Wednesday, April 18, 2018

पुस्तक चर्चा-दर्पण

‌‌                    समाज का प्रतिबिंब है 'दर्पण'।


पुस्तकः  दर्पण
कवयित्रीः  डा. निशि मोहन
प्रकाशनः  महिन्द्रा पब्लिशिंग हाउस, चंडीगढ़।
मूल्यः ₹ 175:00

डा. निशि मोहन का प्रकाशित काव्य संकलन 'दर्पण' राजनीतिक व समाजिक घटनाओं, नारी विमर्श , कृषक व श्रमिक जीवन की दुखद स्थिति के साथ-साथ आधुनिक जीवन की समस्याओं को उजागर ही नहीं करता बल्कि उन पर कुठाराघात भी करता है।
काव्य संकलन की प्रथम कविता 'माँ' माँ के समर्पण व उसके वात्सल्य प्रेम  को प्रस्तुत करती है। गुरु गोबिन्द सिंह की महिमा का गुणगान करती पंक्ति 'मनुष्य वेश में वह दिव्य आत्मा मानवधर्म सिखाने आया था'  उनके जीवन की सटीक व्याख्या करती है।

'विकास बनाम विनाश', 'बस करो' तथा 'धरती का दम घुटता है' में प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता व हमारी आधुनिक जीवन शैली पर कड़ा प्रहार है। कविता की पंक्ति ''जितना ऊँचा उठता है तरु/ उसकी पैठ उतनी गहरी होती/ तभी तो झंझावात में सीना ताने रहता है खड़ा/पर, आधुनिकता वश इंसा अपनी जड़ों को खोद रहा'' अपनी प्रासंगिकता  को खुद बयान कर रही है। '26/11की कहानी ताज की जुबानी' आतंकवाद की भयावहता , दहशत तथा सेना की अद्भुत शौर्य की गाथा है। कविता  'दुश्मन को सबक सिखाना है' कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद तथा वीर सैनिक व उनके परिवार के साहस व देश भक्ति को दर्शाती है।   समझौता एक्सप्रेस में मारे गए लोगों के प्रति संवेदनशील कवयित्री ने 'क्या मिला' कविता में असमाजिक गतिविधियों में संलग्न तत्वों से बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रश्न पूछा है''क्या मिला बेगुनाहों को मौत की नींद सुला के'' ? 'मँहगाई और मज़बूरी' , 'पहचानो श्रम की महत्ता' तथा 'अमीरी - गरीबी' कविता देश के निम्न वर्ग(श्रमिक, कृषक) के जीवन की व्यथा को सुनाती है।"आँचल में शिशु का क्रन्दन/आँखों से टपक रही मज़बूरी" पंक्ति देश की निर्धन माताओं की विवशता और बदहाली की ओर ध्यान आकृष्ट करती है। 'काश! ऐसा ही होता' नेताओं की कभी न पूरे होने वाले वादों को दर्शाती है। सुनामी , बादल फटने तथा बाढ़  जैसी प्राकृतिक त्रासदी का वर्णन कवयित्री ने अपनी कविताओं में किया है। "जब जीवन ज्योति बुझने लगी तब/ वह घी डाल कहता जलने को " पंक्ति भयंकर तबाही के बीच गाहे- बगाहे होनेवाले नवागत के जन्म की दास्तां सुनाती  है, जो कवयित्री की आशावादी सोच को दर्शाती है।
'माँ की ममता', 'दूर नहीं पास है तू' , 'आधी आबादी', 'माँ के दिल का खौफ','असुरक्षित मासूम', 'मुझे बचा लो' , 'नारी समाज की त्रासदी ', ' इक्कीसवीं सदी की बेटियाँ ' कविताएँ नारी जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती हैं। इनमें माँ की ममता से लेकर गर्भस्थ शिशु की पुकार के साथ आधुनिक समाज में कन्याओं के लिए बढ़ती असुरक्षा की अभिव्यक्त है।
 " न चाहिए उपाधि , न चाहिए अलंकार/ बस एक सम्मानजनक जीवित प्राणी के समान /चाहिए उसे अपनी पहचान!" स्त्रियों का सम्मान ही मूल शर्त है; समाज की आधी आबादी को संतुष्ट व खुशहाल रखने की।
बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति से चिंतित कवयित्री ने  'मातृभूमि के लाल ' में  जीवन की महत्ता को  समझाते हुए लिखा है-
 "तुम हो राष्ट्र के अनमोल धरोहर, तुम्हें इतिहास नया रचना है
अवनि क्या अंबर पर भी ध्वज तिरंगा लहराना है।"
'संदेशा युवा शक्ति के नाम' में  देश के युवक- युवतियों को अपनी शक्ति को पहचानने व देश में फैली अशिक्षा, गरीबी, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए आह्वान किया है।अंतिम कविता साहित्य की उपयोगिता व उसकी प्रासंगिकता को दर्शाती है।

