Tuesday, August 20, 2024

फुॅलस्टाप (कहानी)

 फुॅलस्टाप 



जब से वह अपनी पार्टी के प्रदेश किसान मोर्चा का अध्यक्ष हुआ है उसने मोहल्ले में एक छोटी दुकान भी किराए पर उठा ली है। राजनीति की राजनीति बिजनेस का बिजनेस। खाने कमाने के लिए तो प्रॉपर्टी डीलिंग का काम करना ही था। अब तक जो काम भैय्या जी के किराना स्टोर के आगे कुर्सियां डालकर होता था अब अपनी खुद की दुकान पर होगा। अभी तक जो करते आए सो किया मगर अब राजनीतिक छवि का प्रश्न था। बिजनेस पार्टनर रघुवीर ने खबर सुनी मुंह में पान की पिक संभालते हुए बोल पड़ा 'तुम्हें किसानी का अ ब पता है बे। तुमको काहे अध्यक्ष बना दिए?' 

गणेश ने त्यौड़िया चढ़ाते हुए जवाब दिया- 'इसके लिए कौन डिग्री लेनी पड़ती है। सीख लेंगे और फिर किसान मोर्चा का अध्यक्ष राजनीतिक पद है। किसानो की बात रखनी है और क्या।'

' पर मेरे भाई बात रखने के लिए देश में किसानी की असल स्थिति पता होनी चाहिए कि नहीं।' देर तक मुंह में गुडगुडाए पान मसाले का बाउंड्री वॉल के पार नाली पर निशाना लगाते हुए रघुवीर बोला।

 'अरे सब हो जाएगा भाई। आप लोग साथ बनाए रखिए बस।' गणेश ने अपने नथुनों के नीचे उग आई मूंछों को उंगलियों से उघाड़ते हुए रघुवीर की तरफ एक झूठी मुस्कान उछाल दी। दरअसल पार्टी की सालों भर की सेवा के बाद इस बार गणेश को पार्टी ने क्षेत्र में कोई ढंग का पद दिया है।

 मंडल महामंत्री, मंडल अध्यक्ष जैसे कुकुरमुत्ते की तरह हर वार्ड में उग आने वाली छोटी-मोटी जिम्मेदारियां तो उसे यदा कदा  मिल ही जाती रही थी मगर मंडल के किसी छोटे-मोटे पद और किसान मोर्चा का जिला अध्यक्ष होने में बहुत फर्क है। अब मंडलों की रैलियां सभाओं में उसकी बात का भी वजन होगा। अन्य मंडल प्रतिनिधियों की तरह केवल मंच पर की सेल्फियां लेकर नहीं निकल जाना होगा। गणेश का मन कल्पना मात्र से ही फूला नहीं समा रहा था बाहर से स्थिर देखने का प्रयास अक्सर उसे उसके नथुनों अनायासी फूल जाते हैं उनको धुपने के लिए ही बात-बात पर उंगलियों से मूंछों को नीचे की तरफ उगने का उपकरण वह करता उपक्रम वह करता रहता है गणेश के जीवन के यह दो सरे ही अवशेष बचे थे राजनीति और क्षेत्र के लोगों के साथ उसकी बाल मनसाहत व्यवहार कुशलता मां के बाद कुछ छोटे-छोटे नौकरियों कर लेने और उनसे उत्तर जाने के बाद गणेश ने मोहल्ले के एक बुजुर्ग भैया जी के नाम से मशहूर क्षेत्रीय नेता के चरण पकड़ लिए थे क्षेत्र की समाज विशेष की समितियां में सदस्य से शुरू हुआ उसका सफल धीरे-धीरे महासचिव सचिव तक पहुंचने लगा माध्यम का सुधीर के नए नक्श छल्लेदार बातों का धनी गणेश जल्दी ही समझ में अपनी पकड़ बन गया राज बेरा थारी बीमारी कच्चे पक्के कागज बनाने दुख सुख बांटने में गणेश हमेशा खड़ा रहता इसी वजह से इतनी जल्दी क्षेत्र में अपनी पेंट भी बन गया मगर पार्टी में कोई पद मिलना इतना आसान नहीं था 15 20 साल में पार्टी और समाज के पीछे उसका धंधा पानी भी प्रॉपर्टी डीलिंग पर निर्भर होकर रह गया था मगर इस बार किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष पद के लिए उसके नाम का प्रस्ताव पर मोहर लगी तब राजनीति में एक कदम आगे जाने की आप पुनः जागृत हुई आखिर पार्षद की दौड़ में पहुंचना इतना आसान नहीं था पिछला पार्षद बूढ़ा गया तब लगा अब तो उसके नाम का प्रस्ताव आएगा मगर साल भर पहले दीपावली छठ की शुभकामनाओं के बहाने होर्डिंग में पार्षद ने बेटे की तस्वीर चसपा कर दी। जाहिर था बलवीर राठी जाएगा तो उसका बेटा खड़ा है। राष्ट्रीय पार्टी है। होडिंग लगा देने से टिकट मिले यह तय थोड़ी है। आखिर संगठन और कार्यकर्ता की बात का भी कुछ वजन है कि नहीं। मगर उस साल वह सीट महिला आरक्षित घोषित हो गई और बलवीर राठी रातों-रात रात बेटे का ब्याह कर बहू ले आया। बहू क्या लाया पार्षदी का उम्मीदवार ले आया। गणेश तब भी मन मसोजकर रह गया। करता भी क्या नाराजगी जताकर। उसके हाथ में था भी क्या? पार्टी बड़ी है छोटी आवाजें है गुम हो जाती है। मगर किसान मोर्चा का जिला अध्यक्ष बनने के बाद अब राह कुछ आसान होती दिखाई दे रही थी। मगर जिले का महत्वपूर्ण पद मिल जाने के बाद भी अब भी उसकी दिनचर्या में कोई विशेष फर्क नहीं आया था। पहले की तरह आधा दिन ऑफिस में निकल जाता। आधा मिटिंग व सभाओं में। शाम को कुछ यार दोस्त ऑफिस में मिलने आ जाते और बोलते बतियाते देर रात अपने-अपने घरों को चलते बनते। उनके जाते ही गणेश व रघुवीर भी ऑफिस बढ़ाकर घर की तरफ चल निकलते। ऑफिस से उसका घर पास था। मगर अक्सर वह मोटरसाइकिलसे ही आता-जाता। आज भी रघुवीर के जाते ही ऑफिस बंद कर वह घर की तरफ निकल आया। घर की तरफ निकलते हुए उसके पर बेजान हो जाते हैं और दिमाग शून्य। इसीलिए रात बे रात  दोस्त यारों के साथ बैठने-बिठाने के बहाने वह खोज ही लेता था। मगर आज ऐसा कोई संजोग ना बन पाया। बेमन से उसने पैंट की बाई पॉकेट से चाबी निकाली और दाहिने पैर को हवा में कुछ उछालते हुए मोटरसाइकिल में सवार हो घर की तरफ निकल गया। घर का दरवाजा खोलते ही सांय सांय की ध्वनि ने उसका स्वागत किया। साल भर हुए उसकी मां ने भी इस उम्र में उसकी सेवा सुश्रुसा से पल्ला झाड़ बड़े बेटे के वहां स्थाई ठिकाना बना लिया था

 गणेश भीतर से दरवाजा लगाकर सोफे पर निढ़ल हो गया। हर रोज घर लौटकर कुछ देर वह सोफे पर बमतलब बैठ जाता है। तब कुछ देर बाद हाथ जूते की तरफ बढ़ता और व गुसलखाने का रुख करता।मिथिलांचल समाज व एक राष्ट्रीय पार्टी में किसान मोर्चा का जिला अध्यक्ष, दिन भर लोगों, समाज, दुनियादारी, यार दोस्तों से घिरा रहने वाला गणेश घर की चारदिवारी के बीच एकदम अकेला था। पिछले तीन सालों में कितना कुछ गुजर चुका था। समाज और राजनीति के प्रति गणेश के समर्पण ने उसके व्यक्तिगत जीवन में उसे बहुत पीछे छोड़ दिया था।

 शुरू में सब ठीक ही था। सोमा से प्रेम विवाह, घर गृहस्थी और एक प्यारी सी बिटिया। जैसा जो भी था जीवन में रस था। घर लौटने की वजह थी। फिर चाह ना चाह के नौकरी छूट गई। प्रॉपर्टी का काम पकड़ा। तब भी उलझने थी शिकवे- शिकायत थे मगर जीवन तब भी पटरी पर था। एक छत के नीचे घरौंदे को जिस तरह होना चाहिए वैसा था। दीवार पर लगी तस्वीर जितनी मुस्कुराहट बची हुई थी जीवन में। गणेश ने एक लंबी सांस ली। अमूमन वह रात में दोस्तों के साथ बैठकर घर इसीलिए देर से लौटता है ताकि मोबाइल स्क्रोल करते हुए उसे तुरंत नींद आ जाए। मगर आज ध्यान बटाने का कोई उपक्रम काम न आया। मोबाइल के होम स्क्रीन में सोमा और जूही की मुस्कुराती तस्वीर चमक उठी। 'गणेश तुम एक हारे हुए इंसान हो।' गणेश का मन उसी तीन साल पुरानी घृणा और तिरस्कार से तिलमिला उठा। उसे लगा सोमा उसकी नाकामियों पर फिर उसे ताने दे रही है। सोमा का वह तिरस्कार गणेश से ना तब सहन होता था ना अब। गणेश उघाडे मारकर रोना चाहता था मगर इन तीन सालों में आंखों का पानी भी सूख चुका था। उसे याद आया उन दिनों वह पार्टी से नया-नया जुड़ा था। गणेश जानता था समाज और राजनीति के इस पायदान पर खाने-कमाने का काम नहीं है।लोग सालों से सेवा दे रहे हैं तब भी सामान्य कार्यकर्ता के तौर पर पूछ नहीं। भैया जी ने भी साफ कह दिया था। 'पांच-दस साल तो पार्टी को देने ही होंगे। राजनीति में बने रहने की भी एक राजनीति होती है। अपने व्यक्तिगत आग्रहों को कुछ पीछे कर पार्टी की सेवा में देने पड़ेंगे तब जाकर कोई बात बनेगी।' भैया जी की बात में एक आकर्षण था। अपनी इसी वाकपटुता व व्यवहारिकता के बल पर उन्होंने अपने कई चेले बना लिए थे। गणेश पर भैया जी की बातों का ऐसा सम्मोहन पार्टी हुआ कि समाज और राजनीति के सिवाय उसे फिर कहीं रस नहीं मिला।  उसने मन बना लिया था। मां-बाप का पुश्तैनी घर रहने के लिए है ही। जूही की पढ़ाई और घर का खर्च महीने दो महीने में किसी प्रॉपर्टी के सौदे से चल ही जाएगा। गणेश ने रैलियां, सभाओं, मीटिंग के पीछे दिन रात एक कर दिया। देर-सवेरे घर लौटना दिन भर गायब रहना आम हो गया। कई बार सोमा ने दबी जुबान में उलाहने दिए।  धीरे-धीरे उलाहने ताने बने और ताने तीर और फिर बात अलग होने तक आ गई। 'तुम्हें यही सब ही करना था तब घर ही क्यों बसाया गणेश।'

 'मुझे थोड़ा समय दे दो सोमा। मैं सब ठीक कर दूंगा और फिर तुम लोगों के लिए कहां कमी की है मैंने।'

' बात सिर्फ पैसों तक होती तब भी ठीक था मगर गणेश तुम्हें परिवार चाहिए ही नहीं। तुम्हें पत्नी, बच्चे की उम्मीद और सपनों से कुछ लेना-देना नहीं है।' सोमा जूही को लेकर उस दिन गई तो फिर पलट कर नहीं देखा। हां महीने दो महीने में जूही आ जाती थी पापा से मिलने।

इसी उधेड़बुन में जाने कब गणेश की आंख लगी। दूसरा दिन सुबह से मीटिंग में बीता। शाम के समय ऑफिस पहुंचा तो बिजनेस पार्टनर रघुवीर वहां पहले से ही बैठा हुआ था। 'खूब आए गुरु। भाई नेता बन गए हो तो क्या काम-धन्धा छोड़ दोगे?' 'अरे नहीं यार सुबह से ही फंसा हुआ था। फ्री हुआ तो सीधा ऑफिस ही आया हूं।' गणेश ने एक बार फिर अपनी मूंछों को उंगलियों से उघाड़ते हुए कहा।

 'तो गुरु अब क्या सोचा है? किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष भी बन गए हो। धन्धा भी ठीक-ठाक चल रहा है। जीवन यूं ही अकेले बर्बाद कर दोगे? भाभी से बात करो यार बिटिया बड़ी हो रही है। कब तक चलेगा यह सब?' गणेश एकटक रघुवीर को देखता रहा फिर अचानक कुछ सोचता हुआ बोला 'नहीं यार जो है जैसा है ठीक है। अब मैं ही नहीं चाहता कुछ ठीक हो।'

