ऑफबीट सिनेमा का पर्याय बन चुके आयुष्मान खुराना की नई फिल्म बधाई हो नए कथानक व दमदार अभिनय के साथ सिनेमाप्रेमियो के दिलों में जगह बना गई। हंसते हंसते कब आंख की कोर भीग जाती है पता नहीं चलता।नीना गुप्ता, आयुष्मान खुराना, सान्या मल्होत्रा व गजराज राव जैसे कलाकारों का अभिनय चार चांद लगा गया मगर इन सब पर भारी पड़ी सुरेखा सिकरी अपने दमदार अभिनय और तीखे संवादों से सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। बेहद चुटिले संवाद, रोचक कथानक और सशक्त अभिनय इन तीनों का सुखद मेल है बधाई हो । आयुष्मान ऐसे अभिनेता है जो आर्ट और व्यावसायिक सिनेमा के मध्य की खाई को पाटने में सर्वथा सक्षम दिखाई देते हैं।यहां पर भी उन्हें नकुल के किरदार में देखना अच्छा लगा। पचास के पार मां यदि प्रेगनेंट हो जाती है तो परिवार, बच्चों व समाज की क्या प्रतिक्रिया होती है उसे बखूबी परदे पर उतारती फ़िल्म है बधाई हो। जीवन के जिस कोने में सेंध लगाने का प्रयास यह फिल्म करती है वो जगहें अनदेखी- अनछुई इसलिए भी रह जाती हैं क्योंकि उनको सिनेमा जैसे माध्यमों के द्वारा उतारने के शिल्प व परोसने के जोखिम को उठाने से परहेज़ किया जाता रहा है। नए और अलग विषयों को पर काम करते हुए सिनेमा को सिनेमा की तरह उतारा जाना जहां ढाई घंटे का पैसा वसूल मनोरंजन देने के साथ आप चुपके से अपनी बात भी दर्शकों तक पहुंचा दें,तब आर्ट और कामर्शियल के एक्सक्यूज पीछे छूट जातें है।आज फिल्मी कॉमेडी इस हल्के अंदाज़ में पहुंच चुकी है कि दशकों को हंसाने के लिए कलाकार बेमतलब की उठापटक करते या थप्पड़,घूसे बरसाते दिखाई देते हैं।इन सब से इतर बधाई हो में गुदगुदाते संवाद हैं और बेहतरीन कॉमेडी एक्सप्रेशन टाइमिंग।कई बार आप केवल कलाकारों की मुखाकृति या परिस्थिति देखकर ही मुस्कुराने लगते हैं।कुल मिलाकर एक अच्छी फिल्म के लिए निर्देशक अमित शर्मा और राइटर अक्षत घिल्डियाल दोनों बधाई के पात्र हैं।
Sunday, October 21, 2018
बधाई हो- सिनेमा
ऑफबीट सिनेमा का पर्याय बन चुके आयुष्मान खुराना की नई फिल्म बधाई हो नए कथानक व दमदार अभिनय के साथ सिनेमाप्रेमियो के दिलों में जगह बना गई। हंसते हंसते कब आंख की कोर भीग जाती है पता नहीं चलता।नीना गुप्ता, आयुष्मान खुराना, सान्या मल्होत्रा व गजराज राव जैसे कलाकारों का अभिनय चार चांद लगा गया मगर इन सब पर भारी पड़ी सुरेखा सिकरी अपने दमदार अभिनय और तीखे संवादों से सबसे ज्यादा प्रभावित करती हैं। बेहद चुटिले संवाद, रोचक कथानक और सशक्त अभिनय इन तीनों का सुखद मेल है बधाई हो । आयुष्मान ऐसे अभिनेता है जो आर्ट और व्यावसायिक सिनेमा के मध्य की खाई को पाटने में सर्वथा सक्षम दिखाई देते हैं।यहां पर भी उन्हें नकुल के किरदार में देखना अच्छा लगा। पचास के पार मां यदि प्रेगनेंट हो जाती है तो परिवार, बच्चों व समाज की क्या प्रतिक्रिया होती है उसे बखूबी परदे पर उतारती फ़िल्म है बधाई हो। जीवन के जिस कोने में सेंध लगाने का प्रयास यह फिल्म करती है वो जगहें अनदेखी- अनछुई इसलिए भी रह जाती हैं क्योंकि उनको सिनेमा जैसे माध्यमों के द्वारा उतारने के शिल्प व परोसने के जोखिम को उठाने से परहेज़ किया जाता रहा है। नए और अलग विषयों को पर काम करते हुए सिनेमा को सिनेमा की तरह उतारा जाना जहां ढाई घंटे का पैसा वसूल मनोरंजन देने के साथ आप चुपके से अपनी बात भी दर्शकों तक पहुंचा दें,तब आर्ट और कामर्शियल के एक्सक्यूज पीछे छूट जातें है।आज फिल्मी कॉमेडी इस हल्के अंदाज़ में पहुंच चुकी है कि दशकों को हंसाने के लिए कलाकार बेमतलब की उठापटक करते या थप्पड़,घूसे बरसाते दिखाई देते हैं।इन सब से इतर बधाई हो में गुदगुदाते संवाद हैं और बेहतरीन कॉमेडी एक्सप्रेशन टाइमिंग।कई बार आप केवल कलाकारों की मुखाकृति या परिस्थिति देखकर ही मुस्कुराने लगते हैं।कुल मिलाकर एक अच्छी फिल्म के लिए निर्देशक अमित शर्मा और राइटर अक्षत घिल्डियाल दोनों बधाई के पात्र हैं।
Sunday, September 30, 2018
पुस्तक - ज्ञान चक्षु-आत्मसाक्षात्कार की एक अनूठी श्रृंखला
ज्ञान चक्षु- आत्मसाक्षात्कार की एक अनूठी श्रृंखला
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पुस्तक - ज्ञान चक्षु (आत्मसाक्षात्कार)
लेखक - महेश चंद्र पांडेय
संपर्क - भगवान पुर, हल्द्वानी,नैनीताल
मोबाइल-8630961236
जीवन के विभिन्न पायदानों में नित्यप्रति की चुनौतियों से गुजरता मनुष्य अपने आस पास के परिवेश, संपर्क में आते व्यक्तियों, परिस्थिति,देशकाल और समाज के विभिन्न पक्षों का अवलोकन, निरीक्षण इन स्थूल आंखों से ही करता है।अपने भीतर झांकने का ना तो उसके पास अवकाश ही है और ना ही वो जीवन दृष्टि ही जो भीतर व बाह्य जगत की वास्तविक छवि उसके सम्मुख रख सके। आध्यात्मिक चिंतन मनन वही तीसरा नेत्र अर्थात ज्ञान चक्षु हमें प्रदान करता है जो जीव व जगत के वास्तविक स्वरूप से हमारा परिचय कराता है।महेश चंद्र पांडेय की पुस्तक ज्ञान चक्षु आत्मसाक्षात्कार की वह अनूठी श्रृंखला है जो स्वयं व परमात्मा के परिचय के साथ,ज्ञान के प्रयोजन व आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से विश्व एकता का संदेश भी सामने रखती है।
सीमित कलेवर की 38 पृष्ठिय यह पुस्तक इस अर्थ में एक जरूरी पुस्तक है कि यह परंपरावादी व कर्मकांडी विचारधारा से पृथक आध्यात्मिक चेतना का तथ्यपरक व वैज्ञानिक सुझाव पाठक को सौंपती है।अनेक विचारकों, चिंतकों के विचारों का अध्ययन, चिंतन, मनन कर इस पुस्तक को विस्तृत फलक लेखक द्वारा दिया गया है।इस कारण इस पुस्तक की महत्ता और बढ़ जाती है।
पुस्तक के पूर्वकथन में अपनी बात शीर्षक से उस परमसत्ता की तरफ संकेत करते हुए लेखक लिखते हैं 'मनुष्य की शक्तियां सीमित हैं,वह जो कुछ भी सोचता है, करता है उसमें अपूर्णता रह जाती है। इसलिए वह एक ऐसी शक्ति को खोजने में लगा रहता है, जिसके सामने वह अपनी अपूर्णता को स्वीकार करता हुआ पूर्णता की ओर अग्रसर हो।'
