फुॅलस्टाप
जब से वह अपनी पार्टी के प्रदेश किसान मोर्चा का अध्यक्ष हुआ है उसने मोहल्ले में एक छोटी दुकान भी किराए पर उठा ली है। राजनीति की राजनीति बिजनेस का बिजनेस। खाने कमाने के लिए तो प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करना ही था। अब तक जो काम भैय्या जी के किराना स्टोर के आगे कुर्सियां डालकर होता था अब अपनी खुद की दुकान पर होगा। अभी तक जो करते आए सो किया मगर अब राजनीतिक छवि का प्रश्न था। बिजनेस पार्टनर रघुवीर ने खबर सुनी मुंह में पान की पिक संभालते हुए बोल पड़ा 'तुम्हें किसानी का अ ब पता है बे। तुमको काहे अध्यक्ष बना दिए?'
गणेश ने त्यौड़िया चढ़ाते हुए जवाब दिया- 'इसके लिए कौन डिग्री लेनी पड़ती है। सीख लेंगे और फिर किसान मोर्चा का अध्यक्ष राजनीतिक पद है। किसानो की बात रखनी है और क्या।'
' पर मेरे भाई बात रखने के लिए देश में किसानी की असल स्थिति पता होनी चाहिए कि नहीं।' देर तक मुंह में गुडगुडाए पान मसाले का बाउंड्री वॉल के पार नाली पर निशाना लगाते हुए रघुवीर बोला।
'अरे सब हो जाएगा भाई। आप लोग साथ बनाए रखिए बस।' गणेश ने अपने नथुनों के नीचे उग आई मूंछों को उंगलियों से उघाड़ते हुए रघुवीर की तरफ एक झूठी मुस्कान उछाल दी। दरअसल पार्टी की सालों भर की सेवा के बाद इस बार गणेश को पार्टी ने क्षेत्र में कोई ढंग का पद दिया है।
मंडल महामंत्री, मंडल अध्यक्ष जैसे कुकुरमुत्ते की तरह हर वार्ड में उग आने वाली छोटी-मोटी जिम्मेदारियां तो उसे यदा कदा मिल ही जाती रही थी मगर मंडल के किसी छोटे-मोटे पद और किसान मोर्चा का जिला अध्यक्ष होने में बहुत फर्क है। अब मंडलों की रैलियां सभाओं में उसकी बात का भी वजन होगा। अन्य मंडल प्रतिनिधियों की तरह केवल मंच पर की सेल्फियां लेकर नहीं निकल जाना होगा। गणेश का मन कल्पना मात्र से ही फूला नहीं समा रहा था बाहर से स्थिर देखने का प्रयास अक्सर उसे उसके नथुनों अनायासी फूल जाते हैं उनको धुपने के लिए ही बात-बात पर उंगलियों से मूंछों को नीचे की तरफ उगने का उपकरण वह करता उपक्रम वह करता रहता है गणेश के जीवन के यह दो सरे ही अवशेष बचे थे राजनीति और क्षेत्र के लोगों के साथ उसकी बाल मनसाहत व्यवहार कुशलता मां के बाद कुछ छोटे-छोटे नौकरियों कर लेने और उनसे उत्तर जाने के बाद गणेश ने मोहल्ले के एक बुजुर्ग भैया जी के नाम से मशहूर क्षेत्रीय नेता के चरण पकड़ लिए थे क्षेत्र की समाज विशेष की समितियां में सदस्य से शुरू हुआ उसका सफल धीरे-धीरे महासचिव सचिव तक पहुंचने लगा माध्यम का सुधीर के नए नक्श छल्लेदार बातों का धनी गणेश जल्दी ही समझ में अपनी पकड़ बन गया राज बेरा थारी बीमारी कच्चे पक्के कागज बनाने दुख सुख बांटने में गणेश हमेशा खड़ा रहता इसी वजह से इतनी जल्दी