Sunday, June 7, 2020

'क्या बहिरा हुआ खुदाय'-संत कबीर की याद


                      
 

बालपन की दृष्टि से कबीरदास जी को बांचने के प्रयास में पाठ्य पुस्तक के प्रथम अध्याय में सरल सुबोध और बिना किसी विशेष उपक्र के वाणी में बस जाने वाले दोहाकार के रूप में उनकी छवि उभरती है। मगर आज जब कबीरदास को उनके समग्र रूप में समझने का प्रयास किया तब वो साहित्य,दलितविमर्शसामाजिक चेतनासत्य -अहिंसा,समाज सुधार,अध्यात्म -दर्शन आदि चर्चाओं के केंद्र में दिखाई देते हैं। यधपि उन्होंने जो कहा अपनी फक्कड़ता में कहा जहाँ समाज सुधारक के रूप में प्रविष्ट होने की कोई पूर्वनियोजित सोच नहीं थी तथापि उनका रचनाकर्म उन्हें सामाजिक चेतना के अग्रदूत के रूप में प्रतिष्ठित कर गया। भारतवर्ष की सुदीर्घ काव्य परम्परा में इतना विराट व्यक्तित्व तुलसीदास के अतिरिक्त नहीं मिलता।

उनका जन्म जेष्ठ पूर्णिमा के दिन काशी में हुआ था। कबीरदास के जन्म के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है ,जिनका उल्लेख उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि कबीरदास जुलाहे थे ,कपडा बुनते ,सूत कातते सर्वधर्म समभाव ,अध्यात्म,सात्विकता ,अहिंसा,इतियादी का जो सूत्र तत्कालीन समाज को दे गए वो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। कबीरदास ऐसे समय में उभर कर आये जब भारत मुस्लिम शाषकों के अधीन था। हिंसा व् अत्याचार के बल पर आम जनता द्वारा अपने फरमान मनवाये जाते थे। मुसलमान शासकों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन कराया जाता व् और अवमानना होने पर मौत के घाट उतार दिया जाताआम हिन्दू जनता पर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे थे। दूसरी तरफ अपनी धर्म विशेष पहचान बनाये रखने के लिए हिन्दुओं में धार्मिक कर्मकांड व् पाखंड का बोलबाला था। व्यभिचार से बचने के लिए कन्याओं की कम उम्र में शादियां की जाती जिससे बाल विवाह जैसी कुरुती समाज में बढ़ने लगी।समाज वर्णभेद ,पाखंड ,छुआछूत जैसी कुरीतियों में जकड़ा हुआ था। कबीर  का निरक्षर किन्तु  सवेदनशील मन केवल व्यथित हुआ वरन उस दर्द को आत्मसात कर जो कुछ जाना - चिंतन मनन किया दोहा ,सबद ,रमैनी रूप में बह गया। निम्न जातियों जैसे जुलाहा ,कारीगरों ,धोबी ,हरिजनों के प्रति उच्च जातियों की उपेक्षा व् शोषण एक नवीन आंदोलन का सूत्रपात कर गया। सभी निम्न जातियां   अपनी अस्मिता व् स्वाभिमान की बात किसी किसी रूप में उठा रहे थे कबीर की वाणी ने उसे केवल ऊर्जा प्रदान की बल्कि उनमे आत्मविश्वास की भावना का संचार भी किया। डा. राधेश्याम द्विवेदी लिखते हैं " महात्मा कबीर का जन्म ऐसे समय में हुआ ,जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरुप अंधकारमय हो रहा था। "

कबीर मुसलमान धर्म के थे और स्वामी रामानंद का शिष्य बनकर  उन्हें हिन्दू धर्म की भी अच्छी समझ हुई। उन्होंने प्रत्येक धर्म की तर्कसंगत बातों को अपनाया तथा अन्धविश्वास व् ढकोसलों का जमकर विरोध भी किया। अपनी रचनाओं के माधयम से केवल वो धर्मान्धता में जकड़े मुस्लिम समाज पर खुलकर बोलते हैं साथ ही हिन्दुओं में प्रचलित धार्मिक कर्मकाण्ड व् पाखंड पर भी कड़ी चोट करते हैं

"कंकड़ पत्थर जोड़ के ,मस्जिद ली चिनाय।
चढ़ कर मुल्ला बांग दे ,क्या बहिरा हुआ खुदाय।

