Tuesday, August 20, 2024

फुॅलस्टाप (कहानी)

 फुॅलस्टाप 



जब से वह अपनी पार्टी के प्रदेश किसान मोर्चा का अध्यक्ष हुआ है उसने मोहल्ले में एक छोटी दुकान भी किराए पर उठा ली है। राजनीति की राजनीति बिजनेस का बिजनेस। खाने कमाने के लिए तो प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करना ही था। अब तक जो काम भैय्या जी के किराना स्टोर के आगे कुर्सियां डालकर होता था अब अपनी खुद की दुकान पर होगा। अभी तक जो करते आए सो किया मगर अब राजनीतिक छवि का प्रश्न था। बिजनेस पार्टनर रघुवीर ने खबर सुनी मुंह में पान की पिक संभालते हुए बोल पड़ा 'तुम्हें किसानी का अ ब पता है बे। तुमको काहे अध्यक्ष बना दिए?' 

गणेश ने त्यौड़िया चढ़ाते हुए जवाब दिया- 'इसके लिए कौन डिग्री लेनी पड़ती है। सीख लेंगे और फिर किसान मोर्चा का अध्यक्ष राजनीतिक पद है। किसानो की बात रखनी है और क्या।'

' पर मेरे भाई बात रखने के लिए देश में किसानी की असल स्थिति पता होनी चाहिए कि नहीं।' देर तक मुंह में गुडगुडाए पान मसाले का बाउंड्री वॉल के पार नाली पर निशाना लगाते हुए रघुवीर बोला।

 'अरे सब हो जाएगा भाई। आप लोग साथ बनाए रखिए बस।' गणेश ने अपने नथुनों के नीचे उग आई मूंछों को उंगलियों से उघाड़ते हुए रघुवीर की तरफ एक झूठी मुस्कान उछाल दी। दरअसल पार्टी की सालों भर की सेवा के बाद इस बार गणेश को पार्टी ने क्षेत्र में कोई ढंग का पद दिया है।

