शैलेश मटियानी का जन्म 14 अक्टूबर, 1931 को अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना गांव में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। मटियानी जी जब बारह वर्ष (1943) के ही थे तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया। माता-पिता की मृत्यु के बाद वे चाचा के बूचड़ खाने में काम करने लगे। बहुत संघर्षों के बाद उन्होंने हाईस्कूल तक की अपनी पढ़ाई किसी तरह पूरी की। बचपन से ही वे लेखक बनना चाहते थे। सन 1950 से उन्होंने कविताएं, कहानियां लिखना शुरू कर दिया। शुरुआत कविताओं से की फिर कहानियां लिखने लगे। जीवन के संघर्षों और उज्जवल भविष्य की चाह में एक दिन अचानक अल्मोड़ा में अपने छोटे भाई-बहन को अकेला छोड़ बालक रमेश मटियानी 1951 में दिल्ली आ गए और ‘अमर कहानी’ के संपादक आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहां रुके। उसके बाद कई शहरों में किस्मत आजमाने के बाद वे बंबई चले गए। फिर पांच-छह वर्षों तक उन्हें फुटपाथों पर सोना, फेंके हुए भोजन खाना, भिखांड़यों व पाकेटमारों की संगत में बैठना जैसे कई अनुभवों से गुजरना पड़ा। वहां एक जगह प्लेटें साफ करने का काम मिला और अगले साढ़े तीन साल तक वे वहीं रहे और काम के साथ-साथ लिखते भी रहे। बाद में वे इलाहाबाद आ गए।
शैलेश मटियानी का आरंभिक जीवन किसानी और जुआरी के बेटे और बूचड़ के भतीजे होने के कारण संघर्ष और उपेक्षा के अनुभवों से संपन्न रहा। उसके बाद दिल्ली मुंबई में किए गए संघर्ष, आपराधिक और विभत्स दुनिया के अनुभव उनके अनुभव जगत को विकसित करते गए। इस क्रम में आर्थिक संकटों, भावनात्मक संघर्ष और प्रतिकार के कड़वे अनुभव उनके कथा साहित्य में सर्वथा व्याप्त हैं। उनके जैसी अनुभव संपन्नता और भोगे हुए यथार्थ का चित्रण हिंदी कथा साहित्य जगत में और कहीं मिलना दुर्लभ है। उनके कथा साहित्य की यही विशेषता उन्हें एक उत्कृष्ट लेखक के रूप में हिन्दी जगत में प्रतिस्थापित करती है। एक कथाकार के रूप में शैलेश मटियानी अपने कथा साहित्य के माध्यम से सामाजिक व आर्थिक रूप से शोषित और पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते हैं। उनके कथा साहित्य में आर्थिक संकट भोंगते निम्नवर्गीय लोग, घर से प्रेम संबंधों में भागी स्त्रियों का दुर्भाग्य, जातिगत रूप से निम्न स्थिति प्राप्त पात्र और भुखमरी तथा अभावग्रस्त जीवन भोंगने को विवश अति निम्न स्तरीय लोग तथा अपराध जगत के पीछे की दारूण सच्चाईयों से दो-चार होते लोगों का यथार्थ अभिव्यक्त हुआ है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने शोषित और पीड़ित आम आदमी को चित्रित किया है। उनका पहला उपन्यास 'बोरीवली से बोरीबंदर तक' निम्न स्तरीय आम आदमी के संघर्ष और बम्बई की झुग्गी बस्तियों से जुड़े अनुभव की गाथा बनकर उभरा है। वहां घर से भगा कर लाई गई और बेच दी गई स्त्रियों का त्रासद जीवन है तो अपराध जगत में लिप्त गंदी गलियों की सच्चाई भी। उपन्यास बताता है कि गंदी गलियों और अपराधिक जीवन के पीछे का सच हमेशा गंदा नहीं होता। 'हौलदार' उपन्यास के माध्यम से वे कुमाऊंनी समाज में गहरे तक उतरे जातिवाद और वर्णवाद के संस्कारों को उजागर करते हैं और सदियों से चले आ रहे ब्राह्मण तथा क्षत्रिय समाज के मध्य उपजे अंतर्द्वंद को रेखांकित करने का प्रयास करते हैं। 'सावित्तरी' उपन्यास की सावित्तरी भी एक निम्न वर्गीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जो सिर्फ इसलिए लोगों की गंदी नजर और फब्बतियों का शिकार बनती है क्योंकि वह दिखने में आकर्षक है और लोगों के घरों में काम करती है।शैलेश मटियानी के कथा साहित्य में संवेदना और मार्मिकता का एक अलग स्तर दिखाई देता है। यही उनकी विशेषता भी है और कुछ आलोचकों की नजर में यही उनकी सीमा भी। शैलेश मटियानी के कथा साहित्य की एक और बड़ी विशेषता है कि वे अपनी कहानियों और उपन्यासों में स्त्री जीवन के विभिन्न पक्षों को सामने रखते हैं। 'बोरीवली से बोरबंदर तक' उपन्यास की नूर जो असल में रैवा है समाज में उन स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है जो कि धूर्त पुरुषों द्वारा प्रेम में फांस कर पहाड़ों से शहर लाई जाती है और फिर वेश्यावृत्ति में धकेल दी जाती है। वहीं 'सावित्तरी' उपन्यास की सावित्तरी एक निम्न वर्गीय अभावग्रस्त स्त्री होते हुए भी एक स्वाभिमानी स्त्री है जो बड़े मन से मीत और उसके परिवार का ध्यान रखती है और उसके चरित्र की यही विलक्षणता नायक को मोह लेती है।शैलेश की कहानियों में कुमाऊं का जनजीवन, परिवेश, संस्कृति और वहां का दुर्गम यथार्थ परिलक्षित होता है। 'हौलदार', 'चिट्ठी रसैन', 'गोपुली गफुरन' इत्यादि इसी तरह के उपन्यास हैं जहां कुमाऊं का जनजीवन और वहां की जटिलताएं अपने पूरे विस्तार के साथ उपस्थित होती हैं। इसी तरह अर्धांगिनी, किसी से ना कहना, कालिका अवतार, लीक, पोस्टमैन, बाली-सुग्रीव, दशरथ, प्रेतात्मा इत्यादि उनकी ऐसी कहानियां हैं जो पहाड़ के जनजीवन को पाठकों के सम्मुख रखती हैं। शैलेश मटियानी उन गिने-चुने कथाकारों में है जो पहाड़ के बाहरी सौंदर्य, पर्वतों, नदियों और वनों पर मोहित नहीं होते बल्कि वहां के कड़वे यथार्थ को भी अपने कथा साहित्य के माध्यम से सामने रखते हैं। कुमाऊं के लोक जीवन में व्याप्त मान्यताएं, रूढ़िवादिता, वर्ण व जातिवाद के गहरी संस्कार बखूबी उनके कथा साहित्य में उभर कर आए हैं। शैलेश मटियानी कथाकार के रूप में संवेदनात्मक और भावनात्मक आधार पर पाठक को अपने साथ जोड़ते हैं। यह भावनात्मक आधार वह अपनी बेहद सरस और मार्मिक भाषा में सिद्धहस्तता से निर्मित करते हैं। आज उनका जंयती है।मीना पाण्डेय

No comments:
Post a Comment