Thursday, September 17, 2020

लोक



होना, सोचने से बेहतर है 

 'होने' की होती है एक जमीन

जिस पर पुरखों ने बोया अपने समय का सच

उस पीड़ा, उदेख, श्रमों के अंतराल को 

हमने 'लोक' कहा  

सैकड़ों मील दूर बैठे

गढ़ते रहे लोकजीवी होने का स्वांग


कमरतोड़ मेहनत के बाद 

लम्बी, उजाड़ रातों में वे-

 मिलजुल सुस्ताए भर

हमने उन्हें 'लोक गीत' कह सहेजा

 हमारे हाथ उस पसीने तक नहीं पहुंचे

जिसे सहेज निकाली जा सकती थी

एक राह पहाड़ों की तरफ

 

याद और आंसुओं से नहाई 'न्योली' से

 मिलाते रहे उस चिड़िया की शक्ल

हमने उस दर्द को नहीं पढ़ा 


कोहरे ढके पहाड़ों के पीछे से

चटकीले सूरज सी कौंधती लोककथाएं 

कथा भर होकर भी

जीवन से आगे दौडती रहीं 

 हवा,पानी, सुकून से होता हुआ

विकास का 'बिख्याती' हाथ हम तक पहुंचा 


पहाड झोड़़ा-चाचंरी, मडुवा भर नहीं है  

 पहाड़, श्रम के रास्ते 

 लोक को उसकी जटिलताओं के साथ जीना है


होना, सोचने से इसलिए बेहतर है

क्योंकि वहां से 

लोक के मोह में उलझे मस्तिष्क और

आधुनिक देह के मध्य

उभरने लगती है

द्वंद की एक बारीक रेखा।


#मीना पाण्डेय



(फोटो साभार गूगल) 

Tuesday, September 8, 2020

कोराना लाइव

 




कोरोनाकाल में लाकडाउन के चलते सड़कें जितनी वीरान और तन्हा नजर आयी, उतने ही भरेपूरे, चुहलक भरे नजर आए तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मस। मानो पूरा संसार हथेली जितने फोन में उमड़ आया हो। यूं तो पहले भी व्हाट्सएप, फेसबुकव ट्विटर के माध्यम से ज्ञान बघारने वालों की कमी ना थी मगर उनकी संख्या में इस दौर में जितना इजाफा हुआ है वो पहले कभी नहीं हुआ। कभी-कभी तो आश्चर्य होता है, ये वही दुनिया है जहां रोडरेज, धोखाधड़ी और चोरी की घटनाओं से हमारे अखबार भरे रहते थे। वे घटनाएं शायद मंगल ग्रह में होती रही हो। मगर सबसे ज्यादा उछाल आया है साहित्य और कलाओं की दुनिया में। जिस तरह दुनिया के अलग-अलग भागों में कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है उसी तरह इस दौर को साहित्य के उत्कर्ष काल के रुप में भी याद किया जाएगा। इस अवधि में कवियों, साहित्यकारों, कलाकारों की संख्या में जो इजाफा हुआ है वह संसार को एक नई सांस्कृतिक क्रांति की ओर ले जाने में निश्चय ही बड़ी भूमिका निभाएगा। बहरहाल,  साहित्य की आधी दुनिया इस बीच सोशल मीडिया पर लाईव कार्यक्रमों में व्यस्त रही और शेष आधी दुनिया जिनको लाईव कार्यक्रमों का मौका नहीं मिल पाया इन कार्यक्रमों को  गलियाने में। कवियों की कल्याण समिति ने अपना विरोध दर्ज करते हुए कहा 'महिलाएं सज-धज कर बाकायदा रंग-बिरंगी पोशाकों में लाईव अवतरित होती हैं। उनके कजरे की धार से उत्तरोत्तर साहित्यिक विकास में खलल पड़ रहा है। उधर कवियत्री मुक्ति आंदोलन की प्रतिनिधि  महिलाओं ने प्रतिउत्तर में कह दिया 'पुरुषों को लाईव कार्यक्रम के तौर तरीके पता नहीं हैं। बाल-नाक-कान खुजाते हुए कविता पाठ करते पुरुष साहित्य को पतन की ओर ले जा रहे हैं।' ज्ञान को बुरी तरह पीट चुके, अकादमिक कवियों की टोलियों ने आनन-फानन में प्रस्ताव पारित कर दिया कि 'फेसबुक  कवियों को कवि ही नहीं माना जाएगा और न ही फेसबुक में डाली जाने वाली कविताओं को कविता ही।'  दूसरी तरफ नए-नए अवतरित फेसबुक कवियों ने भी दो-टूक कह दिया- 'बर्तन, घंटियों की आवाज से बच गए कोरोना को कविताएं सुना-सुना कर भगाएंगे।' अब हम से पूछो, तब बात तो भैया दोनों की ही सही है। अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग।
 अब भैया एक सिद्धहस्त लाईव कार्यक्रम के प्रणेता जिनके इन दिनों लगभग हर पोस्ट पर अप्रत्याशित रूप से टिप्पणियों की झड़ी लग रही थी, उन्हें समझ नहीं आया, इसकी वजह क्या है? पहले-पहल उनका शक अभी-अभी बदल दी गई उनकी प्रोफाइल पिक्चर पर गया। मगर  उनका ये शक बिल्कुल बेबुनियाद निकला। तब एक मित्र ने उन्हें आईना दिखाते हुए कहा- "यार! कोरोनाकाल में ईश्वर के बाद तुम जैसे लाईव कार्यक्रम के आयोजकों का ही सहारा रह गया है। कभी हमें भी याद किजिए।" तब असल बात उनके गले उतरी।

