(जन्मदिन पर विशेष)
पंकज बिष्ट जी को पढ़ते हुए जाने क्यों सबसे अधिक उत्सुकता मुझे उनकी प्रेम कहानियों के प्रति रही। उत्सुकता ये कि अपने विषयवस्तु के प्रति एक तरह की तटस्थता व तार्किक अंतर्दृष्टि का निर्वाह जो वह उपन्यासों में करते चलते हैं उसे किसी कहानी उसमें भी प्रेम कहानी में किस तरह निभाया जा रहा होगा। हाल ही मे 'शताब्दि से शेष' शीर्षक से उनकी कहानियाँ एक कलेवर में पढ़ने को मिली उसमें दो प्रेम कहानियाँ भी हैं। उनके यहाँ साधरण को गरिमापूर्ण उँचाई तक पहुंचाती विरल लेखकीय प्रतिबद्धता मिलती है।
पंकज बिष्ट जी की पहली कहानी 1967 में 'साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुई। पहला कहानी-संग्रह 1980 में 'पंद्रह जमा पच्चीस’ आया। इसके अतिरिक्त इनकी अन्य कृतियां इस प्रकार हैं : 'लेकिन दरवाजा’, 'उस चिडिय़ा का नाम’, 'पंखवाली नाव’ (उपन्यास), 'बच्चे गवाह नहीं हो सकते?’, 'टुंड्रा प्रदेश तथा अन्य कहानियाँ’, 'चर्चित कहानियाँ’ (कहानी-संग्रह), 'गोलू और भोलू’ (बाल उपन्यास), 'हिंदी का पक्ष’, 'कुछ सवाल कुछ जवाब’, 'शब्दों के घर’ (लेख संग्रह)।
पंकज बिष्ट का मूल नाम प्रताप सिंह बिष्ट है और वे मूल रूप से रानीखेत के निकट एक गांव जो की पश्चिमी रामगंगा के तट पर स्थित है, के निवासी हैं। अपने एक साक्षात्कार में वे बताते हैं दो व्यक्तित्व जिनसे वे बाल्यकाल से ही सबसे ज्यादा प्रभावित रहे उनमें पहले हैं उनके पिताजी, पढ़ने के प्रति लगाव व श्रद्धा उन्हें वहीं से प्राप्त हुई मगर मेरी कल्पनाशीलता को बढ़ाने में सबसे बड़ा योगदान मेरी मां का रहा है। वे बताते हैं अल्मोड़ा में उनके पिता ने एक समाचार पत्र का संपादन भी किया था। पंकज जी ने जब वहां रहकर प्रेस का माहौल देखा तो तय कर लिया कि मैं भी पत्रकारिता या लेखन का कार्य करूंगा। बचपन में उन्होंने मैक्सिम गोर्की की कुछ किताबो के अतिरिक्त विश्व की कई भाषा के अनुवाद पढ़े। पंकज जी का मानना रहा है कि अच्छी रचनाएं आपको प्रभावित करती हैं।उनकी पहली कहानी सन 67-68 में छपी।अपने पहले उपन्यास 'लेकिन दरवाजा' के विषय में बताते हुए वे कहते हैं लेकिन दरवाजा के समय में ऑल इंडिया रेडियो में था। वहां से छुट्टी लेकर मै, मेरी पत्नी जहां पोस्टेड थी वहां चला गया और वहीं वह उपन्यास पूरा किया।अपने लेखन पर बोलते हुए एक साक्षात्कार में वे बताते हैं कि मैं एक लेखक के रूप में मानव जीवन की सीमाओं,उसकी विडंबनाओं, पीड़ा, सुख,प्रेम और घृणा को समझने की कोशिश करता हूं।तब मैं जज नहीं होता। आज दर्शक भी नहीं होता जो विकृतियों में मजा ले।बल्कि मैं एक सर्जक होता हूं जो अपने चरित्रों को उनकी सीमाओं में देखने, समझने और नैतिकता,अनैतिकता से परे व्याख्यातित करने का प्रयास करता है।
पंकज बिष्ट जी के अब तक तीन उपन्यास व तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उनके उपन्यासों के विषय बेहद नए और साहसिक कहे जा सकते हैं।