 रघुवीर को कुछ नहीं सूझा तो पान मसाले की पुड़िया निकाली और मुंह में खाली करता गया। गणेश की बात उसके हलक से नीचे नहीं उतर रही थी। बात-बात में अकेलेपन, घर-परिवार व बेटी का जिक्र ले आने वाला गणेश एकाएक इतना तथस्त कैसे हो गया। सम्भवतः एक लम्बी खींचतान और शब्द बाणों से छलनी मन मरहम नहीं ढूंढना चाहता। वह हर उस चीज से दूर हो जाना चाहता है जो उसे छोटा और बेमतलब होने का एहसास दिलाती है। 'अकेलापन सदैव अकेला नहीं होता। अतीत के घावों की टीस होती है उसमें। छोड़े हुए नस्तरों की गूंज होती है उसमें। दर्द से हर दिन गुजरने वाला आदमी उससे जूझना सीख लेता है। अकेलापन जीवन की कई दुश्वारियां से बेहतर है।' गणेश जैसे अपने आप में आश्वस्त होना चाहता था। मानो भीतर ही भीतर स्वयं को अपने निर्णय के लिए तैयार कर रहा हो। 'जूही के बारे में तो सोच यार।उसका क्या कसूर है?' रघुवीर जैसे उसे पूरी तरह टटोलना चाहता था।'कसूर तो यार किसी का भी नहीं। मां-बाप को हरपल लड़ने-झगड़ने देखे इससे बेहतर है जहां रहे खुश रहे।' गणेश अब ऊपर-ऊपर से गुजर जाना चाहता है। गहरे उतरने में डूब जाने का डर था। एकबार फिर अपनी मूंछों को उंगलियों से उघारते हुए वह उठ खड़ा हुआ। मेज की दराज से उसने बाइक की चाबी निकाली और रघुवीर से हाथ मिलाकर घर की तरफ निकल आया। मोटरसाइकिल स्टार्ट होते ही ठंडी हवा का एक झौंका उसके चेहरे को छूकर निकल गया। गणेश बेहद तरोताजा महसूस करने लगा। मन जैसे किसी हलचल से मुक्त हो गया हो। आज घर का किवाड़ खोलते हुए उसने सोचा जीवन में कुछ अनुत्रित प्रश्नों पर कठोर निर्णयों का फुॅलस्टाप लगाना कितना जरूरी है।



-मीना पाण्डेय 

Srujanse.patrika@gmail.com

Tuesday, August 6, 2024

आरामकुर्सी

 आरामकुर्सी


पौ फटने के साथ ही मैं और नवीन घर पहुंच गए। घर का मुख्य द्वार खुला हुआ था। बाहर सड़क पर रिश्तेदारों पड़ोसियों की भीड़ जमा थी। मेरे कदम वहीं पर जम गए। नवीन ने कंधे पर हाथ रखा तब पैरों पर हजार मन का बोझ ढ़ोऐ हुए मैं आगे बड़ी। आंगन पर पापा को लेटाया गया था। उनके चारों ओर कुछ देखे-अनदेखे  चेहरों का रेला था। ठीक सामने मम्मी अस्त- व्यस्त बैठी सुबक रही थी। मुझे देखा तो उनकी सिसकियां रुलाई में बदल गई। मैं लपक कर माँ के गले लग गई।

 'मैं अकेली पड़ गई ऊषा। धोखा दे गए तुम्हारे पापा।' 

मां की रुलाई मेरे भीतर के ठहरे पड़े लावे को तरल कर गई। प्रकृति के  नियम को जानते-बुझते हुए भी मृत्यु की तटस्थता इंसान को असहाय कर जाती है। एक लंबी चीख और एक दूसरे से लिपटकर हम देर तक रोते रहे। मैंने पापा की तरफ देखा वह हमेशा की तरह ध्यानस्थ लेटे थे। उनके चेहरे पर अब तक जीवन की आभा थी। मानो अभी जागकर कहेंगे आज बड़ी देर तक सोता रहा। रुलाई फिर-फिर गले तक आकर ठहर जाती है। आंगन के दूसरे छोर पर वीरेन के बाल उतारे जा रहे थे। नाते-रिश्तेदार फुर्ती से पापा के अंतिम क्रिया की तैयारी में जुटे थे। यही तो जीवन है बस इतना सा जागने व सोने का अंतराल भर। पापा हमेशा जीवन का दर्शन खोजते रहे। जीवन-मृत्यु, कर्म- अकर्म, भक्ति-ज्ञान, पाप-पुण्य। आंगन के उस तरफ बालकनी के बाएं किनारे पर गमले में गुलदावरी, सोनजूही व डहलिया के फूलों की कतार के मध्य पापा की आराम कुर्सी आज उदास पड़ी थी। टूटे-फूटे कदम अनायास उस तरफ बढ़ गए। हाथ के पोर-पोर से छूकर मैंने उसमें पापा के होने को महसूस किया और आंखें मूंद में पापा की आरामकुर्सी में निढ़ाल हो गई। समय के इस टुकड़े के साथ आंख बंद कर मैं वर्तमान से अलग हो जाना चाहती थी।

आरामकुर्सी पर पड़े-पड़े ऊँघना पापा को सदा से ही पसंद था यह तो मैं नहीं कह सकती मगर दोपहर में कुछ देर अखबार पढ़ने, किसी किताब को बांचने और मोबाइल को स्क्रोल कर लेने के बाद आराम कुर्सी पर बैठे-बैठे सोना इधर पापा का नया शगल बन गया था। मैंने दोपहर के समय पापा को बिस्तर पर लेटे कभी नहीं देखा। हारी-बीमारी में भी नहीं, बहुत थक जाते तब भी नहीं। किसी गंभीर बीमारी की वजह से जब उन्हें महीनों अस्पताल में रहना पड़ा तब भी दोपहर के वक्त यथा संभव वह उठकर बैठ जाते थे। पापा के शांत, एक रस से जीवन में से मम्मी जलतरंग सी गुजरती रहती। कभी आंगन में बिस्तर डालती, कभी अचार-दालों को धूप दिखाती और कभी पौधों को सहलाती। हर बात पर मम्मी की एक प्रतिक्रिया थी। उठने-बैठने सोने जागने खाने-पीने के लिए मम्मी के कुछ नियम थे। उनकी अनदेखी उनको बेचैन कर देती। मगर इस हलचल के दूसरे छोर पर बैठे पापा शांत और स्थिर रहते। कभी-कभार जब पापा खुद पर अखबार ठाले आरामकुर्सी पर ऊंघ रहे होते तब मम्मी आंगन के ठीक सामने मुख्य द्वार से लगी रसोईघर की खिड़की से किसी काम के लिए आवाज देती। पापा हड़बड़ा कर खड़े हो जाते। उनके चेहरे की खिसयाहट किसी अबोध बच्चे से प्रतीत होती मानो कोई शरारत करते पकड़े गए हों। यह आरामकुर्सी पापा की सेवानिवृत्ति के साल भर पहले हमारे घर पर आई थी। नौकरी के चलते मिले सरकारी क्वार्टर से जब नए मकान में आना तय हुआ तब लकड़ी के पुराने फर्नीचर पर फॉम लगवा कर उस पर वेलवेट की कवर चढ़ाई गई। लकड़ी का फर्नीचर मम्मी के मायके से विवाह के समय आया था। विवाह के 30- 32 साल बाद भी जस की तस। मम्मी उसे पुराने घर पर छोड़ना नहीं चाहती थी और हमारा कहना था कि नए घर में नया फर्नीचर होना चाहिए। तब बीच का रास्ता निकाला गया। पुराने फर्नीचर को नए सोफे की शक्ल दी गई। इस फर्नीचर के मध्य चौड़े हत्थे व  बुनाई वाली पुराने जमाने की एक आराम कुर्सी भी थी। इस कुर्सी को पापा किसी नीलामी से उठाकर ले आए थे। कुर्सी को लेकर जब उनके ऑफिस का चपरासी घर आया था तब मम्मी ने कुर्सी भीतर तो रखवा ली मगर उनके जाते ही वह फूट पड़ी। 'सारी दुनिया का कूड़ा इकट्ठा करके घर ले आते हैं। बाकी लोग नीलामी से काम की चीज उठाकर ले गए और तुम्हें यह टूटी फूटी कुर्सी मिली।' पापा चुपचाप आराम कुर्सी उठाकर बालकनी की दु-छत्ती में डाल आए। लगभग पूरे साल कुर्सी दुछत्ती में उसी हाल में पड़ी रही। मम्मी की जब नजर पड़ती कुर्सी और पापा की अकल को कोसना नहीं भूलती। मगर जब नए घर का फर्नीचर रिपेयर हो रहा था तब एक दिन पापा ने दुछत्ती में से कुर्सी भी उतरवा ली। कुर्सी पर नई और चुस्त बुनाई कराई गई। पूरी कुर्सी पर कत्थई रंग-रोगन पापा ने अपने हाथों से की। सोफे की गद्दियों में से बचे फॉम और कपड़े से आराम कुर्सी पर भी कवर चढ़ाई गई। इस प्रकार नए रूप रंग में इठलाती आरामकुर्सी को ससम्मान नए घर की बालकनी में सुसज्जित किया गया। हम सब देखकर हैरान थे कि पापा ने साल भर पहले से सेवानिवृत्ति के बाद की योजना पुख्ता कर रखी थी। वह जब भी उसमें बैठते उनके चेहरे पर आत्मविश्वास की एई अलग सी चमक दिखाई देती। कुर्सी के सदुपयोग व पापा की कारीगरी पर मम्मी भी मुग्ध थी। आराम कुर्सी बालकनी के एक सुरक्षित और यथासंभव दर्शनीय स्थान पर रखी गई। कुर्सी के पीछे घर की बाउंड्री वॉल थी जिस पर कुर्सी पर बैठने वाला मोबाइल, किताब व चाय का कप इत्यादि रख सकता था। दाहिनी तरफ गमलों पर तरह-तरह के फूल शोभायमान थे। ठीक सामने रसोई घर की खिड़की थी जहां से पापा को वक्त-बेवक्त आवाज देकर बुलाया जा सकता था। कुर्सी के बाएं तरफ बालकनी का विस्तार था जहां से दोपहर बाद धूप धीरे-धीरे सरकाना शुरू करती है। पापा की आराम कुर्सी भी धूप के साथ-साथ सरकती जाती।  गर्मियों में इस जगह पर दोपहर बाद ही बैठा जा सकता था। उमस भरी गर्मी के बाद बाउंड्री वॉल के उस पार आम के पेड़ की पड़ती हल्की-हल्की छांव बैठने वाले को सुकून से भर देती थी। कभी-कभार जब पापा से पहले मम्मी आराम कुर्सी में नम्बुदार हो जाती तब पापा कहते कुछ नहीं थे मगर यहां वहां बैठे-बिठाते, चक्कर लगाते मम्मी उनकी उक्ताहट भांप जाती और उठ खड़ी होती। 'लो बिराजो अपनी मूई कुर्सी में।' पापा बड़ी मासूमियत से खिलखिलाते हुए सुकून से बैठ जाते।

कुछ साल पहले जब उनकी गंभीर बीमारी को लेकर डॉक्टर के संशय ने हमें तोड़कर रख दिया था तब इसी आराम कुर्सी में शांत चित्त बैठे पापा सब कुछ जानते हुए भी अनभिज्ञ बने रहते। उन दिनों मम्मी उनकी कुर्सी के पास मोड़ा डालकर घण्टों बैठी रहती और उनकी हस्तरेखाएं पड़ने लगती। मानो रेखाएं पढ़ने के बहाने उनकी सारी पीड़ाएं स्वयं में ले लेना चाहती हो। 'जीवन रेखा तो लंबी है तुम्हारी।' पापा किसी बच्चे सी ही फुर्ती से बोल पड़ते 'तभी तो कहता हूं मुझे कुछ नहीं होने वाला। तुम लोगों ने मुझे बीमार घोषित कर दिया है।' जब बीमारी ने बदन पूरी तरह तोड़ दिया था तब भी कुछ देर अनंत में निहारते आराम कुर्सी में जाकर निढ़ाल हो जाते। दो महीने बाद जब अस्पताल से लौटे तब भी कुछ देर बालकनी में आराम कुर्सी पर बिराजने का क्रम नहीं टूटा। 'कुछ बात तो है पापा इस कुर्सी में' एक बार कुछ देर आरामकुर्सी पर बैठने के बाद जब मैंने पापा से कहा तो मानो उनकी किसी धारणा पर पक्की मुहर लग गई हो। बड़े चाव से बताने लगे-'ये इस कुर्सी की सकारात्मक तरंगे हैं जो महसूस होती हैं उषा। यह कोई आम कुर्सी नहीं है महान विचारक विवेकानंद जब हमारे शहर में बरसों पहले आए और आकर रुके थे तब कौन जाने इस ही कुर्सी पर बैठकर उन्होंने चिंतन मनन किया हो। यह कुर्सी उसी मकान से जहां वह आकर ठहरे थे नीलामी के समान में निकली थी और जीर्ण-शीर्ण होने के कारण कबाड़ में जा रही थी। बस यही सोचकर इस पुरानी कुर्सी को मैं घर ले आया कि 'लिगेसी' कबाड़ में नहीं जानी चाहिए। कौन जाने अपने प्रवास के दौरान विवेकानंद ने कुछ देर इसी आरामकुर्सी पर बैठकर चिंतन मनन किया हो।' घर पर आने वाला हर व्यक्ति उस आराम कुर्सी के महात्म को जानता था और कुछ देर उस पर बैठकर उसका आनंद भी ले चुका था।इसी आराम कुर्सी पर बैठकर उन्होंने हमें अपने बचपन के लंबे-लंबे किस्से सुनाए। यहीं पर हमारी नाउम्मीदियों पर हमारा मनोबल बढ़ाया। उनके लिए भी आत्म चिंतन, मनन और मंथन का स्रोत रही यह आरामकुर्सी।

'उषा तुम ऐसे सुन्न पड़ जाओगी तो कैसे चलेगा। मां को कौन संभालेगा?'