क्षेत्र में अपनी पेंट भी बन गया मगर पार्टी में कोई पद मिलना इतना आसान नहीं था 15 20 साल में पार्टी और समाज के पीछे उसका धंधा पानी भी प्रॉपर्टी डीलिंग पर निर्भर होकर रह गया था मगर इस बार किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष पद के लिए उसके नाम का प्रस्ताव पर मोहर लगी तब राजनीति में एक कदम आगे जाने की आप पुनः जागृत हुई आखिर पार्षद की दौड़ में पहुंचना इतना आसान नहीं था पिछला पार्षद बूढ़ा गया तब लगा अब तो उसके नाम का प्रस्ताव आएगा मगर साल भर पहले दीपावली छठ की शुभकामनाओं के बहाने होर्डिंग में पार्षद ने बेटे की तस्वीर चसपा कर दी। जाहिर था बलवीर राठी जाएगा तो उसका बेटा खड़ा है। राष्ट्रीय पार्टी है। होडिंग लगा देने से टिकट मिले यह तय थोड़ी है। आखिर संगठन और कार्यकर्ता की बात का भी कुछ वजन है कि नहीं। मगर उस साल वह सीट महिला आरक्षित घोषित हो गई और बलवीर राठी रातों-रात रात बेटे का ब्याह कर बहू ले आया। बहू क्या लाया पार्षदी का उम्मीदवार ले आया। गणेश तब भी मन मसोजकर रह गया। करता भी क्या नाराजगी जताकर। उसके हाथ में था भी क्या? पार्टी बड़ी है छोटी आवाजें है गुम हो जाती है। मगर किसान मोर्चा का जिला अध्यक्ष बनने के बाद अब राह कुछ आसान होती दिखाई दे रही थी। मगर जिले का महत्वपूर्ण पद मिल जाने के बाद भी अब भी उसकी दिनचर्या में कोई विशेष फर्क नहीं आया था। पहले की तरह आधा दिन ऑफिस में निकल जाता। आधा मिटिंग व सभाओं में। शाम को कुछ यार दोस्त ऑफिस में मिलने आ जाते और बोलते बतियाते देर रात अपने-अपने घरों को चलते बनते। उनके जाते ही गणेश व रघुवीर भी ऑफिस बढ़ाकर घर की तरफ चल निकलते। ऑफिस से उसका घर पास था। मगर अक्सर वह मोटरसाइकिलसे ही आता-जाता। आज भी रघुवीर के जाते ही ऑफिस बंद कर वह घर की तरफ निकल आया। घर की तरफ निकलते हुए उसके पर बेजान हो जाते हैं और दिमाग शून्य। इसीलिए रात बे रात दोस्त यारों के साथ बैठने-बिठाने के बहाने वह खोज ही लेता था। मगर आज ऐसा कोई संजोग ना बन पाया। बेमन से उसने पैंट की बाई पॉकेट से चाबी निकाली और दाहिने पैर को हवा में कुछ उछालते हुए मोटरसाइकिल में सवार हो घर की तरफ निकल गया। घर का दरवाजा खोलते ही सांय सांय की ध्वनि ने उसका स्वागत किया। साल भर हुए उसकी मां ने भी इस उम्र में उसकी सेवा सुश्रुसा से पल्ला झाड़ बड़े बेटे के वहां स्थाई ठिकाना बना लिया था
गणेश भीतर से दरवाजा लगाकर सोफे पर निढ़ल हो गया। हर रोज घर लौटकर कुछ देर वह सोफे पर बमतलब बैठ जाता है। तब कुछ देर बाद हाथ जूते की तरफ बढ़ता और व गुसलखाने का रुख करता।मिथिलांचल समाज व एक राष्ट्रीय पार्टी में किसान मोर्चा का जिला अध्यक्ष, दिन भर लोगों, समाज, दुनियादारी, यार दोस्तों से घिरा रहने वाला गणेश घर की चारदिवारी के बीच एकदम अकेला था। पिछले तीन सालों में कितना कुछ गुजर चुका था। समाज और राजनीति के प्रति गणेश के समर्पण ने उसके व्यक्तिगत जीवन में उसे बहुत पीछे छोड़ दिया था।
