Friday, May 8, 2020

बम बम बाबा और भगनौल*


ऐसे समय में जब घर से बाहर निकलना लक्ष्मण रेखा पार करना हो गया है तब मन जब तब यादों की यात्रा में निकल पड़ता है।
हाय हो sss हाय होsss
ओमss जयs जगदीशs हरेsss
 हाय होss हाय होss
 घुम्म s घुम्म s घुम्म s





हुड़के की थाप के मध्य गूंजता उसका स्वर दिसंबर की बर्फीली, वीरान रात के सन्नाटे को चीरता हुआ मंदिर के आगे अर्धचंद्राकार फैले मकानों की रोशनदानों के भीतर पहुंच जाता। रात्रि भोजन के बाद अलसाए लोग जब रजाई के भीतर होते तब बच्चे 'बम बम बाबा' की कोठरी की तरफ खुलती खिड़कियों पर आंख गड़ाए ढ़िपरी की तरह टिमटिमाते बल्ब की रोशनी में बाबा का अलमस्त नृत्य देखने लगते। 1556 के आसपास चंद राजा कल्याण चंद्र ने इस पहाड़ी कस्बे में किला बनवाया था। बाद में किले में मंदिर स्थापित कर दिया गया। मंदिर के चारों ओर पहले घना जंगल हुआ करता था मगर अब पूर्व में जंगल काटकर कई मकान बन गए हैं। पश्चिमी छोर पर अब भी चीड़ का जंगल था। जिससे होते हुए सैकड़ों राहगीर दूरस्थ स्थित गांवों से आया-जाया करते। मंदिर के नीचे थी एक कोठरी जो सदैव रिक्त पड़ी रहती थी। तो हुआ ये कि सुनसान कोठरी एकाएक गुलजार हो गई। एक बूढ़े बाबा वहां रहने आ गए। लंबी छरहरी काया, चेहरे पर सेंटानुमा दाढ़ी, घुटनों तक आधुनिक मिनी स्कर्ट की तर्ज पर जोगिया धोती और सर पर सदाबहार बंदर टोपी। बाबा के पास एक हुड़का था। रात का अंधेरा घिरते ही वातावरण उनके भगनौलो ( पहाड़ी शैली के गीत) की मस्ती में डूब जाता। धीरे-धीरे उठता उनका स्वर कभी हिमालय की सबसे ऊंची चोटी से टकराता‌ कभी हुड़के की घुम्म घुम्म पाताल का चक्कर लगा आती। बड़े-बूढ़े कहते बाबा दम लगा कर नाचता है। हां नशा तो था उसके स्वर में। जैसे नदी में उतरती गागर घुप्प घुप्प घुडुप्प और चोटियों से गिरते चीड़ के ठीठे ठिs ठिs ठिररररर और पीरूल में सरररर फिसलता पैर। बाबा एक पंक्ति को बीसीयों बार गाता। स्वर ऊपर- नीचे फिर आलाप। बाबा के आसमान छूते आलाप के साथ बच्चे सुनते-सुनते नींद में गहरे उतर जाते।

उनके गीतों के बोलो से जोड़कर उन्हें 'बम बम बाबा' पुकारा जाने लगा। बाबा पलटन से रिटायर थे। चीन युद्ध के समय लड़े थे। उन्हें बैठे-बैठे बच्चा बन जाने का गुण आता था। ये हमने बाबा के मुंह से सुना था। मगर उड़ती-उड़ती कुछ खबरें भी बाबा के पीछे-पीछे वहां पहुंचने लगी। मसलन बाबा पास के किसी गांव में अपने परिवार के साथ रहता था। सेना से रिटायर है और अब मानसिक संतुलन खो चुका है। स्वभाव से सनकी है और गांव में एक आदमी को मारकर फरार है। खबर में कितनी सच्चाई थी भगवान जाने। मगर बाबा स्वभाव से कुछ निराले तो थे। कुछ  विरले। कभी गुस्सैल और चिड़चिड़े,कभी प्रसन्न। मगर बिना बात कभी किसी से नहीं उलझे‌। उनका यह हैरतअंगेज मिजाज ही बच्चों के खेल का विषय  हो गया। बच्चे पत्थर मारकर उन्हें परेशान करते और बम बम बाबा क्रुद्ध होकर भद्दी भद्दी गालियां निकालते। प्रसन्न होते तो वही बाबा बच्चों को बिस्किट, टॉफीयां  बांटते। कुछ अलग ही तरह के थे बम बम बाबा। नमस्कार के स्थान पर नमो नारायण कहते और छोटे लड़के-लड़कियों को ए छोरा ए छोरी। कोठरी के भीतर उन्होंने अपनी अलग दुनिया रच रखी थी। सुबह शाम मंदिर की साफ-सफाई करते और रात के समय अलमस्त नाच गाना। फिर वही हुआ जिसका डर था।बाबा के मिजाज के कारण उन्हें निकालने की कवायद शुरू हो गई। उन दिनों वो और गुस्सैल हो गये। और एक दिन मुंह अंधेरे उठकर जाने कहां चला गये। मन्दिर के आसपास पहरा देते चीड़ के वृक्ष उसके बाद कभी उनके गीतों के साथ नहीं झूमे। बच्चे उदास हो गए और रातें फिर सुनसान।

कुछ नहीं था उस बम बम बाबा में पर बहुत कुछ था।  लाकडाउन के दिनों सड़कें वीरान और उजाड़ हो गई हैं। मन एक अदृश्य दहशत में रहता है। शाम ढले बालकनी में बैठती हूं। गर्मी की गुम्म शाम के मध्य रीता मन वहीं-कहीं बम बम बाबा के स्वर से जुड़ने लगता है।
हाय हो sss हाय होsss
ओमs जयs जगदीशs हरेsss
घुम्म घुम्म घुम्म।

- *मीना पाण्डेय*
*शालीमार गार्डन, साहिबाबाद*
*गाजियाबाद (उ•प्र•)*

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