नवीन झकझोर कर मुझे उठा रहा था। मेरे अंदर एक शून्य पसर गया था... एकदम शून्य। मेरे कान सुन रहे थे, शरीर चल फिर रहा था मगर चेतना के भीतर कुछ था जो चटक गया था। मैं जैसे तैसे उठ खड़ी हुई। मां को संभाला। सारी रस्में हुई। पापा को अंतिम विदाई दी गई। बालकनी की ओट से पापा की आराम कुर्सी भी किंकर्तव्यविमूढ खड़ी उनको अपनी अंतिम विदाई दे रही थी। पापा के जाने के बाद जब तक मम्मी रही आराम कुर्सी को वहां से हटने नहीं दिया। बाद के दिनों में तो पापा की तरह माँ भी उस पर एकनिष्ठ घंटों बैठे रहती।

मम्मी-पापा के जाने के सालभर बाद घर आना हुआ तब मुझे पापा की आराम कुर्सी कहीं दिखाई नहीं दी। वीरेन से पूछा तो उसने बताया सालों से बालकनी में पड़ी-पड़ी बदरंग हो गई थी। बुनाई भी ढीली पड़ गई है। खेलते हुए वीनू एक दो बार गिर गया था इसलिए मीता ने कुर्सी स्टोर रूम में रखवा दी। मीता तो कबाड़ में देना चाहती थी मगर मम्मी पापा की आखिरी निशानी है मैंने रोक दिया। 'स्मृतियों को स्टोर रूम में नहीं रखा जाता वीरेन। स्मृतियों को संजोया जाता है जिस तरह पापा ने संजोया था बरसो पुरानी इस स्मृति को।'  हफ्ता भर रही उस बार। पापा की आराम कुर्सी को स्टोर रूम से निकलवाया। उसकी बुनाई कवाई। हम दोनो बहन-भाई ने मिलकर उसमें पापा की पसंद का कत्थई रंग किया। इतने लंबे अंतराल के बाद भी कुर्सी की लकड़ी खराब नहीं हुई थी। कारीगर ने बताया किसी शाही घराने की लगती है। महंगी लकड़ी है अब तो मिलने से रही। 'लकड़ी के साथ-साथ इस कुर्सी का इतिहास भी तो इतना समृद्ध है' मैंने मुस्कुराते हुए कहा। बहुत सोचने के बाद मैंने वीरेंद्र से बात की और हम दोनों आराम कुर्सी को शहर के राजकीय संग्रहालय के सुपुर्द कर आए। वहां से निकलते हुए एक संतुष्टि भीतर थी। पापा की स्मृतियों को हमेशा के लिए सुरक्षित कर दिया है। पापा जहां भी होंगे प्रसन्न होंगे। आराम कुर्सी भी जैसे आज सालों बाद मुस्कुरा रही थी। मानो एक उपेक्षित बच्चे को चिंता से भरी हुई दो आंखें फिर मिल गई हों'।



-मीना पाण्डेय 

Srujanse.patrika@gmail.com

Thursday, October 13, 2022

अनुभव सम्पन्नता का कथा साहित्य



   
शैलेश मटियानी का जन्म 14 अक्टूबर, 1931 को अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना गांव में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। मटियानी जी जब बारह वर्ष (1943) के ही थे तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया। माता-पिता की मृत्यु के बाद वे चाचा के बूचड़ खाने  में काम करने लगे। बहुत संघर्षों के बाद उन्होंने हाईस्कूल तक की अपनी पढ़ाई किसी तरह पूरी की‌। बचपन से ही वे  लेखक बनना चाहते थे। सन 1950 से उन्होंने कविताएं, कहानियां लिखना शुरू कर दिया। शुरुआत कविताओं से की फिर कहानियां लिखने लगे। जीवन के संघर्षों और उज्जवल भविष्य की चाह में एक दिन अचानक अल्मोड़ा में अपने छोटे भाई-बहन को अकेला छोड़ बालक रमेश मटियानी 1951 में दिल्ली आ गए और ‘अमर कहानी’ के संपादक आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहां रुके। उसके बाद कई शहरों में किस्मत आजमाने के बाद वे बंबई चले गए।  फिर पांच-छह वर्षों तक उन्हें फुटपाथों पर सोना, फेंके हुए भोजन खाना,  भिखांड़यों व पाकेटमारों की संगत में बैठना जैसे कई अनुभवों से गुजरना पड़ा। वहां एक जगह प्लेटें साफ करने का काम मिला और अगले साढ़े तीन साल तक वे वहीं रहे और काम के साथ-साथ लिखते भी रहे। बाद में वे इलाहाबाद आ गए।
शैलेश मटियानी का आरंभिक जीवन किसानी और जुआरी के बेटे और बूचड़ के भतीजे होने के कारण संघर्ष और उपेक्षा के अनुभवों से संपन्न रहा। उसके बाद दिल्ली मुंबई में किए गए संघर्ष, आपराधिक और विभत्स दुनिया के अनुभव उनके अनुभव  जगत को  विकसित करते गए। इस क्रम में आर्थिक संकटों, भावनात्मक संघर्ष और प्रतिकार के कड़वे अनुभव उनके कथा साहित्य में सर्वथा व्याप्त हैं। उनके जैसी अनुभव संपन्नता और भोगे हुए यथार्थ का चित्रण हिंदी कथा साहित्य जगत में और कहीं मिलना दुर्लभ है। उनके कथा साहित्य की यही विशेषता उन्हें एक उत्कृष्ट लेखक के रूप में हिन्दी जगत में प्रतिस्थापित करती है। एक कथाकार के रूप में शैलेश मटियानी अपने कथा साहित्य के माध्यम से सामाजिक व आर्थिक रूप से शोषित और पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते हैं। उनके कथा साहित्य में आर्थिक संकट भोंगते निम्नवर्गीय लोग, घर से प्रेम संबंधों में भागी स्त्रियों का दुर्भाग्य, जातिगत रूप से निम्न स्थिति प्राप्त पात्र और भुखमरी तथा अभावग्रस्त जीवन भोंगने को विवश अति निम्न स्तरीय लोग तथा अपराध जगत  के पीछे की दारूण सच्चाईयों से दो-चार होते लोगों का यथार्थ अभिव्यक्त हुआ है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने शोषित और पीड़ित आम आदमी को चित्रित किया है। उनका पहला उपन्यास 'बोरीवली से बोरीबंदर तक'  निम्न स्तरीय आम आदमी के संघर्ष और बम्बई की झुग्गी बस्तियों से जुड़े अनुभव की गाथा बनकर उभरा है। वहां घर से भगा कर लाई गई और बेच दी गई स्त्रियों का त्रासद जीवन है तो अपराध जगत में लिप्त गंदी गलियों की सच्चाई भी। उपन्यास बताता है कि गंदी गलियों और अपराधिक जीवन के पीछे का सच हमेशा गंदा नहीं होता। 'हौलदार' उपन्यास के माध्यम से वे कुमाऊंनी समाज में गहरे तक उतरे जातिवाद और वर्णवाद के संस्कारों को उजागर करते हैं और सदियों से चले आ रहे ब्राह्मण तथा क्षत्रिय समाज के मध्य उपजे अंतर्द्वंद को रेखांकित करने का प्रयास करते हैं। 'सावित्तरी' उपन्यास की सावित्तरी भी एक निम्न वर्गीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जो सिर्फ इसलिए लोगों की गंदी नजर और फब्बतियों का शिकार बनती है क्योंकि वह दिखने में आकर्षक है और लोगों के घरों में काम करती है।
शैलेश मटियानी के कथा साहित्य  में संवेदना और मार्मिकता का एक अलग स्तर दिखाई देता है। यही उनकी विशेषता भी है और कुछ आलोचकों की नजर में यही उनकी सीमा भी। शैलेश
शैलेश की कहानियों में कुमाऊं का जनजीवन, परिवेश, संस्कृति और वहां का दुर्गम यथार्थ परिलक्षित होता है। 'हौलदार', 'चिट्ठी रसैन', 'गोपुली  गफुरन' इत्यादि इसी तरह के उपन्यास हैं जहां कुमाऊं का जनजीवन और वहां की जटिलताएं अपने पूरे विस्तार के साथ उपस्थित होती हैं। इसी तरह अर्धांगिनी, किसी से ना कहना, कालिका अवतार, लीक, पोस्टमैन, बाली-सुग्रीव, दशरथ, प्रेतात्मा इत्यादि उनकी ऐसी कहानियां हैं जो पहाड़ के जनजीवन को पाठकों के सम्मुख रखती हैं। शैलेश मटियानी उन गिने-चुने कथाकारों में है जो पहाड़ के बाहरी सौंदर्य, पर्वतों, नदियों और वनों पर मोहित नहीं होते बल्कि वहां के कड़वे यथार्थ को भी अपने कथा साहित्य के माध्यम से सामने रखते हैं। कुमाऊं के लोक जीवन में व्याप्त मान्यताएं, रूढ़िवादिता, वर्ण व जातिवाद के गहरी संस्कार बखूबी उनके कथा साहित्य में उभर कर आए हैं। शैलेश मटियानी कथाकार के रूप में संवेदनात्मक और भावनात्मक आधार पर पाठक को अपने साथ जोड़ते हैं। यह भावनात्मक आधार वह अपनी बेहद सरस और मार्मिक भाषा में सिद्धहस्तता से निर्मित करते हैं। आज उनका जंयती है।


मीना पाण्डेय 

Thursday, October 6, 2022

शेखर जोशी- हिन्दी कहानी का जादूगर


कथाकार शेखर जोशी हमारे बीच नहीं रहे। गत 4 अक्टूबर को 90 वर्ष की आयु में उनका देहांत हो गया। शेखर जोशी हिन्दी कथा साहित्य के ऐसे अप्रतिम हस्ताक्षर रहे जिन्होने कोई उपन्यास तो नहीं  लिखा मगर केवल 60-65 कहानियां लिखकर हिन्दी कथा साहित्य में अपना एक विशेष स्थान सुनिश्चित कर लिया। प्रस्तुत है शेखर जोशी की कुछ प्रमुख कहानियों पर मेरी बात-




कोसी का घटवार- ' कोसी का घटवार ' शेखर जोशी की अत्यंत चर्चित कहानियों में है। यह सर्वप्रथम ' कल्पना ' पत्रिका के प्रकाशित हुई। यह पर्वतीय क्षेत्र कुमाऊं की प्रेम कथा है जिसे अदभुत सादगी से दर्शाया गया है। कथाकार सूरज प्रकाश अपने आलेख ' प्रेम न बाड़ी ऊपजे' में इस कहानी पर प्रकाश डालते हुए लिखते हैं- 
" ......शेखर जोशी ने बिन कुछ कहे, बिना किसी संवाद के दोनों पात्रों के बीच में प्रेम के जिस उच्च शिखर को छुआ है, हमारी आंखें नम हो जाती हैं।हम कहानी के नायक गुसाईं सिंह के साथ हो जाते हैं।हम सोचने लगते हैं कि अगर हम उसकी जगह होते तो हम भी यही करते,जो उसने किया है।"
वे आगे लिखते हैं- 

" शेखर जोशी की इस दुर्लभ कहानी में कहीं पर भी प्रेम शब्द नहीं आया है।कहीं पर भी दोनों पात्रों ने आंखें नहीं मिलाई हैं। दोनों ने एक दूसरे को छुआ भी नहीं है।न ही कोई वादा किया है और ना किसी किस्म की कसमें खाई हैं। उसके बावजूद यह प्रेम की दुर्लभ कहानी लगती है।"