पंकज बिष्ट जी का पहला उपन्यास 'लेकिन दरवाजा' सन 1982 में प्रकाशित हुआ।हिंदी उपन्यास के क्षेत्र में लेकिन दरवाजा एक नई शुरुआत के रूप में महत्वपूर्ण है जहां कथाकार बेहद आम भाषा में तत्कालीन साहित्यिक जगत की वास्तविकता से पर्दा उठाता है।यह उपन्यास एक तरह से सातवें- आठवें दशक की साहित्यिक दुनियां के सच को तो पाठकों के सामने रखता ही है साथ ही आने वाले साहित्यिक जगत के अतिविकृत विशुद्ध व्यावसायिक रूप की एक तरह से पूर्व घोषणा करता दृष्टिगोचर होता है।लेकिन दरवाजा की रचना प्रक्रिया के विषय में बताते हुए पंकज बिष्ट कहते हैं- 'उपन्यास असल में महत्वाकांक्षा की सीमाओं को दर्शाने का प्रयास है।काफी हद तक यह मेरे साहित्य ओर कला जगत के अनुभवों और ऑब्जर्वेशन का नतीजा है।'
पंकज बिष्ट के उपन्यास 'लेकिन दरवाजा' के विषय में गीत चतुर्वेदी अपनी डायरी-3 (4 सितंबर,2008) में लिखते हैं-
' जब पंकज बिष्ट लेकिन दरवाजा लिख रहे थे,तो वह भारतीय मध्य वर्ग की सारी लंपटई, स्वार्थ में पगी भावुकता, झूठ, मक्कारी पकड़ रहे थे। अस्सी के शुरू में ऐसा मध्य वर्ग बन भी रहा था......।
गीत चतुर्वेदी इसे पिछले पच्चीस सालों का श्रेष्ठ उपन्यास मानते हैं।
'उस चिड़िया का नाम' उनका दूसरा उपन्यास उस चिड़िया का नाम जैसा वे स्वयं कहते हैं ' एक ठहरे हुए समाज से एक आधुनिक व्यक्ति के टकराव पर आधारित' उपन्यास है। पहाड़ों के नीरव व संघर्षशील जीवन के मध्य आगे बढ़ती कथा रमा उसके भाई हरीश,पिता व पार्वती के जीवन के इर्द गिर्द घूमती है। रमा के पिता की मृत्यु हो जाती है और मृत्यु के बाद पिता व पार्वती के संबंधों के आलोक में रमा व हरीश गुजरे अतीत का पुनर्परीक्षण करते दिखाई देते हैं।इसी क्रम में इस क्षेत्र में प्रचलित एक लोक कथा की चिड़िया की कथा से लेखक रमा के पिता की कथा की तुलना करता है। किस प्रकार पिता का अकेलापन व निर्भरता उन्हें उस उम्र में पार्वती के निकट ले आती है। इस उपन्यास के बहाने उत्तराखंड के पर्वतीय जीवन,वहां के रहन- सहन,लोक कथाओं,लोक जीवन की जानकारी भी कथाकार पाठक के सम्मुख पहुंचाने का प्रयास करता है। इस उपन्यास में कुमाऊं का लोक जीवन उसकी समग्रता में अभिव्यक्त हुआ है।वहां का परिवेश,संस्कृति,मान्यताएं व संघर्ष के साथ लोक जीवन और लोक कथाएं भी।कुमाऊं में प्रचलित लोक कथाओं के मर्म तक पहुंचता लेखक संपूर्ण क्षेत्र के सांस्कृतिक भावनाओं को विस्तृत अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
'पंख वाली नाव' बिष्ट जी का तीसरा व अन्तिम उपन्यास है। सन 2009 में प्रकाशित इस उपन्यास को विषय की नवीनता व लेखकीय अंतर्दृष्टि हिंदी उपन्यास यात्रा में एक महत्वपूर्ण उपन्यास के रूप में सामने रखती है। समलैंगिकता जैसे संवेदनशील विषय पर बिना जजमेंटल हुए आधुनिक जीवन में मानवीय वृत्तियों की जटिलताओं को बड़ी ही तटस्थता व संवेदनशीलता के साथ डील करना इस उपन्यास की उपलब्धि है। साहित्य,चित्रकला, सिनेमा आदि माध्यमों से पहले भी समलैंगिक विषयों को उठाया जाता रहा है। साहित्य के क्षेत्र में संभवतः इस्मत चुग़ताई की कहानी ' लिहाफ' सबसे पहली कहानी है जो इस विषय पर बात करती है। निराला के उपन्यास ' कुल्ली भांट' व नागार्जुन का उपन्यास ' रतिनाथ की चाची ' इस विषय को उठाता है। इस उपन्यास में समलैंगिक व्यक्ति का अंतर्द्वंद्व, अं संबंधों की जटिलता व उनका संघर्ष बड़े ही सहज रूप में दर्शाया गया है। उपन्यास का मुख्य पात्र अनुपम एक समलैंगिक है व अपने कार्य में दक्ष है। वह हर कार्य में पूर्णता देखने का पक्षधर है।