अपूर्णता से पूर्णता की इस महायात्रा में स्वयं व ईश्वर के वास्तविक विराट स्वरूप से उसका परिचय होता है। मनुष्य ईश्वर की श्रेष्ठ कृति है मगर क्रोध, छल, कपट, द्वेष,मोह, अहंकार आदि विकारों के वश होकर आज उसकी स्थिति बहुत निकृष्ट हो गई है।यह अनुपम कृति आज विकारों के कारण पतन कि ओर अग्रसर है।
पुस्तक सात अध्यायों में विभक्त है जिसमें बड़े ही समीचीन तरीके से ईश्वर की श्रेष्ठ कृति मनुष्य, सृष्टि चक्र के चरण, आत्म ज्ञान, परमात्मज्ञान,समय की महत्ता,ज्ञान के प्रयोजन व अध्यात्म के माध्यम से विश्व एकता संदेश इत्यादि विषयों पर प्रकाश डाला गया है।ज्ञान की महत्ता को बताते हुए लेखक लिखते हैं- " ज्ञान का संबंध हमारे तंत्रिका तंत्र से जुड़ा होता है, तंत्रिका तंत्र के माध्यम से आत्मा का संदेश शरीर के विभिन्न कर्मेंद्रियों तक पहुंचता है।"
पुस्तक में विभिन्न उद्धरणों के माध्यम से जटिल तथ्यों को बड़ी ही सहजता के साथ तथा पौराणिक आख्यानों व प्रसंगों को तथ्यपरक ढंग से समझाया गया है।बेहद पठनीय शैली में लिखी गई यह पुस्तक पाठक की चेतना को अंतिम पृष्ठ तक आते आते आध्यात्मिक रूप से समृद्ध तो करती ही है साथ ही विस्तृत चिंतन के लिए प्रोत्साहित भी करती है।इस नाते ज्ञान चक्षु चिंतनशील पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।लेखक को साधुवाद।
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पुस्तक - ज्ञान चक्षु (आत्मसाक्षात्कार)
लेखक - महेश चंद्र पांडेय
संपर्क - भगवान पुर, हल्द्वानी,नैनीताल
मोबाइल-8630961236
जीवन के विभिन्न पायदानों में नित्यप्रति की चुनौतियों से गुजरता मनुष्य अपने आस पास के परिवेश, संपर्क में आते व्यक्तियों, परिस्थिति,देशकाल और समाज के विभिन्न पक्षों का अवलोकन, निरीक्षण इन स्थूल आंखों से ही करता है।अपने भीतर झांकने का ना तो उसके पास अवकाश ही है और ना ही वो जीवन दृष्टि ही जो भीतर व बाह्य जगत की वास्तविक छवि उसके सम्मुख रख सके। आध्यात्मिक चिंतन मनन वही तीसरा नेत्र अर्थात ज्ञान चक्षु हमें प्रदान करता है जो जीव व जगत के वास्तविक स्वरूप से हमारा परिचय कराता है।महेश चंद्र पांडेय की पुस्तक ज्ञान चक्षु आत्मसाक्षात्कार की वह अनूठी श्रृंखला है जो स्वयं व परमात्मा के परिचय के साथ,ज्ञान के प्रयोजन व आध्यात्मिक चिंतन के माध्यम से विश्व एकता का संदेश भी सामने रखती है।
सीमित कलेवर की 38 पृष्ठिय यह पुस्तक इस अर्थ में एक जरूरी पुस्तक है कि यह परंपरावादी व कर्मकांडी विचारधारा से पृथक आध्यात्मिक चेतना का तथ्यपरक व वैज्ञानिक सुझाव पाठक को सौंपती है।अनेक विचारकों, चिंतकों के विचारों का अध्ययन, चिंतन, मनन कर इस पुस्तक को विस्तृत फलक लेखक द्वारा दिया गया है।इस कारण इस पुस्तक की महत्ता और बढ़ जाती है।
पुस्तक के पूर्वकथन में अपनी बात शीर्षक से उस परमसत्ता की तरफ संकेत करते हुए लेखक लिखते हैं 'मनुष्य की शक्तियां सीमित हैं,वह जो कुछ भी सोचता है, करता है उसमें अपूर्णता रह जाती है। इसलिए वह एक ऐसी शक्ति को खोजने में लगा रहता है, जिसके सामने वह अपनी अपूर्णता को स्वीकार करता हुआ पूर्णता की ओर अग्रसर हो।'
अपूर्णता से पूर्णता की इस महायात्रा में स्वयं व ईश्वर के वास्तविक विराट स्वरूप से उसका परिचय होता है। मनुष्य ईश्वर की श्रेष्ठ कृति है मगर क्रोध, छल, कपट, द्वेष,मोह, अहंकार आदि विकारों के वश होकर आज उसकी स्थिति बहुत निकृष्ट हो गई है।यह अनुपम कृति आज विकारों के कारण पतन कि ओर अग्रसर है।
पुस्तक सात अध्यायों में विभक्त है जिसमें बड़े ही समीचीन तरीके से ईश्वर की श्रेष्ठ कृति मनुष्य, सृष्टि चक्र के चरण, आत्म ज्ञान, परमात्मज्ञान,समय की महत्ता,ज्ञान के प्रयोजन व अध्यात्म के माध्यम से विश्व एकता संदेश इत्यादि विषयों पर प्रकाश डाला गया है।ज्ञान की महत्ता को बताते हुए लेखक लिखते हैं- " ज्ञान का संबंध हमारे तंत्रिका तंत्र से जुड़ा होता है, तंत्रिका तंत्र के माध्यम से आत्मा का संदेश शरीर के विभिन्न कर्मेंद्रियों तक पहुंचता है।"
पुस्तक में विभिन्न उद्धरणों के माध्यम से जटिल तथ्यों को बड़ी ही सहजता के साथ तथा पौराणिक आख्यानों व प्रसंगों को तथ्यपरक ढंग से समझाया गया है।बेहद पठनीय शैली में लिखी गई यह पुस्तक पाठक की चेतना को अंतिम पृष्ठ तक आते आते आध्यात्मिक रूप से समृद्ध तो करती ही है साथ ही विस्तृत चिंतन के लिए प्रोत्साहित भी करती है।इस नाते ज्ञान चक्षु चिंतनशील पाठकों के लिए एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।लेखक को साधुवाद।
Wednesday, April 18, 2018
पुस्तक चर्चा-दर्पण
समाज का प्रतिबिंब है 'दर्पण'।
पुस्तकः दर्पण
कवयित्रीः डा. निशि मोहन
प्रकाशनः महिन्द्रा पब्लिशिंग हाउस, चंडीगढ़।
मूल्यः ₹ 175:00
डा. निशि मोहन का प्रकाशित काव्य संकलन 'दर्पण' राजनीतिक व समाजिक घटनाओं, नारी विमर्श , कृषक व श्रमिक जीवन की दुखद स्थिति के साथ-साथ आधुनिक जीवन की समस्याओं को उजागर ही नहीं करता बल्कि उन पर कुठाराघात भी करता है।
काव्य संकलन की प्रथम कविता 'माँ' माँ के समर्पण व उसके वात्सल्य प्रेम को प्रस्तुत करती है। गुरु गोबिन्द सिंह की महिमा का गुणगान करती पंक्ति 'मनुष्य वेश में वह दिव्य आत्मा मानवधर्म सिखाने आया था' उनके जीवन की सटीक व्याख्या करती है।
