मीना पांडे के काव्य संग्रह 'नराई' को मैंने कई बार पढ़ा। हर बार पहाड़ की संस्कृति के सागर में और गहरे डूबती चली गई। काव्य संग्रह का शीर्षक ही अपने भीतर प्रेम, याद व कसक को समेटे हुए है। एक विरहणी की पीड़ा व बिछोह जनित नराई यहां साकार हो उठती है-
.'तन मन किलमोड़ी के कांटे'
.'द्वार पर बिछी आंखें'
.'तुम ले आना/ एक रोज/ उन्हें भी दरवाजे'।
रोजगार के साधनों की कमी के कारण पलायन की पीड़ा सहते परिवार, मिलने की तीव्र उत्कंठा लिए मां, बहन, बेटी की व्यथा को लेखिका ने बड़े ही मार्मिक रूप से उभारा है-
'कभी चिट्ठी के बदले
किसी का अक्स उभरे।'
अपनी वेदना को सबसे छुपाने के प्रयास में उसके हृदय की चुभन का सौन्दर्य देखिए -
'चुभन कोई हंसी के साथ उभरी'
एक ओर विरह दग्ध हृदय तो दूसरी ओर श्रम की चक्की में पिसता शरीर। विवशता, विरह, वेदना व श्रम को कितना सटीक बिम्ब मिला है-
' सख्त हथेली
योवन मुरझाया
होठों पर एक प्यास।
आज मोबाइल है। आने-जाने की सुविधा है। पर पहले तो चिट्ठी व मनीऑर्डर पर ही टिकी थी पहाड़ की संस्कृति। उसी की आस में अभाव व वियोग की पीड़ा कटती थी-
' मनीऑर्डर
की शक्ल में
जवाब भी कहां आया है।'
और जब खत व मनीऑर्डर आया तो मानो पूरा परिवेश ही नाच उठा। ह्रदय के इस उल्लास को लेखिका ने बड़ी ही सजीवता व नवीन बिम्बो के अद्भुत सौंदर्य के साथ अभिव्यक्ति दी है-
'फिर दोपहर खिलखिलाई/
सांझ ने भगनौल गाया/
सीमा से/ किसी को/ याद करता फिर किसी का/ खत है आया।'
पलायन की यह पीड़ा एक तरफा नहीं है। घर से जाते समय परिवार व जाने वाले की पीड़ा को लेखिका के नए अंदाज ने कितना मार्मिक बना दिया है-
'बारिश में
नहा रहा है गांव
कोई शहर को
जा रहा है।'
एक पति व बेटे की विवशता, सीमा पर तैनात सिपाही के अपनी पत्नी को भेजे गए पत्र में झलक रही है-
'एक बेरी यहां/ एक तेरा खिलखिलाना / छिड़ी है/ सीमा पर जंग /मुश्किल है /मेरा लौट के आना।'
'ईजा-बाबू हैं/तेरे भरोसे
मेरे भरोसे/ मातृभूमि।'
इस पीड़ा का अंदाजा वही लगा सकता है, जो पहाड़ की संस्कृति में रचा बसा हो। पत्नी वियोग की पीड़ा। वृद्ध माता-पिता की चिंता व मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की भावना। कुछ पंक्तियों में लेखिका ने सब कुछ कहकर 'गागर में सागर' भर दिया है।
नारी की विरह वेदना के साथ उसका मायके की याद में छटपटाते हृदय के गान को घुघूती के माध्यम से बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है-
'वह सजल/ सुंदर सी युवती/ एक न्योली गा रही है'
'छैय्या में बैठी/ एक घुघुती गा रही है।'
आधुनिक युग में समय के साथ-साथ पहाड़ की नारी आकाश छूने का प्रयास भी कर रही है। देखिए परिश्रम और सपने का ताना-बाना लेखिका ने कितने कौशल से बुना है-
'सुबह स्कूल में उगती।
शाम जंगल की ओर
छीलती, बीनती लकड़ियां'।
"स्कूल में उगती" एक नया प्रयोग है जो लड़कियों की उड़ान को भीतर समेट रहा है।
पहाड़ का एक उज्जवल पक्ष वहां के मेले उत्सव हैं जो वहां के श्रम, विरह-वेदना व कष्टों को कुछ पल के लिए उल्लास में बदल देते हैं। प्रकृति के साथ मन भी नाच उठता है-
'राई फूली/एपण झूले/ द्वार पर झूली बसंत धार।'
इसी तरह 'हुड़के ने चैती गाई' बहुत सुंदर बिम्ब है। हुड़का पहाड़ की संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है, जिसकी थाप पर बच्चे से लेकर वृद्ध तक सभी थिरक उठते हैं। चैत का महीना बहनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। इसकी प्रतीक्षा वह साल भर करती है-
'चैत ने आंगन बुहारा
फिर बहन के/ द्वार पर/ भाई ने/ झूला उतारा।
'आंगन बुहारा', 'झोला उतारा' में मानो बहन का सम्पूर्ण प्रेम व मायके का पूरा खजाना सिमट कर आ गया हो। यह पर्व त्यौहार, कौतिक पहाड़ की संस्कृति का उज्जवल पक्ष हैं। कौतिक(मेले) का आनंद उठाती बालिकाओं का उल्लास देखिए-
' 'तिले धारो बोला' / नाचती छपेलियां।'
मीना पाण्डेय ने एक ओर कविताओं के माध्यम से पहाड़ को उसके सौन्दर्य, श्रम, विरह- वेदना, हर्ष-उल्लास के साथ अभिव्यक्ति दी है तो कुछ कहानियों के माध्यम से एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे वृद्धों के जीवन के सूनेपन, 'बंजर मकान को घर बना। पुरखों का ऋण चुकाती' वृद्धा की पीड़ा, सामाजिक विषमता का दंश झेलती परित्यक्ता की वेदना को भी बड़ी कुशलता से अभिव्यक्ति दी है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह काव्य संग्रह मीना पांडे के पहाड़ के प्रति प्रेम को दर्शाता है। वहां के जीवन और संस्कृति के छोटे से छोटे पहलुओं को इसमें स्थान मिला है। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति के सागर में गहरे तक उतर कर वहां के लोक जीवन के इतने मोती हमारे हाथों में रख दिए हैं कि कहीं-कहीं लयात्मकता की एक-दो कमियां नजरंदाज की जा सकती हैं। लेखिका इसी तरह पहाड़ को अपनी कविताओं कहानियों में उतारती रहें,यही प्रार्थना है।
डॉ पुष्पलता भट्ट 'पुष्प'
एसोसिएट प्रोफेसर
श्री वेंकटेश्वर कॉलेज
धौला कुआं,नई दिल्ली