 अब हुजूर! लाईव आइए। समय के साथ तो चलना ही हुआ। मगर अवतरण से पहले इस सुझाव पत्र पर एक नजर जरूर मार लिजियेगा।
 पहली बात, लाईव के लिए वहीं पर स्वीकृति दें जहां सदस्यों की संख्या पांच हजार या उसके पार हो। भले आप दस कवियों की एक-एक पंक्ति चुराकर नितान्त मौलिक कविताएं लिखते रहे हों मगर पेज या ग्रुप की सदस्य संख्या ही आपके साहित्यिक  कद को तय करेगी। दूसरे, कार्यक्रम के समय पर विशेष ध्यान दें। अपने अनुभव के आधार पर जब आपको लगे कि इस समय तक झाड़ू- फटके से निपटा जा चुका होगा , उस ही समय का चयन करें। यदि  प्राइम टाइम का समय मिल जाए तो वह तो सोने पर सुहागा है। तीसरा, लाईव आने के बाद किसी बेकार माईक को चेक करने के अंदाज में बार-बार 'हेलो- हेलो- हेलो- हेलो' करके अपना और अन्य लोगों की बेकारी का  उपहास न उड़ाएं। कान- नाक या माथा खुजाते हुए बार-बार आवाज आ रही है, हम दिखाई दे रहे हैं, यह पूछना भी लाईव के नियमों के विरुद्ध है। लाइव स्क्रीन पर नजर आ रही आंख में दस की संख्या आते ही अपना ज्ञान प्रारंभ कर दें। आंख के पास संख्या बढ़ने से ना तो फूल कर गुब्बारा होइए। न आंख पर संख्या कम होने पर चूसा हुआ आम। निष्काम भाव से अपना ज्ञान बघारते जाएं। परंतु इससे बहुत पहले मैं आपसे आशा करती हूं कि आपने अपने परिवार, रिश्तेदारों व मित्रों इत्यादि को अपनी तारीफ में कसीदे पढ़ने के लिए आमंत्रण पत्र भेज दिया होगा। वे शुभचिंतक पांच-पांच मिनट के अंतराल में लगातार आपको अपने होने की स्मृति कराते जाएंगे। इस दौरान कभी-कभार आपके मन में यह विचार भी आ सकता है कि 'इससे बेहतर तो अपने मुन्ना की शादी में  ज्ञान बघार दिए होते, कम से कम नहीं तो चालीस-पचास लोग तो सुनने वाले मिल ही जाते।' इस तरह की बातें सोच कर अपना मन छोटा ना करें। चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात, बार-बार कैमरे के पास आकर टिप्पणियों को आंखें फाड़ कर नहीं पढ़े ‌ इससे आपके ज्ञान से पके बैठे किसी दर्शक द्वारा फोन से बाहर आपकी गर्दन खींच लिए जाने का खतरा बना रहता है। पांचवी, बार-बार लाइव  की वीडियो भेज-भेज कर दहशत के इस माहौल को और ना बढ़ाएं। 

खैर दद्दू! हम तो मीडिया को खामखां बदनाम करते रहे। इस बीच साहित्य की दुनिया को करीब से देखा तब मीडिया के लिए चुनी हुई तमाम सम्मानजनक भाषा, उपमाओं को   साहित्य के दिग्गजों के लिए संभाल कर रख दिया है।अब हम झुझलाएं, खिसयाएं, मिमियाएं या हिनहिनाएं उन्हें इससे क्या फर्क पड़ना है? खींचातानी ही वर्तमान साहित्य का ग्लैमर है, यकीन न आए तब अगले लाईव का इंतजार कर खुद ही देख लीजिएगा।

मीना पाण्डेय
एम-3, सी-61 शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, साहिबाबाद गाजियाबाद-201005
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