राग दरबारी
कहो किताब ( चयनित प्रविष्टि-2)
आकाश वाणी लखनऊ के स्टूडियों में पधारे श्री लाल शुक्ल को पहली बार मैंने देखा। उनके साक्षात्कार की-रिकार्डिंग मुझे ही करनी थी। 40-45 मि0 की अवधि में जो मेरा अनुभव रहा, वह मेरे जीवन की बहुमूल्य थाती है। तेज़ तर्रार जु़बान और बेधड़क होकर बोलने का अन्दाज़ लिए श्री लाल शुक्ल को सुनने के लिए स्टूडियों में मेरे बहुत से साथी आ जुटे थे।
काफ़ी समय बाद शुक्ल जी पुस्तक ‘राग दरबारी’ मेरे हांथ लगी। हाथ में पुस्तक क्या आई जिज्ञासा और उत्सुकता ने मुझे जकड़ लिया। जल्दी-जल्दी किताब पढ़कर ही दम लिया। इस बात को कई वर्ष बीत गए पर जब कभी भी यह पुस्तक मेरे हाथ में आई मैं उसे कहीं से भी पढ़ना शुरू कर देती हूँ और किताब छोड़ने का मन ही न करता। मैं क्या कहूँ इसकी बानगी आप ही देख लीजियें-
‘सनीचर अब तक बैठक में आ गया था। समझाते हुआ बोला ऐसी बात नहीं निकालनी चाहिये मुँह से धरती धरती चलो, आसमान की छाती न फाड़ो। आखिर कुसहर ने तुम्हे पैदा किया है।’
‘छोटे ने भुनभुना कर कहा- ‘कोई हमने स्टाम्प लगाकर दस्तखत की थीं कि हमें पैदा करो चले साले कही के पैदा करने वाले।’
बद्री बोले, बहुत हो गया छोटे अब ठन्ठे हो जाओ’
सबसे बड़ी खूबी भाषा की है। शुक्ल जी के शब्दों से चित्र खिंचता चला जाता है। गाँव का दृश्य आँखों के सामने फ़िल्म की रील की तरह आगे बढ़ता जाता है। पढ़ने वाला इतना डूब जाता हैं कि वह स्वयं पुस्तक का एक पात्र बन जाता है। वे शब्द, वे मुहावरे, यहाँ तक गाली गुफ़्तारी भी धड़ल्ले से उपन्यास को गति देते हैं। पाठक इस गति की रफ़्तार को पकड़ने की कोशिश करता है। उपर लिखित चन्द लाइनों से एक ऐसा चित्र बन जाता है कि पाठक प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता है।
परिवेश को चित्र उकेरने में शुक्ल जी को महारथ हासिल है। पाठक पढ़ते-पढ़ते उन परिस्थितियों में खो जाता है। इतने बड़े उपन्यास में न जाने कितने दृश्य सामने आते हैं, परन्तु एक घटना के आरम्भ होने और समाप्त होने के बीच में लेखक ने ज़रा भी स्पेस नहीं छोड़ा है, होता यह है कि ज्यों-ज्यों हम आगे पढ़ते जाते हैं, रफ़्तार तेज़ और तेज होती चली जाती है। 335 पृष्ठ का यह उपन्यास ‘राग दरबारी’ मात्र उपन्यास ही नहीं है, यह एक प्रमाणिक सत्य का दस्तावेज़ लगता है। यह भारत के उस समय के गावँ, निवासी, परिस्थितियाँ, और हालात का सजीव चित्र लगता है।
साहित्य आकादमी पुरस्कार पाने वाला उपन्यास ‘राग दरबारी’ बड़ी निर्ममता से भारतीय समाज से एक परदा उठाता है। जिसके पीछे की सच्चाई अपने समग्र मूल रूप में सामने खड़ी दिखती है। पाठक सच्चाई को कैसे नकारे? कैसे आज़ाद भारत के वजूद को आत्म सात करें? व्यंग और सच्चाई का इतना सुन्दर उदाहरण हमें हिन्दी साहित्य में कहीं ढूँढ़े न मिलेगा। सच्चाई तो यह है कि सन् 1969 में इस उपन्यास का प्रकाशन एक महत्वपूर्ण साहित्यिक घटना है। शुक्ल जी ने उपन्यास में एक ऐसे सच को उजागर किया हैं जो हमें चौंका देता है। आज़ादी के बरसों बाद सुख सुविधाओं से वंचित गाँव, जहाँ जंगल राज है, जहा-नियम कानून कुछ भी मायने नहीं रखते है, वह आज भी विद्यमान है, जबकि यह गाँव शहर से बहुत दूर नहीं है। कहावत ‘दिये तले अँधेरा’ चरितार्थ होती है।
