कुछ बातें तरकस में से तीर की तरह छूटती हैं और जाकर बींध देती है सामने वाले का सीना , कुछ बातें उबलते माड़ में से भाप सी उठकर पलभर में लोगो के नथुनों तक पहुंच जाती हैं। कुछ बातें गरीब की रोटी सी हलक में ही अटक कर रह जाती हैं कभी नीचे नहीं उतरती और कुछ बातें पूराने संदूक के उजाड़ कोने में दुबकी पड़ी रहती हैं ताउम्र। बातें गुलाब होती हैं ,बातें काँटों सी चुभ भी जाती हैं और जुगनू की तरह अँधेरे में रास्ता भी दिखाती हैं। बात -बात में फर्क तो यक़ीनन है साहब। खैर बात न कर पाने वालों को ईश्वर ने लिखने का हुनर बक्शा है। वहां नहीं तो यहीं दो -दो हाथ सही।
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