"माला फेरत जग भया ,फिरा मन का फेर।
 कर का मन का डार दे,मनका -मनका फेर।

कबीर राम की उपासना करते है ,मगर कबीर के राम धनुषधारी -रघुनन्दन राम नहीं हैं। उनके राम तो सत,चित,आनंद स्वरुप परमात्मा हैं जो आडम्बर से नहीं सत्कर्म व् आतंरिक पवित्रता से प्राप्त किये जा सकते हैं। अपनी रचनाओं में वे मूर्तिपूजा का खंडन करते भी नजर आते हैं। यथा -

"पाहन पूजे हरी मिलै ,तो मैं पूजों पहार।
वा ते ता चाकी भली, पीसी खाय संसार।




कबीरदास अपने हरि (परमात्मा ) तक पहुंचने का बहुत ही सुगम मार्ग बताते हैं,यही सुगमता और सरसता उनकी शब्दावली और भाषा में भी दिखाई देती है। भाषा की यही बोधगम्यता उन्हें जनमानस में लोकप्रिय बनाती है। यही कारण है की कबीरदास के दोहे साक्षर -निरक्षर गांव -नगर ,देश -विदेश सभी तक अपनी पहुंच बनाने में सर्वथा सफल दिखाई देते है। डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं "सहज सत्य को सहज ढंग से वर्णन करने में कबीर अपना प्रतिद्वन्दी नहीं जानते...... "

गृहस्थ जीवन जीते हुए ,अपने व्यवसाय से रिक्त समय में सत्संग व् मनन चिंतन के माध्यम से कबीर अध्यात्म व् सत्मार्ग की ओर समाज को ले जाने का उत्कृष्ट उदाहरण सामने रखने का जो कार्य करते है वो विरले ही देखने को मिलता है


सात्विक प्रवृतियों के प्रबल पक्षधर कबीर  हिंसा, पशु हत्या व् मांसहार का जमकर विरोध करते हैं और मन को नियंत्रित कर माया के जंजाल से बचाकर रखने की सीख देते हैं मांसहार का खंडन करते हुए वे लिखते हैं  -
"बकरी पाती खात है , ताकि काड़ी खाल।
जो नर बकरी खात है ,उनका कवन हवाल। "

'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय " कहते हुए एक तरफ पुस्तक ज्ञान से अनुभव ज्ञान को अधिक महत्व देते नजर आते है तो दूसरी तरफ प्रेम की परिभाषा को असीमित विस्तार देते। मगर कबीर का प्रेम प्रेयसी को रिझाता पागल प्रेम भर नहीं वरन निर्बलों ,मूक पशुओं ,व् मानवजाति के प्रति प्रेम का पक्षधर है।
हिन्दुओं में प्रचलित वर्णव्यवस्था पर भी कबीर एक स्वभोगी की हैसियत से खुलकर बोलते है। उनका मानना था की जनम के आधार पर किसी को उच्च या निम्न नहीं कहा जा सकता , मानव कर्म ही है जो समाज में प्रतिष्ठा या पतन के लिए उत्तरदायी है। उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा दलितों में स्वाभिमान जगाने का कार्य किया है।
अंत में जैसाकि प्रो. महावीर सरन जैन लिखते है " कबीर का सारा जीवन सत्य की खोज तथा असत्य के खंडन में व्यतीत हुआ है। " कबीर अपनी इस यात्रा में संतमति से मानवजाति को सदगति की तरफ ले जाने वाले विनम्र संत व् दिशाविहीन समाज को दिशा दिखाते एक श्रेष्ठ दोहाकार के रूप में नजर आते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।





मीना पांडेय
एम् -3 ,सी -61 वैष्णव अपार्टमेंट
शालीमार गार्डन एक्स-2
साहिबाबाद ,गाज़ियाबाद -201005 (यू पी )


Wednesday, May 20, 2020

काव्यांकुर- किरन पंत की दो कविताएं

             

    (1)

कवितामय हो जीवन अपना
कवितामय संसार
कविता का रसपान करु मैं
कविता में श्रृगांर भरु मैं
कविता को जीवन्त करु मैं
कविता में सुर भी जड दूँ मैं
मौन अधर भी बोल उठे 
जब ऐसा कवितापाठ करु मैं।



         (2)