शुरू में सब ठीक ही था। सोमा से प्रेम विवाह, घर गृहस्थी और एक प्यारी सी बिटिया। जैसा जो भी था जीवन में रस था। घर लौटने की वजह थी। फिर चाह ना चाह के नौकरी छूट गई। प्रॉपर्टी का काम पकड़ा। तब भी उलझने थी शिकवे- शिकायत थे मगर जीवन तब भी पटरी पर था। एक छत के नीचे घरौंदे को जिस तरह होना चाहिए वैसा था। दीवार पर लगी तस्वीर जितनी मुस्कुराहट बची हुई थी जीवन में। गणेश ने एक लंबी सांस ली। अमूमन वह रात में दोस्तों के साथ बैठकर घर इसीलिए देर से लौटता है ताकि मोबाइल स्क्रोल करते हुए उसे तुरंत नींद आ जाए। मगर आज ध्यान बटाने का कोई उपक्रम काम न आया। मोबाइल के होम स्क्रीन में सोमा और जूही की मुस्कुराती तस्वीर चमक उठी। 'गणेश तुम एक हारे हुए इंसान हो।' गणेश का मन उसी तीन साल पुरानी घृणा और तिरस्कार से तिलमिला उठा। उसे लगा सोमा उसकी नाकामियों पर फिर उसे ताने दे रही है। सोमा का वह तिरस्कार गणेश से ना तब सहन होता था ना अब। गणेश उघाडे मारकर रोना चाहता था मगर इन तीन सालों में आंखों का पानी भी सूख चुका था। उसे याद आया उन दिनों वह पार्टी से नया-नया जुड़ा था। गणेश जानता था समाज और राजनीति के इस पायदान पर खाने-कमाने का काम नहीं है।लोग सालों से सेवा दे रहे हैं तब भी सामान्य कार्यकर्ता के तौर पर पूछ नहीं। भैया जी ने भी साफ कह दिया था। 'पांच-दस साल तो पार्टी को देने ही होंगे। राजनीति में बने रहने की भी एक राजनीति होती है। अपने व्यक्तिगत आग्रहों को कुछ पीछे कर पार्टी की सेवा में देने पड़ेंगे तब जाकर कोई बात बनेगी।' भैया जी की बात में एक आकर्षण था। अपनी इसी वाकपटुता व व्यवहारिकता के बल पर उन्होंने अपने कई चेले बना लिए थे। गणेश पर भैया जी की बातों का ऐसा सम्मोहन पार्टी हुआ कि समाज और राजनीति के सिवाय उसे फिर कहीं रस नहीं मिला। उसने मन बना लिया था। मां-बाप का पुश्तैनी घर रहने के लिए है ही। जूही की पढ़ाई और घर का खर्च महीने दो महीने में किसी प्रॉपर्टी के सौदे से चल ही जाएगा। गणेश ने रैलियां, सभाओं, मीटिंग के पीछे दिन रात एक कर दिया। देर-सवेरे घर लौटना दिन भर गायब रहना आम हो गया। कई बार सोमा ने दबी जुबान में उलाहने दिए। धीरे-धीरे उलाहने ताने बने और ताने तीर और फिर बात अलग होने तक आ गई। 'तुम्हें यही सब ही करना था तब घर ही क्यों बसाया गणेश।'
'मुझे थोड़ा समय दे दो सोमा। मैं सब ठीक कर दूंगा और फिर तुम लोगों के लिए कहां कमी की है मैंने।'
