(1)
जिन्हें कहते थे, फक्र से अपना,
आज अपनो की भीड़ में क्यूं ?
खुद को अकेला पाया।
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया!
अपनेपन में भी रूखापन पाया ,
"रियल" जैसे "कजिन्स"
"अपनो" ने जताया ।
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया !
रिश्तों में "अहंवाद","अहंकार",
"रोष' को सर्वोपरि पाया ,
"वात्सल्य", "अपनत्व",
"संरक्षण" का बोध भुलाया ।
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का एहसास कराया!!
टिक-टोक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और
फेसबुक के दौर में,
अनजान लाइक और शेयर
ने ही मान बढ़ाया।
बिखरे रिश्तों की डोर को बांधने में
किसने समय गवाया?
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया!
विस्तृत जिसका सोशल औरा,
उनको सोशल एंटिटी बतलाया,
अंतर्मुखी,जो रहे स्वयं में
उनको रिश्तों से विरक्त। दिखाया
वह भी है इस समाज का संबल,
दूरियों ने क्यूं न समझाया?
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया !
(2).
मानवता आज
फिर शर्मसार हो रही?
इस करोना काल में ,
क्यूं वन्य जीवन की हार हो रही?
विषम विपदाएं देख भी
आंख क्यों खुली नहीं?
मानव की हास्य क्रीडा से
क्यों मातृत्वता तार-तार हो रही?
कैसा यह अभिमान,
कैसा यह अहंवाद है?
धरणी के अंचल में
सबका आयुष्य समान है?
फिर क्यों मनुष्य को अपने ही
अस्तित्व पर इतना गुमान है?
इंसा की इंसानियत पर ,
क्यों आज शोध हो रहा?
अमानवीय क्रूरता, कृतघ्नता,
का बोध हो रहा।
जिस गज को गजराज,
की उपाधि मिली।
इस करोना काल में ,
वह भी तीव्र तृष्णा से ,
समनुग्य दिखी।
नव जीवन के "सृजन" को
मां कोख में संग्रहीत किए,
पग पग चले वह मतंग ,
आशा के दीप लिए।
बारूद से भरा वह अनन्नास
इस करोना काल में ,
क्यूं वन्य जीवन की हार हो रही?
विषम विपदाएं देख भी
आंख क्यों खुली नहीं?
मानव की हास्य क्रीडा से
क्यों मातृत्वता तार-तार हो रही?
कैसा यह अभिमान,
कैसा यह अहंवाद है?
धरणी के अंचल में
सबका आयुष्य समान है?
फिर क्यों मनुष्य को अपने ही
अस्तित्व पर इतना गुमान है?
इंसा की इंसानियत पर ,
क्यों आज शोध हो रहा?
अमानवीय क्रूरता, कृतघ्नता,
का बोध हो रहा।
जिस गज को गजराज,
की उपाधि मिली।
इस करोना काल में ,
वह भी तीव्र तृष्णा से ,
समनुग्य दिखी।
नव जीवन के "सृजन" को
मां कोख में संग्रहीत किए,
पग पग चले वह मतंग ,
आशा के दीप लिए।
बारूद से भरा वह अनन्नास
था जघन्य, अमानुषिक प्रयास।
जो खाया "हस्ती मां"ने समझ "खाद्यपदार्थ",
कर, मानवता पर अखंड विश्वास
ना समझी वो
अमानवीय विश्वासघात ।
क्रंदन,रुदन ,कोलाहल करती, वेदनापूर्ण उसकी हर श्वांस
शायद कुछ देर से समझी,
मानवता का निष्ठुर आघात।
पूछता वह मूक जीवन
पल रहा जो कोख में,
घुट रहा क्यूं अस्तित्व मेरा,
तेरे स्नेहिल पार्श्व में?
उस पीड़ा,जलन,करुणा को लिए,
खड़ी वह अपने ही अश्रुओं के सैलाब में
गिर गई निस्तेज मृत हो,
अमानवीय अवसाद में
हस्ती की हस्ती मिट गई,
अमानुषिक गहन तालाब में।
देख में,सोचती हूं,
मानवता क्यूं ???
फिर शर्मसार हो रही?
क्यूं बने हम मूक दृष्टा,
क्रूरतापूर्ण कृत्य के?
क्या बन गया ....मानव
"विषाणु"?
अपने ही अभिवृत्य के?
जो खाया "हस्ती मां"ने समझ "खाद्यपदार्थ",
कर, मानवता पर अखंड विश्वास
ना समझी वो
अमानवीय विश्वासघात ।
क्रंदन,रुदन ,कोलाहल करती, वेदनापूर्ण उसकी हर श्वांस
शायद कुछ देर से समझी,
मानवता का निष्ठुर आघात।
पूछता वह मूक जीवन
पल रहा जो कोख में,
घुट रहा क्यूं अस्तित्व मेरा,
तेरे स्नेहिल पार्श्व में?
उस पीड़ा,जलन,करुणा को लिए,
खड़ी वह अपने ही अश्रुओं के सैलाब में
गिर गई निस्तेज मृत हो,
अमानवीय अवसाद में
हस्ती की हस्ती मिट गई,
अमानुषिक गहन तालाब में।
देख में,सोचती हूं,
मानवता क्यूं ???
फिर शर्मसार हो रही?
क्यूं बने हम मूक दृष्टा,
क्रूरतापूर्ण कृत्य के?
क्या बन गया ....मानव
"विषाणु"?
अपने ही अभिवृत्य के?
परिचय
स्तुति सक्सेना सिंह
माता: श्रीमती अंजना सक्सेना
पिता: श्री दिलीप कुमार सक्सेना
स्नातक: बायोटेक्नोलॉजी,
डिप्लोमा: क्लीनिकल ट्रायल एंड डेटा रिसर्च मैनेजमेंट
स्नातकोत्तर : हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन तथा ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट
प्रकाशित पुस्तकें
भारत- प्राचीन इतिहास की विसंगतियां
भारत- प्राचीन इतिहास की विसंगतियां ( अपडेटेड एडिशन)
मां-काव्य संग्रह
प्रकाशनाधीन रचनाएं
-लघु कथाओं का संग्रह,
-परिस्थितियां (काव्य संग्रह),
-मां- काव्य संग्रह का अंग्रेजी संस्करण
वर्तमान पता
डब्ल्यू जेड २०, रत्न पार्क, निकट रमेश नगर मेट्रो स्टेशन।
नई दिल्ली(११००१५)
stuti_1127@rediffmail.com
मोबाइल न-ं 9917376748








