Monday, June 15, 2020

एक क्रांति का नाम - नईमा उप्रेती खान

एक क्रांति का नाम - नईमा उप्रेती खान 



नईमा उप्रेती खान एक क्रांति का नाम था। एक तरफ उत्तराखंड के लोक गीतों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर लाने के लिए उन्होंने मोहन उप्रेती जी के साथ मिलकर एक बड़ी भूमिका निभाई। दूसरी ओर रंगमंच और लोक कलाओं में महिला भागीदारी के प्रति तत्कालीन समाज की जड़ मान्यताओं को पीछे छोड़ पहले पहल एक जीता-जागता उदाहरण बनी।
मध्यम कद काठी, धुला रंग, छोटी पोनी में समेटे अर्द्ध खिचड़ी बाल और ऐनक से झांकती दो आँखों का पैनापन। उघड़ती सांसो के अवरोध के बावजूद वो एक बहाव में बोलतीं थीं। सत्तर की उम्र में भी उनके चेहरे मोहरे और अंदाज से अनायास ही नवयुवती के रूप में उनके अनुपम सौन्दर्य और जुझारू व्यक्तित्व का अनुमान लगाया जा सकता था।  
 सन 2000 या 2001 की बात रही होगी। मोहन उप्रेती शोध संस्थान, अल्मोड़ा के कार्यक्रम में उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आना था। ख़राब स्वास्थ्य  के कारण उनके आने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी। मगर वे आयीं और वहीँ पहली बार मैंने  उन्हें मंच  गाते  हुए सुना-

'पारा भिड़ा को छे भागि तू 
मुरली बाजी गे..... मुरली बाजी गे।'

उसके बाद तो वे मेरे सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका 'सृजन से' की संरक्षिका भी रहीं। अक्सर उनसे उनके मयूर विहार, दिल्ली स्थित निवास पर मिलना होता था। करीब से उनके व्यक्तित्व और कार्यों को देखा और एक लम्बे सार्थक और उतने ही संघर्षपूर्ण जीवन के अनुभवों को सुनती रही।
नईमा खान उप्रेती का जन्म 25 मई, 1938 को अल्मोड़ा के एक कटटर मुस्लिम परिवार में हुआ।  उनका परिवार अल्मोड़ा के बड़े रईस परिवारों में एक था। उनके पिता शब्बीर मुहम्मद खान ने उस समय की तमाम सामजिक रूढ़ियों को दरकिनार कर एक क्रिस्चियन महिला से विवाह किया। पिता के प्रगतिशील विचारों का प्रभाव नईमा पर पड़ा। उन्हें बचपन से ही गाने का शौक था। परिवार में भी संगीत के प्रति अनुराग रहा। शुरुवाद में वे शौकिया फ़िल्मी गाने गुनगुनाया करती थीं। उन्होंने इंटर तक की शिक्षा अल्मोड़ा एडम्स गर्ल्स इंटर कॉलेज से पास की। वहीँ एक संगीत शिक्षक के रूप में मोहन उप्रेती जी से उनकी प्रथम भेंट हुई। मोहन जी को उनकी आवाज पसन्द आई। उसी दौरान प्रसिद्ध घसियारी गीत  "घा काटना जानू हो दीदी, घा कॉटन जानू हो' का संगीत भी मोहन जी ने बनाया और नईमा जी को ही वह गीत पहली बार गाने का अवसर मिला। यह महज संयोग ही कहा जा सकता है कि आगे चलकर जिस मोहन उप्रेती से उन्होने प्रेम विवाह किया, एक प्रतियोगिता के दौरान वे उनसे काफी रुष्ट हो गई थीं। हुआ यह था कि हमेशा गाने में प्रथम आने वाली नईमा  को निर्णायक के तौर पर मोहन जी ने द्वितीय स्थान दे दिया था। इस तरह दौनों सम्पर्क में आए और नजदिकियां बढ़ने लगी।
उसके बाद यूनाइटेड आर्टिस्ट संस्था और 1955 में लोक कलाकार संघ के साथ जुड़कर दोनों ने साथ में कई गाने गाये। उन्होंने आकाशवाणी के माध्यम से भी उनकी आवाज पसन्द की गई। लोक गायक के तौर पर नईमा व मोहन जी की जोड़ी उस समय की सबसे लोकप्रिय जोड़ी रही।  बाद में दिल्ली आकर उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला लिया। आगे चलकर वे कई महत्वपूर्ण पदों पर रहीं।

