Thursday, August 4, 2022

कविताएं-मीना पाण्डेय

 घास 


जीवन के घोषित-अघोषित हिस्सों पर

विचारों के बांझपन को ढ़ापती 

फिर उग आऐगी घास 


 पतझड़ की दुखती देह पर मरहम लगाते बसंत

 बुलाए नहीं जाते


स्वतः आ जाती है

लम्बी थकान के बाद नींद


 बचे रह गए दालानों, धाटियों और रास्तों पर भी

प्रश्नचिन्ह की तरह अनायास उग आएगी घास 


 जमीन पर फूटने से पहले 

एक युद्ध वो मिट्टी के भीतर लड़ेगी 

जब जब बारिश धोऐगी जमीन की मटमैली देह

सतह को फाड़ सर उठाऐगी घास 


ये हरा रक्त गांव की धमनियों में दौड़ता है

ताकि बने रहे घर, आंगन और गोट 


पुरखों ने जब भी सर पर हाथ रख कहा  'हरा भरा रहे'

उनकी कल्पना में घास ही रही

बार-बार, कई बार उगना

हरी घास की तरह

ताकि एक सुबह दराती कमर में खौंच 

मेरे गांव की घस्यारिनें

फिर गट्ठरों में बांध लें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का सुख 

कटना घास की नियति है

बिछना घास का सुख।




संसार की सबसे सुंदर औरतें


उसे गाड़-गधेरों, नौलों-धारों के डबडबाने व सूखने का सही क्रम पता है

 बाहर उमड़ने से पहले

उसके भीतर उमड़ता है एक चौमास


हिमालय के कन्धे पर पैर टिका

उसकी देह से हरी चादर उतार लाने का हुनर वो जानती है


उसे पता है दिन के ठीक किस पहर 

रघुवा के बाप को बीडी की

रम्भा को घास की 

और 

बूढों को लगती है चाय की टीप

अंतहीन परिश्रम को आंचल की गाँठों में बांध

वो जानती है मां होने की प्राथमिकताएं


यहां अपनी समग्रता मे उपस्थित रहता है पहाड़


हिमालय की पीठ पर दराती सी घुपी औरतें

संसार की सबसे सुंदर औरतें हैं।


#मीनापाण्डेय

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