तू चलती रही मां


तुझे वक़्त ने कभी बाँधा नहीं 

लिए प्रेम ह्रदय मे चलती रही 

जिंदादिली का ताजा  उदाहरण है तेरी मौहब्बत

तेरी मौहब्बत मे खुदा बसता है माँ ,

और खुदा की मौहब्बत मे कभी मिलावट नहीं होती |

एक रोते हुए बच्चे के लिए लोरी 

 बूढ़े के बुढ़ापे की लाठी है तू 

एक प्रेमी की आस 

प्रेयसी का श्रिंगार है तू 

कविता ,ग़ज़ल ,कहानी हर रूप मे समायी तू ,

प्रेम ,विश्वास ,मर्यादा ,बलिदान का प्रतिक तू 

ए माँ ,इस धरा पर बेसकीमती किरदार है तू |

गोद मे तेरी खेल कूदकर मातृभूमि का हर लाल बड़ा है 

ममता, प्रेम ,बलिदान के खातिर ,

रणभूमि मे छाती ताने वो साहसी वो वीर खड़ा है 

मातृभूमि की लाज बचाने, चट्टानों मे भी टूट पड़I |

दर्द भूल के कैसे अपना, मंद मंद मुस्काती वो 

राह मे कांटे देख वो कैसे ,आंख मूंद चली जाती है 

मोल चुकाने मे रिश्तों का ,अपनी तस्वीर भुला बैठी 

माँ तू हजार गलतियों पर भी ,हमसे कभी न रूठी |

लिए प्रेम ह्रदय मे सदा चलती रही 
बस चलती रही ,माँ तू बस चलती रही ।


किरन पंत 'वर्तिका'
हल्द्वानी, उत्तराखंड

(विभिन्न पत्र-पत्रिकाओ में रचनाएं प्रकाशित तथा अनेक मंचों पर कविता पाठ)


सीता, द्रौपदी और पटरंगपुर की आमा



इन दिनों मृणाल पाण्डे जी के उपन्यास 'पटरंगपुर पुराण' के साथ दिन शुरू हो रहा है। तब फिर बंजारा सा होकर दिवस रामायण-महाभारत इन दो ध्रुर्वों के मध्य झूलता रहता है। रामायण में सीता, महाभारत की द्रौपदी और पटरंगपुर की आमा। चीजें एकदम गुड़मुड़ हो जाती हैं। अब आप पूछेंगे सीता व द्रौपदी का पटरंगपुर की आमा से क्या लेना?
 तो उधर सीता वाल्मीकि के आश्रम में है और अपने स्त्री स्वरुप को धन्य कर रही है। द्रौपदी अपने खुले केशों के साथ कृष्ण से युद्ध की अनिश्चितताओं पर प्रश्न कर रही है और इन दोनों स्थितियों को एक धरातल पर भोगती पटरंगपुर की आमा विष्णुकुटि की अपनी आरामकुर्सी में किस्सों की दुकान खोले बैठी है। सब कुछ कितना घुलमिल जाता है। शायद सीता ही द्वापर में आकर द्रौपदी हो गई और कलयुग में पटरंगपुर की आमा।