आश्चर्य होता है जिस समाज में लड़कियों का नृत्य व् नाटक जैसे माध्यमों से जुड़ना गलत समझा जाता था उसी समाज में रहते हुए नईमा जी न केवल लोक गीत और रंगमंच के क्षेत्र में अपने लिए जगह बनाती हैं वरन अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बनती हैं। नईमा जी के प्रेम और उसके लिए किये गए लम्बे संघर्ष पर बात करते हुए एक पत्र के माध्यम से वरिष्ठ कथाकार और समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट लिखते हैं -"मैंने उन्हें अल्मोड़े में जब पहली बार सुना था तब मैं 6 -7 वर्ष का रहा हूँगा। पर उनका सुरीला स्वर मेरी स्मृति में सदा बना रहा है। अपने प्रेम और कमिटमेंट के लिए उन्हें जिस पीड़ा और संत्रास से गुजरना पड़ा होगा, उसकी मात्र कल्पना की जा सकती है। जिस तरह चार दशक तक वह अपने प्रण पर अटल रहीं वह प्रेम की अद्भुत मिसाल है।  वह भी एक ऐसे समाज में जो अपने पाखण्ड और रूढ़िवादिता के लिए प्रसिद्ध है।"
  उन्होंने कटटरपंथी सोच को पीछे छोड़ एक हिन्दू ब्राह्मण से न केवल प्रेम किया बल्कि ताउम्र एक सच्ची सहधर्मिणी  की भांति उनके स्वपनों को जीती रही। इन दोनों के असाधारण प्रेम की अनूठी कथा सुनने-पढ़ने में चाहे कितनी ही रोचक लगे मगर उस प्रतिबद्धता के लिए 30 वर्षों के लम्बे संघर्ष और समर्पण की जिस ऊंचाई से उन्हें गुजरना पड़ा वो आसान नहीं था। अपने लम्बे चले  प्रेम के विवाह में परिवर्तित होने के सुख को सांझा करते हुए वे डॉ दीपा जोशी को दिए एक साक्षात्कार में बताती हैं   -
 "अक्टूबर 1979 को मेरे पिता का इंतकाल हो गया। मैं बिलकुल अकेली हो गई। उप्रेती जी भी कब्रिस्तान आए। मैं अपनी माँ और पिता की कब्रों  के पास बैठकर फुट-फूटकर रो रही थी तभी नजाने इनके दिल में क्या ख्याल आया, इन्होनें कब्र के सामने मेरे सर पर हाथ रखा और कहा हमें शादी कर लेनी चाहिए। मुझे उस समय ऐसा लगा मानो वो मेरी माँ और पिता से इस बात की इजाजत ले रहे हों।"
मगर विवाह के बाद जहाँ एक ओर विभिन्न प्रशासनिक पदों पर रहते हुए नईमा जी  संस्कृति व् रंगमंच के प्रति अपनी प्रतिबद्धता निभाती रहीं वहीँ दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन में उनका संघर्ष भी जारी रहा। मोहन उप्रेती के उनके प्रति अगाध प्रेम और समर्पण के बाद भी उनके परिवार ने नईमा जी को कभी  स्वीकार नहीं किया। पर्वतीय कला केंद्र में रहे सिने अभिनेता गोविन्द पांडे बताते हैं -" मुस्लिम होने के कारण उप्रेती जी के परिवार में उन्हें बहुत नाकारा गया, ये सच है। मोहन जी की माँ उनके यहां खाना नहीं खाया करती थीं। और उनके भाई वगैरह भी अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। अंतिम समय तक भी उन्हें देखने कोई नहीं आता था।  तो ये दर्द तो नईमा जी के सीने में था कि मोहन उप्रेती जी के परिवार ने कभी उन्हें स्वीकार नहीं किया।'
उनके करीबी और अंतिम दिनों में उन्हें सहयोग करने वाले अभिनेता गोविंद पांडे आगे बताते हैं - "एक समय था की जब बड़े बड़े मंत्री, एन एस डी के प्रोफेसर, चेयरमैन इनके घर पर बैठे रहते थे, उनसे मिलने के लिए तरसते थे और एक समय ये आया की उनके अपने परिवार वालों ने भी उन्हें नहीं देखा।"
नईमा उप्रेती के व्यक्तित्व में शिक्षित, स्वावलम्बी, योग्य और समर्पित स्त्री के विविध शेड्स रहे जो एक साथ विरले ही मिलते हैं। यही समर्पण उनके काम में भी दिखाई देता है। मोहन उप्रेती जी के साथ वे एक कलाकार और सहधर्मिणी दोनों भूमिकाओं में शत प्रतिशत नजर आती हैं।
ये विडम्बना ही है कि एक सम्पूर्ण जीवन लोक गीतों और संस्कृति को समर्पित करते ये कलाकार अपने जीवन काल में ही भुला दिए जाते हैं। न सरकार सुध लेती है न संस्थाएं। उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर पसरा ये शून्य अखरता है। विनम्र श्रद्धांजलि