'विकास बनाम विनाश', 'बस करो' तथा 'धरती का दम घुटता है' में प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता व हमारी आधुनिक जीवन शैली पर कड़ा प्रहार है। कविता की पंक्ति ''जितना ऊँचा उठता है तरु/ उसकी पैठ उतनी गहरी होती/ तभी तो झंझावात में सीना ताने रहता है खड़ा/पर, आधुनिकता वश इंसा अपनी जड़ों को खोद रहा'' अपनी प्रासंगिकता को खुद बयान कर रही है। '26/11की कहानी ताज की जुबानी' आतंकवाद की भयावहता , दहशत तथा सेना की अद्भुत शौर्य की गाथा है। कविता 'दुश्मन को सबक सिखाना है' कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद तथा वीर सैनिक व उनके परिवार के साहस व देश भक्ति को दर्शाती है। समझौता एक्सप्रेस में मारे गए लोगों के प्रति संवेदनशील कवयित्री ने 'क्या मिला' कविता में असमाजिक गतिविधियों में संलग्न तत्वों से बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रश्न पूछा है''क्या मिला बेगुनाहों को मौत की नींद सुला के'' ? 'मँहगाई और मज़बूरी' , 'पहचानो श्रम की महत्ता' तथा 'अमीरी - गरीबी' कविता देश के निम्न वर्ग(श्रमिक, कृषक) के जीवन की व्यथा को सुनाती है।"आँचल में शिशु का क्रन्दन/आँखों से टपक रही मज़बूरी" पंक्ति देश की निर्धन माताओं की विवशता और बदहाली की ओर ध्यान आकृष्ट करती है। 'काश! ऐसा ही होता' नेताओं की कभी न पूरे होने वाले वादों को दर्शाती है। सुनामी , बादल फटने तथा बाढ़ जैसी प्राकृतिक त्रासदी का वर्णन कवयित्री ने अपनी कविताओं में किया है। "जब जीवन ज्योति बुझने लगी तब/ वह घी डाल कहता जलने को " पंक्ति भयंकर तबाही के बीच गाहे- बगाहे होनेवाले नवागत के जन्म की दास्तां सुनाती है, जो कवयित्री की आशावादी सोच को दर्शाती है।
'माँ की ममता', 'दूर नहीं पास है तू' , 'आधी आबादी', 'माँ के दिल का खौफ','असुरक्षित मासूम', 'मुझे बचा लो' , 'नारी समाज की त्रासदी ', ' इक्कीसवीं सदी की बेटियाँ ' कविताएँ नारी जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती हैं। इनमें माँ की ममता से लेकर गर्भस्थ शिशु की पुकार के साथ आधुनिक समाज में कन्याओं के लिए बढ़ती असुरक्षा की अभिव्यक्त है।
" न चाहिए उपाधि , न चाहिए अलंकार/ बस एक सम्मानजनक जीवित प्राणी के समान /चाहिए उसे अपनी पहचान!" स्त्रियों का सम्मान ही मूल शर्त है; समाज की आधी आबादी को संतुष्ट व खुशहाल रखने की।
बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति से चिंतित कवयित्री ने 'मातृभूमि के लाल ' में जीवन की महत्ता को समझाते हुए लिखा है-
"तुम हो राष्ट्र के अनमोल धरोहर, तुम्हें इतिहास नया रचना है
अवनि क्या अंबर पर भी ध्वज तिरंगा लहराना है।"
'संदेशा युवा शक्ति के नाम' में देश के युवक- युवतियों को अपनी शक्ति को पहचानने व देश में फैली अशिक्षा, गरीबी, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए आह्वान किया है।अंतिम कविता साहित्य की उपयोगिता व उसकी प्रासंगिकता को दर्शाती है।
कवयित्री का प्रथम काव्य संकलन इस उक्ति को प्रासंगिक बनाता है कि 'साहित्य समाज का दर्पण है' समाज के हर पहलू की अच्छाई और बुराई को उन्होंने काव्यसंग्रह में दर्शाया है। साथ ही उन्होंने समाज की बुराइयों पर कटाक्ष करते हुए कहीं -कहीं इन्हें दूर करने का समाधान भी बताया है। काव्य संकलन 'दर्पण' अपने नाम को सार्थक करता है, बिना किसी लाग- लपेट के सहज सरल शब्दों में भावों की अभिव्यक्ति है।सच पूछा जाय तो समाज का प्रतिबिंब है 'दर्पण'।
समीक्षक: डा.निरुपमा कपूर, 17,जसवंत स्टेट एक्सटेंशन, आगरा।
पुस्तकः दर्पण
कवयित्रीः डा. निशि मोहन
प्रकाशनः महिन्द्रा पब्लिशिंग हाउस, चंडीगढ़।
मूल्यः ₹ 175:00
डा. निशि मोहन का प्रकाशित काव्य संकलन 'दर्पण' राजनीतिक व समाजिक घटनाओं, नारी विमर्श , कृषक व श्रमिक जीवन की दुखद स्थिति के साथ-साथ आधुनिक जीवन की समस्याओं को उजागर ही नहीं करता बल्कि उन पर कुठाराघात भी करता है।
काव्य संकलन की प्रथम कविता 'माँ' माँ के समर्पण व उसके वात्सल्य प्रेम को प्रस्तुत करती है। गुरु गोबिन्द सिंह की महिमा का गुणगान करती पंक्ति 'मनुष्य वेश में वह दिव्य आत्मा मानवधर्म सिखाने आया था' उनके जीवन की सटीक व्याख्या करती है।
'विकास बनाम विनाश', 'बस करो' तथा 'धरती का दम घुटता है' में प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता व हमारी आधुनिक जीवन शैली पर कड़ा प्रहार है। कविता की पंक्ति ''जितना ऊँचा उठता है तरु/ उसकी पैठ उतनी गहरी होती/ तभी तो झंझावात में सीना ताने रहता है खड़ा/पर, आधुनिकता वश इंसा अपनी जड़ों को खोद रहा'' अपनी प्रासंगिकता को खुद बयान कर रही है। '26/11की कहानी ताज की जुबानी' आतंकवाद की भयावहता , दहशत तथा सेना की अद्भुत शौर्य की गाथा है। कविता 'दुश्मन को सबक सिखाना है' कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद तथा वीर सैनिक व उनके परिवार के साहस व देश भक्ति को दर्शाती है। समझौता एक्सप्रेस में मारे गए लोगों के प्रति संवेदनशील कवयित्री ने 'क्या मिला' कविता में असमाजिक गतिविधियों में संलग्न तत्वों से बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रश्न पूछा है''क्या मिला बेगुनाहों को मौत की नींद सुला के'' ? 'मँहगाई और मज़बूरी' , 'पहचानो श्रम की महत्ता' तथा 'अमीरी - गरीबी' कविता देश के निम्न वर्ग(श्रमिक, कृषक) के जीवन की व्यथा को सुनाती है।"आँचल में शिशु का क्रन्दन/आँखों से टपक रही मज़बूरी" पंक्ति देश की निर्धन माताओं की विवशता और बदहाली की ओर ध्यान आकृष्ट करती है। 'काश! ऐसा ही होता' नेताओं की कभी न पूरे होने वाले वादों को दर्शाती है। सुनामी , बादल फटने तथा बाढ़ जैसी प्राकृतिक त्रासदी का वर्णन कवयित्री ने अपनी कविताओं में किया है। "जब जीवन ज्योति बुझने लगी तब/ वह घी डाल कहता जलने को " पंक्ति भयंकर तबाही के बीच गाहे- बगाहे होनेवाले नवागत के जन्म की दास्तां सुनाती है, जो कवयित्री की आशावादी सोच को दर्शाती है।
'माँ की ममता', 'दूर नहीं पास है तू' , 'आधी आबादी', 'माँ के दिल का खौफ','असुरक्षित मासूम', 'मुझे बचा लो' , 'नारी समाज की त्रासदी ', ' इक्कीसवीं सदी की बेटियाँ ' कविताएँ नारी जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती हैं। इनमें माँ की ममता से लेकर गर्भस्थ शिशु की पुकार के साथ आधुनिक समाज में कन्याओं के लिए बढ़ती असुरक्षा की अभिव्यक्त है।
" न चाहिए उपाधि , न चाहिए अलंकार/ बस एक सम्मानजनक जीवित प्राणी के समान /चाहिए उसे अपनी पहचान!" स्त्रियों का सम्मान ही मूल शर्त है; समाज की आधी आबादी को संतुष्ट व खुशहाल रखने की।
बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति से चिंतित कवयित्री ने 'मातृभूमि के लाल ' में जीवन की महत्ता को समझाते हुए लिखा है-
"तुम हो राष्ट्र के अनमोल धरोहर, तुम्हें इतिहास नया रचना है
अवनि क्या अंबर पर भी ध्वज तिरंगा लहराना है।"
'संदेशा युवा शक्ति के नाम' में देश के युवक- युवतियों को अपनी शक्ति को पहचानने व देश में फैली अशिक्षा, गरीबी, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए आह्वान किया है।अंतिम कविता साहित्य की उपयोगिता व उसकी प्रासंगिकता को दर्शाती है।
कवयित्री का प्रथम काव्य संकलन इस उक्ति को प्रासंगिक बनाता है कि 'साहित्य समाज का दर्पण है' समाज के हर पहलू की अच्छाई और बुराई को उन्होंने काव्यसंग्रह में दर्शाया है। साथ ही उन्होंने समाज की बुराइयों पर कटाक्ष करते हुए कहीं -कहीं इन्हें दूर करने का समाधान भी बताया है। काव्य संकलन 'दर्पण' अपने नाम को सार्थक करता है, बिना किसी लाग- लपेट के सहज सरल शब्दों में भावों की अभिव्यक्ति है।सच पूछा जाय तो समाज का प्रतिबिंब है 'दर्पण'।
समीक्षक: डा.निरुपमा कपूर, 17,जसवंत स्टेट एक्सटेंशन, आगरा।
Tuesday, April 17, 2018
पुस्तक चर्चा -सतरंगी आईना
सहज बोध की कविताएं
पुस्तक - सतरंगी आईना
कवयित्री- मनजीत कौर 'मीत'
प्रकाशक- तस्वीर प्रकाशन, सिरसा (हरियाणा)
पृष्ठ- 112,
मूल्य- 150/रु
कविता चित्त और चेतना की अभिव्यक्ति है। कोई भी रचनाकार सहज स्थितियों , चेतना के विभिन्न चित्रों, भाव-अभाव के बहुवर्णी आवेगों और जीवन के बहुरंगी सरोकारों की अनदेखी करके रचना नहीं कर सकता। इस अनिवार्यता के व्यक्ति के मनस और सामाजिक सरोकारों के अनेक रंगों-वर्णों को सृजक अपनी कृतियों में उकेरता है ।शास्त्र कहता है कि किसी रचना का निर्माण भाव, विचार, कल्पना और शैली से होता है ।कवयित्री मनजीत कौर 'मीत' द्वारा रचित 'सतरंगी आईना' काव्य संग्रह में भाव तथा विचार सर्वोपरि है। कवयित्री ने 80 कविताओं को तीन उपखंडों में बांटा है- छंदमुक्त रचनाएं,गज़लनुमा रचनाएं, एवं गीत ।इनमें देश -दुनिया, समाज व व्यक्ति से संबंधित अनेक अनुभूतियों-सरोकारों का अंकन है। प्रकृति, देश, राजनीति,स्त्री सुरक्षा, बेटी की महिमा आदि सब कुछ है।कवयित्री का अपना काल,युगीन विसंगतियाँ पूर्णता में विद्यमान हैं। एक मंजे हुए साहित्यकार की भांति कृतिकार का प्रयास रहा है कि मनुष्यमात्र को बेहतर मनुष्य कैसे बनाया जाए । कवयित्री की यात्रा संस्कृति की यात्रा है,उसकी अन्तर्वेदना का जीवंत दस्तावेज है।रचनाकार के मन में जो-जो विचार आते रहे होंगे, उन्हें बिना पांडित्य-प्रदर्शन, काव्य में पिरोदिया। बानगी के तौर पर-
कदम-कदम पर करनी पड़ती
बिटिया तेरी रखवारी
बेटी के पिता को सिर क्यों नत करना पड़ता है - शायद परिपाटियाँ निभाने के लिए।
बेटी के पिता को सिर क्यों नत करना पड़ता है - शायद परिपाटियाँ निभाने के लिए।
स्पष्ट है कि मौजूदा परिस्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन हेतु समाज की सोच में परिवर्तन की आवश्यकता है। कवयित्री तरलहृदया हैं इस लिए वह सोचने को मजबूर हो जाती है कि कर्फ्यू के दिनों में कितने घरों के चूल्हे ठंडे रहजाते हैं। स्त्री सुरक्षा की समस्या के समाधान
स्वरूप वे लिखती हैं कि जिस प्रकार दीप्तिमानरहने के लिए दीपक को हवा के झकोरों से संघर्ष करना पड़ता है, उसी प्रकार स्त्री को संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा।
कविताओं में राष्ट्र चिंतन का भाव उभरा है और सैनिक के सम्मान में शब्दों के ताज पहनाए हैं ।नकलीपन का बहिष्कार किया है।
मानव को उसकी दोहनकारी नीति के लिए चेताया है-
कुदरत का देखो मानव पतन कर रहा
जी तोड़ सुविधा सारे जतन कर रहा
चक्र दमन का जो चलता जाएगा
अस्तित्व हिमालय का बच न पाएगा ।
आतंक के खतरे से बचने के लिए कहा है- मुँह तोड़ जवाब देकर ही लहू का बहना बंदहो पाएगा । कवयित्री को पीड़ा है कि समस्याओं को निपटाने के लिए शासन की ओरसे बहुत ढोल पीटे जातें हैं परंतु बात वहीं की वहीं रह जाती है । 'महंगाई' कविता में आम आदमी का यथार्थ तो है ही भाषाई प्रवाह भी
भरपूर है, यथा-
महंगाई ने यारो हमको
क्या-क्या नाच दिखाए
चीनी करती आनाकानी
नखरे प्याज दिखाए।
कविताओं में उठाए गए प्रश्न पाठक को ठिठक कर सोचने को विवश करते हैं।मदरटेरेसा को श्रद्धांजलि स्वरूप कवयित्री लिखती है -
प्रेम-त्याग की राह पर चलकर
जीवन की सार्थकता पाई ।
वस्तुतः ये पंक्तियां कवयित्री का व्यक्तित्व व्यक्त करती हैं कि जीवन की सार्थकता के लिए कुछ न कुछ सार्थक होना चाहिए।
'हर माल बिकाऊ है यारो' रचना में शिकवों की झड़ी है, वहीं हल ढूंढती लड़ियाँ हैं ।ऑनरकिलिंग के समाधान हेतु लिखा है-
कुछ उनकी मानो कुछ अपनी रखो
छोड़ो भी ऑनरकिलिंग की कहानी
कविताओं में व्यंग्य की मारकता देखिए -
आओ मिलकर बांटें खाएं
देश है अब्बा की जागीर ।
कहीं-कहीं भाषिक सूक्तिमयता आन विराजी
है-
काँटों भरी देखो तन के खड़ी है
फूलों भरी डाल झुकती है प्यारे ।
माँ की महिमा को भी ओझल नहीं होने दिया है-
माँ को सभी अज़ीज़ हैं होते
ज़ाहिल हो या कोई दाना ।
गागर में सागर भरती ये पंक्तियां देर व दूर तक
पाठक के साथ चलती हैं। एक अन्य शाश्वत सत्य को सुंदर ढंग से बयां किया है-
हम उसके खिलौने, वह हमको नचाता
कभी वह बनाता, कभी है मिटाता ।
कवयित्री की विनम्रता की परिचायक हैं ये
पंक्तियां-
सोच में निर्मल ,गंगा की तू धार दे
मेरी वाणी में वीणा सी झंकार दे ।
मेरी राय में संग्रह की अंतिम कविता का स्थान सबसे पहले होना चाहिए था। कुछेक रचनाओं में भावों की पुनरावृत्ति से बचा जा सकता था।
कुल मिलाकर भाव-विचार के मणि-कांचन योग से बनी इन कविताओं में कवयित्री की मौलिक उदभावना प्रकट हुई है।सहज बोध की
