सहज बोध की कविताएं
पुस्तक - सतरंगी आईना
कवयित्री- मनजीत कौर 'मीत'
प्रकाशक- तस्वीर प्रकाशन, सिरसा (हरियाणा)
पृष्ठ- 112,
मूल्य- 150/रु
कविता चित्त और चेतना की अभिव्यक्ति है। कोई भी रचनाकार सहज स्थितियों , चेतना के विभिन्न चित्रों, भाव-अभाव के बहुवर्णी आवेगों और जीवन के बहुरंगी सरोकारों की अनदेखी करके रचना नहीं कर सकता। इस अनिवार्यता के व्यक्ति के मनस और सामाजिक सरोकारों के अनेक रंगों-वर्णों को सृजक अपनी कृतियों में उकेरता है ।शास्त्र कहता है कि किसी रचना का निर्माण भाव, विचार, कल्पना और शैली से होता है ।कवयित्री मनजीत कौर 'मीत' द्वारा रचित 'सतरंगी आईना' काव्य संग्रह में भाव तथा विचार सर्वोपरि है। कवयित्री ने 80 कविताओं को तीन उपखंडों में बांटा है- छंदमुक्त रचनाएं,गज़लनुमा रचनाएं, एवं गीत ।इनमें देश -दुनिया, समाज व व्यक्ति से संबंधित अनेक अनुभूतियों-सरोकारों का अंकन है। प्रकृति, देश, राजनीति,स्त्री सुरक्षा, बेटी की महिमा आदि सब कुछ है।कवयित्री का अपना काल,युगीन विसंगतियाँ पूर्णता में विद्यमान हैं। एक मंजे हुए साहित्यकार की भांति कृतिकार का प्रयास रहा है कि मनुष्यमात्र को बेहतर मनुष्य कैसे बनाया जाए । कवयित्री की यात्रा संस्कृति की यात्रा है,उसकी अन्तर्वेदना का जीवंत दस्तावेज है।रचनाकार के मन में जो-जो विचार आते रहे होंगे, उन्हें बिना पांडित्य-प्रदर्शन, काव्य में पिरोदिया। बानगी के तौर पर-
कदम-कदम पर करनी पड़ती
बिटिया तेरी रखवारी
बेटी के पिता को सिर क्यों नत करना पड़ता है - शायद परिपाटियाँ निभाने के लिए।
बेटी के पिता को सिर क्यों नत करना पड़ता है - शायद परिपाटियाँ निभाने के लिए।
स्पष्ट है कि मौजूदा परिस्थितियों में सकारात्मक परिवर्तन हेतु समाज की सोच में परिवर्तन की आवश्यकता है। कवयित्री तरलहृदया हैं इस लिए वह सोचने को मजबूर हो जाती है कि कर्फ्यू के दिनों में कितने घरों के चूल्हे ठंडे रहजाते हैं। स्त्री सुरक्षा की समस्या के समाधान
स्वरूप वे लिखती हैं कि जिस प्रकार दीप्तिमानरहने के लिए दीपक को हवा के झकोरों से संघर्ष करना पड़ता है, उसी प्रकार स्त्री को संघर्ष का रास्ता अपनाना होगा।
कविताओं में राष्ट्र चिंतन का भाव उभरा है और सैनिक के सम्मान में शब्दों के ताज पहनाए हैं ।नकलीपन का बहिष्कार किया है।
मानव को उसकी दोहनकारी नीति के लिए चेताया है-
कुदरत का देखो मानव पतन कर रहा
जी तोड़ सुविधा सारे जतन कर रहा
चक्र दमन का जो चलता जाएगा
अस्तित्व हिमालय का बच न पाएगा ।
आतंक के खतरे से बचने के लिए कहा है- मुँह तोड़ जवाब देकर ही लहू का बहना बंदहो पाएगा । कवयित्री को पीड़ा है कि समस्याओं को निपटाने के लिए शासन की ओरसे बहुत ढोल पीटे जातें हैं परंतु बात वहीं की वहीं रह जाती है । 'महंगाई' कविता में आम आदमी का यथार्थ तो है ही भाषाई प्रवाह भी
भरपूर है, यथा-
महंगाई ने यारो हमको
क्या-क्या नाच दिखाए
चीनी करती आनाकानी
नखरे प्याज दिखाए।
कविताओं में उठाए गए प्रश्न पाठक को ठिठक कर सोचने को विवश करते हैं।मदरटेरेसा को श्रद्धांजलि स्वरूप कवयित्री लिखती है -
प्रेम-त्याग की राह पर चलकर
जीवन की सार्थकता पाई ।
वस्तुतः ये पंक्तियां कवयित्री का व्यक्तित्व व्यक्त करती हैं कि जीवन की सार्थकता के लिए कुछ न कुछ सार्थक होना चाहिए।
'हर माल बिकाऊ है यारो' रचना में शिकवों की झड़ी है, वहीं हल ढूंढती लड़ियाँ हैं ।ऑनरकिलिंग के समाधान हेतु लिखा है-
कुछ उनकी मानो कुछ अपनी रखो
छोड़ो भी ऑनरकिलिंग की कहानी
कविताओं में व्यंग्य की मारकता देखिए -
आओ मिलकर बांटें खाएं
देश है अब्बा की जागीर ।
कहीं-कहीं भाषिक सूक्तिमयता आन विराजी
है-
काँटों भरी देखो तन के खड़ी है
फूलों भरी डाल झुकती है प्यारे ।
माँ की महिमा को भी ओझल नहीं होने दिया है-
माँ को सभी अज़ीज़ हैं होते
ज़ाहिल हो या कोई दाना ।
गागर में सागर भरती ये पंक्तियां देर व दूर तक
पाठक के साथ चलती हैं। एक अन्य शाश्वत सत्य को सुंदर ढंग से बयां किया है-
हम उसके खिलौने, वह हमको नचाता
कभी वह बनाता, कभी है मिटाता ।
कवयित्री की विनम्रता की परिचायक हैं ये
पंक्तियां-
सोच में निर्मल ,गंगा की तू धार दे
मेरी वाणी में वीणा सी झंकार दे ।
मेरी राय में संग्रह की अंतिम कविता का स्थान सबसे पहले होना चाहिए था। कुछेक रचनाओं में भावों की पुनरावृत्ति से बचा जा सकता था।
कुल मिलाकर भाव-विचार के मणि-कांचन योग से बनी इन कविताओं में कवयित्री की मौलिक उदभावना प्रकट हुई है।सहज बोध की
इन रचनाओं में शास्त्रीय पक्ष की कहीं-कहीं अनदेखी कर दी जाए तो कहा जा सकता है कि अपने शीर्षक के अनुसार सतरंगी आईना समाज की वास्तविक तस्वीर पेश करता है-उसके कुभाव -सुभाव, संस्कृति-विकृति, मेल-मिलाप के मेलों, अहं -दंभ के झमेलों की भी।तस्वीर मेंं कुछ अटपटा लगे तो दोष आईने का नहीं। दोष देखना है तो झांकना होगा,खुद के अंदर अच्छे भावों को खुर्दबीन लेकर।
आशा है, यह काव्य संग्रह मनजीत कौर को काव्य सुमनों से साहित्य का गुलदस्ता सजाने के लिए प्रेरणा देता रहेगा।
डॉ. कृष्ण लता यादव
(संरक्षक- प्रादेशिक लघुकथा मंच,गुरुग्राम)
1746,सैक्टर 10 A
गुरुग्राम- 122001
चलभाष- 09811642789

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