मीना पाण्डेय
एम-3, सी-61, शालीमार गार्डन एक्सटेंशन-2, साहिबाबाद, गाजियाबाद-201005
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Saturday, June 13, 2020

लोक की आवाज-हीरा सिंह राणा




आज से कुछ 18-20 साल पहले हीरा सिंह राणा जी से अल्मोड़ा के एक कार्यक्रम के दौरान पहली बार मिलना हुआ। ‌तब उनकी छवि मेरे किशोर मस्तिष्क में 'रंगीली बिंदी' के लोकप्रिय गायक के रूप में थी। उसके बाद दिल्ली आकर कई कार्यक्रमों में लगातार मिलना हुआ। मध्यम कद-काठी पर मटमैला कुर्ता और गहरे रंग के चेहरे को आधा ढ़ापती अर्द्ध-चंद्राकार दाड़ी। चेहरे-मोहरे और वेश भूषा में भी वे लोक के प्रतीक रहे। उनकी कविताओं और गीतों में पहाड़ के परिवेश व  संस्कृति के प्रति गहरा लगाव स्पष्ट दिखाई देता है। राणा जी की रचनाओं का वितान बहुत वृहद रहा। वहां श्रृंगार है, जन आंदोलनों को उत्साह से भर देने के गीत हैं, प्रकृति के प्रति अनुराग है और अपनी संस्कृति के प्रति अकाट्य प्रेम भी। 
हीरा सिंह राणा जी का जन्म  मनीला (भिकयासैण  अल्मोड़ा) के डढ़ोली गांव में 16 सितंबर सन 1942 को हुआ। वे दसवीं तक पढ़े थे। अपना रचना कर्म और गायिकी उन्होंने लंबे संघर्ष और अनुभव की अग्नि में तपाकर निखारे थे। उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में 'प्योली और बुरांश', मनख्यों पड्यों मैं', मानिले डानि' सम्मिलित हैं। ये दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि हीरा सिंह राणा जी की एक लोकगायक के रूप में लोकप्रियता के प्रकाश में उनका कवि स्वरुप कहीं उपेक्षित सा रह गया। कुमाऊनी भाषा के एक सशक्त कवि के रूप में उनका आकलन होना अभी शेष है।
कुमाऊनी बोली-भाषा के लिए उनका योगदान अमूल्य है। उन्होंने लोक भाषा में लोकसंवेदना को गीतों के रूप में पिरोया। एक रचनाकार के रूप में उनका प्रेयसी के प्रति प्रेम जब अपने अनगढ़ और लोक ठसक के साथ प्रस्फुटित होता है तब कवि उसके हाव-भाव, वेशभूषा,नैन नक्श इत्यादि को अनेक उपमाओं से विभूषित करने लगता है। 'रंगिली बिन्दी' उनके सबसे चर्चित गीतों में एक है। गीत में अविस्मरणीय बोलों के साथ पहाड़ी ठसक में गायक का 'आय हाय हाय रे', 'ओय होय होय रे' टेक विशेष रूप से अपना ध्यान खींचता है।
 सरसरी तौर पर देखने पर उनका  गीत-कर्म नारी सौंदर्य वर्णन, मनुहार, प्रकृति के प्रति मुग्ध भाव लिए रुमानी दृष्टिगोचर होता है मगर उन्होंने बेहद संजीदा रचनाएं भी लिखी और गुनगुनाई।
पहाड़ों के संघर्ष और दुर्गम जनजीवन के केंद्र में वहां की परिश्रमी स्त्रियां हैं। उन स्त्रियों के दुख भी पहाड़ से हैं। उन मेहनतकश स्त्रियों की पीड़ा और श्रम को सार्थक शब्द देते हुए राणा जी लिखते हैं-
 'हे नारी नमन त्यहे, जग मौहतारी,
 त्वील अपणा आंस पीय उमरमा सारी।'