इन रचनाओं में शास्त्रीय पक्ष की कहीं-कहीं अनदेखी कर दी जाए तो कहा जा सकता है कि अपने शीर्षक के अनुसार सतरंगी आईना समाज की वास्तविक तस्वीर पेश करता है-उसके कुभाव -सुभाव, संस्कृति-विकृति, मेल-मिलाप के मेलों, अहं -दंभ के झमेलों की भी।तस्वीर मेंं कुछ अटपटा लगे तो दोष आईने का नहीं। दोष देखना है तो झांकना होगा,खुद के अंदर अच्छे भावों को खुर्दबीन लेकर।
आशा है, यह काव्य संग्रह मनजीत कौर को काव्य सुमनों से साहित्य का गुलदस्ता सजाने के लिए प्रेरणा देता रहेगा।
डॉ. कृष्ण लता यादव
(संरक्षक- प्रादेशिक लघुकथा मंच,गुरुग्राम)
1746,सैक्टर 10 A
गुरुग्राम- 122001
चलभाष- 09811642789
Monday, March 5, 2018
महिलानामा- हिन्दी की सबसे ज्यादा पड़ी जाने वाली लेखिका -शिवानी
हिंदी कथा साहित्य के इतिहास का एक अनूठा अध्याय है गौरा पंत शिवानी। उनकी कहानियों में पहाड़ व वहां का परिवेश अत्यंत मुखर रुप में सामने आया है इसीलिए उन्हें देव भूमि उत्तराखंड की लेखिका के रूप में भी जाना जाता है।इस ओर उनकी कहानियों पर कुमाऊं के प्रति विशेष लगाव दृष्टिगोचर होने के आरोप लगते रहे मगर यह भी सत्य है कि शिवानी हिन्दी की सबसे ज्यादा पड़ी जाने वाली लेखिकाओं में हैं।कहानी के क्षेत्र में पाठकों की रुचि को निर्मित करना तथा कहानी को केंद्रीय विधा के रूप में विकसित करने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनकी कहानियों को बार-बार पढ़ने की जिज्ञासा होती है।
गौरा पंत शिवानी का जन्म १७ अक्टूबर १९२३ को राजकोट, गुजरात मे हुआ था। इनकी शिक्षा-दीक्षा शन्तिनिकेतन में हुई।शिवानी की कृतियों में अगर नारी चित्रण की बात की जाए तो उनकी कहानियों में स्त्री की व्यथा और सामाजिक बंधनों से जूझती स्त्रीयों को बड़े ही सजीवता व संजीदगी से उकेरा गया है।उनकी कलम मन की गहरे, भीतर तक जाकर अंदर की व्यथा, दर्द, प्रेम की पीर को आंखों तक पहुंचाने का काम करती है।
शिवानी की कहानियों में विविधता होने के बावजूद भी उनकी कहानी के केंद्र में नारी ही रही है। चाहे वह नारी की सामाजिक दशा हो चाहे सांस्कृतिक, धार्मिक रुढ़ियों को झेलती स्त्री हो, चाहे पुरुष के अहंकार के आगे खड़ी विवश स्त्री।उनकी कहानियों में मुख्यतः मध्यम वर्गीय नारी चरित्रों का चित्रण अधिक मिलता है,चाहे वह कस्बाई हो , नगरीय या महानगरीय।
नारी सम्वेदनाओं को चित्रित करते हुए शिवानी के दो दर्जन से ज्यादा कृतियां हैं जिनमें सुरंगमा, भैरवी,कालंदी ,अपराधिनी,मायापुरी , चौदह फेरे, रतिविलाप, विषकन्या, कस्तूरी मणिमाला की हँसी, आदि प्रमुख हैं।
नारी सम्वेदनाओं को चित्रित करते हुए शिवानी के दो दर्जन से ज्यादा कृतियां हैं जिनमें सुरंगमा, भैरवी,कालंदी ,अपराधिनी,मायापुरी , चौदह फेरे, रतिविलाप, विषकन्या, कस्तूरी मणिमाला की हँसी, आदि प्रमुख हैं।
शिवानी कृत "जिलाधीश"" अपराजिता" वह उपहार उनकी मुख्य कृतियों में से हैं, जिन में नारियों का चित्रण आर्थिक रुप से संपन्न, आत्मनिर्भर और शिक्षित के रूप में किया गया है फिर भी शिवानी ने अपनी कहानी के माध्यम से अनेक प्रकार की समस्याओं के बीच नारी की विवशता का बड़ी ही सजीवता से चित्रण किया है। उनकी 'जिलाधीश 'कहानी की पात्र 'सुमन 'भी अत्यधिक प्रतिभावान, शिक्षित ,आत्मनिर्भर होते हुए भी विवाह संबंधी प्रश्नों से गुजरती विवश चित्रित हुई है, उसी प्रकार अपराजिता कहानी की नायिका आरती भी जिलाधिश की नायिका सुमन की भांति ही सामाजिक रुढ़ियों का दंश झेलती ही चित्रित हुई है। इन कहानियों की नायिकाएं शिक्षित होते हुए भी पुरुष के सम्मुख लाचार व विवश दिखाई दी हैं। पुरुषप्रधान समाज में मात्र सेवा, त्याग, समर्पण की पर्याय समझी जाने वाली स्त्रियों की दशा को उन्होंने बखूबी अपनी कृतियों के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया है।शिवानी ने अपनी कहानियों में मध्यम एवं निम्न वर्गीय जीवन से संबंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं से दो -चार होती नारी पात्रों का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है। उनकी 'श्राप' कहानी की पात्र दिव्या भी कुछ ऐसे ही दंश को झेलकर दहेज की भेंट चढ़ जाती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि शिवानी की कहानियां स्त्री को स्त्री होने का बोध कराती हैं। जिस रचनाकार का अनुभव क्षेत्र इतना व्यापक हो उनकी रचनाओं में विविधता सर्वाधिक स्वाभाविक है।
किरन पंत
Friday, February 23, 2018
महिलानामा- संसार भर का दुख बांटने वाली कवियत्री महादेवी
-(महिला दिवस पर विशेष श्रृंखला)
निशा की, धो देता राकेश
चाँदनी में जब अलकें खोल,
कली से कहता था मधुमास
बता दो मधुमदिरा का मोल;
महादेवी जितनी छायावाद की एक महान कवयित्री के रूप में महत्वपूर्ण हैं उतनी ही महत्वपूर्ण है उनकी जीवन यात्रा और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ संकीर्ण विचार वाले समाज में अपनी शर्तों के साथ जीवन जीने का प्रयास और काफी हद तक उसमें विजय भी होना। कविता को संसार का सुख-दुख बांटने का माध्यम मान स्वयं एक सर्वप्रिय कवियत्री के रूप में पहचाना जाना और सबसे महत्वपूर्ण अपना संपूर्ण जीवन व दुलार उस कुssक, हूssक, घू ssघू, हूssहू के नाम कर देना जिसे हम रोजमर्रा के दिनों में सुन कर भी अनसुना कर देते हैं। हम में से कौन है जिसने अपने नीरस पाठ्यक्रमों में गिल्लू, गौरा जैसी कहानियों को बेहद रस के साथ ना पढ़ा हो। वह सचमुच महादेवी थी अपने नाम में ही नहीं अपने कर्म, विचार व सादगीपूर्ण व्यक्तित्व में भी।
जितना भी उनका गद्य व पद्य पढ़ पाई, मुझे कहीं पर भी वह दुःख व पीड़ा की कवियत्री नहीं लगी। महादेवी जी अपनी रचनाओं में संसार भर का दुख बांटने वाली कवियत्री हैं। वह ऐसी मां है जो अपनी दुखी, निर्बल व पीड़ित संतानों को श्वेत,सुखद अपने आंचल में भर लेती है तथा संतानों के दुख से विचलित उसका हृदय कविता के रूप में बह उठता है। कविता दर कविता खोज में निकली उनकी रचनाधर्मिता उस प्रियतम की खोज में संलग्न दिखाई दी हैं जिसे कबीर हरि या राम कहते हैं। यह निरंतर खोज जीवन के रहस्यों का उद्घाटन करती हुई कहीं मानव जाति की पीड़ा में आंसू बहाती है तो कहीं कर्तव्य पथ पर 'जाग तुझको दूर जाना' कहकर आह्वान करती है।