अपने व्यक्तिगत जीवन की आकांक्षाओं व त्रासदियों में एक रहस्मय व्यक्ति प्रतीत होता है। दूसरी तरफ विक्रम उसका सहकर्मी, विषम लैंगिक है।विक्रम के ना चाहते हुए भी दोनों में मित्रता होती है। मित्रता के विभिन्न स्तरों से गुजरते विक्रम,अनुपम के जीवन के कई रहस्यों से दो चार होता है। यद्यपि अनुपम के उसके प्रति आकर्षण को देखकर विक्रम को घृणा होती है और वो बड़ी ही तटस्थता से असहमति व्यक्त कर देता है। इसके बाद भी दोनों की भावनात्मक निकटता काम नहीं होती। बिना भाषा की शालीनता खोए,बिना अश्लील व्याख्याओं के किस तरह इस तरह के संवेदनशील व कम छुए जाने वाले विषयों को उठाया जाता है,यह इस उपन्यास में देखा जा सकता है।
"लगा कोई हिंसक पशु झपट पड़ा है। ना चाहते हुए भी मेरी नजर उस पर टिकी। उसकी आंखें बंद थी तनाव से लाल चेहरे को पसीने ने पहली बौछार के बाद खिड़की के कांच पर छाई बूदों की तरह ढक लिया
था। जुगुप्सा से मैं गहरे तक भर गया।"
"उसका बाया हाथ बढ़कर मेरे दाएं पैर के पंजे को सहलाने लगा था वह जिस वह वाला से निवेदन कर रहा था उसने मेरे अंदर हड़कंप मचा दिया था मेरे पैर स्वयं ही सिकुड़ कर उसके हाथों से दूर हो गए।"
उनके उपन्यास आधुनिक समाज में उपजी विसंगतियों की तरफ तार्किक हस्तक्षेप करते दिखाई देते हैं। सही- गलत के फेर में उलझे बिना, संवेदनशील मानसिकता से समस्याओं के पीछे की मनोवृति व कारणों की एक लंबी श्रृंखला को समझने व उसे व्याख्यायित करने का प्रयास करते हैं। अपने पात्रों के साथ वे एक मित्र की तरह' डील ' करते हैं जो उनकी विचारधारा विशेष को सही या गलत ठहराने के बजाय उन परिस्थितियों की जटिलताओं को समझने का प्रयास करता है जो इस विसंगति के लिए उत्तरदाई है।
पंकज बिष्ट के उपन्यासों की सबसे बड़ी विशेषता पात्रों के चरित्र चित्रण वह घटनाओं के वर्णन में बौद्धिक व तार्किक अंतर्दृष्टि है। इस ओर पंख वाली नाव उपन्यास में अनुपम के एक समलैंगिक के रूप में अस्वाभाविक व्यवहार को वे कुछ इस तरह व्यक्त करते हैं-
"दूसरी ओर अनुपम था। जो यौन व्यवहार में गड़बड़ी का शिकार था। पर्वसन नहीं तो भी वह किसी और की, एक तरह की, पथभ्रष्टता का शिकार रहा था और अब उसने अपने उस उत्पीड़न को अपनी नियति मान लिया था। पर जिसे वह मानने को तैयार नहीं था। यह मेरा तर्क था, जो मैंने उसे बतला भी दिया था। "अगर यह स्वाभाविक है तो प्रकृति ने उसे कुछ और ही बनाया होता। या फिर अगर वह प्रकृति की देन है तो प्रकृति के विकास की दिशा ही मुड़ गई लगती है। आदमी और औरत के बीच के भेद को खत्म करने की ओर। एक ऐसे उभय लिंगी जीव को विकसित करने की प्रक्रिया में जिस में ना औरत औरत होगी ना आदमी आदमी। यानी वो औरत भी होगा और आदमी भी।"
कथाकार के रूप में पंकज बिष्ट अपने कथा साहित्य के माध्यम से अपने समाज को उसकी समग्रता में देखते हैं। उनका उपन्यास लेकिन दरवाजा एक तरह से सातवें- आठवें दशक के सांस्कृतिक जगत का संपूर्ण दस्तावेज कहा जा सकता है। यह उपन्यास सांस्कृतिक जगत के विविध पक्षों साहित्य, चित्रकला, सिनेमा इत्यादि के संकटों पर तो बोलता ही है मगर लेकिन इस से गुजरते तत्कालीन समाज की विचारधारा, राजनीतिक दृष्टि व आर्थिकी से भी हम परिचित होते हैं। यही एक अच्छे उपन्यासकार की सबसे बड़ी विशेषता है।
मीना पाण्डेय

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