 मंडल महामंत्री, मंडल अध्यक्ष जैसे कुकुरमुत्ते की तरह हर वार्ड में उग आने वाली छोटी-मोटी जिम्मेदारियां तो उसे यदा कदा  मिल ही जाती रही थी मगर मंडल के किसी छोटे-मोटे पद और किसान मोर्चा का जिला अध्यक्ष होने में बहुत फर्क है। अब मंडलों की रैलियां सभाओं में उसकी बात का भी वजन होगा। अन्य मंडल प्रतिनिधियों की तरह केवल मंच पर की सेल्फियां लेकर नहीं निकल जाना होगा। गणेश का मन कल्पना मात्र से ही फूला नहीं समा रहा था बाहर से स्थिर देखने का प्रयास अक्सर उसे उसके नथुनों अनायासी फूल जाते हैं उनको धुपने के लिए ही बात-बात पर उंगलियों से मूंछों को नीचे की तरफ उगने का उपकरण वह करता उपक्रम वह करता रहता है गणेश के जीवन के यह दो सरे ही अवशेष बचे थे राजनीति और क्षेत्र के लोगों के साथ उसकी बाल मनसाहत व्यवहार कुशलता मां के बाद कुछ छोटे-छोटे नौकरियों कर लेने और उनसे उत्तर जाने के बाद गणेश ने मोहल्ले के एक बुजुर्ग भैया जी के नाम से मशहूर क्षेत्रीय नेता के चरण पकड़ लिए थे क्षेत्र की समाज विशेष की समितियां में सदस्य से शुरू हुआ उसका सफल धीरे-धीरे महासचिव सचिव तक पहुंचने लगा माध्यम का सुधीर के नए नक्श छल्लेदार बातों का धनी गणेश जल्दी ही समझ में अपनी पकड़ बन गया राज बेरा थारी बीमारी कच्चे पक्के कागज बनाने दुख सुख बांटने में गणेश हमेशा खड़ा रहता इसी वजह से इतनी जल्दी क्षेत्र में अपनी पेंट भी बन गया मगर पार्टी में कोई पद मिलना इतना आसान नहीं था 15 20 साल में पार्टी और समाज के पीछे उसका धंधा पानी भी प्रॉपर्टी डीलिंग पर निर्भर होकर रह गया था मगर इस बार किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष पद के लिए उसके नाम का प्रस्ताव पर मोहर लगी तब राजनीति में एक कदम आगे जाने की आप पुनः जागृत हुई आखिर पार्षद की दौड़ में पहुंचना इतना आसान नहीं था पिछला पार्षद बूढ़ा गया तब लगा अब तो उसके नाम का प्रस्ताव आएगा मगर साल भर पहले दीपावली छठ की शुभकामनाओं के बहाने होर्डिंग में पार्षद ने बेटे की तस्वीर चसपा कर दी। जाहिर था बलवीर राठी जाएगा तो उसका बेटा खड़ा है। राष्ट्रीय पार्टी है। होडिंग लगा देने से टिकट मिले यह तय थोड़ी है। आखिर संगठन और कार्यकर्ता की बात का भी कुछ वजन है कि नहीं। मगर उस साल वह सीट महिला आरक्षित घोषित हो गई और बलवीर राठी रातों-रात रात बेटे का ब्याह कर बहू ले आया। बहू क्या लाया पार्षदी का उम्मीदवार ले आया। गणेश तब भी मन मसोजकर रह गया। करता भी क्या नाराजगी जताकर। उसके हाथ में था भी क्या? पार्टी बड़ी है छोटी आवाजें है गुम हो जाती है। मगर किसान मोर्चा का जिला अध्यक्ष बनने के बाद अब राह कुछ आसान होती दिखाई दे रही थी। मगर जिले का महत्वपूर्ण पद मिल जाने के बाद भी अब भी उसकी दिनचर्या में कोई विशेष फर्क नहीं आया था। पहले की तरह आधा दिन ऑफिस में निकल जाता। आधा मिटिंग व सभाओं में। शाम को कुछ यार दोस्त ऑफिस में मिलने आ जाते और बोलते बतियाते देर रात अपने-अपने घरों को चलते बनते। उनके जाते ही गणेश व रघुवीर भी ऑफिस बढ़ाकर घर की तरफ चल निकलते। ऑफिस से उसका घर पास था। मगर अक्सर वह मोटरसाइकिलसे ही आता-जाता। आज भी रघुवीर के जाते ही ऑफिस बंद कर वह घर की तरफ निकल आया। घर की तरफ निकलते हुए उसके पर बेजान हो जाते हैं और दिमाग शून्य। इसीलिए रात बे रात  दोस्त यारों के साथ बैठने-बिठाने के बहाने वह खोज ही लेता था। मगर आज ऐसा कोई संजोग ना बन पाया। बेमन से उसने पैंट की बाई पॉकेट से चाबी निकाली और दाहिने पैर को हवा में कुछ उछालते हुए मोटरसाइकिल में सवार हो घर की तरफ निकल गया। घर का दरवाजा खोलते ही सांय सांय की ध्वनि ने उसका स्वागत किया। साल भर हुए उसकी मां ने भी इस उम्र में उसकी सेवा सुश्रुसा से पल्ला झाड़ बड़े बेटे के वहां स्थाई ठिकाना बना लिया था

 गणेश भीतर से दरवाजा लगाकर सोफे पर निढ़ल हो गया। हर रोज घर लौटकर कुछ देर वह सोफे पर बमतलब बैठ जाता है। तब कुछ देर बाद हाथ जूते की तरफ बढ़ता और व गुसलखाने का रुख करता।मिथिलांचल समाज व एक राष्ट्रीय पार्टी में किसान मोर्चा का जिला अध्यक्ष, दिन भर लोगों, समाज, दुनियादारी, यार दोस्तों से घिरा रहने वाला गणेश घर की चारदिवारी के बीच एकदम अकेला था। पिछले तीन सालों में कितना कुछ गुजर चुका था। समाज और राजनीति के प्रति गणेश के समर्पण ने उसके व्यक्तिगत जीवन में उसे बहुत पीछे छोड़ दिया था।