 पति की गरिमा के लिए अवध के साथ अपने नाम का भी त्याग करना सीता को राम से अलग पहचान देता है। सीता के रूप में स्त्री सशक्तिकरण की ओर ये वाल्मिकी का प्रयास है। द्रौपदी के खुले केश पांडवों को युद्ध के लिए उकसाते हैं। यह मात्र दृष्टि और विचार का भ्रम है। द्रौपदी को एक दृष्टिहीन युग की तमाम विषाक्त प्रवृत्तियों और अधर्म के विनाश का सूचक बनना था। एक ऐसे समाज या राष्ट्र में जिसकी बागडोर मोह में अंधे राजा के हाथ में हैं, (चाहे फिर वो मोह किसी के भी प्रति  हो) और जिसकी अनुयायी आंख होते हुए भी आंखों में पट्टी बांध लें वहां दुर्योधनों द्वारा राष्ट्र धन का दुरुपयोग होना ही है। और दुशासन नितियों का पालन भी। वहां पक्षपात होगा, स्त्री का अपमान होगा और मर्यादा का उल्लंघन भी। मगर पटरंगपुर की आमा की जुबान से जब आप उस कस्बे के बसने, संवरने, उजड़ने और फिर बसने की कहानी सुनते हैं तब पटरंगपुर में ही राम, रावण, पांडव, कौरव के साथ कितनी ही सीताएं, द्रौपदियां दिखाई पड़ने लगती है। इन सब के मध्य कुटुम्ब के लिए भीष्म पितामाह बनी आमा की मृत्यु के साथ उपन्यास का अंत भी जुड़ जाता है। अब वहां से पढ़ने वाले को सोचना होता है। वाल्मीकि की दृष्टि में सीता, वेदव्यास की दृष्टि में द्रौपदी और विष्णु कुटी की आमा की दृष्टि में पटरंगपुर और मृणाल जी की दृष्टि में विष्णुकुटी की आमा। इन चारों जीवन दृष्टियों से निरंतर विकसित होती एक नई दृष्टि। साहित्य विभिन्न जीवन दृष्टियों में से मौलिक दृष्टियां विकसित करने का एक उपक्रम है। *सीता के अनुसार  राजा को केवल नितिसम्मत होना नहीं चाहिए, दिखना भी चाहिए।* तब सीता और राम का त्याग होने और दिखने की पारस्परिकता का सूचक कहा जा सकता है। रामायण-महाभारत ऐसे प्रतीकात्मक रेखाचित्र हैं जिनमें अपनी-अपनी दृष्टियों के रंग भरे जा सकते हैं। धर्म का चश्मा इनके विस्तृत फलक को संकुचित कर देता है। हमें कृष्ण होने का मतलब समझना है और पांडव कहलाने की साधना भी। हमें राम होने के क्रम में सीता और लक्ष्मण की सह कथाओं का भी अनुसरण, चिंतन, मनन, आकलन करना है और पटरंगपुर की आमा के समान उन विभिन्न जीवन दृष्टियों से अपनी एक नितांत मौलिक फिर भी गुड़मुड़ दृष्टि और दृष्टिकोण विकसित करना है।

- *मीना पाण्डेय*
*शालीमार गार्डन, साहिबाबाद*
*गाजियाबाद (उ•प्र•)*

Friday, May 8, 2020

बम बम बाबा और भगनौल*


ऐसे समय में जब घर से बाहर निकलना लक्ष्मण रेखा पार करना हो गया है तब मन जब तब यादों की यात्रा में निकल पड़ता है।
हाय हो sss हाय होsss
ओमss जयs जगदीशs हरेsss
 हाय होss हाय होss
 घुम्म s घुम्म s घुम्म s





हुड़के की थाप के मध्य गूंजता उसका स्वर दिसंबर की बर्फीली, वीरान रात के सन्नाटे को चीरता हुआ मंदिर के आगे अर्धचंद्राकार फैले मकानों की रोशनदानों के भीतर पहुंच जाता। रात्रि भोजन के बाद अलसाए लोग जब रजाई के भीतर होते तब बच्चे 'बम बम बाबा' की कोठरी की तरफ खुलती खिड़कियों पर आंख गड़ाए ढ़िपरी की तरह टिमटिमाते बल्ब की रोशनी में बाबा का अलमस्त नृत्य देखने लगते। 1556 के आसपास चंद राजा कल्याण चंद्र ने इस पहाड़ी कस्बे में किला बनवाया था। बाद में किले में मंदिर स्थापित कर दिया गया। मंदिर के चारों ओर पहले घना जंगल हुआ करता था मगर अब पूर्व में जंगल काटकर कई मकान बन गए हैं। पश्चिमी छोर पर अब भी चीड़ का जंगल था। जिससे होते हुए सैकड़ों राहगीर दूरस्थ स्थित गांवों से आया-जाया करते। मंदिर के नीचे थी एक कोठरी जो सदैव रिक्त पड़ी रहती थी। तो हुआ ये कि सुनसान कोठरी एकाएक गुलजार हो गई। एक बूढ़े बाबा वहां रहने आ गए। लंबी छरहरी काया, चेहरे पर सेंटानुमा दाढ़ी, घुटनों तक आधुनिक मिनी स्कर्ट की तर्ज पर जोगिया धोती और सर पर सदाबहार बंदर टोपी। बाबा के पास एक हुड़का था। रात का अंधेरा घिरते ही वातावरण उनके भगनौलो ( पहाड़ी शैली के गीत) की मस्ती में डूब जाता। धीरे-धीरे उठता उनका स्वर कभी हिमालय की सबसे ऊंची चोटी से टकराता‌ कभी हुड़के की घुम्म घुम्म पाताल का चक्कर लगा आती। बड़े-बूढ़े कहते बाबा दम लगा कर नाचता है। हां नशा तो था उसके स्वर में। जैसे नदी में उतरती गागर घुप्प घुप्प घुडुप्प और चोटियों से गिरते चीड़ के ठीठे ठिs ठिs ठिररररर और पीरूल में सरररर फिसलता पैर। बाबा एक पंक्ति को बीसीयों बार गाता। स्वर ऊपर- नीचे फिर आलाप। बाबा के आसमान छूते आलाप के साथ बच्चे सुनते-सुनते नींद में गहरे उतर जाते।

