लाकडाउन, क्वारंटीन, आइसोलेशन जैसे शब्द इन दिनों काफी प्रचलन में हैं। अब बात घर में बंद होने या सोशल डिस्टेंसिंग की है तो बंधु एकांतप्रिय, एकलकट्टू,घरघूसु जमात के लिए यह कोई नई बात तो है नहीं। ये 'जमात' शब्द तो मियां सबसे ज्यादा डरावना है इन दिनों। जमात बोले तो वर्ग।
खैर छोड़िए! शांतिप्रिय, अकेले पसंद, एकांतप्रिय, एकलकट्टू प्रजातियों के लिए यह कोरोना काल कोई खास बदलाव लेकर नहीं आया। प्रवृत्तिवश क्वॉरेंटाइन लोगों के लिए यह कोई नई बात नहीं। जंगल में भी मंगल कर देने वाले इस दौर में भीड़ के बीचों-बीच अकेले होने का हुनर जानने वाले लोग एकाएक महत्वपूर्ण हो जाएंगे किसने सोचा था? ये स्मृतिजीवी लोग चैनलों की चकाचौंध भरी फेहरिस्त के मध्य भी कई बार दूरदर्शन तक होकर आ चुके थे। इसीलिए एकाएक दूरदर्शन की तरफ लौटना इनके लिए कोई नई चीज नहीं थी।
किताबों, अखबारों, बालकनियों से गुफ्तगू करने वाले ये लोग एक स्वैच्छिक आइसोलेशन में है मित्र। इन्हें कभी व्यवहार कुशल होना नहीं आया। बात को शुरू, समाप्त करना उनके लिए सदैव दुविधा का प्रसंग रहा है। मुस्कुराहट के पीछे की राजनीति और हंसी के पीछे का षड्यंत्र इन्हें नहीं सुहाता और बातों में से बात निकालने की कला इनके बस का रोग नहीं।
अव्यावहारिक लोगों के एकलकट्टू होने की वजह भी उतनी अव्यावहारिक होती हैं। दरअसल अकेलेपन की सुगंध, एकांत में विचरण और शांति का संगीत इन्हें अच्छा लगता है। ऐसे महामानवों के लिए यह कोरोना काल कोई बड़ी घटना नहीं है। प्रतिदिन कितनी ही महामारी इनके श्वसन तंत्र से होकर गुजरती हैं। हर रोज कितने वायरस इनकी इंद्रियां दूषित करते हैं। मगर यह बचे रहे। इन्होंने चलचित्र सा गुजर जाने दिया है दुनिया को सामने से। मगर ये अचल, अडोल व अप्रभावित ही रहे। ऐसे एकांतप्रिय, अधिक सामाजिक न हो पाए लोग समाज के लिए सैनिटाइजर हैं!
मीना पाण्डेय 😀
#लाकडाउनअनलाक

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