 शुरू में सब ठीक ही था। सोमा से प्रेम विवाह, घर गृहस्थी और एक प्यारी सी बिटिया। जैसा जो भी था जीवन में रस था। घर लौटने की वजह थी। फिर चाह ना चाह के नौकरी छूट गई। प्रॉपर्टी का काम पकड़ा। तब भी उलझने थी शिकवे- शिकायत थे मगर जीवन तब भी पटरी पर था। एक छत के नीचे घरौंदे को जिस तरह होना चाहिए वैसा था। दीवार पर लगी तस्वीर जितनी मुस्कुराहट बची हुई थी जीवन में। गणेश ने एक लंबी सांस ली। अमूमन वह रात में दोस्तों के साथ बैठकर घर इसीलिए देर से लौटता है ताकि मोबाइल स्क्रोल करते हुए उसे तुरंत नींद आ जाए। मगर आज ध्यान बटाने का कोई उपक्रम काम न आया। मोबाइल के होम स्क्रीन में सोमा और जूही की मुस्कुराती तस्वीर चमक उठी। 'गणेश तुम एक हारे हुए इंसान हो।' गणेश का मन उसी तीन साल पुरानी घृणा और तिरस्कार से तिलमिला उठा। उसे लगा सोमा उसकी नाकामियों पर फिर उसे ताने दे रही है। सोमा का वह तिरस्कार गणेश से ना तब सहन होता था ना अब। गणेश उघाडे मारकर रोना चाहता था मगर इन तीन सालों में आंखों का पानी भी सूख चुका था। उसे याद आया उन दिनों वह पार्टी से नया-नया जुड़ा था। गणेश जानता था समाज और राजनीति के इस पायदान पर खाने-कमाने का काम नहीं है।लोग सालों से सेवा दे रहे हैं तब भी सामान्य कार्यकर्ता के तौर पर पूछ नहीं। भैया जी ने भी साफ कह दिया था। 'पांच-दस साल तो पार्टी को देने ही होंगे। राजनीति में बने रहने की भी एक राजनीति होती है। अपने व्यक्तिगत आग्रहों को कुछ पीछे कर पार्टी की सेवा में देने पड़ेंगे तब जाकर कोई बात बनेगी।' भैया जी की बात में एक आकर्षण था। अपनी इसी वाकपटुता व व्यवहारिकता के बल पर उन्होंने अपने कई चेले बना लिए थे। गणेश पर भैया जी की बातों का ऐसा सम्मोहन पार्टी हुआ कि समाज और राजनीति के सिवाय उसे फिर कहीं रस नहीं मिला।  उसने मन बना लिया था। मां-बाप का पुश्तैनी घर रहने के लिए है ही। जूही की पढ़ाई और घर का खर्च महीने दो महीने में किसी प्रॉपर्टी के सौदे से चल ही जाएगा। गणेश ने रैलियां, सभाओं, मीटिंग के पीछे दिन रात एक कर दिया। देर-सवेरे घर लौटना दिन भर गायब रहना आम हो गया। कई बार सोमा ने दबी जुबान में उलाहने दिए।  धीरे-धीरे उलाहने ताने बने और ताने तीर और फिर बात अलग होने तक आ गई। 'तुम्हें यही सब ही करना था तब घर ही क्यों बसाया गणेश।'

 'मुझे थोड़ा समय दे दो सोमा। मैं सब ठीक कर दूंगा और फिर तुम लोगों के लिए कहां कमी की है मैंने।'

' बात सिर्फ पैसों तक होती तब भी ठीक था मगर गणेश तुम्हें परिवार चाहिए ही नहीं। तुम्हें पत्नी, बच्चे की उम्मीद और सपनों से कुछ लेना-देना नहीं है।' सोमा जूही को लेकर उस दिन गई तो फिर पलट कर नहीं देखा। हां महीने दो महीने में जूही आ जाती थी पापा से मिलने।

इसी उधेड़बुन में जाने कब गणेश की आंख लगी। दूसरा दिन सुबह से मीटिंग में बीता। शाम के समय ऑफिस पहुंचा तो बिजनेस पार्टनर रघुवीर वहां पहले से ही बैठा हुआ था। 'खूब आए गुरु। भाई नेता बन गए हो तो क्या काम-धन्धा छोड़ दोगे?' 'अरे नहीं यार सुबह से ही फंसा हुआ था। फ्री हुआ तो सीधा ऑफिस ही आया हूं।' गणेश ने एक बार फिर अपनी मूंछों को उंगलियों से उघाड़ते हुए कहा।

 'तो गुरु अब क्या सोचा है? किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष भी बन गए हो। धन्धा भी ठीक-ठाक चल रहा है। जीवन यूं ही अकेले बर्बाद कर दोगे? भाभी से बात करो यार बिटिया बड़ी हो रही है। कब तक चलेगा यह सब?' गणेश एकटक रघुवीर को देखता रहा फिर अचानक कुछ सोचता हुआ बोला 'नहीं यार जो है जैसा है ठीक है। अब मैं ही नहीं चाहता कुछ ठीक हो।'