 गुसाईं सिंह फौज से रिटायर होकर किसी नदी के घट पर अनाज पीसने का कार्य करता है। उसे महसूस होता है अकेलापन उसके जीवन में स्थाई हो चुका है। फ़ोंज की पेंट को देखकर उसे ध्यान आता है जिस पैंट की शान देखकर वो फोंज में भर्ती हुए था उसी ने बदले में स्थाई अकेलापन उसके जीवन में लिख दिया। फौज की नौकरी के कारण ही उसकी प्रेमिका लछमा से उसका ब्याह नहीं हो पाया था। उसके बाद गुसाईं सिंह ने आजीवन अविवाहित रहने का फैसला कर लिया और नौकरी में रहते15 वर्षों तक गाव की तरफ मुड़ कर नहीं देखा। अतीत से गुसाईं सिंह वर्तमान में पहुंचता है। घट पर पानी का बहाव काम है। घट में बहुत धीरे धीरे पिसाई हो रही है।काफी पिसान एकत्र हो गया है। उसी दौरान एक युवती सर पर पीसान का थैला लिए घट पर आती है। गुसाईं सिंह देखता है कि वो लछमा ही है।उसे पता चलता है कि लछमा विधवा होकर मायके आ गई है । दोनों के बीच कुछ ओपचारिक बातें होती हैं और गुसाईं बारी में लगे पिसान में से उसका पिसान घट में पहले लगा देता है । पुरानी सारी बातें भूल वह अपनी पूर्व प्रेमिका व उसके भूख से मचलते पुत्र के लिए गुसाईं सिंह ना केवल चाय व रोटियां बनाता है बल्कि उनकी परेशानी देख कुछ पैसे भी उसकी तरफ बढ़ाता है। गुसाईं के प्रेम की ये सादगी और ईमानदारी पाठक को मोह लेती है।उसे लगता है  उस स्थिति में होता तो वह भी यही करता। पहाड़ी पृष्ठभूमि में वहां के जीवन व संघर्ष के मध्य निस्वार्थ प्रेम की ये उत्कृष्ट कथा एक मीठी टीस भीतर छोड़ जाती है।
यहां एक कहानी के दो अंत एक साथ चलते हैं।एक कहानी के भीतर और एक पाठक के भीतर।पाठक चाहता है दोनों परम्पराओं, रूढ़ियों से होड़ ले। और ये भी कि गुसाईं सिंह जाती हुई लछमा को आवाज देकर रोक ले।
'कोसी का घटवार ' कहानी की कथावस्तु पर बालकृष्ण पांडेय लिखते हैं -
"कुछ शाश्वत समस्याओं को उठाते हुए आंचलिक मूल्य मान्यताओं की सीमा का भी ध्यान रखा गया है, अन्यथा कोसी का घटवर में गहरे रोमानी स्पर्श के स्तर पर लछमा और गुसाईं घटवार का पुनर्मिलन इतना नीरस  और उद्देश्हीन न होता।"

शेखर जोशी उस सिरे पर कहानी को छोड़ देते हैं जहां पर पाठक का कहानी से उबारना सहज नहीं होता। यही एक बड़े कहानीकार की विशेषता भी है जो कहानी में पाठक के लिए भी स्पेस छोड़ता है। और यही विशेषता कोसी का घटवार को एक बड़ी कहानी बनाती है। सीमा मोर्य का कथन इस ओर समीचीन है- 
' यह कहानी विषय वस्तु से,अपने व्यवहार से पाठकों में परंपरा और रूढ़ियों के प्रति द्वंद जगाती हुई नवीनता के स्वीकार का आग्रह प्रस्तुत करती है।द्वंद कहानी में नहीं पाठक के मन में चलता है - परंपरा से विद्रोह भी कहानी में नहीं, पाठकों के मन में घटता है।कहानी में वर्णित प्रेम की असफलता, द्वंद की विशिष्टता के स्तर पर कहानी की सफलता में बदल जाती है।' 

हलवाहा- हलवाहा शेखर जोशी की उन कहानियों में है, जो की किसान जीवन पर आधारित है। कहानी की पृष्ठभूमी चूंकि कुमाऊं क्षेत्र की है अतः वहां के जातिगत समीकरण विशेषकर गल चलाने के सवाल पर उभर कर आए हैं। कुमाऊं क्षेत्र में यह मान्यता है कि उच्च जातीय ब्राह्मण हल नहीं चलाते। कहानी का नायक जीवानंद है जो की जाति से ब्राह्मण है। हलवाहा कहानी पर्वतीय क्षेत्रों के गांव का बदलता हुए यथार्थ दर्शाने का प्रयत्न करती है। जीवानंद की परिस्थितियां उसे परंपरा से होड़ लेने के लिए प्रेरित करती हैं। जीवानंद का किसान बनना पुरातन मूल्यों व धारणाओं के विरूद्ध एक नया कदम है।इस तरह शेखर जोशी समाज के शिथिल पड़ गए ढर्रों पर प्रहार तो करते हैं मगर उनका पथ राजनीतिक ना होकर सांस्कृतिक अधिक है। भाषा व शैली के स्तर पर कहानी सहज व सरल है।कहानी के माध्यम से उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के जीवन व मान्यताओं के विषय में जानकारी मिलती है।

दाज्यू- वर्ग भेद व स्वार्थ आधारित रिश्तों की पृष्ठभूमि पर लिखी गई शेखर जोशी की कहानी दाज्यू एक उत्कृष्ट कहानी है। पहाड़ों के संघर्षमय जीवन व बेरोजगारी के चलते नौजवान रोजगार की तलाश में शहरों की तरफ आ जाते हैं।मगर अपने गांव,घर की याद सदैव उन्हें व्यथित करती है। ऐसे में अपने क्षेत्र से संबंधित व्यक्ति से परदेश में मिलना उसे आत्मीयता से भर देता है। दाज्यु कहानी में भी मदन, जगदीश बाबू के प्रति वही आत्मीयता महसूस करता है। उन्हें बड़े भाई के समान मानते हुए दाज्यू संबोधन का प्रयोग उनके लिए करता है। शहर में नए होने के कारण पहले पहल तो मदन की आत्मीयता व दा संबोधन उन्हें नहीं अखरता मगर बाद में जब शहर में उनका परिचय प्रगाढ़ हो जाता है उन्हें एक रेएसटोरेंट के बेरे का आत्मीय दाज्यू संबोधन अखरने लगता है।मदन की भावनाओं को नज़रंदाज़ कर जगदीश बाबू उसे जोर से डांट देते हैं।
दाज्यू कहानी हमारे समाज में फैले वर्ग भेद का कटु यथार्थ है।कहानी में आज के समाज में सम्बन्धों के खोखलेपन व स्वार्थ आधारित रिश्तों को दर्शाया गया है। कहानी में कहानीकार का भोगा हुआ यथार्थ परिलक्षित होता है जो नई कहानी की एक मुख्य प्रवृति रही है। शेखर जोशी स्वयं पहाड़ से संबंध रखते हैं और वहां के संघर्ष व समस्याओं से भलीभांति परिचित भी हैं। पहाड़ों से महानगरों की तरफ आए नौजवानों की मनोवृत्ति के वे भुक्तभोगी हैं।मदन पहाड़ और अपने परिवेश के प्रति नराई का प्रतीक है।दूसरी तरफ वर्गीय संस्कारों के जगदीश बाबू अपने मान अपमान के प्रति चौकन्ना रहने वाले उन चेहरों में शुमार हैं जो सुविधा व हैसियत के अनुसार संबंधों का निर्वाह करते हैं।वर्ग भेद की गहरी जड़ें अपने क्षेत्र, परिवार के व्यक्ति को भी अपना नहीं रहने देती।

गलता लोहा- गलता लोहा कहानी  भारतीय समाज में गहरे तक धसी जाति व वर्ण व्यवस्था पर करारा प्रहार है।बिना किसी अनावश्यक आख्यान के लेखक सांकेतिक रूप से जाति व्यवस्था की जड़ों पर पात्रों द्वारा घन की लगातार चोट लगवाता है।रोचक बात यह है कि कहानी के भीतर  जाति व्यवस्था पर ओपचारिक रूप से कोई टिपण्णी लेखक द्वारा नहीं की गई है। संकेतों के आधार पर शेखर जोशी बड़ी मजबूती से अपनी बात पाठक के सम्मुख रखते हैं।यह एक कुशल कहानीकार की पहचान है।इस ओर कहानी का शीर्षक गलता लोहा भी सांकेतिक रूप से उत्कृष्ट है।

उस्ताद- उस्ताद एक ऐसे कारखाना मजदूर की कहानी है जो जीवन का एक बड़ा हिस्सा कारखाने की मशीनों के साथ दो-दो हाथ करते बीता है। इन वर्षों जो थोडा बहुत सहेजने लायक उसने कमाया उसमें सबसे महत्वपूर्ण है उसकी उस्तादी जो नए कर्मचारियों को काम सीखा उसने प्राप्त की है। भाषा के स्तर पर कहानी जितनी सादगी लिए हुए है विचार के स्तर पर कारखाना मजदूरों की छोटी- छोटी आशा निराशाओं, सुख दुख व उनके कार्य क्षेत्र में प्रचलित युक्तियों पर गहरी सेंध लगाती है। कहानीकार बड़ी सादगी से
अपने कहन कोशल से कारखाना मजदूरों के मध्य उस्ताद नाम से प्रचलित पात्र के व्यक्तित्व के बेहद सूक्ष्म पक्ष उद्घाटित करता है।उस्ताद एक तरफ उस्ताद होने की प्रस्थिति के प्रति सजग दिखाई देते हैं दूसरी तरफ उस भूमिका के प्रति असुरक्षा का भाव कहानी का मूल है। उस्ताद मजदूरों को काम सिखाते हुए भी तुरुप का इक्का अपने पास संभाले रखना चाहता है ताकि उसकी उस्तादी पर खतरा ना मडराए।उस्ताद द्वारा वल्टेमिंग बांधने की कारीगरी लेखक से छिपा जाना तथा कहानी के अंत में अपनी आदत के विपरीत उस्ताद का लेखक से न केवल मिलने आना बल्कि एक सांस में वॉल्टमिंग बांधने की कारीगरी भी समझ जाना कहानी के सबसे रोचक बिंदु हैं। कारखाने के रोजमर्रा के साधारण वाकये को बड़ी ही कुशलता से कहानीकार कहानी का रूप दे देता है तथा आत्मीयता के उस बिंदु से परिचित कराता है जो दिन प्रतिदिन के निजी सरोकारों से पृथक संबंधों की सबसे बड़ी पूंजी है। 

डांगरी वाले - 
विडुवा - विडुवा कहानी में दो पीढ़ियों के मध्य का द्वंद कहानी के मूल में है।युवा पीढ़ी आधुनिक तौर तरीकों के साथ जीना चाहती है तथा पुरानी पीढ़ी के लिए अपनी परम्पराओं के विपरीत इं तौर तरीकों को अपनाना सहज नहीं होता। बड़े ठाकुर के पुत्र का ब्याह है। वे अपनी परम्पराओं के अनुसार विवाह के रीति रिवाज सम्पन्न करवाना चाहते हैं।मगर उनका छोटा भाई दिग्विजय व बहन ननकी विवाह में वीडियोग्राफी के लिए वीडियो के जाने की बात कहते हैं।रीति रिवाजों व परंपरा की उपेक्षा व आधुनिक तरीकों का बोलबाला बड़े ठाकुर की चिंता की वजह बनता है। लेखक आधुनिक समाज में परंपरा व आधुनिकता के बीच के द्वंद को बड़ी ही खूबसूरती से कहानी में उठाते हैं।

डरे हुए लोग - डरे हुए लोग कहानी मध्यवर्गीय परिवार की कथा है जहां अपनी छोटी- छोटी जरूरतों के लिए भी परिवार को महीना भर संघर्ष करना पड़ता है। एक आम मध्यवर्गीय परिवार जिन समस्याओं से दो चार होता है वही व्यथा कमला तथा उसके पति की भी है।दोनों पति पत्नी बेटे की जरूरत पूरी ना कर पाने के कारण चिंतित हैं तथा  बेटे को आश्वासन देते हैं के माह के अंत में वेतन आते आते उसकी जरूरत पूरी हो जायगी।मगर दोनों को ही पता है कि यह आसन नहीं है। शेखर जोशी मध्यवर्गीय समाज के छोटे छोटे सुख दुख, संघर्ष इत्यादि को ना केवल अपनी अधिकांश कहानियों का विषय बनाते हैं बल्कि उस जिजीविषा को भी सामने रखते हैं जो इं संघर्षों से होड़ लेती है,उनके सामने घुटने नहीं टेकती। 

बदबू - बदबू कहानी उस समाजिक विडंबना को भी परिलक्षित करती है जहां जूझते हुए अंततः हम उस व्यवस्था का हिस्सा हो जाते हैं। इस ओर कहानी का अंत दृष्तव्य है जहां नायक हाथों से केरोसीन की बदबू पुनः महसूस होने से संतुष्ट होता है-
" दूसरी मिट्टी लगाने से पहले उसने हाथों को सूंघा और अनुभव किया कि हाथों की गंध मिट चुकी है।सहसा एक विचित्र आतंक से उसका समूचा शरीर सिहर उठा।उसे लगा आज वह घासी की तरह बदबू का आदि हो गया है। उसने चाहा कि एक बार फिर हाथों को सूंघ के लेकिन उसका साहस नहीं हुआ। परन्तु फिर बड़ी मुश्किल से वह दोनों हाथों को नाक तक ले गया और इस बार उसके हर्ष की सीमा ना रही।पहली बार उसे भ्रम हुआ था हाथों में केरोसीन तेल की बदबू अब भी आ रही है।"