  प्रेम का सबसे सुंदर स्वरूप है  देशप्रेम। मातृभूमि के लिए अपने प्रगाढ़ प्रेम को जब कवि शब्दों में उड़ेल देता हैं तो ये गीत अपनी नियति लिखता है-
'गंगा जमुना बगनि, दादी हमर देश मा।
जनमा भगवान लिनी दादी हमर देश मा।'
एक जगह राज्य आन्दोलन के शहिदों का स्मरण करती उनकी  कविता की पंक्तियां हैं-
'पहाड़ा का वीर च्यलौ तुमु हैं प्रणाम,
हिमाले कि चार ऊंची करि गौछा नाम।'

 जीवन की विषमताओं से निराश,टूटे मन में उत्साह का अलख जगाते उनके गीत निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे हैं-
'लस्का कमर बांधा,
हिम्मत का साथा,
फिर भोव उजाली हली
का रैली राता।'

आज विकसित तकनीक के साथ हर दिन एक कवि या गायक का जन्म होता है और रातों-रात प्रसिद्धि भी मिल जाती है। मगर  हीरा सिंह राणा जैसे लोक कवि और गायक कौतिक, मेले-ठेलों, जन आंदोलनों के माध्यम से लोक मानस में जगह बनाकर यहां तक पहुंचे हैं। यही वजह है कि उनकी आवाज पहाड़ की अपनी आवाज बन गई। हरदा लोक के ऐसे कवि और गायक थे जो बनाए नहीं जाते, अपने परिवेश के साथ बनते, संवरते हैं और लोक के संघर्षों से जिनका अनुभव जगत विकसित होता है। उनके गीतों में पहाड़ की गीली मिट्टी की गंध थी और वहां के दुर्गम जनजीवन की पीड़ा भी।   
हीरा सिंह राणा जैसे कलाकार मरते नहीं अपने गीतों के माध्यम से लोक की संवेदना से जुड़कर अमर हो जाते हैं।

मीना पाण्डेय
srujanse.patrika@gmail.com

Tuesday, June 9, 2020

काव्यांकुर- स्तुति सक्सेना सिंह की दो कविताएं



(1)

जिन्हें कहते थे, फक्र से अपना,
आज अपनो की भीड़ में  क्यूं ?
खुद को अकेला पाया।
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया!
अपनेपन में भी रूखापन पाया ,
"रियल" जैसे "कजिन्स"
"अपनो" ने जताया ।
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया !
रिश्तों में "अहंवाद","अहंकार",
"रोष' को सर्वोपरि पाया ,
"वात्सल्य", "अपनत्व",
"संरक्षण" का बोध भुलाया ।
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का एहसास कराया!!
टिक-टोक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और
 फेसबुक के दौर में,
अनजान लाइक और शेयर
ने ही मान बढ़ाया।
बिखरे रिश्तों की डोर को बांधने में 
किसने समय गवाया?
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया!
विस्तृत जिसका सोशल औरा,
उनको सोशल एंटिटी बतलाया,
अंतर्मुखी,जो रहे स्वयं में
उनको रिश्तों से विरक्त। दिखाया
वह भी है इस समाज का संबल, 
 दूरियों ने क्यूं न समझाया?
इस युग ने यह कैसी 
दूरियों का बोध कराया !

