अपनी आदत के विपरीत उस्ताद का लेखक से न केवल मिलने आना बल्कि एक सांस में वॉल्टमिंग बांधने की कारीगरी भी समझ जाना कहानी के सबसे रोचक बिंदु हैं। कारखाने के रोजमर्रा के साधारण वाकये को बड़ी ही कुशलता से कहानीकार कहानी का रूप दे देता है तथा आत्मीयता के उस बिंदु से परिचित कराता है जो दिन प्रतिदिन के निजी सरोकारों से पृथक संबंधों की सबसे बड़ी पूंजी है। 

डांगरी वाले - 
विडुवा - विडुवा कहानी में दो पीढ़ियों के मध्य का द्वंद कहानी के मूल में है।युवा पीढ़ी आधुनिक तौर तरीकों के साथ जीना चाहती है तथा पुरानी पीढ़ी के लिए अपनी परम्पराओं के विपरीत इं तौर तरीकों को अपनाना सहज नहीं होता। बड़े ठाकुर के पुत्र का ब्याह है। वे अपनी परम्पराओं के अनुसार विवाह के रीति रिवाज सम्पन्न करवाना चाहते हैं।मगर उनका छोटा भाई दिग्विजय व बहन ननकी विवाह में वीडियोग्राफी के लिए वीडियो के जाने की बात कहते हैं।रीति रिवाजों व परंपरा की उपेक्षा व आधुनिक तरीकों का बोलबाला बड़े ठाकुर की चिंता की वजह बनता है। लेखक आधुनिक समाज में परंपरा व आधुनिकता के बीच के द्वंद को बड़ी ही खूबसूरती से कहानी में उठाते हैं।

डरे हुए लोग - डरे हुए लोग कहानी मध्यवर्गीय परिवार की कथा है जहां अपनी छोटी- छोटी जरूरतों के लिए भी परिवार को महीना भर संघर्ष करना पड़ता है। एक आम मध्यवर्गीय परिवार जिन समस्याओं से दो चार होता है वही व्यथा कमला तथा उसके पति की भी है।दोनों पति पत्नी बेटे की जरूरत पूरी ना कर पाने के कारण चिंतित हैं तथा  बेटे को आश्वासन देते हैं के माह के अंत में वेतन आते आते उसकी जरूरत पूरी हो जायगी।मगर दोनों को ही पता है कि यह आसन नहीं है। शेखर जोशी मध्यवर्गीय समाज के छोटे छोटे सुख दुख, संघर्ष इत्यादि को ना केवल अपनी अधिकांश कहानियों का विषय बनाते हैं बल्कि उस जिजीविषा को भी सामने रखते हैं जो इं संघर्षों से होड़ लेती है,उनके सामने घुटने नहीं टेकती। 

बदबू - बदबू कहानी उस समाजिक विडंबना को भी परिलक्षित करती है जहां जूझते हुए अंततः हम उस व्यवस्था का हिस्सा हो जाते हैं। इस ओर कहानी का अंत दृष्तव्य है जहां नायक हाथों से केरोसीन की बदबू पुनः महसूस होने से संतुष्ट होता है-
" दूसरी मिट्टी लगाने से पहले उसने हाथों को सूंघा और अनुभव किया कि हाथों की गंध मिट चुकी है।सहसा एक विचित्र आतंक से उसका समूचा शरीर सिहर उठा।उसे लगा आज वह घासी की तरह बदबू का आदि हो गया है। उसने चाहा कि एक बार फिर हाथों को सूंघ के लेकिन उसका साहस नहीं हुआ। परन्तु फिर बड़ी मुश्किल से वह दोनों हाथों को नाक तक ले गया और इस बार उसके हर्ष की सीमा ना रही।पहली बार उसे भ्रम हुआ था हाथों में केरोसीन तेल की बदबू अब भी आ रही है।"