बदबू कहानी का नायक ओद्यौगिक व्यवस्था की विसंगतियों के प्रति जागरूक है।वो उस व्यवस्था के खिलाफ अन्य मजदूरों को भी संगठित करना चाहता है।मगर इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ता है और उसे मुश्किल जगह काम के लिए भेज दिए जाने के रूप में।बदबू कहानी का अंत यथार्थ में बदलाव की उद्घोषणा के रूप में महत्वपूर्ण है।जहां पर कई मजदूर उस वातावरण व्यवस्था को चुपचाप ज्यों का त्यों स्वीकार कर लेते हैं वहीं कहानी का नायक नए बदलाव के प्रति आशावान है। 

आशीर्वचन - आशीर्वचन कहानी का नायक रिटायरमेंट के लिए जाने वाला है। उसके आखिरी दिन काम पर आने से कहानी शुरू होती है।कहानीकार बताता है कि उस कारखाने में कुछ वर्षों से अच्छी परंपरा शुरू हुई है कि वेलफेयर एसोसिएशन के द्वारा  रिटायरमेंट में जाने वाले कर्मचारी को एक जोड़ी नए कपड़े और जूते दिए जाते हैं। काम के आखिरी दिन श्यामलाल कारखाने में घूम घूमकर पुरानी स्मृतियां ताजा करता है।उसे वो दिन याद आते हैं जब वह युवक था और काम में तेज भी।जहां से भी श्यामलाल कारखाने में गुजरता है सभी सहकर्मी उसका अभिवादन करते हैं।साहब द्वारा भी उसे ओपचारिक मुलाकात के लिए बुलाया जाता है।शाम को जब हॉल में श्यामलाल का विदाई समारोह आयोजित होता है तब श्यामलाल की इच्छा होती है कि वह भी अपने अनुभव व शुरुवाती मुश्किल दिनों की यादें युवा पीढ़ी के साथ बांटे तथा उन्हें ईमानदारी व लगन से काम करने की प्रेरणा दे। यथा- 
"उसने सोचा अगर अलख नारायण ने उससे भी बोलने का अनुरोध किया तो वह बताएगा उन्हें उस कारखाने के बारे में, कारखाने के पुरखों के बारे में जिन्होनें इसकी एक एक ईंट रखी है,उस जमाने के बारे में जब सिर उठाने का मतलब सिर काटना होता था, उन जीतों के बारे में जिन्हें जितना आसान नहीं था, उन हारों के बारे में जिन्हें भूलना आसान नहीं है।वह उन्हें हुनर की इज्जत करने के लिए कहेगा। ठेले पर चैनल फेंकता मुल्लू, कैंची मशीन का ऑपरेटर,पटरी केन वाला लड़का,ग्राइंडर पर खड़ा रामलखन उसकी आंखों के आगे घूम गया।उसने सोचा, वह उन्हें हमेशा न्याय का साथ देने। अन्याय से लडने के लिए कहेगा। भाषणों का दौर चालू था।भाषण से ही नेता की पहचान होती है,कोन उन्नीस पड़ता।अलख नारायण ने साहब से दो शब्द ' कहने की प्रार्थना की।लोग चोरी छिपे अपनी घड़ियों की ओर देखने लगे थे।"

इस प्रकार कहानीकार ओद्योगिक कामगार जीवन की छोटी छोटी विसंगतियों को उसकी समग्रता के साथ प्रस्तुत करते हैं।एक पूरा जीवन कारखाने की देने के बाद सेवानिवृति की कगार में खड़ा कारीगर किस तरह उस बिताए एक एक लम्हें को पुनः जीता है। सभी सहकर्मी अपने बुजुर्ग साथी को स्नेह  सम्मान देना चाहते हैं मगर दिनभर की जी तोड़ मेहनत व अपने व्यक्तिगत संघर्ष उन्हें अधिक देर तक श्यामलाल को सुनने की इजाजत नहीं देते।ओर जल्दी में श्यामलाल को अभिवादन देते हुए वे लोग घर की तरफ तेजी से निकलने लगते हैं।कहानी से गुजरते कारखाने जी दिनचर्या का हिस्सा होते हुए पाठक श्यामलाल की जगह स्वयं को महसूस करने लगता है।बेहद सहज व सादी भाषा में लेखक कहानी के मर्म के साथ पाठक को जोड़ने में कामयाब होता है।

.मीना पाण्डेय 



Copyright ©-मीना पाण्डेय 

Tuesday, September 20, 2022

हैरानी का समाजशास्त्र


यदि आप इंसान है तो हैरान होना जरुरी है। बड़े मियां आज के दौर में आदमी होने की शर्त ही है कदम कदम पर  खुद को हैरानियों के लिए तैयार रखना। बाफुर्सत औरतें और बेरोजगार जो पिछले दिनों आलिया-रणवीर की वैडिंग ड्रेस और प्रियंका चौपड़ा के निक को देखकर हैरान थे वो आजकल इंडिया की बल्लेबाजी पर हैरान हैं।


यकीन मानिए हैरान होना दुनिया का सबसे आसान काम है। कहीं भी, किसी भी बात पर हैरान हुआ जा सकता है। तब भी जब और कुछ न किया जा सके हैरान तो हुआ ही जा सकता है। इस पर भी सबसे अच्छी बात यह कि सरकार  का ध्यान भी इस गैर मामूली इंसानी आदत पर अभी तक नहीं गया। कौन जाने इस पर भी मनोरंजन टैक्स की तर्ज़ पर हैरान टैक्स जैसा कोई नया कर ही लगा दिया जाय। फिलहाल तब तक जमकर और बेफिक्र हैरान हो लिजिए। 


कुछ गप्पबाजों की दुकानें ही इस एक बेशकीमती हुनर पर टिकी रहती हैं। फलां फलां की कमाई, फलां व्यक्ति ने किया कारनामा या फलां की बेटी फलां के साथ रफूचक्कर। आंखें फाड़कर हथेली को गालों पर टिका लिजिए। यदि आप इस के साथ मुंह भी फाड़ सकते हैं तो आप में एक उम्दा हैरान शख्स बनने की सारी काबिलियत है। गाहे-बगाहे इस प्रक्रिया को दोहराते रहना भी जरूरी है,  आखिर अभ्यास नाम की भी कोई चीज होती है कि नहीं। स्थान के अनुरूप हैरान होने के तरिकों में कुछ भिन्नता देखने को मिलती है। यदि आप शहरों में रहते हैं तो थोड़ा सा आंखें फाड़कर और छोटा-सा मुंह खोल कर हैरान हुआ जा सकता है लेकिन यदि आप किसी गांव या कस्बे में रहते हैं तो आप को हैरान होने के लिए ज्यादा मस्सकत करनी होगी। हैरान होने की आदत व्यक्ति सापेक्ष या घटना सापेक्ष होती है यानि एक बात या घटना जो आपको हैरान कर रही है, हो सकता है कि वो दूसरे के लिए सामान्य सी बात हो।


बहरहाल, आज की जय श्री राम और अल्लाह हो अकबर राजनीति में भी हैरान होने के किस्से कम नहीं है। यहां हैरान होने से ज्यादा हैरान किया जाता है। आज की राजनीति किस तरफ जा रही है या सारी शाखों पर उल्लू ही क्यों बैठें हैं? इस बात पर यहां कम हैरानी होती है। यहां इस पर भी हैरानी नहीं होती कि पिछत्तर सालों में केवल पैकेजिंग ही क्यों बदलती रही? हैरान होने की वजह यहां अनर्गल बयान भी नहीं होते। हैरान होने की वजहें यहां प्रियंका वाड्रा, अमेठी और अमित शाह जैसी बड़ी होती हैं। हम मोदी के कपड़ों और राहुल के लड़कपन पर हैरान होते हैं। रसोई गैस व पैट्रोल के बड़े हुए दाम हमें परेशान तो करते हैं हैरान नहीं। हम हैरान होते हैं इस बात पर कि इंदिरा गांधी से हूबहू कैसे मिलती है उनकी पोती की शक्ल? मुहल्ले की सबसे काबिल और खूबसूरत लड़की के तेजाब जले चेहरे को देख हमें हैरानी नहीं होती।

हैरान होना दुनिया का सबसे खूबसूरत काम तब हो जाता है जब आपकी हैरानी आपको परेशान करने लगती है।


मीना पाण्डेय

  

Tuesday, September 13, 2022

हिन्दी दिवस

 भाषा नदी है

 धाराओं से समृद्ध 

 सीमा में असीमित बहते हुए 

बहा ले जाती है

तमाम मौखिक-लिखित असुविधाएं,

दुविधाएं

नदी की तरह 

भाषा की भी कोई सरहद नहीं होती

सीमाएं लांघकर 

अपने गन्तव्य तक पहुंचती है भाषा

जहां नहीं पहुंचती वहां उसकी पैकेजिंग पहुंचती है


भाषा नदी है

जिसके जल को

 मुहँ में भीतर तक गुड़गुड़ा 

जहन की बेस्वादी धोई जा सकती है

अपनी यार भाषा में

जबडे से जेहन तक गटका जा सका 

समय का सबसे विषाक्त रूपक

सबसे अश्लील मुहावरा

पढ़ा लिखा जिस भी भाषा में गया

मस्तिष्क से स्नायुओं तक 

 मातृभाषा में ही ढुकेला जा सका है


हिन्दी मेरे जायके की सबसे लजीज भाषा रही

जिस में घुल कर 

किसी भी जुबान में

असर आया है


मीना पाण्डेय 

Thursday, August 4, 2022

कविताएं-मीना पाण्डेय

 घास 


जीवन के घोषित-अघोषित हिस्सों पर

विचारों के बांझपन को ढ़ापती 

फिर उग आऐगी घास 


 पतझड़ की दुखती देह पर मरहम लगाते बसंत

 बुलाए नहीं जाते


स्वतः आ जाती है

लम्बी थकान के बाद नींद


 बचे रह गए दालानों, धाटियों और रास्तों पर भी

प्रश्नचिन्ह की तरह अनायास उग आएगी घास 


 जमीन पर फूटने से पहले 

एक युद्ध वो मिट्टी के भीतर लड़ेगी 

जब जब बारिश धोऐगी जमीन की मटमैली देह

सतह को फाड़ सर उठाऐगी घास 


ये हरा रक्त गांव की धमनियों में दौड़ता है

ताकि बने रहे घर, आंगन और गोट 


पुरखों ने जब भी सर पर हाथ रख कहा  'हरा भरा रहे'

उनकी कल्पना में घास ही रही

बार-बार, कई बार उगना

हरी घास की तरह

ताकि एक सुबह दराती कमर में खौंच 

मेरे गांव की घस्यारिनें

फिर गट्ठरों में बांध लें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सुख 

कटना घास की नियति है

बिछना घास का सुख।




संसार की सबसे सुंदर औरतें


उसे गाड़-गधेरों, नौलों-धारों के डबडबाने व सूखने का सही क्रम पता है

 बाहर उमड़ने से पहले

उसके भीतर उमड़ता है एक चौमास


हिमालय के कन्धे पर पैर टिका

उसकी देह से हरी चादर उतार लाने का हुनर वो जानती है


उसे पता है दिन के ठीक किस पहर 

रघुवा के बाप को बीडी की

रम्भा को घास की 

और 

बूढों को लगती है चाय की टीप

अंतहीन परिश्रम को आंचल की गाँठों में बांध

वो जानती है मां होने की प्राथमिकताएं


यहां अपनी समग्रता मे उपस्थित रहता है पहाड़


हिमालय की पीठ पर दराती सी घुपी औरतें

संसार की सबसे सुंदर औरतें हैं।


#मीनापाण्डेय

गढ़वाली, कुमाउनी एवं जौनसारी अकादमी द्वारा आयोजित बाल-उत्सव 2022

 गढ़वाली, कुमाउनी एवं जौनसारी अकादमी द्वारा आयोजित बाल-उत्सव 2022 (3 जुलाई से 9 जुलाई) के सफ़र पर एक नज़र..


