Wednesday, May 20, 2020

सीता, द्रौपदी और पटरंगपुर की आमा



इन दिनों मृणाल पाण्डे जी के उपन्यास 'पटरंगपुर पुराण' के साथ दिन शुरू हो रहा है। तब फिर बंजारा सा होकर दिवस रामायण-महाभारत इन दो ध्रुर्वों के मध्य झूलता रहता है। रामायण में सीता, महाभारत की द्रौपदी और पटरंगपुर की आमा। चीजें एकदम गुड़मुड़ हो जाती हैं। अब आप पूछेंगे सीता व द्रौपदी का पटरंगपुर की आमा से क्या लेना?
 तो उधर सीता वाल्मीकि के आश्रम में है और अपने स्त्री स्वरुप को धन्य कर रही है। द्रौपदी अपने खुले केशों के साथ कृष्ण से युद्ध की अनिश्चितताओं पर प्रश्न कर रही है और इन दोनों स्थितियों को एक धरातल पर भोगती पटरंगपुर की आमा विष्णुकुटि की अपनी आरामकुर्सी में किस्सों की दुकान खोले बैठी है। सब कुछ कितना घुलमिल जाता है। शायद सीता ही द्वापर में आकर द्रौपदी हो गई और कलयुग में पटरंगपुर की आमा।



 पति की गरिमा के लिए अवध के साथ अपने नाम का भी त्याग करना सीता को राम से अलग पहचान देता है। सीता के रूप में स्त्री सशक्तिकरण की ओर ये वाल्मिकी का प्रयास है। द्रौपदी के खुले केश पांडवों को युद्ध के लिए उकसाते हैं। यह मात्र दृष्टि और विचार का भ्रम है। द्रौपदी को एक दृष्टिहीन युग की तमाम विषाक्त प्रवृत्तियों और अधर्म के विनाश का सूचक बनना था। एक ऐसे समाज या राष्ट्र में जिसकी बागडोर मोह में अंधे राजा के हाथ में हैं, (चाहे फिर वो मोह किसी के भी प्रति  हो) और जिसकी अनुयायी आंख होते हुए भी आंखों में पट्टी बांध लें वहां दुर्योधनों द्वारा राष्ट्र धन का दुरुपयोग होना ही है। और दुशासन नितियों का पालन भी। वहां पक्षपात होगा, स्त्री का अपमान होगा और मर्यादा का उल्लंघन भी। मगर पटरंगपुर की आमा की जुबान से जब आप उस कस्बे के बसने, संवरने, उजड़ने और फिर बसने की कहानी सुनते हैं तब पटरंगपुर में ही राम, रावण, पांडव, कौरव के साथ कितनी ही सीताएं, द्रौपदियां दिखाई पड़ने लगती है। इन सब के मध्य कुटुम्ब के लिए भीष्म पितामाह बनी आमा की मृत्यु के साथ उपन्यास का अंत भी जुड़ जाता है। अब वहां से पढ़ने वाले को सोचना होता है। वाल्मीकि की दृष्टि में सीता, वेदव्यास की दृष्टि में द्रौपदी और विष्णु कुटी की आमा की दृष्टि में पटरंगपुर और मृणाल जी की दृष्टि में विष्णुकुटी की आमा। इन चारों जीवन दृष्टियों से निरंतर विकसित होती एक नई दृष्टि। साहित्य विभिन्न जीवन दृष्टियों में से मौलिक दृष्टियां विकसित करने का एक उपक्रम है। *सीता के अनुसार  राजा को केवल नितिसम्मत होना नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए।* तब सीता और राम का त्याग होने और दिखने की पारस्परिकता का सूचक कहा जा सकता है। रामायण-महाभारत ऐसे प्रतीकात्मक रेखाचित्र हैं जिनमें अपनी-अपनी दृष्टियों के रंग भरे जा सकते हैं। धर्म का चश्मा इनके विस्तृत फलक को संकुचित कर देता है। हमें कृष्ण होने का मतलब समझना है और पांडव कहलाने की साधना भी। हमें राम होने के क्रम में सीता और लक्ष्मण की सह कथाओं का भी अनुसरण, चिंतन, मनन, आकलन करना है और पटरंगपुर की आमा के समान उन विभिन्न जीवन दृष्टियों से अपनी एक नितांत मौलिक फिर भी गुड़मुड़ दृष्टि और दृष्टिकोण विकसित करना है।

- *मीना पाण्डेय*
*शालीमार गार्डन, साहिबाबाद*
*गाजियाबाद (उ•प्र•)*

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