बदबू कहानी का नायक ओद्यौगिक व्यवस्था की विसंगतियों के प्रति जागरूक है।वो उस व्यवस्था के खिलाफ अन्य मजदूरों को भी संगठित करना चाहता है।मगर इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ता है और उसे मुश्किल जगह काम के लिए भेज दिए जाने के रूप में।बदबू कहानी का अंत यथार्थ में बदलाव की उद्घोषणा के रूप में महत्वपूर्ण है।जहां पर कई मजदूर उस वातावरण व्यवस्था को चुपचाप ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेते हैं वहीं कहानी का नायक नए बदलाव के प्रति आशावान है। 

आशीर्वचन - आशीर्वचन कहानी का नायक रिटायरमेंट के लिए जाने वाला है। उसके आखिरी दिन काम पर आने से कहानी शुरू होती है।कहानीकार बताता है कि उस कारखाने में कुछ वर्षों से अच्छी परंपरा शुरू हुई है कि वेलफेयर एसोसिएशन के द्वारा  रिटायरमेंट में जाने वाले कर्मचारी को एक जोड़ी नए कपड़े और जूते दिए जाते हैं। काम के आखिरी दिन श्यामलाल कारखाने में घूम घूमकर पुरानी स्मृतियां ताजा करता है।उसे वो दिन याद आते हैं जब वह युवक था और काम में तेज भी।जहां से भी श्यामलाल कारखाने में गुजरता है सभी सहकर्मी उसका अभिवादन करते हैं।साहब द्वारा भी उसे ओपचारिक मुलाकात के लिए बुलाया जाता है।शाम को जब हॉल में श्यामलाल का विदाई समारोह आयोजित होता है तब श्यामलाल की इच्छा होती है कि वह भी अपने अनुभव व शुरुवाती मुश्किल दिनों की यादें युवा पीढ़ी के साथ बांटे तथा उन्हें ईमानदारी व लगन से काम करने की प्रेरणा दे। यथा- 
"उसने सोचा अगर अलख नारायण ने उससे भी बोलने का अनुरोध किया तो वह बताएगा उन्हें उस कारखाने के बारे में, कारखाने के पुरखों के बारे में जिन्होनें इसकी एक एक ईंट रखी है,उस जमाने के बारे में जब सिर उठाने का मतलब सिर काटना होता था, उन जीतों के बारे में जिन्हें जितना आसान नहीं था, उन हारों के बारे में जिन्हें भूलना आसान नहीं है।वह उन्हें हुनर की इज्जत करने के लिए कहेगा। ठेले पर चैनल फेंकता मुल्लू, कैंची मशीन का ऑपरेटर,पटरी केन वाला लड़का,ग्राइंडर पर खड़ा रामलखन उसकी आंखों के आगे घूम गया।उसने सोचा, वह उन्हें हमेशा न्याय का साथ देने। अन्याय से लडने के लिए कहेगा। भाषणों का दौर चालू था।भाषण से ही नेता की पहचान होती है,कोन उन्नीस पड़ता।अलख नारायण ने साहब से दो शब्द ' कहने की प्रार्थना की।लोग चोरी छिपे अपनी घड़ियों की ओर देखने लगे थे।"

इस प्रकार कहानीकार ओद्योगिक कामगार जीवन की छोटी छोटी विसंगतियों को उसकी समग्रता के साथ प्रस्तुत करते हैं।एक पूरा जीवन कारखाने की देने के बाद सेवानिवृति की कगार में खड़ा कारीगर किस तरह उस बिताए एक एक लम्हें को पुनः जीता है। सभी सहकर्मी अपने बुजुर्ग साथी को स्नेह  सम्मान देना चाहते हैं मगर दिनभर की जी तोड़ मेहनत व अपने व्यक्तिगत संघर्ष उन्हें अधिक देर तक श्यामलाल को सुनने की इजाजत नहीं देते।ओर जल्दी में श्यामलाल को अभिवादन देते हुए वे लोग घर की तरफ तेजी से निकलने लगते हैं।कहानी से गुजरते कारखाने जी दिनचर्या का हिस्सा होते हुए पाठक श्यामलाल की जगह स्वयं को महसूस करने लगता है।बेहद सहज व सादी भाषा में लेखक कहानी के मर्म के साथ पाठक को जोड़ने में कामयाब होता है।