मैं, राज कमल प्रकाशन को भी भाग्यशाली मानती हूँ; जिन्होंने इस उपन्यास के प्रकाशन का दायित्व निभाया। प्रकाशक के सहयोग से ही अपनी रचना का सुन्दरम रूप पाठकों के सामने लाया जा सकता है लेखक। ‘राग दरबारी’ जिस रूप में हमारे सामने है; उसके लिए प्रकाशक को साधुवाद।
हर भारतीय को यह उपन्यास पढ़ना चाहिए सामाजिक परिस्थितयाँ कितनी कुरूप हो सकती, यह सबको जानना चाहिये। गाँव के जिन घाघ पात्रों द्वारा आज़ादी की धज्जियाँ उड़ाकर रख दी जाती हैं-उनके कारनामों को लोग जानें और समझे। हर नौजवान इस उपन्यास को पढ़े, यद्यपि अब 70 वर्ष बीत रहें हैं आज़ादी के, फिर भी हमारे चारों ओर जो कुछ हो रहा है क्या वह इस उपन्यास के अंश में हमे नहीं मिलेगा? लोग पढ़ेें और इस बात का आकलन करें कि हमने कितनी प्रगति की है?
अफ़सोस तो इस बात का हैं कि आज कल पठन-पाठन का चलन बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है, आज हम सब कुछ भूल कर लैपटाप, इन्टरनेट, और मोबाइल में उलझे हुए है। बड़े हो रहे बच्चे, युवा लड़के-लड़कियों ने पुस्तकों से दूरी बना ली है, यह दुःखद है। - नया सीखें, जाने, समझें पर अपनी विरासत को सहेजने के लिए भी चिन्तित रहें। पूरा का पूरा उपन्यास लगता है कि क़िस्सा गोई की फितरत के लपेटे में है।
एक बानगी देखिये-
'नवाब साहब सिर पीटने लगे चारों तफर एलान किया गया। ‘कोई शहज़ादे को चंगा कर दे। अन्त में एक बुजुर्ग हकीम आये, शहज़ादे को देख कर बोले- जहाँ पनाह आधी रियासत और शहज़ादी नहीं चाहिये। मेरी तो बस दरख़्वास्त मान ली जाए फिर शहज़ादे को चंगा करने का जिम्मा हमारा। दरख़्वास्त पेश करने के लिए तख़्लिया चाहिये। नवाब साहब भी वहाँ से हट गए। बेगम साहिबा हकीम साहब के सामने पेश की गयीं। हकीम ने कड़ी निगाह से बेगम को देखा, और कहा अगर शहज़ादे की जान प्यारी हैं तो साफ़ साफ बताइयेगा, यह शहज़ादा किसका लड़का है किसके लुत्फ़ से पैदा हुआ है-......... (और अन्त का वाक्य)........ उठबे भिश्ती की औलाद ..... और शहज़ादा उठकर बैठ गया।’
पाठक सांस रोके सारे प्रकरण को पढ़ जाता है पढ़ने वाले की उत्सुकता का ग्राफ़ शीर्ष पर पहुँच जाता है।
एक और उदाहरण प्रस्तुत है -
‘सारी बात रंगनाथ के समझ में आ गयी। नाम-ज़दगी का पर्चा आज ही दाख़िल किया जायेगा। अभी अभी इसवी वक़्त-सनीचर ने जोश से कहा-पर्चा पहले दाखिल करूँगा, नहाऊँगा बाद में। उसने चलताऊ नज़र गाँठ बाँधने वाले को देखने के लिए डाली कि उस पर रोआब पड़ा कि नहीं। पर नतीजा साफ था, सनीचर केे रोआब का असर सनीचर तक ही रह गया। जैसा कि हिन्दुस्तान का एशिया और अफ्रीका की नेता गीरी करने का दावा। वह इतमिनान से कहने लगा चलो अच्छा है तुम्ही प्रधान बन जाओं। किसी न किसी को तो होना ही है। हिकारत के साथ उसने कहा, गाँव पचायत क्या है? सरकारी चोचला।