महादेवी जी का जन्म फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश में हुआ था।प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर, मध्य प्रदेश में व उच्च शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में हुई। बहुत छोटी उम्र से उन्होंने कविताएं लिखना प्रारम्भ कर दिया था और दसवीं तक आते-आते उनकी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होने लगी। 9 वर्ष की आयु में उनका बाल विवाह कर दिया गया। परन्तु वे ताउम्र एक साध्वी का सा जीवन जीतीं रहीं। 1966 में उनके पति की मृत्यु के बाद वे स्थाई रुप से इलाहाबाद आ गईं और रचना कर्म करती रहीं। शिक्षा को जीवन के पहले पायदान में रख कर उन्होंने न केवल खुद को सशक्त किया वरन् जीवन के विभिन्न पड़ावों में जिन भी महिलाओं के संपर्क में वे आईं उन्हें भी शैक्षिक व बौद्धिक रूप से सशक्त करती गईं। उनकी 'लछमा' कहानी इस ओर महत्वपूर्ण है। लछमा पर्वतीय नारी के संघर्षमय जीवन का प्रतिनिधित्व करती है। विषम जीवन वह निरस परिस्थितियों के मध्य मुस्कुराहट के मोती वहां की स्त्रियां जुटा ही लेती हैं। पर्वतीय स्त्री के भीतर बहुत गहरे तक सैंध लगाती है कहानी लछमा। पहाड़ों से उन्हें प्रेम था। नैनीताल के रामगढ़ स्थान पर रहकर भी काफी समय तक महादेवी जी की साहित्य साधना चलती रहीं। उन दिनों पहाड़ के परिवेश वह परिस्थितियों को उन्होंने निकट से देखा। आज भी पहाड़ों की पगडन्डी पर घास ढोती कितनी ही लछमाएं मिल जाएंगी। वास्तव में, आज जिस स्त्री विमर्श ने वर्तमान हिन्दी साहित्य में एक वृहद आंदोलन का रूप ले लिया है उसकी चर्चा महादेवी वर्मा ने 1942 में 'श्रृंखला की कड़ियां' में कर दी थी। यद्यपि स्त्री समस्याओं के नाम पर होs हल्ला वे नहीं मचातीं तथापि स्त्रियों की आधारभूत समस्याओं को ना केवल अपने गद्य के माध्यम से रेखांकित करती हैं वरन तार्किक समाधान की ओर भी लेकर चलती हैं। वे स्त्रियों को शिक्षित व स्वावलम्बी होकर जाग्रत जीवन जीने की प्रेरणा देती रहीं।
छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक महादेवी जी का रचना संसार बहुत व्यापक था। गद्य, पद्य, बाल साहित्य विधाओं में लेखन के साथ उन्हें चित्रकला व संगीत में भी गहरी रुचि थी। अपने समय की लोकप्रिय पत्रिका 'चांद' व' 'साहित्यकार' के अवैतनिक सम्पादन के रूप में भी वे महत्वपूर्ण कार्य करती रहीं। महादेवी वर्मा को देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त करने का गौरव मिला है।उनकी कृति 'यामा' के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया।
वे मुस्काते फूल, नहीं
जिनको आता है मुरझाना
वे तारों के दीप नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना
इस प्रेरणा के साथ जीवन के अंतिम समय तक वे रचना कर्म करती रहीं और अंततः 11 सितंबर, 1987 को उनका देहांत हो गया।अपनी प्रिय सहेली व 'खूब लड़ी मर्दानी' जैसी कालजयी कविता रचने वाली प्रसिद्ध कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान पर लिखे अपने एक संस्मरण में महादेवी लिखती हैं-
--मीना पाण्डेय
निशा की, धो देता राकेश
चाँदनी में जब अलकें खोल,
कली से कहता था मधुमास
बता दो मधुमदिरा का मोल;
महादेवी जितनी छायावाद की एक महान कवयित्री के रूप में महत्वपूर्ण हैं उतनी ही महत्वपूर्ण है उनकी जीवन यात्रा और दृढ़ इच्छा शक्ति के साथ संकीर्ण विचार वाले समाज में अपनी शर्तों के साथ जीवन जीने का प्रयास और काफी हद तक उसमें विजय भी होना। कविता को संसार का सुख-दुख बांटने का माध्यम मान स्वयं एक सर्वप्रिय कवियत्री के रूप में पहचाना जाना और सबसे महत्वपूर्ण अपना संपूर्ण जीवन व दुलार उस कुssक, हूssक, घू ssघू, हूssहू के नाम कर देना जिसे हम रोजमर्रा के दिनों में सुन कर भी अनसुना कर देते हैं। हम में से कौन है जिसने अपने नीरस पाठ्यक्रमों में गिल्लू, गौरा जैसी कहानियों को बेहद रस के साथ ना पढ़ा हो। वह सचमुच महादेवी थी अपने नाम में ही नहीं अपने कर्म, विचार व सादगीपूर्ण व्यक्तित्व में भी।
जितना भी उनका गद्य व पद्य पढ़ पाई, मुझे कहीं पर भी वह दुःख व पीड़ा की कवियत्री नहीं लगी। महादेवी जी अपनी रचनाओं में संसार भर का दुख बांटने वाली कवियत्री हैं। वह ऐसी मां है जो अपनी दुखी, निर्बल व पीड़ित संतानों को श्वेत,सुखद अपने आंचल में भर लेती है तथा संतानों के दुख से विचलित उसका हृदय कविता के रूप में बह उठता है। कविता दर कविता खोज में निकली उनकी रचनाधर्मिता उस प्रियतम की खोज में संलग्न दिखाई दी हैं जिसे कबीर हरि या राम कहते हैं। यह निरंतर खोज जीवन के रहस्यों का उद्घाटन करती हुई कहीं मानव जाति की पीड़ा में आंसू बहाती है तो कहीं कर्तव्य पथ पर 'जाग तुझको दूर जाना' कहकर आह्वान करती है।
महादेवी जी का जन्म फर्रुखाबाद उत्तर प्रदेश में हुआ था।प्रारम्भिक शिक्षा इन्दौर, मध्य प्रदेश में व उच्च शिक्षा-दीक्षा इलाहाबाद में हुई। बहुत छोटी उम्र से उन्होंने कविताएं लिखना प्रारम्भ कर दिया था और दसवीं तक आते-आते उनकी कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होने लगी। 9 वर्ष की आयु में उनका बाल विवाह कर दिया गया। परन्तु वे ताउम्र एक साध्वी का सा जीवन जीतीं रहीं। 