.मीना पाण्डेय 



Copyright ©-मीना पाण्डेय 

Tuesday, September 20, 2022

हैरानी का समाजशास्त्र


यदि आप इंसान है तो हैरान होना जरुरी है। बड़े मियां आज के दौर में आदमी होने की शर्त ही है कदम कदम पर  खुद को हैरानियों के लिए तैयार रखना। बाफुर्सत औरतें और बेरोजगार जो पिछले दिनों आलिया-रणवीर की वैडिंग ड्रेस और प्रियंका चौपड़ा के निक को देखकर हैरान थे वो आजकल इंडिया की बल्लेबाजी पर हैरान हैं।


यकीन मानिए हैरान होना दुनिया का सबसे आसान काम है। कहीं भी, किसी भी बात पर हैरान हुआ जा सकता है। तब भी जब और कुछ न किया जा सके हैरान तो हुआ ही जा सकता है। इस पर भी सबसे अच्छी बात यह कि सरकार  का ध्यान भी इस गैर मामूली इंसानी आदत पर अभी तक नहीं गया। कौन जाने इस पर भी मनोरंजन टैक्स की तर्ज़ पर हैरान टैक्स जैसा कोई नया कर ही लगा दिया जाय। फिलहाल तब तक जमकर और बेफिक्र हैरान हो लिजिए। 


कुछ गप्पबाजों की दुकानें ही इस एक बेशकीमती हुनर पर टिकी रहती हैं। फलां फलां की कमाई, फलां व्यक्ति ने किया कारनामा या फलां की बेटी फलां के साथ रफूचक्कर। आंखें फाड़कर हथेली को गालों पर टिका लिजिए। यदि आप इस के साथ मुंह भी फाड़ सकते हैं तो आप में एक उम्दा हैरान शख्स बनने की सारी काबिलियत है। गाहे-बगाहे इस प्रक्रिया को दोहराते रहना भी जरूरी है,  आखिर अभ्यास नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं। स्थान के अनुरूप हैरान होने के तरिकों में कुछ भिन्नता देखने को मिलती है। यदि आप शहरों में रहते हैं तो थोड़ा सा आंखें फाड़कर और छोटा-सा मुंह खोल कर हैरान हुआ जा सकता है लेकिन यदि आप किसी गांव या कस्बे में रहते हैं तो आप को हैरान होने के लिए ज्यादा मस्सकत करनी होगी। हैरान होने की आदत व्यक्ति सापेक्ष या घटना सापेक्ष होती है यानि एक बात या घटना जो आपको हैरान कर रही है, हो सकता है कि वो दूसरे के लिए सामान्य सी बात हो।


बहरहाल, आज की जय श्री राम और अल्लाह हो अकबर राजनीति में भी हैरान होने के किस्से कम नहीं है। यहां हैरान होने से ज्यादा हैरान किया जाता है। आज की राजनीति किस तरफ जा रही है या सारी शाखों पर उल्लू ही क्यों बैठें हैं? इस बात पर यहां कम हैरानी होती है। यहां इस पर भी हैरानी नहीं होती कि पिछत्तर सालों में केवल पैकेजिंग ही क्यों बदलती रही? हैरान होने की वजह यहां अनर्गल बयान भी नहीं होते। हैरान होने की वजहें यहां प्रियंका वाड्रा, अमेठी और अमित शाह जैसी बड़ी होती हैं। हम मोदी के कपड़ों और राहुल के लड़कपन पर हैरान होते हैं। रसोई गैस व पैट्रोल के बड़े हुए दाम हमें परेशान तो करते हैं हैरान नहीं। हम हैरान होते हैं इस बात पर कि इंदिरा गांधी से हूबहू कैसे मिलती है उनकी पोती की शक्ल? मुहल्ले की सबसे काबिल और खूबसूरत लड़की के तेजाब जले चेहरे को देख हमें हैरानी नहीं होती।