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3 जुलाई, रविवार

 इस उत्सव का उदघाट्न, आज़ादी के अमृत महोत्सव के उपलक्ष में वीरांगना 'तीलू रौतेली' की सफल प्रस्तुति के साथ 3 जुलाई को हुआ था। लाइट्स, ऑडियो एवं वीडियो प्रोजेक्शन से बने, इसके दृश्यबंधों को दर्शकों ने सराहा। प्रस्तुति का मूल आलेख, परिकल्पना व निर्देशन- सुवर्ण रावत का था। भाषाविद- रमेश चंद्र घिल्डियाल व सहायक निर्देशन में श्रुति मैठाणी थी। 


दूसरी प्रस्तुति ख़िलानंद के निर्देशन में 'मैं च्यल छूँ' थी। भाषाविद पूर्णचन्द्र कांडपाल व सहायक निर्देशक भुवन गोस्वामी थे। इस प्रस्तुति में लिंग भेद की अनेक घटनाकर्मो को बख़ूबी से उकेरा गया था। वेशविन्यास व मंच सामग्रियों से आँचलिक पुट दिया गया था।


4 जुलाई, सोमवार

आज की नाट्य प्रस्तुति 'हरुहित मालूशाही' की लोककथा' उत्तराखण्ड की एक मशहूर प्रेम कथा थी। शिल्प, तकनीक व प्रस्तुतिकरण पहुलुओं को अगर नज़र अंदाज़ कर दें तो कलाकारों की वेशभूषा, रूप सज्जा एवं मंच सामाग्री भव्यता से भरी लुभावनी थी। 'घुरुघरवान्ति घुघुति...', 'यो डांडा, यो कांठा....देखी छ न्यारा-न्यारा' के साथ 'कनी बज मुरली' गीत की धुन पर विभिन्न क्रियाकलाप- देवी-पूजा, शादी-व्याह के फेरे, माँगल गीत लोक परम्पराओं के साथ नायक-नायिका का रामगंगा पर दुःखद अंत होता है। इसका निर्देशन किया था चंद्रकला नेगी ने, भाषाविद- सुनील नेगी व सहायक थी-ऋतु पन्त।


दूसरी प्रस्तुति, 'जीतू बगड़वाल' में कलाकार पार्श्व से ख़ुद ही गा-बजा रहे थे। वाद्य यंत्र-ढोल, दमाऊ, रणसिंघा लिए रैंप के अलावा पूरे मंच का भरपूर स्तेमाल किया गया था। माँगल गीत- 'खोली क गणेश' के साथ हल्दी-हाथ/बान-रस्म। 'ऐगी र ऐगी स्वाणि बांध' पर नृत्य के बीच छोटे-छोटे दृश्य में मिमियाती बकरी, काले रंग के मुखोटे में दो बैल उभर कर आए थे।आख़िर में बाँसुरी से मंत्र-मुग्ध आछीरियां, जीतू का हरण करती हैं। इसका निर्देशन किया था-हिम्मत नेगी ने। भाषाविद थे-जगदीश नोडियाल व सहायक निर्देशक-निशांत रौथाण।


5 जुलाई, मंगलवार

को पहली नाट्य प्रस्तुति 'कै जावा भेंट आख़िर' में बच्चों के साथ निर्देशक, भाषाविद व सहायक निर्देशक क्रमशः लक्ष्मी रावत, मदन डुकलान व पूजा बडोला भी अभिनय करते हुए नज़र आए। नाट्य प्रस्तुति ने जहाँ एक ओर छूटे हुए उत्तराखण्ड, पलायन की पीड़ा व प्रवासी उत्तराखंडी की जटिलता को सफलता से दर्शाया था। वहीं दूसरी ओर भाषा-बोली के प्रति बेरुखेपन के साथ टूटते रिश्तों की संवेदनाओं को भी छुआ था।


दूसरी नाट्य प्रस्तुति 'फूल जाई' वेशभूषा व रूपसज्जा से जौनसार का परिवेश अच्छे से झलक रहा था। भाग लेने वाले कलाकारों में स्कूल की मास्टरनी वाले दृश्य में एक ओर पांव से लिपटने वाला नन्हा बच्चा भी था तो थानेदार व मास्टरनी की मदद में भारी बोझ को अपनी पीठ में लादने वाले बड़े बच्चे भी थे। शिल्प एवं तकनीक को यदि छोड़ दें, तो नाट्य प्रस्तुति की समाप्त पर ढोल-नगाड़ों के साथ होने वाले तांदी/नाटी गीत पर जौनसार-बावर के दर्शक (पुरुष एवं महिला) उत्साह से भरे मंच पर चढ़ गए, हाथ में डांगरा/ फरसा लिए राजेन्द्र सिंह तोमर (निर्देशक), रमेश चंद्र जोशी (भाषाविद) व टी.आर. शर्मा (सहायक निर्देशक) ने अगुवाई की। पूरा प्रेक्षागृह 'महासू देवता' के जयघोष से गूँज उठा। उत्तराखण्ड के रंगमंच इतिहास में यह देश की राजधानी में शायद पहली जौनसारी नाट्य प्रस्तुति थी।


6 जुलाई, बुधवार

की दोनों नाट्य प्रस्तुतियों में बच्चों की संख्या अब तक के केंद्रों से सबसे ज़्यादा थी।

पहली नाट्य प्रस्तुति 'बारामासा' में अलग-अलग ऋतुओं में हल जोतना, गुड़ाई करना आदि क्रिया- कलापों को बख़ूबी मंच पर दर्शाया गया था। गीत 'दैणा होया...,' 'सुफला हो जाया देवा हो...' , 'तेरी झुमैला...' बुब्बू कौथिक...'एवं 'मेरी स्याली...' जैसे गीतों पर छोटे-बड़े बच्चों के अलग-अलग दो समूहों पर पारंपरिक वेशभूषा व रूप सज्जा में किए गए नृत्य ने मंच पर छटा बिखेर दी थी। बारात व नंदा देवी कौथिक के दृश्य पारंपरिक परिधान में भव्यता से भरे व मनमोहक थे। नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन-भगवत मनराल ने किया। भाषाविद व सहायक निर्देशन का ज़िम्मा क्रमशःनीरज बवाड़ी व रेखा पाटनी ने निभाया।


दूसरी नाट्य प्रस्तुति 'पहाड़ा की कुंती' का सशक्त कथानक, नशा मुक्ति पर आधारित था। कुछ बहुत छोटे बच्चे होने पर भी ढोल-दमाऊ, दैवीय-निशान व पूजा-अर्चना की सामाग्री के साथ गीत -'देव भूमि प्यारो-प्यारो, ये देश हमारो...' ने समा बांध दिया था। अपने शराबी पति व गाँव के प्रधान से आक्रोशित 'कुंती' की लड़ाई, एक आंदोलन में तब्दील हो जाती है और महिलाओं का सैलाब उसके साथ उमड़ पड़ता है। जिसे देख, आख़िर में मातृ शक्ति के सामने, असमाजिक तत्व घुटने टेक देते हैं। नाट्य प्रस्तुति का निर्देशन, नरेन्द्र पांथरी ने किया। साथ में भाषाविद-डॉ. बिहारी लाल जालंधरी व सहायक निर्देशक उमेद सिंह नेगी थे।


7 जुलाई, गुरुवार

नाट्य प्रस्तुति 'आमक जेवर' का कथानक गहनों के बॉक्स के इर्द-गिर्द घूमता है। नेपथ्य में बजने वाली बाँसुरी की स्वर लहरी से मंच पर घटित दृश्यों को उभारने में मदद मिली थी। स्वेटर बुनना, बच्चों का खेलना, टॉवर की वजह से मोबाइल नेटवर्क की समस्या के बीच -'होलो री बल होलो री..., छ गंगा पार...ओ गंगा भगीरथी बागेश्वर जैसे सटीक गीत थे। कथा-पूजा के दौरान देवता का अवतरित होने के साथ बैठी व खड़ी होली की झलक भी देखने को मिली थी।आख़िर में अम्मा के न रहने पर, - 'जिनके पास जेवर नहीं होते, तो क्या वे सेवा नहीं करते।" संवाद के बाद, कुछ लम्हों ठहराव के उपरांत पूर्व प्रवाह के साथ नाटक का अंत हो गया था। निर्देशक के.एन. पाण्डेय 'खिमदा'

भाषाविद- रमेश हितैषी सहायक निर्देशक-संगीता सुयाल थी।


आज की दूसरी नाट्य प्रस्तुति 'मास्टरनी' थी। जिसमें एक मास्टरनी की संरक्षण व मार्गदर्शन में एक साधारण छात्र प्रगति के रास्ते चलकर, अपने व्यक्तितत्व का विकास करता है। बच्चे के सर पर माँ का साया न रहने पर भी एक शिक्षिका के सकारात्मक प्रोत्साहन से वह एक बड़ा डॉक्टर बन जाता हैं। नाटक में 'मास्टरनी' के ज़रिए बच्चों के मनोवैज्ञानिक पहलुओ को अच्छे से उभारा गया था। निर्देशक-विपिन देव, भाषाविद- रघुवर दत्त शर्मा, सहायक निर्देशक-बृजमोहन वेदवाल थे।


 8. जुलाई, शुक्रवार

आज की पहली नाट्य प्रस्तुति 'श्रीदेव सुमन' के संघर्ष की कहानी थी। जिनकी मौत 84 दिन के अनशन के बाद भी रहस्यमयी बनी हुई है- ज़हर या कुछ और? 'सुमन-लक्ष्मी' (पति-पत्नी) एवं दो पुलिस आफिसरों के वैचारिक मतभेदों को बड़ी संवेदनशीलता से उकेरा गया था। इसके अलावा, जहाँ एक ओर टेहरी के राजा को 'जयदेव' से नवाजती भोली-भाली जनता दिखी तो वहीं दूसरी ओर श्रीदेव सुमन व उनके प्रजामण्डल के साथियों को प्रताड़ित करता मोर सिंह के पुलिस बल का कहर भी नज़र आया। इस नाटक के निर्देशक-संयोगिता ध्यानी

भाषाविद- रणीराम 'गढ़वाली' एवं

सहायक निर्देशक- दर्शन सिंह रावत थे।


आज की दूसरी नाट्य प्रस्तुति 'वीर शहीद केसरी चन्द्र' पर आधारित थी। गाँव के स्कूल व डी.ए.वी. कॉलेज देहरादून पढ़ाई के दौरान शिक्षक के उत्साहवर्द्धन व ब्रिटिशर्स के साथ हुई मुठभेड़ ही उन्हें देश भक्ति की ओर खींच लाई थी।

घर-परिवार में अपने 'माँ-बाबा' को भी 'केसरी' की इस देशप्रेम की ज़िद्द के आगे झुकना पड़ा था और केसरी ने अपने आपको सुभाष चन्द्र बोस की आज़ाद हिंद फौज़ में झोंक दिया था। कलाकारों द्वारा अभिनीत चरित्रों/किरदारों की मंच सामग्री, वेश-भूषा व रूप-सज्जा आकर्षक थी। विशेष रुप से ब्रिटिशर

ऑफिसर का पहनावा, जज की विग एवं केसरी चंद्र की हाथ-पाँव में झूलती बेड़ियां। इस नाटक की

निर्देशक-मंजूषा जोशी, भाषाविद-खजानदत्त शर्मा एवं

सहायक निर्देशक-तारादत्त जोशी थे।


9. जुलाई, शनिवार

3 जुलाई, उदघाट्न प्रस्तुति 'तीलू रौतेली' के बाद बाल-उत्सव का सम्मापन सिर्फ़ एक नाट्य प्रस्तुति 'रामी बौराणी' से हुआ। अन्य 12 केन्द्रों की अपेक्षा इसका प्रस्तुति- अन्तराल कम था। एक फौजी का साधु-संत के भेष में अपनी माँ व पत्नी से मिलना एक सुखद अंत था। इस नाट्य प्रस्तुति के निर्देशक-आशीष शर्मा,भाषाविद- पृथ्वी सिंह केदारखण्डी,सहायक निर्देशक- रमेश ठंगरियाल थे। सम्मापन समारोह के मुख्य अतिथि दिल्ली शिक्षक विश्व विद्यालय के कुलपति प्रो. धनंजय जोशी ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति (नेशनल एडुकेशन पालिसी) के तहत सभी भाषाओं के प्रचार-प्रसार पर ज़ोर दिया था। जो की दिल्ली के 13 विभिन्न केंद्रों में उत्तराखण्ड की विविध भाषाओं में होने वाले सशक्त रंगमंचीय- कार्यशाला के माध्यम से करना उद्देश्य भी रहा है।

उत्तराखण्डी भाषा को लेकर देश की राजधानी दिल्ली में मराठी व बंगाली रंगमंच की तर्ज़ पर गढ़वाली व कुमाउनी रंगमंच में, 'पर्वतीय कला केंद्र', 'हाई हिलर्स' एवं 'पर्वतीय कला मंच' जैसी संस्थाएं आज भी सक्रिय हैं। इसके अलावा उत्तराखण्ड परिवेश में रंगमंच करने वालों में 'कला दर्पण', 'प्रज्ञा आर्ट्स' जैसी संस्थाएं प्रमुख हैं। 

गढ़वाली, कुमाउनी एवं जौनसारी अकादमी के13 केंद्रों में अकादमी के उपाध्यक्ष-एम.एस. रावत, सचिव-जीतराम भट्ट, कार्यक्रम समन्यवक- राकेश शर्मा एवं अकादमी के अन्य सक्रिय सदस्यों द्वारा किया गया यह प्रस्तुतिपरक रंगमंच कार्यशाला का प्रथम प्रयोग सराहनीय है।


अकादमी की ओर से अनेक घोषणाओं के बावजूद प्रेक्षागृह में खान-पान व मोबाइल में बात-चीत का सिलसिला आख़िर तक भी जारी रहा। यह तभी थमेगा, जब हम अनुशासन बनाने में अपनी व्यक्तिगत जिम्मेबारी समझेंगें।

गढ़वाली, कुमाउनी एवं जौनसारी अकादमी का यह ऐतिहासिक प्रयोग, एक खूबसूरत पड़ाव था। जिसकी दस्तक से देश की राजधानी में, एक सृजनात्मक हलचल रही। 20 दिनों की इस चुनौतियों से भरी प्रस्तुति परक कार्यशाला में अपनेपन के जज़्बे व कड़ी मेहनत से बच्चों का विश्वास जीतकर, उन्हें सँवारने-निखारने एवं 'व्यक्तित्व-विकास' की कड़ी में बच्चों के घर-परिवार के सदस्यों को उनकी छिपी प्रतिभा का बख़ूबी अहसास करवाना, तारीफ़े क़ाबिल है। 