 रघुवीर को कुछ नहीं सूझा तो पान मसाले की पुड़िया निकाली और मुंह में खाली करता गया। गणेश की बात उसके हलक से नीचे नहीं उतर रही थी। बात-बात में अकेलेपन, घर-परिवार व बेटी का जिक्र ले आने वाला गणेश एकाएक इतना तथस्त कैसे हो गया। सम्भवतः एक लम्बी खींचतान और शब्द बाणों से छलनी मन मरहम नहीं ढूंढना चाहता। वह हर उस चीज से दूर हो जाना चाहता है जो उसे छोटा और बेमतलब होने का एहसास दिलाती है। 'अकेलापन सदैव अकेला नहीं होता। अतीत के घावों की टीस होती है उसमें। छोड़े हुए नस्तरों की गूंज होती है उसमें। दर्द से हर दिन गुजरने वाला आदमी उससे जूझना सीख लेता है। अकेलापन जीवन की कई दुश्वारियां से बेहतर है।' गणेश जैसे अपने आप में आश्वस्त होना चाहता था। मानो भीतर ही भीतर स्वयं को अपने निर्णय के लिए तैयार कर रहा हो। 'जूही के बारे में तो सोच यार।उसका क्या कसूर है?' रघुवीर जैसे उसे पूरी तरह टटोलना चाहता था।'कसूर तो यार किसी का भी नहीं। मां-बाप को हरपल लड़ने-झगड़ने देखे इससे बेहतर है जहां रहे खुश रहे।' गणेश अब ऊपर-ऊपर से गुजर जाना चाहता है। गहरे उतरने में डूब जाने का डर था। एकबार फिर अपनी मूंछों को उंगलियों से उघारते हुए वह उठ खड़ा हुआ। मेज की दराज से उसने बाइक की चाबी निकाली और रघुवीर से हाथ मिलाकर घर की तरफ निकल आया। मोटरसाइकिल स्टार्ट होते ही ठंडी हवा का एक झौंका उसके चेहरे को छूकर निकल गया। गणेश बेहद तरोताजा महसूस करने लगा। मन जैसे किसी हलचल से मुक्त हो गया हो। आज घर का किवाड़ खोलते हुए उसने सोचा जीवन में कुछ अनुत्रित प्रश्नों पर कठोर निर्णयों का फुॅलस्टाप लगाना कितना जरूरी है।



-मीना पाण्डेय 

Srujanse.patrika@gmail.com

Tuesday, August 6, 2024

आरामकुर्सी

 आरामकुर्सी


पौ फटने के साथ ही मैं और नवीन घर पहुंच गए। घर का मुख्य द्वार खुला हुआ था। बाहर सड़क पर रिश्तेदारों पड़ोसियों की भीड़ जमा थी। मेरे कदम वहीं पर जम गए। नवीन ने कंधे पर हाथ रखा तब पैरों पर हजार मन का बोझ ढ़ोऐ हुए मैं आगे बड़ी। आंगन पर पापा को लेटाया गया था। उनके चारों ओर कुछ देखे-अनदेखे  चेहरों का रेला था। ठीक सामने मम्मी अस्त- व्यस्त बैठी सुबक रही थी। मुझे देखा तो उनकी सिसकियां रुलाई में बदल गई। मैं लपक कर माँ के गले लग गई।

 'मैं अकेली पड़ गई ऊषा। धोखा दे गए तुम्हारे पापा।' 