हैरान होना दुनिया का सबसे खूबसूरत काम तब हो जाता है जब आपकी हैरानी आपको परेशान करने लगती है।


मीना पाण्डेय

  

Tuesday, September 13, 2022

हिन्दी दिवस

 भाषा नदी है

 धाराओं से समृद्ध 

 सीमा में असीमित बहते हुए 

बहा ले जाती है

तमाम मौखिक-लिखित असुविधाएं,

दुविधाएं

नदी की तरह 

भाषा की भी कोई सरहद नहीं होती

सीमाएं लांघकर 

अपने गन्तव्य तक पहुंचती है भाषा

जहां नहीं पहुंचती वहां उसकी पैकेजिंग पहुंचती है


भाषा नदी है

जिसके जल को

 मुहँ में भीतर तक गुड़गुड़ा 

जहन की बेस्वादी धोई जा सकती है

अपनी यार भाषा में

जबडे से जेहन तक गटका जा सका 

समय का सबसे विषाक्त रूपक

सबसे अश्लील मुहावरा

पढ़ा लिखा जिस भी भाषा में गया

मस्तिष्क से स्नायुओं तक 

 मातृभाषा में ही ढुकेला जा सका है


हिन्दी मेरे जायके की सबसे लजीज भाषा रही

जिस में घुल कर 

किसी भी जुबान में

असर आया है


मीना पाण्डेय 

Thursday, August 4, 2022

कविताएं-मीना पाण्डेय

 घास 


जीवन के घोषित-अघोषित हिस्सों पर

विचारों के बांझपन को ढ़ापती 

फिर उग आऐगी घास 


 पतझड़ की दुखती देह पर मरहम लगाते बसंत

 बुलाए नहीं जाते


स्वतः आ जाती है

लम्बी थकान के बाद नींद


 बचे रह गए दालानों, धाटियों और रास्तों पर भी

प्रश्नचिन्ह की तरह अनायास उग आएगी घास 


 जमीन पर फूटने से पहले 

एक युद्ध वो मिट्टी के भीतर लड़ेगी 

जब जब बारिश धोऐगी जमीन की मटमैली देह

सतह को फाड़ सर उठाऐगी घास 


ये हरा रक्त गांव की धमनियों में दौड़ता है

ताकि बने रहे घर, आंगन और गोट 


पुरखों ने जब भी सर पर हाथ रख कहा  'हरा भरा रहे'

उनकी कल्पना में घास ही रही

बार-बार, कई बार उगना

हरी घास की तरह

ताकि एक सुबह दराती कमर में खौंच 

मेरे गांव की घस्यारिनें

फिर गट्ठरों में बांध लें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सुख 

कटना घास की नियति है

बिछना घास का सुख।




संसार की सबसे सुंदर औरतें


उसे गाड़-गधेरों, नौलों-धारों के डबडबाने व सूखने का सही क्रम पता है

 बाहर उमड़ने से पहले

उसके भीतर उमड़ता है एक चौमास


हिमालय के कन्धे पर पैर टिका

उसकी देह से हरी चादर उतार लाने का हुनर वो जानती है


उसे पता है दिन के ठीक किस पहर 

रघुवा के बाप को बीडी की

रम्भा को घास की 

और 

बूढों को लगती है चाय की टीप

अंतहीन परिश्रम को आंचल की गाँठों में बांध

वो जानती है मां होने की प्राथमिकताएं


यहां अपनी समग्रता मे उपस्थित रहता है पहाड़


हिमालय की पीठ पर दराती सी घुपी औरतें

संसार की सबसे सुंदर औरतें हैं।


#मीनापाण्डेय

गढ़वाली, कुमाउनी एवं जौनसारी अकादमी द्वारा आयोजित बाल-उत्सव 2022

 गढ़वाली, कुमाउनी एवं जौनसारी अकादमी द्वारा आयोजित बाल-उत्सव 2022 (3 जुलाई से 9 जुलाई) के सफ़र पर एक नज़र..