                       (2).                                    


मानवता आज
फिर शर्मसार हो रही?
इस करोना काल में ,
क्यूं वन्य जीवन की हार हो रही?
विषम विपदाएं देख भी
 आंख क्यों खुली नहीं?
मानव की हास्य क्रीडा से
क्यों मातृत्वता तार-तार हो रही?
कैसा यह अभिमान,
कैसा यह अहंवाद है?
धरणी के अंचल में 
सबका आयुष्य समान है?
फिर क्यों मनुष्य को अपने ही
अस्तित्व पर इतना गुमान है?
इंसा की इंसानियत पर ,
क्यों आज शोध हो रहा?
अमानवीय क्रूरता, कृतघ्नता,
का बोध हो रहा।
जिस गज को गजराज,
की उपाधि मिली।
इस करोना काल में ,
वह भी तीव्र तृष्णा से ,
समनुग्य दिखी।
नव जीवन के "सृजन" को
मां कोख में संग्रहीत किए,
पग पग चले वह मतंग ,
आशा के दीप लिए।
बारूद से भरा वह अनन्नास
 था जघन्य, अमानुषिक प्रयास।
जो खाया "हस्ती मां"ने समझ "खाद्यपदार्थ",
कर, मानवता पर अखंड विश्वास
ना समझी वो
अमानवीय विश्वासघात ।
क्रंदन,रुदन ,कोलाहल करती, वेदनापूर्ण उसकी हर  श्वांस 
शायद कुछ देर से समझी,
मानवता का निष्ठुर आघात।
पूछता वह मूक जीवन 
पल रहा जो कोख में,
घुट रहा क्यूं अस्तित्व मेरा,
तेरे स्नेहिल पार्श्व में?
उस पीड़ा,जलन,करुणा को लिए,
खड़ी वह अपने ही अश्रुओं के सैलाब में
गिर गई निस्तेज मृत हो,
अमानवीय अवसाद में 
हस्ती की हस्ती मिट गई,
अमानुषिक गहन तालाब में।
देख में,सोचती हूं,
मानवता क्यूं ???
फिर शर्मसार हो रही?
क्यूं बने हम मूक दृष्टा,
क्रूरतापूर्ण कृत्य के?
क्या बन गया ....मानव
"विषाणु"?
अपने ही अभिवृत्य के?



परिचय
स्तुति सक्सेना सिंह
माता: श्रीमती अंजना सक्सेना
पिता: श्री दिलीप कुमार सक्सेना

स्नातक:  बायोटेक्नोलॉजी,
डिप्लोमा: क्लीनिकल ट्रायल   एंड डेटा रिसर्च मैनेजमेंट
स्नातकोत्तर : हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन तथा ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट


प्रकाशित पुस्तकें
भारत- प्राचीन इतिहास की विसंगतियां
भारत- प्राचीन इतिहास की विसंगतियां ( अपडेटेड एडिशन) 
मां-काव्य संग्रह

प्रकाशनाधीन रचनाएं
-लघु कथाओं का संग्रह, 
-परिस्थितियां (काव्य संग्रह),
-मां- काव्य संग्रह का अंग्रेजी संस्करण


वर्तमान पता
डब्ल्यू जेड २०, रत्न पार्क, निकट रमेश नगर  मेट्रो स्टेशन।
नई दिल्ली(११००१५)
stuti_1127@rediffmail.com
मोबाइल न-ं 9917376748

Sunday, June 7, 2020

'क्या बहिरा हुआ खुदाय'-संत कबीर की याद


                      
 