1966 में उनके पति की मृत्यु के बाद वे स्थाई रुप से इलाहाबाद आ गईं और रचना कर्म करती रहीं। शिक्षा को जीवन के पहले पायदान में रख कर उन्होंने न केवल खुद को सशक्त किया वरन् जीवन के विभिन्न पड़ावों में जिन भी महिलाओं के संपर्क में वे आईं उन्हें भी शैक्षिक व बौद्धिक रूप से सशक्त करती गईं। उनकी 'लछमा' कहानी इस ओर महत्वपूर्ण है। लछमा पर्वतीय नारी के संघर्षमय जीवन का प्रतिनिधित्व करती है। विषम जीवन वह निरस परिस्थितियों के मध्य मुस्कुराहट के मोती वहां की स्त्रियां जुटा ही लेती हैं। पर्वतीय स्त्री के भीतर बहुत गहरे तक सैंध लगाती है कहानी लछमा। पहाड़ों से उन्हें प्रेम था। नैनीताल के रामगढ़ स्थान पर रहकर भी काफी समय तक महादेवी जी की साहित्य साधना चलती रहीं। उन दिनों पहाड़ के परिवेश वह परिस्थितियों को उन्होंने निकट से देखा। आज भी पहाड़ों की पगडन्डी पर घास ढोती कितनी ही लछमाएं मिल जाएंगी। वास्तव में, आज जिस स्त्री विमर्श ने वर्तमान हिन्दी साहित्य में एक वृहद आंदोलन का रूप ले लिया है उसकी चर्चा महादेवी वर्मा ने 1942 में 'श्रृंखला की कड़ियां' में कर दी थी। यद्यपि स्त्री समस्याओं के नाम पर होs हल्ला वे नहीं मचातीं तथापि स्त्रियों की आधारभूत समस्याओं को ना केवल अपने गद्य के माध्यम से रेखांकित करती हैं वरन तार्किक समाधान की ओर भी लेकर चलती हैं। वे स्त्रियों को शिक्षित व स्वावलम्बी होकर जाग्रत जीवन जीने की प्रेरणा देती रहीं।
छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में से एक महादेवी जी का रचना संसार बहुत व्यापक था। गद्य, पद्य, बाल साहित्य विधाओं में लेखन के साथ उन्हें चित्रकला व संगीत में भी गहरी रुचि थी। अपने समय की लोकप्रिय पत्रिका 'चांद' व' 'साहित्यकार' के अवैतनिक सम्पादन के रूप में भी वे महत्वपूर्ण कार्य करती रहीं। महादेवी वर्मा को देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त करने का गौरव मिला है।उनकी कृति 'यामा' के लिए उन्हें ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी नवाजा गया।
वे मुस्काते फूल, नहीं
जिनको आता है मुरझाना
वे तारों के दीप नहीं
जिनको भाता है बुझ जाना
इस प्रेरणा के साथ जीवन के अंतिम समय तक वे रचना कर्म करती रहीं और अंततः 11 सितंबर, 1987 को उनका देहांत हो गया।अपनी प्रिय सहेली व 'खूब लड़ी मर्दानी' जैसी कालजयी कविता रचने वाली प्रसिद्ध कवियत्री सुभद्रा कुमारी चौहान पर लिखे अपने एक संस्मरण में महादेवी लिखती हैं-
"एक बार बात करते-करते मृत्यु की चर्चा चल पड़ी थी। मैंने कहा,'मुझे तो उस लहर किसी मृत्यु चाहिए जो तट पर दूर तक आकर चुपचाप समुद्र में लौट कर समुद्र बन जाती है।' सुभद्रा बोली,'मेरे मन में तो मरने के बाद भी धरती छोड़ने की कल्पना नहीं है। मैं चाहती हूं,'मेरी एक समाधि हो जिसके चारों नित्य मेला लगा रहे, बच्चे खेलते रहें, कोलाहल होता रहे। अब बताओ तुम्हारी नाम धाम रहित लहर से यह आनंद अच्छा है या नहीं।"
Monday, February 19, 2018
'हो मुबारक होली रंग भरी'-किरन पंत
संपूर्ण भारतवर्ष में होली रंग-उमंग व हर्ष उल्लास के साथ मनाई जाती है।भारत के हर राज्य में इस त्यौहार की एक अलग ही रंगत देखने को मिलती है, विभिन्न भागों में विभिन्न परंपराएं प्रचलित हैं, जिन्हें होली की उत्पत्ति से संबंधित माना गया है। कहा जाता है कि इस दिन हिरण्यकश्यप की बहन होलिका का दहन हुआ था, कुछ लोगों का मानना है इस दिन कृष्ण ने राक्षसी पूतना का वध किया।
खैर जो भी हो होली सचमुच एक ऐसा त्यौहार है जो जीवन को कुछ समय के लिए उमंग उत्साह से ओत-प्रोत कर देता है। बात करते हैं देवभूमि उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र की होली की । यहां रंगों के संगम के साथ-साथ राग -रागीनियों के संगम का भी त्यौहार है होली।पौष माह के पहले सप्ताह,बसंत पंचमी के दिन से ही कुमाऊं के घरों में बैठकी होली का दौर शुरू हो जाता है । होलीयार हारमोनियम, तबला और हुड़के की थाप पर भक्ति से ओतप्रोत होलियों से बैठकी होली की शुरूआत करते हैं।
कुमाऊं में बैठकी होली की शुरुआत की बात करें तो ये शुरुआत तब से मानी जाती है जब चंद्र राज्यकाल में राजा प्रद्युम्न शाह ने रामपुर के दरबारी संगीतज्ञ अमानत हुसैन को अपने यहां बुलाया।जैसा की इस होली में प्रतीत होता है-
" तुम राजा प्रदुम शाह, मेरी करो प्रतिपाल
आज होली खेल रहे हैं सकल सभासद खेल रहे हैं।
इन होलियों को शास्त्रीय रागों पर गाया जाता है। कहने का आशय यह है की बैठकी होली शास्त्रीय संगीत पर आधारित होती है।जिसमें शिवरात्रि आते-आते इसमें श्रृंगार रस का समावेश होने लगता है।इसके बाद श्रृंगार रस से ओतप्रोत होलियां लोगों को झूमने के लिए विवश कर देती हैं।
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| लेखिका |
फाल्गुन एकादशी को देवता स्थान पर चीर बंधन के बाद इन होलियों का स्थान खड़ी होली ले लेती है, जिसमें होलीयार खड़े होकर के वृत्त आकार में घूम-घूमकर गांव के हर आंगन में गायन करने के साथ आशीष प्रदान करते हैं और गांव के लोग गुड़ और चाय द्वारा उनका स्वागत करते हैं ।जिसका स्थान अब मिष्ठान एवं चाय आदि ने ले लिया है।पुरुषों की खड़ी होली के साथ ही महिलाओं की बैठकी होली भी बहुत प्रसिद्ध है जिसमें महिलाओं के स्वभाव अनुसार श्रृंगार रस की अधिकता होती है। महिलाएं तरह-तरह के स्वांग द्वारा होली के उत्साह को दोगुना कर देती हैं।
प्रियपदा के दिन कुमाऊं भर में 'छरड़ी' मनाई जाती है। अंतिम दिन तक होली की मस्ती अपनी चरम सीमा पर पहुंच जाती है। होलीयार, ( होली खेलने वालों का समूह,) गांव के प्रत्येक घर में प्रवेश कर उनके परिवार को आशीर्वाद देते हैं-
, "बरस दिवाली , बरसे फाग
हो हो हो होलकी रे।
इस तरह टीके तक होली का माहौल रहता है जो कि जीजा साली, देवर भाभी , ननद भाभी के रिश्ते से संबंधित है,यह सप्तमी को मनाया जाता है।
इस तरह उदास मन के साथ होली का समापन हो जाता है। पहले और आज की होली में देखा जाए तो समय के साथ काफी बदलाव आ गया है, एक तो पलायन बढ़ने के कारण गांवों में जो होली की रौनक थी वह थोड़ी धूमिल होती नजर आ रही है। क्योंकि आर्थिक रीढ़ कमजोर होने से गांवों में विशेष रूप से अपनी संस्कृति को अर्थविहीन समझने लगे हैं और शहरों में इनमें आधुनिक प्रभाव देखा जा सकता है। सब कुछ सिमट सा गया है।