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3 जुलाई, रविवार

 इस उत्सव का उदघाट्न, आज़ादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष में वीरांगना 'तीलू रौतेली' की सफल प्रस्तुति के साथ 3 जुलाई को हुआ था। लाइट्स, ऑडियो एवं वीडियो प्रोजेक्शन से बने, इसके दृश्यबंधों को दर्शकों ने सराहा। प्रस्तुति का मूल आलेख, परिकल्पना व निर्देशन- सुवर्ण रावत का था। भाषाविद- रमेश चंद्र घिल्डियाल व सहायक निर्देशन में श्रुति मैठाणी थी। 


दूसरी प्रस्तुति ख़िलानंद के निर्देशन में 'मैं च्यल छूँ' थी। भाषाविद पूर्णचन्द्र कांडपाल व सहायक निर्देशक भुवन गोस्वामी थे। इस प्रस्तुति में लिंग भेद की अनेक घटनाकर्मो को बख़ूबी से उकेरा गया था। वेशविन्यास व मंच सामग्रियों से आँचलिक पुट दिया गया था।


4 जुलाई, सोमवार

आज की नाट्य प्रस्तुति 'हरुहित मालूशाही' की लोककथा' उत्तराखण्ड की एक मशहूर प्रेम कथा थी। शिल्प, तकनीक व प्रस्तुतिकरण पहुलुओं को अगर नज़र अंदाज़ कर दें तो कलाकारों की वेशभूषा, रूप सज्जा एवं मंच सामाग्री भव्यता से भरी लुभावनी थी। 'घुरुघरवान्ति घुघुति...', 'यो डांडा, यो कांठा....देखी छ न्यारा-न्यारा' के साथ 'कनी बज मुरली' गीत की धुन पर विभिन्न क्रियाकलाप- देवी-पूजा, शादी-व्याह के फेरे, माँगल गीत लोक परम्पराओं के साथ नायक-नायिका का रामगंगा पर दुःखद अंत होता है। इसका निर्देशन किया था चंद्रकला नेगी ने, भाषाविद- सुनील नेगी व सहायक थी-ऋतु पन्त।


दूसरी प्रस्तुति, 'जीतू बगड़वाल' में कलाकार पार्श्व से ख़ुद ही गा-बजा रहे थे। वाद्य यंत्र-ढोल, दमाऊ, रणसिंघा लिए रैंप के अलावा पूरे मंच का भरपूर स्तेमाल किया गया था। माँगल गीत- 'खोली क गणेश' के साथ हल्दी-हाथ/बान-रस्म। 'ऐगी र ऐगी स्वाणि बांध' पर नृत्य के बीच छोटे-छोटे दृश्य में मिमियाती बकरी, काले रंग के मुखोटे में दो बैल उभर कर आए थे।आख़िर में बाँसुरी से मंत्र-मुग्ध आछीरियां, जीतू का हरण करती हैं। इसका निर्देशन किया था-हिम्मत नेगी ने। भाषाविद थे-जगदीश नोडियाल व सहायक निर्देशक-निशांत रौथाण।


5 जुलाई, मंगलवार

को पहली नाट्य प्रस्तुति 'कै जावा भेंट आख़िर' में बच्चों के साथ निर्देशक, भाषाविद व सहायक निर्देशक क्रमशः लक्ष्मी रावत, मदन डुकलान व पूजा बडोला भी अभिनय करते हुए नज़र आए। नाट्य प्रस्तुति ने जहाँ एक ओर छूटे हुए उत्तराखण्ड, पलायन की पीड़ा व प्रवासी उत्तराखंडी की जटिलता को सफलता से दर्शाया था। वहीं दूसरी ओर भाषा-बोली के प्रति बेरुखेपन के साथ टूटते रिश्तों की संवेदनाओं को भी छुआ था।


