आरामकुर्सी
पौ फटने के साथ ही मैं और नवीन घर पहुंच गए। घर का मुख्य द्वार खुला हुआ था। बाहर सड़क पर रिश्तेदारों पड़ोसियों की भीड़ जमा थी। मेरे कदम वहीं पर जम गए। नवीन ने कंधे पर हाथ रखा तब पैरों पर हजार मन का बोझ ढ़ोऐ हुए मैं आगे बड़ी। आंगन पर पापा को लेटाया गया था। उनके चारों ओर कुछ देखे-अनदेखे चेहरों का रेला था। ठीक सामने मम्मी अस्त- व्यस्त बैठी सुबक रही थी। मुझे देखा तो उनकी सिसकियां रुलाई में बदल गई। मैं लपक कर माँ के गले लग गई।
'मैं अकेली पड़ गई ऊषा। धोखा दे गए तुम्हारे पापा।'
मां की रुलाई मेरे भीतर के ठहरे पड़े लावे को तरल कर गई। प्रकृति के नियम को जानते-बुझते हुए भी मृत्यु की तटस्थता इंसान को असहाय कर जाती है। एक लंबी चीख और एक दूसरे से लिपटकर हम देर तक रोते रहे। मैंने पापा की तरफ देखा वह हमेशा की तरह ध्यानस्थ लेटे थे। उनके चेहरे पर अब तक जीवन की आभा थी। मानो अभी जागकर कहेंगे आज बड़ी देर तक सोता रहा। रुलाई फिर-फिर गले तक आकर ठहर जाती है। आंगन के दूसरे छोर पर वीरेन के बाल उतारे जा रहे थे। नाते-रिश्तेदार फुर्ती से पापा के अंतिम क्रिया की तैयारी में जुटे थे। यही तो जीवन है बस इतना सा जागने व सोने का अंतराल भर। पापा हमेशा जीवन का दर्शन खोजते रहे। जीवन-मृत्यु, कर्म- अकर्म, भक्ति-ज्ञान, पाप-पुण्य। आंगन के उस तरफ बालकनी के बाएं किनारे पर गमले में गुलदावरी, सोनजूही व डहलिया के फूलों की कतार के मध्य पापा की आराम कुर्सी आज उदास पड़ी थी। टूटे-फूटे कदम अनायास उस तरफ बढ़ गए। हाथ के पोर-पोर से छूकर मैंने उसमें पापा के होने को महसूस किया और आंखें मूंद में पापा की आरामकुर्सी में निढ़ाल हो गई। समय के इस टुकड़े के साथ आंख बंद कर मैं वर्तमान से अलग हो जाना चाहती थी।
आरामकुर्सी पर पड़े-पड़े ऊँघना पापा को सदा से ही पसंद था यह तो मैं नहीं कह सकती मगर दोपहर में कुछ देर अखबार पढ़ने, किसी किताब को बांचने और मोबाइल को स्क्रोल कर लेने के बाद आराम कुर्सी पर बैठे-बैठे सोना इधर पापा का नया शगल बन गया था। मैंने दोपहर के समय पापा को बिस्तर पर लेटे कभी नहीं देखा। हारी-बीमारी में भी नहीं, बहुत थक जाते तब भी नहीं। किसी गंभीर बीमारी की वजह से जब उन्हें महीनों अस्पताल में रहना पड़ा तब भी दोपहर के वक्त यथा संभव वह उठकर बैठ जाते थे। पापा के शांत, एक रस से जीवन में से मम्मी जलतरंग सी गुजरती रहती। कभी आंगन में बिस्तर डालती, कभी अचार-दालों को धूप दिखाती और कभी पौधों को सहलाती। हर बात पर मम्मी की एक प्रतिक्रिया थी। उठने-बैठने सोने जागने खाने-पीने के लिए मम्मी के कुछ नियम थे। उनकी अनदेखी उनको बेचैन कर देती। मगर इस हलचल के दूसरे छोर पर बैठे पापा शांत और स्थिर रहते। कभी-कभार जब पापा खुद पर अखबार ठाले आरामकुर्सी पर ऊंघ रहे होते तब मम्मी आंगन के ठीक सामने मुख्य द्वार से लगी रसोईघर की खिड़की से किसी काम के लिए आवाज देती। पापा हड़बड़ा कर खड़े हो जाते। उनके चेहरे की खिसयाहट किसी अबोध बच्चे से प्रतीत होती मानो कोई शरारत करते पकड़े गए हों। यह आरामकुर्सी पापा की सेवानिवृत्ति के साल भर पहले हमारे घर पर आई थी। नौकरी के चलते मिले सरकारी क्वार्टर से जब नए मकान में आना तय हुआ तब लकड़ी के पुराने फर्नीचर पर फॉम लगवा कर उस पर वेलवेट की कवर चढ़ाई गई। लकड़ी का फर्नीचर मम्मी के मायके से विवाह के समय आया था। विवाह के 30- 32 साल बाद भी जस की तस। मम्मी उसे पुराने घर पर छोड़ना नहीं चाहती थी और हमारा कहना था कि नए घर में नया फर्नीचर होना चाहिए। तब बीच का रास्ता निकाला गया। पुराने फर्नीचर को नए सोफे की शक्ल दी गई। इस फर्नीचर के मध्य चौड़े हत्थे व बुनाई वाली पुराने जमाने की एक आराम कुर्सी भी थी। इस कुर्सी को पापा किसी नीलामी से उठाकर ले आए थे। कुर्सी को लेकर जब उनके ऑफिस का चपरासी घर आया था तब मम्मी ने कुर्सी भीतर तो रखवा ली मगर उनके जाते ही वह फूट पड़ी। 