बालपन की दृष्टि से कबीरदास जी को बांचने के प्रयास में पाठ्य पुस्तक के प्रथम अध्याय में सरल सुबोध और बिना किसी विशेष उपक्र के वाणी में बस जाने वाले दोहाकार के रूप में उनकी छवि उभरती है। मगर आज जब कबीरदास को उनके समग्र रूप में समझने का प्रयास किया तब वो साहित्य,दलितविमर्शसामाजिक चेतनासत्य -अहिंसा,समाज सुधार,अध्यात्म -दर्शन आदि चर्चाओं के केंद्र में दिखाई देते हैं। यधपि उन्होंने जो कहा अपनी फक्कड़ता में कहा जहाँ समाज सुधारक के रूप में प्रविष्ट होने की कोई पूर्वनियोजित सोच नहीं थी तथापि उनका रचनाकर्म उन्हें सामाजिक चेतना के अग्रदूत के रूप में प्रतिष्ठित कर गया। भारतवर्ष की सुदीर्घ काव्य परम्परा में इतना विराट व्यक्तित्व तुलसीदास के अतिरिक्त नहीं मिलता।

उनका जन्म जेष्ठ पूर्णिमा के दिन काशी में हुआ था। कबीरदास के जन्म के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है ,जिनका उल्लेख उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि कबीरदास जुलाहे थे ,कपडा बुनते ,सूत कातते सर्वधर्म समभाव ,अध्यात्म,सात्विकता ,अहिंसा,इतियादी का जो सूत्र तत्कालीन समाज को दे गए वो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। कबीरदास ऐसे समय में उभर कर आये जब भारत मुस्लिम शाषकों के अधीन था। हिंसा व् अत्याचार के बल पर आम जनता द्वारा अपने फरमान मनवाये जाते थे। मुसलमान शासकों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन कराया जाता व् और अवमानना होने पर मौत के घाट उतार दिया जाताआम हिन्दू जनता पर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे थे। दूसरी तरफ अपनी धर्म विशेष पहचान बनाये रखने के लिए हिन्दुओं में धार्मिक कर्मकांड व् पाखंड का बोलबाला था। व्यभिचार से बचने के लिए कन्याओं की कम उम्र में शादियां की जाती जिससे बाल विवाह जैसी कुरुती समाज में बढ़ने लगी।समाज वर्णभेद ,पाखंड ,छुआछूत जैसी कुरीतियों में जकड़ा हुआ था। कबीर  का निरक्षर किन्तु  सवेदनशील मन केवल व्यथित हुआ वरन उस दर्द को आत्मसात कर जो कुछ जाना - चिंतन मनन किया दोहा ,सबद ,रमैनी रूप में बह गया। निम्न जातियों जैसे जुलाहा ,कारीगरों ,धोबी ,हरिजनों के प्रति उच्च जातियों की उपेक्षा व् शोषण एक नवीन आंदोलन का सूत्रपात कर गया। सभी निम्न जातियां   अपनी अस्मिता व् स्वाभिमान की बात किसी किसी रूप में उठा रहे थे कबीर की वाणी ने उसे केवल ऊर्जा प्रदान की बल्कि उनमे आत्मविश्वास की भावना का संचार भी किया। डा. राधेश्याम द्विवेदी लिखते हैं " महात्मा कबीर का जन्म ऐसे समय में हुआ ,जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरुप अंधकारमय हो रहा था। "

कबीर मुसलमान धर्म के थे और स्वामी रामानंद का शिष्य बनकर  उन्हें हिन्दू धर्म की भी अच्छी समझ हुई। उन्होंने प्रत्येक धर्म की तर्कसंगत बातों को अपनाया तथा अन्धविश्वास व् ढकोसलों का जमकर विरोध भी किया। अपनी रचनाओं के माधयम से केवल वो धर्मान्धता में जकड़े मुस्लिम समाज पर खुलकर बोलते हैं साथ ही हिन्दुओं में प्रचलित धार्मिक कर्मकाण्ड व् पाखंड पर भी कड़ी चोट करते हैं