मां की रुलाई मेरे भीतर के ठहरे पड़े लावे को तरल कर गई। प्रकृति के  नियम को जानते-बुझते हुए भी मृत्यु की तटस्थता इंसान को असहाय कर जाती है। एक लंबी चीख और एक दूसरे से लिपटकर हम देर तक रोते रहे। मैंने पापा की तरफ देखा वह हमेशा की तरह ध्यानस्थ लेटे थे। उनके चेहरे पर अब तक जीवन की आभा थी। मानो अभी जागकर कहेंगे आज बड़ी देर तक सोता रहा। रुलाई फिर-फिर गले तक आकर ठहर जाती है। आंगन के दूसरे छोर पर वीरेन के बाल उतारे जा रहे थे। नाते-रिश्तेदार फुर्ती से पापा के अंतिम क्रिया की तैयारी में जुटे थे। यही तो जीवन है बस इतना सा जागने व सोने का अंतराल भर। पापा हमेशा जीवन का दर्शन खोजते रहे। जीवन-मृत्यु, कर्म- अकर्म, भक्ति-ज्ञान, पाप-पुण्य। आंगन के उस तरफ बालकनी के बाएं किनारे पर गमले में गुलदावरी, सोनजूही व डहलिया के फूलों की कतार के मध्य पापा की आराम कुर्सी आज उदास पड़ी थी। टूटे-फूटे कदम अनायास उस तरफ बढ़ गए। हाथ के पोर-पोर से छूकर मैंने उसमें पापा के होने को महसूस किया और आंखें मूंद में पापा की आरामकुर्सी में निढ़ाल हो गई। समय के इस टुकड़े के साथ आंख बंद कर मैं वर्तमान से अलग हो जाना चाहती थी।

आरामकुर्सी पर पड़े-पड़े ऊँघना पापा को सदा से ही पसंद था यह तो मैं नहीं कह सकती मगर दोपहर में कुछ देर अखबार पढ़ने, किसी किताब को बांचने और मोबाइल को स्क्रोल कर लेने के बाद आराम कुर्सी पर बैठे-बैठे सोना इधर पापा का नया शगल बन गया था। मैंने दोपहर के समय पापा को बिस्तर पर लेटे कभी नहीं देखा। हारी-बीमारी में भी नहीं, बहुत थक जाते तब भी नहीं। किसी गंभीर बीमारी की वजह से जब उन्हें महीनों अस्पताल में रहना पड़ा तब भी दोपहर के वक्त यथा संभव वह उठकर बैठ जाते थे। पापा के शांत, एक रस से जीवन में से मम्मी जलतरंग सी गुजरती रहती। कभी आंगन में बिस्तर डालती, कभी अचार-दालों को धूप दिखाती और कभी पौधों को सहलाती। हर बात पर मम्मी की एक प्रतिक्रिया थी। उठने-बैठने सोने जागने खाने-पीने के लिए मम्मी के कुछ नियम थे। उनकी अनदेखी उनको बेचैन कर देती। मगर इस हलचल के दूसरे छोर पर बैठे पापा शांत और स्थिर रहते। कभी-कभार जब पापा खुद पर अखबार ठाले आरामकुर्सी पर ऊंघ रहे होते तब मम्मी आंगन के ठीक सामने मुख्य द्वार से लगी रसोईघर की खिड़की से किसी काम के लिए आवाज देती। पापा हड़बड़ा कर खड़े हो जाते। उनके चेहरे की खिसयाहट किसी अबोध बच्चे से प्रतीत होती मानो कोई शरारत करते पकड़े गए हों। यह आरामकुर्सी पापा की सेवानिवृत्ति के साल भर पहले हमारे घर पर आई थी। नौकरी के चलते मिले सरकारी क्वार्टर से जब नए मकान में आना तय हुआ तब लकड़ी के पुराने फर्नीचर पर फॉम लगवा कर उस पर वेलवेट की कवर चढ़ाई गई। लकड़ी का फर्नीचर मम्मी के मायके से विवाह के समय आया था। विवाह के 30- 32 साल बाद भी जस की तस। मम्मी उसे पुराने घर पर छोड़ना नहीं चाहती थी और हमारा कहना था कि नए घर में नया फर्नीचर होना चाहिए। तब बीच का रास्ता निकाला गया। पुराने फर्नीचर को नए सोफे की शक्ल दी गई। इस फर्नीचर के मध्य चौड़े हत्थे व  बुनाई वाली पुराने जमाने की एक आराम कुर्सी भी थी। इस कुर्सी को पापा किसी नीलामी से उठाकर ले आए थे। कुर्सी को लेकर जब उनके ऑफिस का चपरासी घर आया था तब मम्मी ने कुर्सी भीतर तो रखवा ली मगर उनके जाते ही वह फूट पड़ी। 'सारी दुनिया का कूड़ा इकट्ठा करके घर ले आते हैं। बाकी लोग नीलामी से काम की चीज उठाकर ले गए और तुम्हें यह टूटी फूटी कुर्सी मिली।' पापा चुपचाप आराम कुर्सी उठाकर बालकनी की दु-छत्ती में डाल आए। लगभग पूरे साल कुर्सी दुछत्ती में उसी हाल में पड़ी रही। मम्मी की जब नजर पड़ती कुर्सी और पापा की अकल को कोसना नहीं भूलती। मगर जब नए घर का फर्नीचर रिपेयर हो रहा था तब एक दिन पापा ने दुछत्ती में से कुर्सी भी उतरवा ली। कुर्सी पर नई और चुस्त बुनाई कराई गई। पूरी कुर्सी पर कत्थई रंग-रोगन पापा ने अपने हाथों से की। सोफे की गद्दियों में से बचे फॉम और कपड़े से आराम कुर्सी पर भी कवर चढ़ाई गई। इस प्रकार नए रूप रंग में इठलाती आरामकुर्सी को ससम्मान नए घर की बालकनी में सुसज्जित किया गया। हम सब देखकर हैरान थे कि पापा ने साल भर पहले से सेवानिवृत्ति के बाद की योजना पुख्ता कर रखी थी। वह जब भी उसमें बैठते उनके चेहरे पर आत्मविश्वास की एई अलग सी चमक दिखाई देती। कुर्सी के सदुपयोग व पापा की कारीगरी पर मम्मी भी मुग्ध थी। आराम कुर्सी बालकनी के एक सुरक्षित और यथासंभव दर्शनीय स्थान पर रखी गई। कुर्सी के पीछे घर की बाउंड्री वॉल थी जिस पर कुर्सी पर बैठने वाला मोबाइल, किताब व चाय का कप इत्यादि रख सकता था। दाहिनी तरफ गमलों पर तरह-तरह के फूल शोभायमान थे। ठीक सामने रसोई घर की खिड़की थी जहां से पापा को वक्त-बेवक्त आवाज देकर बुलाया जा सकता था। कुर्सी के बाएं तरफ बालकनी का विस्तार था जहां से दोपहर बाद धूप धीरे-धीरे सरकाना शुरू करती है। पापा की आराम कुर्सी भी धूप के साथ-साथ सरकती जाती।  गर्मियों में इस जगह पर दोपहर बाद ही बैठा जा सकता था। उमस भरी गर्मी के बाद बाउंड्री वॉल के उस पार आम के पेड़ की पड़ती हल्की-हल्की छांव बैठने वाले को सुकून से भर देती थी। कभी-कभार जब पापा से पहले मम्मी आराम कुर्सी में नम्बुदार हो जाती तब पापा कहते कुछ नहीं थे मगर यहां वहां बैठे-बिठाते, चक्कर लगाते मम्मी उनकी उक्ताहट भांप जाती और उठ खड़ी होती। 'लो बिराजो अपनी मूई कुर्सी में।' पापा बड़ी मासूमियत से खिलखिलाते हुए सुकून से बैठ जाते।