उनके गीतों के बोलो से जोड़कर उन्हें 'बम बम बाबा' पुकारा जाने लगा। बाबा पलटन से रिटायर थे। चीन युद्ध के समय लड़े थे। उन्हें बैठे-बैठे बच्चा बन जाने का गुण आता था। ये हमने बाबा के मुंह से सुना था। मगर उड़ती-उड़ती कुछ खबरें भी बाबा के पीछे-पीछे वहां पहुंचने लगी। मसलन बाबा पास के किसी गांव में अपने परिवार के साथ रहता था। सेना से रिटायर है और अब मानसिक संतुलन खो चुका है। स्वभाव से सनकी है और गांव में एक आदमी को मारकर फरार है। खबर में कितनी सच्चाई थी भगवान जाने। मगर बाबा स्वभाव से कुछ निराले तो थे। कुछ  विरले। कभी गुस्सैल और चिड़चिड़े,कभी प्रसन्न। मगर बिना बात कभी किसी से नहीं उलझे‌। उनका यह हैरतअंगेज मिजाज ही बच्चों के खेल का विषय  हो गया। बच्चे पत्थर मारकर उन्हें परेशान करते और बम बम बाबा क्रुद्ध होकर भद्दी भद्दी गालियां निकालते। प्रसन्न होते तो वही बाबा बच्चों को बिस्किट, टॉफीयां  बांटते। कुछ अलग ही तरह के थे बम बम बाबा। नमस्कार के स्थान पर नमो नारायण कहते और छोटे लड़के-लड़कियों को ए छोरा ए छोरी। कोठरी के भीतर उन्होंने अपनी अलग दुनिया रच रखी थी। सुबह शाम मंदिर की साफ-सफाई करते और रात के समय अलमस्त नाच गाना। फिर वही हुआ जिसका डर था।बाबा के मिजाज के कारण उन्हें निकालने की कवायद शुरू हो गई। उन दिनों वो और गुस्सैल हो गये। और एक दिन मुंह अंधेरे उठकर जाने कहां चला गये। मन्दिर के आसपास पहरा देते चीड़ के वृक्ष उसके बाद कभी उनके गीतों के साथ नहीं झूमे। बच्चे उदास हो गए और रातें फिर सुनसान।

कुछ नहीं था उस बम बम बाबा में पर बहुत कुछ था।  लाकडाउन के दिनों सड़कें वीरान और उजाड़ हो गई हैं। मन एक अदृश्य दहशत में रहता है। शाम ढले बालकनी में बैठती हूं। गर्मी की गुम्म शाम के मध्य रीता मन वहीं-कहीं बम बम बाबा के स्वर से जुड़ने लगता है।
हाय हो sss हाय होsss
ओमs जयs जगदीशs हरेsss
घुम्म घुम्म घुम्म।

- *मीना पाण्डेय*
*शालीमार गार्डन, साहिबाबाद*
*गाजियाबाद (उ•प्र•)*

 #lockdownunlock

Tuesday, May 5, 2020

घर पर रहने और फंसे होने का अन्तर

एक पुराने गीत की पंक्तियां स्मरण हो आई हैं 'हम-तुम एक कमरे में बंद हो और चाबी खो जाए....!' लाकडाउन के दौरान ये पंक्तियां काफी रिलेट करती प्रतीत होती हैं। मगर आप मानेंगे कि सभी सुविधाओं के साथ अपनी मर्जी से घर में बंद होने और बगैर आवश्यक चीजों के दुर्भाग्यवश घर में बंद हो जाने में बड़ा अंतर है। कभी सोचा है ये अंतर किस हद तक दुरह हो सकता है? 