'सारी दुनिया का कूड़ा इकट्ठा करके घर ले आते हैं। बाकी लोग नीलामी से काम की चीज उठाकर ले गए और तुम्हें यह टूटी फूटी कुर्सी मिली।' पापा चुपचाप आराम कुर्सी उठाकर बालकनी की दु-छत्ती में डाल आए। लगभग पूरे साल कुर्सी दुछत्ती में उसी हाल में पड़ी रही। मम्मी की जब नजर पड़ती कुर्सी और पापा की अकल को कोसना नहीं भूलती। मगर जब नए घर का फर्नीचर रिपेयर हो रहा था तब एक दिन पापा ने दुछत्ती में से कुर्सी भी उतरवा ली। कुर्सी पर नई और चुस्त बुनाई कराई गई। पूरी कुर्सी पर कत्थई रंग-रोगन पापा ने अपने हाथों से की। सोफे की गद्दियों में से बचे फॉम और कपड़े से आराम कुर्सी पर भी कवर चढ़ाई गई। इस प्रकार नए रूप रंग में इठलाती आरामकुर्सी को ससम्मान नए घर की बालकनी में सुसज्जित किया गया। हम सब देखकर हैरान थे कि पापा ने साल भर पहले से सेवानिवृत्ति के बाद की योजना पुख्ता कर रखी थी। वह जब भी उसमें बैठते उनके चेहरे पर आत्मविश्वास की एई अलग सी चमक दिखाई देती। कुर्सी के सदुपयोग व पापा की कारीगरी पर मम्मी भी मुग्ध थी। आराम कुर्सी बालकनी के एक सुरक्षित और यथासंभव दर्शनीय स्थान पर रखी गई। कुर्सी के पीछे घर की बाउंड्री वॉल थी जिस पर कुर्सी पर बैठने वाला मोबाइल, किताब व चाय का कप इत्यादि रख सकता था। दाहिनी तरफ गमलों पर तरह-तरह के फूल शोभायमान थे। ठीक सामने रसोई घर की खिड़की थी जहां से पापा को वक्त-बेवक्त आवाज देकर बुलाया जा सकता था। कुर्सी के बाएं तरफ बालकनी का विस्तार था जहां से दोपहर बाद धूप धीरे-धीरे सरकाना शुरू करती है। पापा की आराम कुर्सी भी धूप के साथ-साथ सरकती जाती। गर्मियों में इस जगह पर दोपहर बाद ही बैठा जा सकता था। उमस भरी गर्मी के बाद बाउंड्री वॉल के उस पार आम के पेड़ की पड़ती हल्की-हल्की छांव बैठने वाले को सुकून से भर देती थी। कभी-कभार जब पापा से पहले मम्मी आराम कुर्सी में नम्बुदार हो जाती तब पापा कहते कुछ नहीं थे मगर यहां वहां बैठे-बिठाते, चक्कर लगाते मम्मी उनकी उक्ताहट भांप जाती और उठ खड़ी होती। 'लो बिराजो अपनी मूई कुर्सी में।' पापा बड़ी मासूमियत से खिलखिलाते हुए सुकून से बैठ जाते।
कुछ साल पहले जब उनकी गंभीर बीमारी को लेकर डॉक्टर के संशय ने हमें तोड़कर रख दिया था तब इसी आराम कुर्सी में शांत चित्त बैठे पापा सब कुछ जानते हुए भी अनभिज्ञ बने रहते। उन दिनों मम्मी उनकी कुर्सी के पास मोड़ा डालकर घण्टों बैठी रहती और उनकी हस्तरेखाएं पड़ने लगती। मानो रेखाएं पढ़ने के बहाने उनकी सारी पीड़ाएं स्वयं में ले लेना चाहती हो। 'जीवन रेखा तो लंबी है तुम्हारी।' पापा किसी बच्चे सी ही फुर्ती से बोल पड़ते 'तभी तो कहता हूं मुझे कुछ नहीं होने वाला। तुम लोगों ने मुझे बीमार घोषित कर दिया है।' जब बीमारी ने बदन पूरी तरह तोड़ दिया था तब भी कुछ देर अनंत में निहारते आराम कुर्सी में जाकर निढ़ाल हो जाते। दो महीने बाद जब अस्पताल से लौटे तब भी कुछ देर बालकनी में आराम कुर्सी पर बिराजने का क्रम नहीं टूटा। 