' बात सिर्फ पैसों तक होती तब भी ठीक था मगर गणेश तुम्हें परिवार चाहिए ही नहीं। तुम्हें पत्नी, बच्चे की उम्मीद और सपनों से कुछ लेना-देना नहीं है।' सोमा जूही को लेकर उस दिन गई तो फिर पलट कर नहीं देखा। हां महीने दो महीने में जूही आ जाती थी पापा से मिलने।
इसी उधेड़बुन में जाने कब गणेश की आंख लगी। दूसरा दिन सुबह से मीटिंग में बीता। शाम के समय ऑफिस पहुंचा तो बिजनेस पार्टनर रघुवीर वहां पहले से ही बैठा हुआ था। 'खूब आए गुरु। भाई नेता बन गए हो तो क्या काम-धन्धा छोड़ दोगे?' 'अरे नहीं यार सुबह से ही फंसा हुआ था। फ्री हुआ तो सीधा ऑफिस ही आया हूं।' गणेश ने एक बार फिर अपनी मूंछों को उंगलियों से उघाड़ते हुए कहा।
'तो गुरु अब क्या सोचा है? किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष भी बन गए हो। धन्धा भी ठीक-ठाक चल रहा है। जीवन यूं ही अकेले बर्बाद कर दोगे? भाभी से बात करो यार बिटिया बड़ी हो रही है। कब तक चलेगा यह सब?' गणेश एकटक रघुवीर को देखता रहा फिर अचानक कुछ सोचता हुआ बोला 'नहीं यार जो है जैसा है ठीक है। अब मैं ही नहीं चाहता कुछ ठीक हो।'
रघुवीर को कुछ नहीं सूझा तो पान मसाले की पुड़िया निकाली और मुंह में खाली करता गया। गणेश की बात उसके हलक से नीचे नहीं उतर रही थी। बात-बात में अकेलेपन, घर-परिवार व बेटी का जिक्र ले आने वाला गणेश एकाएक इतना तथस्त कैसे हो गया। सम्भवतः एक लम्बी खींचतान और शब्द बाणों से छलनी मन मरहम नहीं ढूंढना चाहता। वह हर उस चीज से दूर हो जाना चाहता है जो उसे छोटा और बेमतलब होने का एहसास दिलाती है। 'अकेलापन सदैव अकेला नहीं होता। अतीत के घावों की टीस होती है उसमें। छोड़े हुए नस्तरों की गूंज होती है उसमें। दर्द से हर दिन गुजरने वाला आदमी उससे जूझना सीख लेता है। अकेलापन जीवन की कई दुश्वारियां से बेहतर है।' गणेश जैसे अपने आप में आश्वस्त होना चाहता था। मानो भीतर ही भीतर स्वयं को अपने निर्णय के लिए तैयार कर रहा हो। 'जूही के बारे में तो सोच यार।उसका क्या कसूर है?' रघुवीर जैसे उसे पूरी तरह टटोलना चाहता था।'कसूर तो यार किसी का भी नहीं। मां-बाप को हरपल लड़ने-झगड़ने देखे इससे बेहतर है जहां रहे खुश रहे।' गणेश अब ऊपर-ऊपर से गुजर जाना चाहता है। गहरे उतरने में डूब जाने का डर था। एकबार फिर अपनी मूंछों को उंगलियों से उघारते हुए वह उठ खड़ा हुआ। मेज की दराज से उसने बाइक की चाबी निकाली और रघुवीर से हाथ मिलाकर घर की तरफ निकल आया। मोटरसाइकिल स्टार्ट होते ही ठंडी हवा का एक झौंका उसके चेहरे को छूकर निकल गया। गणेश बेहद तरोताजा महसूस करने लगा। मन जैसे किसी हलचल से मुक्त हो गया हो। आज घर का किवाड़ खोलते हुए उसने सोचा जीवन में कुछ अनुत्रित प्रश्नों पर कठोर निर्णयों का फुॅलस्टाप लगाना कितना जरूरी है।
-मीना पाण्डेय
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