यह उपन्यास आम आदमी को क्यों आकर्षित करता है- इसके मूल में है इसकी भाषा। ज़िन्दगी उदास-ग़मग़ीन माहौल से बचती बचाती हल्की-फुलकी टकसाली भाषा का रस लेना चाहती है जो इस उपन्यास में भरपूर है। अबे, तबे, साले, ससुरे शब्द जो आम आदमी से जुड़े रहते हैं, उसकी ज़बान पर रहते हैं, वह वही सुनना चाहता है। इस अनोखी भाषा ने, दुःख, अवसाद, घृणा क्रोध को बखूबी संवारा है। सबसे मज़े की बात तो यह है कि शायद लेखक ने यह बात नहीं सोची होगी, वह एक उपन्यास रचने जा रहा है- ऐसा लगता है कि गाँव की चैपाल में कोई व्यक्ति बैठा है और वह सब लिखता जा रहा है, जो वहाँ हो रहा है। झूठ, बेइमानी, दंगा, फ़साद, चोरी-चकारी, छल कपट, प्रेम,घृणा सब कुछ अपने मूल रूप में काग़ज पर उतरता जा रहा है। इस पुस्तक का कथानक एक ख़ास रिदम में क़दम ताल करता हुआ आगे बढ़ता जाता है।
इस उपन्यास को पढ़ते पढ़ते अगर किसी अन्य काम के लिए उठना पड़ जायें, तो बड़ा अखरता है। जब हम दूसरे काम में लगे रहते हैं, हमारा मन उपन्यास के छोड़े हुए अंश में अटका रहता है। आगे क्या होगा यह जानने के लिए मन वहीं अटका रहता है, यह बात मैंने अपने अनुभव से जानी।
अक्सर लोग यह भूल कर बैठते हैं कि यह व्यंग कथा है, पर नहीं ऐसा नहीं है, एक गाँव जो आज़ादी के बाद तमाम सुख सुविधाओं से बंचित है, जैसे-जैसे हालातों से वहाँ के लोगों को दो चार होना पड़ता है, यह सब उस गाँव की हक़ीकत है। शुक्ल जी ने इसी सच्चाई को अपनी क़लम की मार्फ़त हम तक पहुँचाया है। उन नारों और वायदों को झुठलाया हैं जिन्होंने भोली जनता को भ्रमित किया है। सच पूछा जाय तो हर कोण से हकीकत को शीशे में उतारने, और उससे हमें रुबरू कराने का सफल प्रयोग किया है लेखक ने। कैसी अजीब बात है, देश एक लम्बा सफ़र तय कर चुका है, परन्तु ‘राग दरबारी’ आज भी प्रासंगिक है।
शुक्ल जी ने अपनी बहुत सी रचनाओं से हिन्दी साहित्य को समृद्ध बनाया है और ‘राग दरबारी’ श्री लाल शुक्ल का पर्याय बन गया है। हक़ीकत की तुला पर खरा उतारने वाला, उपन्यास ‘राग दरबारी’ आज भी आम आदमी की पसन्द का नम्बर वन उपन्यास है-इसमें तनिक भी सन्देह नहीं।
श्रीमती शरदा लाल
(अवकाश प्राप्त कार्यक्रम अधिशासी
आकाशवाणी, लखनऊ)
499/183, गोकरन नाथ रोड
डालीगंज, लखनऊ-226020
मो0नं0: 9935638020


ये एक मात्र उपन्यास मेरे पठन में आया जिसके पात्रों और उनके चित्रण को मैं तब तक याद रखूंगा जब तक मैं साहित्य में अपनी आस्था रखूंगा ।
ReplyDeleteये भारतीय समाज की एक कालजई धरोहर है जो भले ही वर्षों पहले लिखी गई परन्तु आज भी उतनी ही सच और वास्तविक चित्रण या तस्वीर उपस्थित करती है जितनी तब करती थी , जब ये उपन्यास लिखा गया था । भारत की त्रासदियां जरा भी तो नहीं बदलीं । अदालतें , राजनीति , परिवार , गली मोहल्लों में रहने वालों का सोचने और करने के साथ , स्वयं को परिभाषित करने का रंग ढंग , सब कुछ वैसा का वैसा जैसा , इस उपन्यास के पात्रों के या घटनाओं के माध्यम से घटित होता है ।
मेरे पास इसकी एक प्रति थी ,जो मुझे इस बार नहीं मिली , एन जाने कहां खो गई या रखी गई ।
इसलिए लिख नहीं पाया । और किसी पर लिखने की इच्छा नहीं हुई ।