होना, सोचने से बेहतर है
'होने' की होती है एक जमीन
जिस पर पुरखों ने बोया अपने समय का सच
उस पीड़ा, उदेख, श्रमों के अंतराल को
हमने 'लोक' कहा
सैकड़ों मील दूर बैठे
गढ़ते रहे लोकजीवी होने का स्वांग
कमरतोड़ मेहनत के बाद
लम्बी, उजाड़ रातों में वे-
मिलजुल सुस्ताए भर
हमने उन्हें 'लोक गीत' कह सहेजा
हमारे हाथ उस पसीने तक नहीं पहुंचे
जिसे सहेज निकाली जा सकती थी
एक राह पहाड़ों की तरफ
याद और आंसुओं से नहाई 'न्योली' से
मिलाते रहे उस चिड़िया की शक्ल
हमने उस दर्द को नहीं पढ़ा
कोहरे ढके पहाड़ों के पीछे से
चटकीले सूरज सी कौंधती लोककथाएं
कथा भर होकर भी
जीवन से आगे दौडती रहीं
हवा,पानी, सुकून से होता हुआ
विकास का 'बिख्याती' हाथ हम तक पहुंचा
पहाड झोड़़ा-चाचंरी, मडुवा भर नहीं है
पहाड़, श्रम के रास्ते
लोक को उसकी जटिलताओं के साथ जीना है
होना, सोचने से इसलिए बेहतर है
क्योंकि वहां से
लोक के मोह में उलझे मस्तिष्क और
आधुनिक देह के मध्य
उभरने लगती है
द्वंद की एक बारीक रेखा।
#मीना पाण्डेय
(फोटो साभार गूगल)

बेहतरीन 👌
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