'कुछ बात तो है पापा इस कुर्सी में' एक बार कुछ देर आरामकुर्सी पर बैठने के बाद जब मैंने पापा से कहा तो मानो उनकी किसी धारणा पर पक्की मुहर लग गई हो। बड़े चाव से बताने लगे-'ये इस कुर्सी की सकारात्मक तरंगे हैं जो महसूस होती हैं उषा। यह कोई आम कुर्सी नहीं है महान विचारक विवेकानंद जब हमारे शहर में बरसों पहले आए और आकर रुके थे तब कौन जाने इस ही कुर्सी पर बैठकर उन्होंने चिंतन मनन किया हो। यह कुर्सी उसी मकान से जहां वह आकर ठहरे थे नीलामी के समान में निकली थी और जीर्ण-शीर्ण होने के कारण कबाड़ में जा रही थी। बस यही सोचकर इस पुरानी कुर्सी को मैं घर ले आया कि 'लिगेसी' कबाड़ में नहीं जानी चाहिए। कौन जाने अपने प्रवास के दौरान विवेकानंद ने कुछ देर इसी आरामकुर्सी पर बैठकर चिंतन मनन किया हो।' घर पर आने वाला हर व्यक्ति उस आराम कुर्सी के महात्म को जानता था और कुछ देर उस पर बैठकर उसका आनंद भी ले चुका था।इसी आराम कुर्सी पर बैठकर उन्होंने हमें अपने बचपन के लंबे-लंबे किस्से सुनाए। यहीं पर हमारी नाउम्मीदियों पर हमारा मनोबल बढ़ाया। उनके लिए भी आत्म चिंतन, मनन और मंथन का स्रोत रही यह आरामकुर्सी।
'उषा तुम ऐसे सुन्न पड़ जाओगी तो कैसे चलेगा। मां को कौन संभालेगा?'
नवीन झकझोर कर मुझे उठा रहा था। मेरे अंदर एक शून्य पसर गया था... एकदम शून्य। मेरे कान सुन रहे थे, शरीर चल फिर रहा था मगर चेतना के भीतर कुछ था जो चटक गया था। मैं जैसे तैसे उठ खड़ी हुई। मां को संभाला। सारी रस्में हुई। पापा को अंतिम विदाई दी गई। बालकनी की ओट से पापा की आराम कुर्सी भी किंकर्तव्यविमूढ खड़ी उनको अपनी अंतिम विदाई दे रही थी। पापा के जाने के बाद जब तक मम्मी रही आराम कुर्सी को वहां से हटने नहीं दिया। बाद के दिनों में तो पापा की तरह माँ भी उस पर एकनिष्ठ घंटों बैठे रहती।
मम्मी-पापा के जाने के सालभर बाद घर आना हुआ तब मुझे पापा की आराम कुर्सी कहीं दिखाई नहीं दी। वीरेन से पूछा तो उसने बताया सालों से बालकनी में पड़ी-पड़ी बदरंग हो गई थी। बुनाई भी ढीली पड़ गई है। खेलते हुए वीनू एक दो बार गिर गया था इसलिए मीता ने कुर्सी स्टोर रूम में रखवा दी। मीता तो कबाड़ में देना चाहती थी मगर मम्मी पापा की आखिरी निशानी है मैंने रोक दिया। 'स्मृतियों को स्टोर रूम में नहीं रखा जाता वीरेन। स्मृतियों को संजोया जाता है जिस तरह पापा ने संजोया था बरसो पुरानी इस स्मृति को।' हफ्ता भर रही उस बार। पापा की आराम कुर्सी को स्टोर रूम से निकलवाया। उसकी बुनाई कवाई। हम दोनो बहन-भाई ने मिलकर उसमें पापा की पसंद का कत्थई रंग किया। इतने लंबे अंतराल के बाद भी कुर्सी की लकड़ी खराब नहीं हुई थी। कारीगर ने बताया किसी शाही घराने की लगती है। महंगी लकड़ी है अब तो मिलने से रही। 'लकड़ी के साथ-साथ इस कुर्सी का इतिहास भी तो इतना समृद्ध है' मैंने मुस्कुराते हुए कहा। बहुत सोचने के बाद मैंने वीरेंद्र से बात की और हम दोनों आराम कुर्सी को शहर के राजकीय संग्रहालय के सुपुर्द कर आए। वहां से निकलते हुए एक संतुष्टि भीतर थी। पापा की स्मृतियों को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया है। पापा जहां भी होंगे प्रसन्न होंगे। आराम कुर्सी भी जैसे आज सालों बाद मुस्कुरा रही थी। मानो एक उपेक्षित बच्चे को चिंता से भरी हुई दो आंखें फिर मिल गई हों'।
-मीना पाण्डेय
Srujanse.patrika@gmail.com
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