दूसरी नाट्य प्रस्तुति 'फूल जाई' वेशभूषा व रूपसज्जा से जौनसार का परिवेश अच्छे से झलक रहा था। भाग लेने वाले कलाकारों में स्कूल की मास्टरनी वाले दृश्य में एक ओर पांव से लिपटने वाला नन्हा बच्चा भी था तो थानेदार व मास्टरनी की मदद में भारी बोझ को अपनी पीठ में लादने वाले बड़े बच्चे भी थे। शिल्प एवं तकनीक को यदि छोड़ दें, तो नाट्य प्रस्तुति की समाप्त पर ढोल-नगाड़ों के साथ होने वाले तांदी/नाटी गीत पर जौनसार-बावर के दर्शक (पुरुष एवं महिला) उत्साह से भरे मंच पर चढ़ गए, हाथ में डांगरा/ फरसा लिए राजेन्द्र सिंह तोमर (निर्देशक), रमेश चंद्र जोशी (भाषाविद) व टी.आर. शर्मा (सहायक निर्देशक) ने अगुवाई की। पूरा प्रेक्षागृह 'महासू देवता' के जयघोष से गूँज उठा। उत्तराखण्ड के रंगमंच इतिहास में यह देश की राजधानी में शायद पहली जौनसारी नाट्य प्रस्तुति थी।


6 जुलाई, बुधवार

की दोनों नाट्य प्रस्तुतियों में बच्चों की संख्या अब तक के केंद्रों से सबसे ज़्यादा थी।

पहली नाट्य प्रस्तुति 'बारामासा' में अलग-अलग ऋतुओं में हल जोतना, गुड़ाई करना आदि क्रिया- कलापों को बख़ूबी मंच पर दर्शाया गया था। गीत 'दैणा होया...,' 'सुफला हो जाया देवा हो...' , 'तेरी झुमैला...' बुब्बू कौथिक...'एवं 'मेरी स्याली...' जैसे गीतों पर छोटे-बड़े बच्चों के अलग-अलग दो समूहों पर पारंपरिक वेशभूषा व रूप सज्जा में किए गए नृत्य ने मंच पर छटा बिखेर दी थी। बारात व नंदा देवी कौथिक के दृश्य पारंपरिक परिधान में भव्यता से भरे व मनमोहक थे। नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन-भगवत मनराल ने किया। भाषाविद व सहायक निर्देशन का ज़िम्मा क्रमशःनीरज बवाड़ी व रेखा पाटनी ने निभाया।


दूसरी नाट्य प्रस्तुति 'पहाड़ा की कुंती' का सशक्त कथानक, नशा मुक्ति पर आधारित था। कुछ बहुत छोटे बच्चे होने पर भी ढोल-दमाऊ, दैवीय-निशान व पूजा-अर्चना की सामाग्री के साथ गीत -'देव भूमि प्यारो-प्यारो, ये देश हमारो...' ने समा बांध दिया था। अपने शराबी पति व गाँव के प्रधान से आक्रोशित 'कुंती' की लड़ाई, एक आंदोलन में तब्दील हो जाती है और महिलाओं का सैलाब उसके साथ उमड़ पड़ता है। जिसे देख, आख़िर में मातृ शक्ति के सामने, असमाजिक तत्व घुटने टेक देते हैं। नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन, नरेन्द्र पांथरी ने किया। साथ में भाषाविद-डॉ. बिहारी लाल जालंधरी व सहायक निर्देशक उमेद सिंह नेगी थे।