 कवयित्री  का प्रथम काव्य संकलन  इस उक्ति  को प्रासंगिक बनाता है कि 'साहित्य समाज का दर्पण है' समाज के हर पहलू की अच्छाई और बुराई को उन्होंने काव्यसंग्रह में दर्शाया है। साथ ही उन्होंने समाज की बुराइयों पर कटाक्ष करते हुए कहीं -कहीं इन्हें दूर करने का समाधान भी बताया है। काव्य संकलन 'दर्पण' अपने नाम को सार्थक करता है, बिना किसी लाग- लपेट के सहज सरल शब्दों में भावों की अभिव्यक्ति है।सच पूछा जाय तो समाज का प्रतिबिंब है 'दर्पण'।


 समीक्षक: डा.निरुपमा कपूर, 17,जसवंत स्टेट एक्सटेंशन, आगरा।

Tuesday, April 17, 2018

पुस्तक चर्चा -सतरंगी आईना


                                                                            सहज बोध की कविताएं



     
पुस्तक -   सतरंगी आईना
कवयित्री-  मनजीत कौर  'मीत'
प्रकाशक- तस्वीर प्रकाशन, सिरसा (हरियाणा)
पृष्ठ-    112,
 मूल्य- 150/रु


कविता चित्त और चेतना की अभिव्यक्ति है। कोई भी रचनाकार सहज स्थितियों , चेतना के विभिन्न चित्रों, भाव-अभाव के बहुवर्णी आवेगों और जीवन के बहुरंगी सरोकारों की अनदेखी करके रचना नहीं कर सकता। इस अनिवार्यता के व्यक्ति के मनस और सामाजिक सरोकारों के अनेक रंगों-वर्णों को सृजक अपनी कृतियों में उकेरता है ।शास्त्र कहता है कि किसी रचना का निर्माण भाव, विचार, कल्पना और शैली से होता है ।कवयित्री मनजीत कौर 'मीत' द्वारा रचित 'सतरंगी आईना' काव्य संग्रह में भाव तथा विचार सर्वोपरि है। कवयित्री ने 80 कविताओं को तीन उपखंडों में बांटा है- छंदमुक्त रचनाएं,गज़लनुमा रचनाएं, एवं गीत ।इनमें देश -दुनिया, समाज व व्यक्ति से संबंधित अनेक अनुभूतियों-सरोकारों का अंकन है। प्रकृति, देश, राजनीति,स्त्री सुरक्षा, बेटी की महिमा आदि सब कुछ है।कवयित्री का अपना काल,युगीन विसंगतियाँ पूर्णता में विद्यमान हैं। एक मंजे हुए साहित्यकार की भांति कृतिकार का प्रयास रहा है कि मनुष्यमात्र को बेहतर मनुष्य कैसे बनाया जाए । कवयित्री की यात्रा संस्कृति की यात्रा है,उसकी अन्तर्वेदना का जीवंत दस्तावेज है।रचनाकार के मन में जो-जो विचार आते रहे होंगे, उन्हें बिना पांडित्य-प्रदर्शन, काव्य में पिरोदिया। बानगी के तौर पर-

कदम-कदम पर करनी पड़ती
बिटिया तेरी रखवारी

 बेटी के पिता को सिर क्यों नत करना पड़ता है - शायद परिपाटियाँ निभाने के लिए।
स्पष्ट है कि मौजूदा परिस्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन हेतु समाज की सोच में परिवर्तन की आवश्यकता है। कवयित्री तरलहृदया हैं इस लिए वह सोचने को मजबूर हो जाती है कि कर्फ्यू के दिनों में कितने घरों के चूल्हे ठंडे रहजाते हैं। स्त्री सुरक्षा की समस्या के समाधान
स्वरूप वे लिखती हैं कि जिस प्रकार दीप्तिमानरहने के लिए दीपक को हवा के झकोरों से संघर्ष करना पड़ता है, उसी प्रकार स्त्री को संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा।
 कविताओं में राष्ट्र चिंतन का भाव उभरा है और सैनिक के सम्मान में शब्दों के ताज पहनाए हैं ।नकलीपन का बहिष्कार किया है।
मानव को उसकी दोहनकारी नीति के लिए चेताया है-