सबने मिलकर इस अभियान को आगे बढ़ाना है। ताकि प्रदर्शन कला/रंगमंच के सशक्त माध्यम से अपनी उत्तराखंडी- कला, साहित्य, संस्कृति की अनूठी पहिचान, राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय फ़लक पर छा जाए।


समीक्षक -डाॅ सुवर्ण रावत

 रंगमंच विशेषज्ञ 


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Saturday, February 20, 2021

तार्किक अंतर्दृष्टि का एक बड़ा कथाकार पंकज बिष्ट

         (जन्मदिन पर विशेष)


पंकज बिष्ट जी को पढ़ते हुए जाने क्यों सबसे अधिक उत्सुकता मुझे उनकी प्रेम कहानियों के प्रति रही। उत्सुकता ये कि अपने विषयवस्तु के प्रति एक तरह की तटस्थता व तार्किक अंतर्दृष्टि का निर्वाह जो वह उपन्यासों में करते चलते हैं उसे किसी कहानी उसमें भी प्रेम कहानी में किस तरह निभाया जा रहा होगा। हाल ही मे 'शताब्दि से शेष' शीर्षक से उनकी कहानियाँ एक कलेवर में पढ़ने को मिली उसमें दो प्रेम कहानियाँ भी हैं। उनके यहाँ साधरण को गरिमापूर्ण उँचाई तक पहुंचाती विरल लेखकीय प्रतिबद्धता मिलती है।


पंकज बिष्ट जी की पहली कहानी 1967 में 'साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुई। पहला कहानी-संग्रह 1980 में 'पंद्रह जमा पच्चीस’ आया। इसके अतिरिक्त इनकी अन्य कृतियां इस प्रकार हैं : 'लेकिन दरवाजा’, 'उस चिडिय़ा का नाम’, 'पंखवाली नाव’ (उपन्यास), 'बच्चे गवाह नहीं हो सकते?’, 'टुंड्रा प्रदेश तथा अन्य कहानियाँ’, 'चर्चित कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह), 'गोलू और भोलू’ (बाल उपन्यास), 'हिंदी का पक्ष’, 'कुछ सवाल कुछ जवाब’, 'शब्दों के घर’ (लेख संग्रह)। 

 पंकज बिष्ट का मूल नाम प्रताप सिंह बिष्ट है और वे मूल रूप से रानीखेत के निकट एक गांव जो की पश्चिमी रामगंगा के तट पर स्थित है, के निवासी हैं। अपने एक साक्षात्कार में वे बताते हैं दो व्यक्तित्व जिनसे वे बाल्यकाल से ही सबसे ज्यादा प्रभावित रहे उनमें पहले हैं उनके पिताजी, पढ़ने के प्रति लगाव व श्रद्धा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई मगर मेरी कल्पनाशीलता को बढ़ाने में सबसे बड़ा योगदान मेरी मां का रहा है। वे बताते हैं अल्मोड़ा में उनके पिता ने एक समाचार पत्र का संपादन भी  किया था। पंकज जी ने जब वहां रहकर प्रेस का माहौल देखा तो तय कर लिया कि मैं भी पत्रकारिता या लेखन का कार्य करूंगा। बचपन में उन्होंने मैक्सिम गोर्की की कुछ किताबो के अतिरिक्त विश्व की  कई भाषा के अनुवाद पढ़े। पंकज जी का मानना रहा है कि अच्छी रचनाएं आपको प्रभावित करती हैं।उनकी पहली कहानी सन 67-68 में छपी।अपने पहले उपन्यास 'लेकिन दरवाजा' के विषय में बताते हुए वे कहते हैं लेकिन दरवाजा के समय में ऑल इंडिया रेडियो में था। वहां से छुट्टी लेकर मै, मेरी पत्नी जहां पोस्टेड थी वहां चला गया और वहीं वह उपन्यास पूरा किया।अपने लेखन पर बोलते हुए एक साक्षात्कार में वे बताते हैं कि मैं एक लेखक के रूप में मानव जीवन की सीमाओं,उसकी विडंबनाओं, पीड़ा, सुख,प्रेम और घृणा को समझने की कोशिश करता हूं।तब मैं जज नहीं होता। आज दर्शक भी नहीं होता जो विकृतियों में मजा ले।बल्कि मैं एक सर्जक होता हूं जो अपने चरित्रों को उनकी सीमाओं में देखने, समझने और नैतिकता,अनैतिकता से परे व्याख्यातित करने का प्रयास करता है।

पंकज बिष्ट जी के अब तक तीन उपन्यास व तीन कहानी संग्रह  प्रकाशित हुए हैं। उनके उपन्यासों के विषय बेहद नए और साहसिक कहे जा सकते हैं।

पंकज बिष्ट जी का पहला उपन्यास 'लेकिन दरवाजा' सन 1982 में प्रकाशित हुआ।हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में लेकिन दरवाजा एक नई शुरुआत के रूप में महत्वपूर्ण है जहां कथाकार बेहद आम भाषा में तत्कालीन साहित्यिक जगत की वास्तविकता से पर्दा उठाता है।यह उपन्यास एक तरह से सातवें- आठवें दशक की साहित्यिक दुनियां के सच को तो पाठकों के सामने रखता ही है साथ ही आने वाले साहित्यिक जगत के  अतिविकृत विशुद्ध व्यावसायिक  रूप की एक तरह से पूर्व घोषणा  करता दृष्टिगोचर होता है।लेकिन दरवाजा की रचना प्रक्रिया के विषय में बताते हुए पंकज बिष्ट कहते हैं- 'उपन्यास असल में महत्वाकांक्षा की सीमाओं को दर्शाने का प्रयास है।काफी हद तक यह मेरे साहित्य ओर कला जगत के अनुभवों और ऑब्जर्वेशन का नतीजा है।'


पंकज बिष्ट के उपन्यास 'लेकिन दरवाजा' के विषय में गीत चतुर्वेदी अपनी डायरी-3 (4 सितंबर,2008) में लिखते हैं- 

' जब पंकज बिष्ट लेकिन दरवाजा लिख रहे थे,तो वह भारतीय मध्य वर्ग की सारी लंपटई, स्वार्थ में पगी भावुकता, झूठ, मक्कारी पकड़ रहे थे। अस्सी के शुरू में ऐसा मध्य वर्ग बन भी रहा था......।

गीत चतुर्वेदी इसे पिछले पच्चीस सालों का श्रेष्ठ उपन्यास मानते हैं।

'उस चिड़िया का नाम' उनका दूसरा उपन्यास उस चिड़िया का नाम जैसा वे स्वयं कहते हैं ' एक ठहरे हुए समाज से एक आधुनिक व्यक्ति के टकराव पर आधारित' उपन्यास है। पहाड़ों के नीरव व संघर्षशील जीवन के मध्य आगे बढ़ती कथा रमा उसके भाई हरीश,पिता व पार्वती के जीवन के इर्द गिर्द घूमती है। रमा के पिता की मृत्यु हो जाती है और मृत्यु के बाद पिता व पार्वती के संबंधों के आलोक में रमा व हरीश  गुजरे अतीत का पुनर्परीक्षण करते दिखाई देते हैं।इसी क्रम में इस क्षेत्र में प्रचलित एक लोक कथा की चिड़िया की कथा से लेखक रमा के पिता की कथा की तुलना करता है। किस प्रकार पिता का अकेलापन व निर्भरता उन्हें उस उम्र में पार्वती के निकट ले आती है। इस उपन्यास के बहाने उत्तराखंड के पर्वतीय जीवन,वहां के रहन- सहन,लोक कथाओं,लोक जीवन की जानकारी भी कथाकार पाठक के सम्मुख पहुंचाने का प्रयास करता है। इस उपन्यास में कुमाऊं का लोक जीवन उसकी समग्रता में अभिव्यक्त हुआ है।वहां का परिवेश,संस्कृति,मान्यताएं व संघर्ष के साथ लोक जीवन और लोक कथाएं भी।कुमाऊं में प्रचलित लोक कथाओं के मर्म तक पहुंचता लेखक संपूर्ण क्षेत्र के सांस्कृतिक भावनाओं को विस्तृत अभिव्यक्ति प्रदान करता है।  


'पंख वाली नाव' बिष्ट जी का तीसरा व अन्तिम उपन्यास है। सन 2009 में प्रकाशित इस उपन्यास को विषय की नवीनता व लेखकीय अंतर्दृष्टि  हिंदी उपन्यास यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपन्यास के रूप में सामने रखती है। समलैंगिकता जैसे संवेदनशील विषय पर बिना जजमेंटल हुए आधुनिक जीवन में मानवीय वृत्तियों की जटिलताओं को बड़ी ही तटस्थता व संवेदनशीलता के साथ डील करना इस उपन्यास की उपलब्धि है। साहित्य,चित्रकला, सिनेमा आदि माध्यमों से पहले भी समलैंगिक विषयों को उठाया जाता रहा है। साहित्य के क्षेत्र में संभवतः इस्मत चुग़ताई की कहानी ' लिहाफ' सबसे पहली कहानी है जो इस विषय पर बात करती है। निराला के उपन्यास ' कुल्ली भांट' व नागार्जुन का उपन्यास ' रतिनाथ की चाची ' इस विषय को उठाता है। इस उपन्यास में समलैंगिक व्यक्ति का अंतर्द्वंद्व, अं संबंधों की जटिलता व उनका संघर्ष बड़े ही सहज रूप में दर्शाया गया है। उपन्यास का मुख्य पात्र अनुपम एक समलैंगिक है व अपने कार्य में दक्ष है। वह हर कार्य में पूर्णता देखने का पक्षधर है।अपने व्यक्तिगत जीवन की आकांक्षाओं व त्रासदियों में एक रहस्मय व्यक्ति प्रतीत होता है। दूसरी तरफ विक्रम उसका सहकर्मी, विषम लैंगिक है।विक्रम के ना चाहते हुए भी दोनों में मित्रता होती है। मित्रता के विभिन्न स्तरों से गुजरते विक्रम,अनुपम के जीवन के कई रहस्यों से दो चार होता है। यद्यपि अनुपम के उसके प्रति आकर्षण को देखकर विक्रम को घृणा होती है और वो बड़ी ही तटस्थता से असहमति व्यक्त कर देता है। इसके बाद भी दोनों की भावनात्मक निकटता काम नहीं होती। बिना भाषा की शालीनता खोए,बिना अश्लील व्याख्याओं के किस तरह इस तरह के संवेदनशील व कम छुए जाने वाले विषयों को उठाया जाता है,यह इस उपन्यास में देखा जा सकता है। 

"लगा कोई हिंसक पशु झपट पड़ा है। ना चाहते हुए भी मेरी नजर उस पर टिकी। उसकी आंखें बंद थी तनाव से लाल चेहरे को पसीने ने पहली  बौछार के बाद खिड़की के कांच पर छाई बूदों की तरह ढक लिया

था। जुगुप्सा से मैं गहरे तक भर गया।"

"उसका बाया हाथ बढ़कर मेरे दाएं पैर के पंजे को सहलाने लगा था वह जिस वह वाला से निवेदन कर रहा था उसने मेरे अंदर हड़कंप मचा दिया था मेरे पैर स्वयं ही सिकुड़ कर उसके हाथों से दूर हो गए।"

उनके उपन्यास आधुनिक समाज में उपजी विसंगतियों की तरफ तार्किक हस्तक्षेप करते दिखाई देते हैं। सही- गलत के फेर में उलझे बिना, संवेदनशील मानसिकता से समस्याओं के पीछे  की मनोवृति व कारणों  की एक लंबी श्रृंखला को समझने व उसे व्याख्यायित करने का प्रयास करते हैं। अपने पात्रों के साथ वे एक मित्र की तरह' डील ' करते हैं जो उनकी विचारधारा विशेष को सही या गलत ठहराने के बजाय उन परिस्थितियों की जटिलताओं को समझने का प्रयास करता है जो इस विसंगति के लिए उत्तरदाई है।

पंकज बिष्ट के उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता पात्रों के चरित्र चित्रण वह घटनाओं के वर्णन में बौद्धिक व तार्किक अंतर्दृष्टि है। इस ओर पंख वाली नाव उपन्यास में अनुपम के एक समलैंगिक के रूप में अस्वाभाविक व्यवहार को वे कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं- 

"दूसरी ओर अनुपम था। जो यौन व्यवहार में गड़बड़ी का शिकार था। पर्वसन नहीं तो भी वह किसी और की, एक तरह की, पथभ्रष्टता का शिकार रहा था और अब उसने अपने उस उत्पीड़न को अपनी नियति मान लिया था। पर जिसे वह मानने को तैयार नहीं था। यह मेरा तर्क था, जो मैंने उसे बतला भी दिया था। "अगर यह स्वाभाविक है तो प्रकृति ने उसे कुछ और ही बनाया होता। या फिर अगर वह प्रकृति की देन है तो प्रकृति के विकास की दिशा ही मुड़ गई लगती है। आदमी और औरत के बीच के भेद को खत्म करने की ओर। एक ऐसे उभय लिंगी जीव को विकसित करने की प्रक्रिया में जिस में ना औरत औरत होगी ना आदमी आदमी। यानी वो औरत भी होगा और आदमी भी।"