"कंकड़ पत्थर जोड़ के ,मस्जिद ली चिनाय।
चढ़ कर मुल्ला बांग दे ,क्या बहिरा हुआ खुदाय।

"माला फेरत जग भया ,फिरा मन का फेर।
 कर का मन का डार दे,मनका -मनका फेर।

कबीर राम की उपासना करते है ,मगर कबीर के राम धनुषधारी -रघुनन्दन राम नहीं हैं। उनके राम तो सत,चित,आनंद स्वरुप परमात्मा हैं जो आडम्बर से नहीं सत्कर्म व् आतंरिक पवित्रता से प्राप्त किये जा सकते हैं। अपनी रचनाओं में वे मूर्तिपूजा का खंडन करते भी नजर आते हैं। यथा -

"पाहन पूजे हरी मिलै ,तो मैं पूजों पहार।
वा ते ता चाकी भली, पीसी खाय संसार।




कबीरदास अपने हरि (परमात्मा ) तक पहुंचने का बहुत ही सुगम मार्ग बताते हैं,यही सुगमता और सरसता उनकी शब्दावली और भाषा में भी दिखाई देती है। भाषा की यही बोधगम्यता उन्हें जनमानस में लोकप्रिय बनाती है। यही कारण है की कबीरदास के दोहे साक्षर -निरक्षर गांव -नगर ,देश -विदेश सभी तक अपनी पहुंच बनाने में सर्वथा सफल दिखाई देते है। डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं "सहज सत्य को सहज ढंग से वर्णन करने में कबीर अपना प्रतिद्वन्दी नहीं जानते...... "

गृहस्थ जीवन जीते हुए ,अपने व्यवसाय से रिक्त समय में सत्संग व् मनन चिंतन के माध्यम से कबीर अध्यात्म व् सत्मार्ग की ओर समाज को ले जाने का उत्कृष्ट उदाहरण सामने रखने का जो कार्य करते है वो विरले ही देखने को मिलता है


सात्विक प्रवृतियों के प्रबल पक्षधर कबीर  हिंसा, पशु हत्या व् मांसहार का जमकर विरोध करते हैं और मन को नियंत्रित कर माया के जंजाल से बचाकर रखने की सीख देते हैं मांसहार का खंडन करते हुए वे लिखते हैं  -
"बकरी पाती खात है , ताकि काड़ी खाल।
जो नर बकरी खात है ,उनका कवन हवाल। "

'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय " कहते हुए एक तरफ पुस्तक ज्ञान से अनुभव ज्ञान को अधिक महत्व देते नजर आते है तो दूसरी तरफ प्रेम की परिभाषा को असीमित विस्तार देते। मगर कबीर का प्रेम प्रेयसी को रिझाता पागल प्रेम भर नहीं वरन निर्बलों ,मूक पशुओं ,व् मानवजाति के प्रति प्रेम का पक्षधर है।
हिन्दुओं में प्रचलित वर्णव्यवस्था पर भी कबीर एक स्वभोगी की हैसियत से खुलकर बोलते है। उनका मानना था की जनम के आधार पर किसी को उच्च या निम्न नहीं कहा जा सकता , मानव कर्म ही है जो समाज में प्रतिष्ठा या पतन के लिए उत्तरदायी है। उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा दलितों में स्वाभिमान जगाने का कार्य किया है।
अंत में जैसाकि प्रो. महावीर सरन जैन लिखते है " कबीर का सारा जीवन सत्य की खोज तथा असत्य के खंडन में व्यतीत हुआ है। " कबीर अपनी इस यात्रा में संतमति से मानवजाति को सदगति की तरफ ले जाने वाले विनम्र संत व् दिशाविहीन समाज को दिशा दिखाते एक श्रेष्ठ दोहाकार के रूप में नजर आते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।





मीना पांडेय
एम् -3 ,सी -61 वैष्णव अपार्टमेंट
शालीमार गार्डन एक्स-2
साहिबाबाद ,गाज़ियाबाद -201005 (यू पी )