7 जुलाई, गुरुवार

नाट्य प्रस्तुति 'आमक जेवर' का कथानक गहनों के बॉक्स के इर्द-गिर्द घूमता है। नेपथ्य में बजने वाली बाँसुरी की स्वर लहरी से मंच पर घटित दृश्यों को उभारने में मदद मिली थी। स्वेटर बुनना, बच्चों का खेलना, टॉवर की वजह से मोबाइल नेटवर्क की समस्या के बीच -'होलो री बल होलो री..., छ गंगा पार...ओ गंगा भगीरथी बागेश्वर जैसे सटीक गीत थे। कथा-पूजा के दौरान देवता का अवतरित होने के साथ बैठी व खड़ी होली की झलक भी देखने को मिली थी।आख़िर में अम्मा के न रहने पर, - 'जिनके पास जेवर नहीं होते, तो क्या वे सेवा नहीं करते।" संवाद के बाद, कुछ लम्हों ठहराव के उपरांत पूर्व प्रवाह के साथ नाटक का अंत हो गया था। निर्देशक के.एन. पाण्डेय 'खिमदा'

भाषाविद- रमेश हितैषी सहायक निर्देशक-संगीता सुयाल थी।


आज की दूसरी नाट्य प्रस्तुति 'मास्टरनी' थी। जिसमें एक मास्टरनी की संरक्षण व मार्गदर्शन में एक साधारण छात्र प्रगति के रास्ते चलकर, अपने व्यक्तितत्व का विकास करता है। बच्चे के सर पर माँ का साया न रहने पर भी एक शिक्षिका के सकारात्मक प्रोत्साहन से वह एक बड़ा डॉक्टर बन जाता हैं। नाटक में 'मास्टरनी' के ज़रिए बच्चों के मनोवैज्ञानिक पहलुओ को अच्छे से उभारा गया था। निर्देशक-विपिन देव, भाषाविद- रघुवर दत्त शर्मा, सहायक निर्देशक-बृजमोहन वेदवाल थे।


 8. जुलाई, शुक्रवार

आज की पहली नाट्य प्रस्तुति 'श्रीदेव सुमन' के संघर्ष की कहानी थी। जिनकी मौत 84 दिन के अनशन के बाद भी रहस्यमयी बनी हुई है- ज़हर या कुछ और? 'सुमन-लक्ष्मी' (पति-पत्नी) एवं दो पुलिस आफिसरों के वैचारिक मतभेदों को बड़ी संवेदनशीलता से उकेरा गया था। इसके अलावा, जहाँ एक ओर टेहरी के राजा को 'जयदेव' से नवाजती भोली-भाली जनता दिखी तो वहीं दूसरी ओर श्रीदेव सुमन व उनके प्रजामण्डल के साथियों को प्रताड़ित करता मोर सिंह के पुलिस बल का कहर भी नज़र आया। इस नाटक के निर्देशक-संयोगिता ध्यानी

भाषाविद- रणीराम 'गढ़वाली' एवं

सहायक निर्देशक- दर्शन सिंह रावत थे।


आज की दूसरी नाट्य प्रस्तुति 'वीर शहीद केसरी चन्द्र' पर आधारित थी। गाँव के स्कूल व डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून पढ़ाई के दौरान शिक्षक के उत्साहवर्द्धन व ब्रिटिशर्स के साथ हुई मुठभेड़ ही उन्हें देश भक्ति की ओर खींच लाई थी।

घर-परिवार में अपने 'माँ-बाबा' को भी 'केसरी' की इस देशप्रेम की ज़िद्द के आगे झुकना पड़ा था और केसरी ने अपने आपको सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिंद फौज़ में झोंक दिया था। कलाकारों द्वारा अभिनीत चरित्रों/किरदारों की मंच सामग्री, वेश-भूषा व रूप-सज्जा आकर्षक थी। विशेष रुप से ब्रिटिशर

ऑफिसर का पहनावा, जज की विग एवं केसरी चंद्र की हाथ-पाँव में झूलती बेड़ियां। इस नाटक की

