Wednesday, May 20, 2020

काव्यांकुर- किरन पंत की दो कविताएं

             

    (1)

कवितामय हो जीवन अपना
कवितामय संसार
कविता का रसपान करु मैं
कविता में श्रृगांर भरु मैं
कविता को जीवन्त करु मैं
कविता में सुर भी जड दूँ मैं
मौन अधर भी बोल उठे 
जब ऐसा कवितापाठ करु मैं।



         (2)

तू चलती रही मां


तुझे वक़्त ने कभी बाँधा नहीं 

लिए प्रेम ह्रदय मे चलती रही 

जिंदादिली का ताजा  उदाहरण है तेरी मौहब्बत

तेरी मौहब्बत मे खुदा बसता है माँ ,

और खुदा की मौहब्बत मे कभी मिलावट नहीं होती |

एक रोते हुए बच्चे के लिए लोरी 

 बूढ़े के बुढ़ापे की लाठी है तू 

एक प्रेमी की आस 

प्रेयसी का श्रिंगार है तू 

कविता ,ग़ज़ल ,कहानी हर रूप मे समायी तू ,

प्रेम ,विश्वास ,मर्यादा ,बलिदान का प्रतिक तू 

ए माँ ,इस धरा पर बेसकीमती किरदार है तू |

गोद मे तेरी खेल कूदकर मातृभूमि का हर लाल बड़ा है 

ममता, प्रेम ,बलिदान के खातिर ,

रणभूमि मे छाती ताने वो साहसी वो वीर खड़ा है 

मातृभूमि की लाज बचाने, चट्टानों मे भी टूट पड़I |

दर्द भूल के कैसे अपना, मंद मंद मुस्काती वो 

राह मे कांटे देख वो कैसे ,आंख मूंद चली जाती है 

मोल चुकाने मे रिश्तों का ,अपनी तस्वीर भुला बैठी 

माँ तू हजार गलतियों पर भी ,हमसे कभी न रूठी |

लिए प्रेम ह्रदय मे सदा चलती रही 
बस चलती रही ,माँ तू बस चलती रही ।


किरन पंत 'वर्तिका'
हल्द्वानी, उत्तराखंड

(विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ में रचनाएं प्रकाशित तथा अनेक मंचों पर कविता पाठ)


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