जहां कदम होली में थिरका करते थे, अब पॉप म्यूजिक में मदिरामय थिरकते हैं। जहां लोग घर घर , गांव -गांव जाकर होली का जश्न मनाते थे,आज सिमट कर रह गए हैं। माहौल ऐसा हो चुका है कि घर की महिलाएं भी खुल के आस-पड़ोस, मोहल्ले में होली का मजा नहीं ले पाते। वहीं जहां पहले होली के रंग घर पर ही बनाए जाते थे फूलों के द्वारा, अब कई रासायनिक तत्वों मिलाकर रंगों की रंगत फीकी पड़ती दिख रही है।इस कारण कोई भी इन रंगों से रंगना नहीं चाहता।
किरन पंत
(हल्द्वानी)।
Friday, January 26, 2018
पुस्तक चर्चा- संगीत सुविद्
संगीत सुविद्
पुस्तक - संगीत सुविद्
लेखक - श्रीश जोशी
प्रकाशक- नौघर , चीनाखान , अल्मोडा, उत्तराखंड
मूल्य- 310 /- रूपया मात्र
संगीत विशारद श्रीश जोशी द्वारा अपने पिता संगीत विद् पं0 नारायण दत्त जोशी की 50 वीं पुण्यतिथि पर प्रकाशित पुस्तक ”संगीत सुविद्" प्राप्त हुई। पुस्तक के प्रारम्भिक पृष्ठों को पढ़कर उनके द्वारा संगीत जगत को दिये गये योगदान के साथ उस कालखण्ड में घटित शास्त्रीय संगीत जगत के क्षेत्र की कई गूढ़ जानकारियाॅ प्राप्त हुई।
11 फरवरी 1885 में उत्तराखंड के अल्मोड़ा में जन्मे पं0 नारायण दत्त जोशी ऐसे संगीत मनीषी थे जिन्होने ऐसे समय में शास्त्रीय संगीत की अलख जगाई जब यह विद्या गुरू शिष्य परम्परा तक ही सीमित थी या यूँ कहा जाए कि संगीत अब तक उस्तादो की वंश परम्परागत विद्या थी। संगीत की विद्यालयीन शिक्षा प्रणाली का अभाव था। हालाकि सन् 1901 में पं0 विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने लाहौर में गंधर्व संगीत महाविद्यालय , भातखण्डे जी ने सन् 1916 में बड़ौदा में महाराज सयाजीराव संगीत महाविद्यालय, सन् 1918 में ग्वालियर में माधव संगीत महाविद्यालय , सन् 1926 लखनऊ में मैरिस कालेज आॅफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक तथा 1926 में ही सत्यानन्द जोशी द्वारा अपने सहयोगियो के साथ इलाहाबाद में प्रयाग संगीत समिति की स्थापना हो चुकी थी। इसी क्रम में 1928 में पं0 नारायण दत्त जोशी के द्वारा शास्त्रीय संगीत को विद्यालयीन शिक्षा का अंग बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया और फिर धीरे -धीरे अन्य नगरो में भी विद्यालय में संगीत विषय के रूप में पढ़ाया जाने लगा ।
1925 तक तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (वर्तमान में उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड) में संगीत शिक्षण की कोई व्यवस्था नही थी सौभाग्यवश उन्ही दिनो ग्वालियर के महाराज माघवराव सिंधिया द्वारा उज्जैन में संगीत महाविद्यालय स्थापना की गई अतः पं0 जी ने वहाॅ से कड़ी मेहनत के बाद संगीतविद् की उपाधि प्राप्त की। अपने प्रारम्भिक जीवन में संगीत की शिक्षा के प्रति अगाध इच्छा होने पर भी जो समस्या उन्होने महसूस की थी अल्मोड़ा लौटने पर उसकी समाधान की दिशा में शास्त्रीय संगीत को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए कठोर प्रयत्न किए। अंततः उनके अथक प्रयासो के फलस्वरूप शास्त्रीय संगीत को विषय के रूप में मान्यता मिली। सम्भवतः 1928 में रैमजे स्कूल उ0प्र0 का पहला विद्यालय था जहाॅ संगीत विषय के रूप में पं0 नारायण दत्त जोशी के प्रयासो पढाया जाने लगा था। पं0 नारायण दत्त के द्वारा संगीत पाठ्यक्रम व संगीत शिक्षण भाग -1 और भाग-2 पाठ्य पुस्तको की रचना भी की गई।
पं0 जी उच्चकोटी के गायक व वाग्येकार भी थे। देश की जानी मानी पत्रिका ”संगीत” के संपादक प्रभूलाल गर्ग पं0 जी के संगीत ज्ञान से अत्यधिक प्रभावित थे। अतः संगीत पत्रिका में उनके लेख ,रचनाऐ व स्वरलिपियाॅ प्रकाशित होती रहती थी।
पं0 जी प्रयाग संगीत समिति के पर्यवेक्षक भी रहे एक गायक के रूप में देश के प्रतिष्ठित समारोह ग्वालियर में संगीत सम्राट तानसेन संगीत गोष्ठी 1940 में गायन प्रस्तुत किया। संगीत जगत में अग्रणी योगदान के चलते उन्हे सरकार द्वारा तानसेन सम्मान व स्वामी हरिदास जयन्ती पर हरिदास सम्मान से नवाजा गया। सन् 1947 में रैमजे स्कूल से संगीत अध्यापक के पद से अवकाश प्राप्त हो वे दिल्ली चले गए जहाॅ पर उनकी संगीत साधना अनवरत रूप् से चलती रही यहाॅ पर उन्हे संगीत के प्रचार प्रसार के लिए वृहद क्षेत्र मिल गया अतः वे संगीत सेवा में जुट गये एक गायक के रूप में अपार ख्याति अर्जित की। 17 सितम्बर 1963 को बिमारी के कारण देहावसान हो गया। उनके 83 वर्षीय पुत्र श्रीश जोशी ने उनकी 3000 हजार (प्रकाशित व अप्रकाशित) स्वरलिपियो मे से 135 चुन्निदा को पुस्तक का आकार दिया। पुस्तक में बडे ख्याल, छोटे ख्याल , ध्रुपद , धमार , होली , मल्हार , चैती, कजरी, ठुमरी , दादरा, भजन आदि को मालकौस, पीलू, शंकरा, जैजैवन्ती , बहार,हंसध्वनी, यमन कल्याण, बागेश्री, हिन्डोल, काफी , सिंदूरा, भैरवी, मदमास सारंग, विभास, केदार, हमीर, तिलक कामोद , प्रदीप, वृन्दावनी सारंग, ललित, आभोगी, जयन्त मल्हार, जलधर केदार, हंस किंकिणी, मियाॅ की मल्हार, गौड मल्हार, सूर मल्हार, मारवा, दुर्गा, तिलंग, भीमपलासी आदि रागो व प्रचलित व अप्रचलित तालो में निबद्ध किया है। पुस्तक की पहली रचना तू ही सूर्य, तू ही चन्द्र, तू ही पवन, तू अगन
....। को पं0 जी ने पाॅच अलग अलग रागो मालकोस, पीलू, शंकरा, ख्माज, जैजैवन्ती तथा चैताल ,झपताल ,दादरा, रूपक में निबद्ध किया है। इस तरह का प्रयोग उनके संगीत के पांडित्य का सशक्त उदाहरण हैं ।
विडम्बना है कि शास्त्रीय संगीत जगत इस व्यक्ति के नाम व कार्य से आज भी अपरिचित है। श्रीश जोशी द्वारा संपादित पुस्तक संगीत सुविद् जहाॅ एक ओर पं0 नारायण दत्त जोशी को शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पहचान दिलायेगी वहीं संगीत के विद्याथियों के लिए प्रायोगिक रूप में लाभकारी
सिद्ध होगी ।
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| समीक्षक- डा दीपा जोशी |
पुस्तक समीक्षक- डाॅ0 दीपा जोशी
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