कथाकार के रूप में पंकज बिष्ट अपने कथा साहित्य के माध्यम से अपने समाज को उसकी समग्रता में देखते हैं। उनका उपन्यास लेकिन दरवाजा एक तरह से सातवें- आठवें दशक के सांस्कृतिक जगत का संपूर्ण दस्तावेज कहा जा सकता है। यह उपन्यास सांस्कृतिक जगत के विविध पक्षों साहित्य, चित्रकला, सिनेमा इत्यादि के संकटों पर तो बोलता ही है मगर लेकिन इस से गुजरते तत्कालीन समाज की विचारधारा, राजनीतिक दृष्टि व आर्थिकी से भी हम परिचित होते हैं। यही एक अच्छे उपन्यासकार की सबसे बड़ी विशेषता है।


मीना पाण्डेय 

Friday, December 11, 2020

ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा

 किताब का नाम-ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’   मूल्य-250/  प्रकाशक- प्रखर गूँज




शिखर चंद जैन जी की रचनाएँ  प्रखरगूँज पब्लिकेशन की पत्रिका साहित्यनामामें पढ़कर मैं पहले से ही उनकी प्रशंसक  थी. जब मुझे पता चला  कि उनकी एक किताब ज़िंदगी ना मिलेगी दोबाराछपने वाली है, तो मैं उसके प्रकाशन की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगी और जैसे ही यह अमाजोंन पर उपलब्ध होने की सूचना मिली, तो मैंने तुरंत ऑर्डर कर दिया.मेरे हाथ में किताब के आते ही  सबसे पहले तो मैं उसके फूलों से सजे मैरून रंग के कवर की  सुन्दरता को देखकर ही सुखद एहसास से घिर गई. फिर किताब के अन्दर शब्दों की छपाई, जो कि सामान्य से अधिक बड़े अक्षरों में है  और जहां किसी मुख्य बात को लिखना  था, वहां उसे बोल्ड शब्दों में उभारा गया है, जिससे पढ़ने  वालों को तनिक भी अतिरिक्त  प्रयास नहीं करना पड़ता.उसके बाद हम आते हैं,पृष्ट की गुणवत्ता पर, बिलकुल दूधिया रंग के मोटे और चमकदार पृष्ट, जिसको पलटने में आपस में चिपकने की जरा भी असुविधा नहीं होती और पाठक के पढने का उत्साह दोगुना कर देती है. किताब की प्रेजेंटेशन ने उसमें चार चांद लगा दिए हैं. वैसे ही जैसे हम किसी रेस्टोरेंट के खाने की तारीफ़ सुनकर जाते हैं और  वहां के रख रखाव,सज्जा,वातावरण और अच्छी सर्विस होने से खाना चौगुना स्वादिष्ट लगता है.

  .किताब का शीर्षक ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारासे ही यह स्पष्ट है कि इस किताब का सार है कि यह ज़िंदगी  दोबारा नहीं मिलेगी,यह अनमोल है, इसलिए हमें इसे बोझ समझ कर नहीं काटना चाहिए, बल्कि इसके एक-एक पल को  भरपूर आनंद लेकर जीना चाहिए. यह किताब जीवन अच्छी तरह और भरपूर जीने की प्रेरणा देने के उद्देश्य से लिखी गई है.

अब शिखर चंद जी की  किताब के अन्दर लिखे विषय सूची  पर आती हूँ, जिसमें एकतीस विषय  हैं और  हर विषय में भिन्नता और विविधता देखते ही बन पड़ रही है.लेखक ने  जीवन के प्रत्येक पहलू पर  विचार करके सुझाव लिखे हैं, जबकि मैंने बहुत सी किताबों में हमारे व्यक्तित्व के एक ही पहलू पर पूरी किताब लिखी हुई पढी है. इसमें सबसे पहले विषय आपकी ज़िंदगी को बदल देंगे ये विचारका पृष्ट खोलते ही बोल्ड शब्दों में लिखे बोझिल रिश्तों को तोड़ देंपर मेरी नज़र पड़ी. उसमें एक वाक्य ने यदि कोई व्यक्ति आपके आंसुओं की वजह बनता है तो बार-बार आंसू पोंछने के बजाय उस व्यक्ति को ही अपने से दूर कर दें, पढ़ते ही मुझे कुछ पारिवारिक दुखदाई  रिश्तों को तोड़ने पर मेरी इस  सोच से कि आखिर खून के रिश्ते तो खून के ही होते हैं,दुविधा की स्थिति से मुक्ति मिल गई.जब मुझे मेरी उलझन से इस किताब में दिए गए सुझाव से मुक्ति मिल सकती है तो आपको क्यों नहीं...! किताब के दूसरे अध्याय में  कैसे बढाएं विलपावरपर आपको तथ्यपरक सुझाव मिलेंगे. तीसरे अध्याय में हम सभी खुश तो रहना चाहते हैं,लेकिन कैसे रहें,इसका जवाब आपको खुशी ऐसे मिलती हैशीर्षक के अंतर्गत मिलेगा. ऐसी बहुत सारे कार्य  हैं जिनके नुकसान  न जानने  के कारण हम उसमें लिप्त रहते हैं और  अपनी ऊर्जा और समय बारबाद करते हैं,इन सबका जवाब इस किताब में है. चावल का एक दाना पका देखकर हम समझ जाते हैं कि सारे चावल पक गए हैं,इसलिए इतने उदाहरणों से ही पूरी किताब समझ में आ जानी चाहिए, क्योंकि प्रत्येक विषय के बारे में जानकारी देना संभव नहीं है.

लेखक द्वारा  हर प्रकार की  आपकी  मानसिक और सामाजिक उलझनें जिनके सुझाव आप किसी पत्र- पत्रिका में भेजकर पूछते हैं या उनमें ढूंढते हैं, किसी काउंसलर या मनोचिकित्सक के पास जाते हैं, गुरुओं के प्रवचन सुनने जाते हैं, जिससे समय, ऊर्जा और धन की भी बरबादी होती है, वे सब  एक ही पुस्तक में लिखी हुई मिल जाए तो इससे अच्छी बात क्या है.पत्रिकाएँ या समाचार पत्र तो हम पढ़कर बेकार समझकर रद्दी में बेच देते हैं, लेकिन किताब तो आप जीवन-पर्यंत अपने पास रख सकते हैं.

हमें पता होना चाहिए कि यदि  हमारा मनोबल (विल पावर ) जो हमारे मन से जुड़ा है,मज़बूत हो तो शारीरिक बीमारियों का असर हमारे मन पर नहीं पड़ता और शारीरिक बीमारियों का इलाज पूरी तरह से डॉक्टर कर सकते हैं, लेकिन मानसिक बीमारी का इलाज पूरी तरह मनोचिकित्सक  नहीं कर सकता और इस बीमारी का  हमारे शरीर पर असर अवश्य पड़ता है.हम बड़ी  से बड़ी शारीरिक बीमारी को  और बड़ी से बड़ी तकलीफ को  अपने मजबूत मनोबल से ठीक कर  सकते हैं, उसके लिए हमें प्रयास करना पड़ता है. यह मेरा नहीं मनोचिकित्सकों का कहना है.हम मानसिक बीमारी अवसाद के  होने पर मनोचिकित्सक के पास जाते हैं तो वह दवा के साथ हमें अच्छी किताबें पढने के लिए और अच्छे मित्र बनाने की सलाह देते हैं,क्योंकि दवा कुछ  प्रतिशत ही असर करती है और अच्छी किताबें और मित्रों का साथ हमारा मनोबल बढाता है,जिससे  इस बीमारी को ठीक करने में अधिक योगदान  होता है, इसलिए हमें  किताबें अवश्य पढनी चाहिए , खासकर जो हमारी नकारात्मक सोच से उपजी समस्या को सकारात्मक सोच में बदलने के उपायों पर लिखी गयी हों.

अपनी  किताब में लेखक ने केवल अपने ही विचार नहीं रखे,बल्कि बहुत सारे  महान दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों  के विचारों के साथ अनेक उदाहरणों को भी सम्मलित करके उसे तथ्यों समेत वास्तविकता की कसौटी पर भी खरा उतारा है. यही नहीं खुद की या अन्य किसी दूसरे के लिखे गए शेर, जिन्हें पढ़कर पाठक का भरपूर मनोरंजन भी होता है , इन सबको पढ़कर महसूस होता है कि लेखक ने लिखने से पहले सभी विषयों पर गहन अध्ययन किया है.

इस किताब की सबसे अच्छी बात तो यह है कि इसकी भाषा बोलचाल वाली सरल भाषा है,जिसमे क्लिष्टता नाम मात्र को भी नहीं है,इसलिए इसे साधारण से साधारण पढ़ा-लिखा इंसान भी पढ़ सकता है.मैंने और भी हिन्दी और अंग्रेज़ी में इस तरह की किताबें पढी हैं,लेकिन भाषा की क्लिष्टता के कारण पढना इतना सरल नहीं लगा.

 

 यह भी सर्वविदित है  कि किसी का भी जीवन हमेशा सामान्य  नहीं रहता.सभी के जीवन में कभी न कभी ऐसा समय आता है जब वह समस्याओं से घबडाकर अवसाद से घिर जाता है.मुझे एक व्यक्तिगत घटना याद आ गई है,जो मैं यहाँ साझा करना चाहूंगी.एक बार मुझे भी अवसाद ने घेर लिया था.मेरी बेटी ने एक किताब मेगालिविंग ( Megaliving ), जिसके लेखक रोबिन शर्माहैं,मुझे पढने को दी. उसका पहला पृष्ट खोलते ही मेरी नज़र बोल्ड शब्दों में लिखी एक पंक्ति पर पड़ी,कंट्रोल योर थॉट,इट विल कंट्रोल योर माइंड.कंट्रोल योर माइंड, इट विल कंट्रोल योर बौडी. अर्थात अपने विचारों को कंट्रोल कर लेंगे तो अपने शरीर पर भी हमारा कंट्रोल रहेगा.आपको जानकार आश्चर्य होगा कि यह  पढ़ते ही मेरे मन में सकारात्मक विचार आने के कारण  मैं ऊर्जा से भर उठी और थोड़ी देर पहले जिस शरीर की कमजोरी से मैं उठ नहीं पा रही थी उसमें ताकत आ गयी और मैं सामान्य हो गयी.इतनी ताकत होती है इस तरह की किताबों में.

आज लॉकडाउन के समय घर में बंद रहने से  जो मनुष्य सोशल एनीमलमाना जाता है, अब सोशल डिस्टेंसिंग  के कारण सिर्फ पिंजरे में बंद एनीमल होकर  रह गया है, इसलिए  अकेलेपन और खालीपन  के कारण अवसाद से घिर रहा है,यहाँ तक कि आत्महत्या तक कर रहा है.ऐसे में इस तरह की मनोबल मजबूत करके के लिए प्रेरित करने वाली किताबें पढनी बहुत ज़रूरी है.लॉकडाउन खुलने के बाद भी अपनी खुशी के लिए किसी पर निर्भरता कभी सुखद परिणाम नहीं देती,इसलिए ऐसी किताबों से मित्रता करनी आवश्यक है,क्योंकि ये कभी हमारा साथ नहीं छोड़ेगी.बल्कि अपने किसी परिचित को भी किसी अवसर पर या वैसे ही यह किताब उपहार स्वरुप देंगे, तो उनके लिए इससे अधिक अनमोल उपहार कुछ भी नहीं होगा.

रही बात किताब के मूल्य की ,यह दो सौ पचास की किताब है,जिसमें कुल मिलाकर एक सौ दस पृष्ठ हैं, जो कि इसकी गुणवत्ता के सामने कुछ भी नहीं है.हम एक कपड़ा खरीदते हैं तो पसंद आने पर अधिक मूल्य होने पर भी खरीदने से अपने को रोक नहीं पाते,जो सिर्फ हमारे शरीर के बाहरी आवरण को खूबसूरत बनाता है,लेकिन   एक किताब, जिसके लिए कहा जाता है कि वह हमारा अकेलेपन का सबसे अच्छा मित्र है, जो हमारे मनोरंजन के साथ हमारे ज्ञान की भी वृद्धि करता है,उसे खरीदते समय हम उसके मूल्य के लिए, इतना सोच-विचार करते हैं, यह  हमारी गलत सोच का ही परिणाम है. सारी  समस्या तो  हमारे नकारात्मक सोच का ही परिणाम है, जिसको बदलने के लिए हमें सकारात्मक सोच पैदा करने की सीख देने वाली किताबें पढनी चाहिए.

 अभी तीन चार वर्षों में कई नई प्रकाशन संस्थाएं खुली हैं,लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से प्रखरगूंजप्रकाशन का कोई मुकाबला नहीं है.इस प्रकाशन की संचालिका  नीलू सिन्हा जीबहुत कर्मठ महिला हैं,जिन्होंने अपनी मेहनत, लगन और कार्य के प्रति सच्चाई और एकनिष्ठता के कारण बहुत थोड़े समय में प्रसिद्धि पा ली है.

 

सुधा कसेरा,

सिकंदराबाद