कुछ साल पहले जब उनकी गंभीर बीमारी को लेकर डॉक्टर के संशय ने हमें तोड़कर रख दिया था तब इसी आराम कुर्सी में शांत चित्त बैठे पापा सब कुछ जानते हुए भी अनभिज्ञ बने रहते। उन दिनों मम्मी उनकी कुर्सी के पास मोड़ा डालकर घण्टों बैठी रहती और उनकी हस्तरेखाएं पड़ने लगती। मानो रेखाएं पढ़ने के बहाने उनकी सारी पीड़ाएं स्वयं में ले लेना चाहती हो। 'जीवन रेखा तो लंबी है तुम्हारी।' पापा किसी बच्चे सी ही फुर्ती से बोल पड़ते 'तभी तो कहता हूं मुझे कुछ नहीं होने वाला। तुम लोगों ने मुझे बीमार घोषित कर दिया है।' जब बीमारी ने बदन पूरी तरह तोड़ दिया था तब भी कुछ देर अनंत में निहारते आराम कुर्सी में जाकर निढ़ाल हो जाते। दो महीने बाद जब अस्पताल से लौटे तब भी कुछ देर बालकनी में आराम कुर्सी पर बिराजने का क्रम नहीं टूटा। 'कुछ बात तो है पापा इस कुर्सी में' एक बार कुछ देर आरामकुर्सी पर बैठने के बाद जब मैंने पापा से कहा तो मानो उनकी किसी धारणा पर पक्की मुहर लग गई हो। बड़े चाव से बताने लगे-'ये इस कुर्सी की सकारात्मक तरंगे हैं जो महसूस होती हैं उषा। यह कोई आम कुर्सी नहीं है महान विचारक विवेकानंद जब हमारे शहर में बरसों पहले आए और आकर रुके थे तब कौन जाने इस ही कुर्सी पर बैठकर उन्होंने चिंतन मनन किया हो। यह कुर्सी उसी मकान से जहां वह आकर ठहरे थे नीलामी के समान में निकली थी और जीर्ण-शीर्ण होने के कारण कबाड़ में जा रही थी। बस यही सोचकर इस पुरानी कुर्सी को मैं घर ले आया कि 'लिगेसी' कबाड़ में नहीं जानी चाहिए। कौन जाने अपने प्रवास के दौरान विवेकानंद ने कुछ देर इसी आरामकुर्सी पर बैठकर चिंतन मनन किया हो।' घर पर आने वाला हर व्यक्ति उस आराम कुर्सी के महात्म को जानता था और कुछ देर उस पर बैठकर उसका आनंद भी ले चुका था।इसी आराम कुर्सी पर बैठकर उन्होंने हमें अपने बचपन के लंबे-लंबे किस्से सुनाए। यहीं पर हमारी नाउम्मीदियों पर हमारा मनोबल बढ़ाया। उनके लिए भी आत्म चिंतन, मनन और मंथन का स्रोत रही यह आरामकुर्सी।