कुदरत का देखो मानव पतन कर रहा
जी तोड़ सुविधा सारे जतन कर रहा
चक्र दमन का जो चलता जाएगा
अस्तित्व हिमालय का बच न पाएगा ।

आतंक के खतरे से बचने के लिए कहा है- मुँह तोड़ जवाब देकर ही लहू का बहना बंदहो पाएगा । कवयित्री को पीड़ा है कि समस्याओं को निपटाने के लिए शासन की ओरसे बहुत ढोल पीटे जातें हैं परंतु बात वहीं की वहीं रह जाती है । 'महंगाई' कविता में आम आदमी का यथार्थ तो है ही भाषाई प्रवाह भी 
भरपूर है, यथा-

महंगाई ने यारो हमको
क्या-क्या नाच दिखाए
चीनी करती आनाकानी
नखरे प्याज दिखाए।

 कविताओं में उठाए गए प्रश्न पाठक को ठिठक कर सोचने को विवश करते हैं।मदरटेरेसा को श्रद्धांजलि स्वरूप कवयित्री लिखती है -

प्रेम-त्याग की राह पर चलकर
जीवन की सार्थकता पाई ।

वस्तुतः ये पंक्तियां कवयित्री का व्यक्तित्व व्यक्त करती हैं कि जीवन की सार्थकता के लिए कुछ न कुछ सार्थक होना चाहिए।
'हर माल बिकाऊ है यारो'  रचना में शिकवों की झड़ी है, वहीं हल ढूंढती लड़ियाँ हैं ।ऑनरकिलिंग के समाधान हेतु लिखा है-

कुछ उनकी मानो कुछ अपनी रखो
छोड़ो भी ऑनरकिलिंग की कहानी

कविताओं में व्यंग्य की मारकता देखिए -

आओ मिलकर बांटें खाएं
देश है अब्बा की जागीर ।

कहीं-कहीं भाषिक सूक्तिमयता आन विराजी
है-
काँटों भरी देखो तन के खड़ी है
फूलों भरी डाल झुकती है प्यारे ।

माँ की महिमा को भी ओझल नहीं होने दिया है-

माँ को सभी अज़ीज़ हैं होते
ज़ाहिल हो या कोई दाना ।

गागर में सागर भरती ये पंक्तियां देर व दूर तक
पाठक के साथ चलती हैं। एक अन्य शाश्वत सत्य को सुंदर ढंग से बयां किया है-

हम उसके खिलौने, वह हमको नचाता
कभी वह बनाता, कभी है मिटाता ।

कवयित्री की विनम्रता की परिचायक हैं ये
पंक्तियां- 

सोच में निर्मल ,गंगा की तू धार दे
मेरी वाणी में वीणा सी झंकार दे ।

मेरी राय में संग्रह की अंतिम कविता का स्थान सबसे पहले होना चाहिए था। कुछेक रचनाओं में भावों की पुनरावृत्ति से बचा जा सकता था।
कुल मिलाकर भाव-विचार के मणि-कांचन योग से बनी इन कविताओं में कवयित्री की मौलिक उदभावना प्रकट हुई है।सहज बोध की
इन रचनाओं में शास्त्रीय पक्ष की कहीं-कहीं अनदेखी कर दी जाए तो कहा जा सकता है कि अपने शीर्षक के अनुसार सतरंगी आईना समाज की वास्तविक तस्वीर पेश करता है-उसके कुभाव -सुभाव, संस्कृति-विकृति, मेल-मिलाप के मेलों, अहं -दंभ के झमेलों की भी।तस्वीर मेंं कुछ अटपटा लगे तो दोष आईने का नहीं। दोष देखना है तो झांकना होगा,खुद के अंदर अच्छे भावों को खुर्दबीन लेकर।
आशा है, यह काव्य संग्रह मनजीत कौर को काव्य सुमनों से साहित्य का गुलदस्ता सजाने के लिए प्रेरणा देता रहेगा। 


डॉ. कृष्ण लता यादव
(संरक्षक- प्रादेशिक लघुकथा मंच,गुरुग्राम)
1746,सैक्टर 10 A
गुरुग्राम- 122001
चलभाष- 09811642789