निर्देशक-मंजूषा जोशी, भाषाविद-खजानदत्त शर्मा एवं

सहायक निर्देशक-तारादत्त जोशी थे।


9. जुलाई, शनिवार

3 जुलाई, उदघाट्न प्रस्तुति 'तीलू रौतेली' के बाद बाल-उत्सव का सम्मापन सिर्फ़ एक नाट्य प्रस्तुति 'रामी बौराणी' से हुआ। अन्य 12 केन्द्रों की अपेक्षा इसका प्रस्तुति- अन्तराल कम था। एक फौजी का साधु-संत के भेष में अपनी माँ व पत्नी से मिलना एक सुखद अंत था। इस नाट्य प्रस्तुति के निर्देशक-आशीष शर्मा,भाषाविद- पृथ्वी सिंह केदारखण्डी,सहायक निर्देशक- रमेश ठंगरियाल थे। सम्मापन समारोह के मुख्य अतिथि दिल्ली शिक्षक विश्व विद्यालय के कुलपति प्रो. धनंजय जोशी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (नेशनल एडुकेशन पालिसी) के तहत सभी भाषाओं के प्रचार-प्रसार पर ज़ोर दिया था। जो की दिल्ली के 13 विभिन्न केंद्रों में उत्तराखण्ड की विविध भाषाओं में होने वाले सशक्त रंगमंचीय- कार्यशाला के माध्यम से करना उद्देश्य भी रहा है।

उत्तराखण्डी भाषा को लेकर देश की राजधानी दिल्ली में मराठी व बंगाली रंगमंच की तर्ज़ पर गढ़वाली व कुमाउनी रंगमंच में, 'पर्वतीय कला केंद्र', 'हाई हिलर्स' एवं 'पर्वतीय कला मंच' जैसी संस्थाएं आज भी सक्रिय हैं। इसके अलावा उत्तराखण्ड परिवेश में रंगमंच करने वालों में 'कला दर्पण', 'प्रज्ञा आर्ट्स' जैसी संस्थाएं प्रमुख हैं। 

गढ़वाली, कुमाउनी एवं जौनसारी अकादमी के13 केंद्रों में अकादमी के उपाध्यक्ष-एम.एस. रावत, सचिव-जीतराम भट्ट, कार्यक्रम समन्यवक- राकेश शर्मा एवं अकादमी के अन्य सक्रिय सदस्यों द्वारा किया गया यह प्रस्तुतिपरक रंगमंच कार्यशाला का प्रथम प्रयोग सराहनीय है।


अकादमी की ओर से अनेक घोषणाओं के बावजूद प्रेक्षागृह में खान-पान व मोबाइल में बात-चीत का सिलसिला आख़िर तक भी जारी रहा। यह तभी थमेगा, जब हम अनुशासन बनाने में अपनी व्यक्तिगत जिम्मेबारी समझेंगें।

गढ़वाली, कुमाउनी एवं जौनसारी अकादमी का यह ऐतिहासिक प्रयोग, एक खूबसूरत पड़ाव था। जिसकी दस्तक से देश की राजधानी में, एक सृजनात्मक हलचल रही। 20 दिनों की इस चुनौतियों से भरी प्रस्तुति परक कार्यशाला में अपनेपन के जज़्बे व कड़ी मेहनत से बच्चों का विश्वास जीतकर, उन्हें सँवारने-निखारने एवं 'व्यक्तित्व-विकास' की कड़ी में बच्चों के घर-परिवार के सदस्यों को उनकी छिपी प्रतिभा का बख़ूबी अहसास करवाना, तारीफ़े क़ाबिल है। 

सबने मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ाना है। ताकि प्रदर्शन कला/रंगमंच के सशक्त माध्यम से अपनी उत्तराखंडी- कला, साहित्य, संस्कृति की अनूठी पहिचान, राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय फ़लक पर छा जाए।


समीक्षक -डाॅ सुवर्ण रावत

 रंगमंच विशेषज्ञ 


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