'उषा तुम ऐसे सुन्न पड़ जाओगी तो कैसे चलेगा। मां को कौन संभालेगा?'

नवीन झकझोर कर मुझे उठा रहा था। मेरे अंदर एक शून्य पसर गया था... एकदम शून्य। मेरे कान सुन रहे थे, शरीर चल फिर रहा था मगर चेतना के भीतर कुछ था जो चटक गया था। मैं जैसे तैसे उठ खड़ी हुई। मां को संभाला। सारी रस्में हुई। पापा को अंतिम विदाई दी गई। बालकनी की ओट से पापा की आराम कुर्सी भी किंकर्तव्यविमूढ खड़ी उनको अपनी अंतिम विदाई दे रही थी। पापा के जाने के बाद जब तक मम्मी रही आराम कुर्सी को वहां से हटने नहीं दिया। बाद के दिनों में तो पापा की तरह माँ भी उस पर एकनिष्ठ घंटों बैठे रहती।

मम्मी-पापा के जाने के सालभर बाद घर आना हुआ तब मुझे पापा की आराम कुर्सी कहीं दिखाई नहीं दी। वीरेन से पूछा तो उसने बताया सालों से बालकनी में पड़ी-पड़ी बदरंग हो गई थी। बुनाई भी ढीली पड़ गई है। खेलते हुए वीनू एक दो बार गिर गया था इसलिए मीता ने कुर्सी स्टोर रूम में रखवा दी। मीता तो कबाड़ में देना चाहती थी मगर मम्मी पापा की आखिरी निशानी है मैंने रोक दिया। 'स्मृतियों को स्टोर रूम में नहीं रखा जाता वीरेन। स्मृतियों को संजोया जाता है जिस तरह पापा ने संजोया था बरसो पुरानी इस स्मृति को।'  हफ्ता भर रही उस बार। पापा की आराम कुर्सी को स्टोर रूम से निकलवाया। उसकी बुनाई कवाई। हम दोनो बहन-भाई ने मिलकर उसमें पापा की पसंद का कत्थई रंग किया। इतने लंबे अंतराल के बाद भी कुर्सी की लकड़ी खराब नहीं हुई थी। कारीगर ने बताया किसी शाही घराने की लगती है। महंगी लकड़ी है अब तो मिलने से रही। 'लकड़ी के साथ-साथ इस कुर्सी का इतिहास भी तो इतना समृद्ध है' मैंने मुस्कुराते हुए कहा। बहुत सोचने के बाद मैंने वीरेंद्र से बात की और हम दोनों आराम कुर्सी को शहर के राजकीय संग्रहालय के सुपुर्द कर आए। वहां से निकलते हुए एक संतुष्टि भीतर थी। पापा की स्मृतियों को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया है। पापा जहां भी होंगे प्रसन्न होंगे। आराम कुर्सी भी जैसे आज सालों बाद मुस्कुरा रही थी। मानो एक उपेक्षित बच्चे को चिंता से भरी हुई दो आंखें फिर मिल गई हों'।



-मीना पाण्डेय 

Srujanse.patrika@gmail.com