 तो हुआ ये है जनाब के 2016 की रिलीज हुई फिल्म ' ट्रैप्ड'(trapped) मुझ तक 2020 में पहुंची और पहुंची तो इस कदर पहुंची कि फिर उससे बाहर निकलना आसान नहीं रहा। विक्रमादित्य मोटवान निर्देशित, अमित पांडेय व हार्दिक मेहता लिखित इस फिल्म का नायक अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहने के लिए बहुत सीमित समय में और सीमित पैसों के साथ एक घर किराए पर लेना चाहता है। उसकी मजबूरी उसे एक ऐसी नवनिर्मित सोसाइटी में ले जाती है जहां अभी कोई  रहने नहीं आया। नायक बिल्डिंग के 35 वें माले पर घर किराए पर ले लेता है। स्थितियां कुछ ऐसे मोड़ लेती हैं कि अगले दिन गर्लफ्रेंड को लेने निकलने की जल्दी में नायक से फ्लैट का दरवाजा लॉक हो जाता है और चाबी दरवाजे के बाहर लगी रह जाती है।  वायर शॉट की वजह से बिजली और पानी का न रहना और फोन डिस्चार्ज जैसी स्थितियों ने उसे हर तरफ से  असहाय कर दिया है। बस इतना ही, इसके बाद फ्लैट से बाहर निकलने के लिए नायक के प्रयास, उसकी छटपटाहट। उसके बाद नायक की विवशता उसकी अपनी नहीं रह जाती। पूरी फिल्म के दौरान जीवित रहने और वहां से निकलने की जद्दोजहद में उपजती नायक की अजीबोगरीब स्थितियां हैं और दर्शक की दो आंखें । जैसे वह सब कुछ अपने ऊपर भोग रहा है। लगभग चार वर्ष पहले आई ये फिल्म दुनियादारी में उलझे हमारे मस्तिष्क को कुछ ऐसी स्थितियों की तरफ केन्द्रित करती है जहां से हम अपने लिए जीवन, आदमी,साधन, आवश्यकता और इच्छाओं की नई परिभाषा गढ़ने को मजबूर हो जाते हैं।  फिल्म के बाद जाने अंजाने कुछ प्रश्न आप के साथ हो लेते हैं। जैसे... विपरीत परिस्थितियों में तमाम ओढ़ी हुई सभ्यता के साथ कितनी देर तक इंसान बना रहा जा सकता है? कौन सा ऐसा बिंदु है जहां पर प्राणी के रूप में मनुष्य-श्रेष्ठ होने का आखिरी भ्रम भी उतर जाता है‌‌?  और ये भी कि जीवन के लिए सबसे जरूरी चीजें क्या हैं। एक ऐसी स्थिति जहां पर भूख और प्यास की जद्दोजहद स्वाद, स्वच्छता और सुगंध की सीमा से पार हो जाती है और सामने पड़ी गंदी से गंदी चीज हमारे हलक के नीचे उतरने को आतुर हो जाती है। वह बिंदु जहां पर शुद्ध शाकाहारी नायक का अंतर्मन कॉकरोच खा लेने को जायज ठहराने लगता है और पानी के स्थान पर यूरिन तक का विकल्प उसके सामने खड़ा हो जाता है। ऐसी स्थितियां एक दर्शक के रूप हमें संवेदना के उस धरातल पर ले जाती है जहां पर मनुष्य होने की दयनीयता और असहायता से घृणा होने लगती है। मनुष्य होने का अभिमान जो संसार की हर वस्तु को अपनी मुट्ठी में करके एक आत्ममुग्धता की स्थिति में पहुंच चुका है अपने सबसे लाचार स्वरूप में कितना दीन-हीन और चीजों पर निर्भर दिखाई दे सकता है, यहां देखिए। 
जीवन के छोटे-छोटे अभाव का रोना रोते हुए कहीं हम भूल जाते हैं कि जो चीजें उपलब्ध हैं कितनी महत्वपूर्ण हैं। जीने मरने के सवाल के मध्य प्रेमिका के चेहरे से ज्यादा पाव भाजी की तस्वीर नायक की कल्पना को रोमांचित कर सकती है।
दो कमरे के फ्लैट में ढाई घंटे तक नायक और उसकी अजीबोगरीब स्थितियों के इर्द-गिर्द बुनी गई यह कहानी बहुत कुछ मिलते-जुलते आम आदमी की कहानी है जो बड़ी ही अजीब परिस्थितियों में फंस गया है। मुख्य किरदार राजकुमार राव जैसे मंझे हुए अभिनेता के द्वारा निभाया जाना फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। पूरी फिल्म के दौरान सिर्फ आपकी आंखें काम करती हैं। आपका दिमाग और दिल एक ऐसे निष्क्रियता की स्थिति में पहुंच जाता हैं जहां आपका अपना अस्तित्व प्रश्नचिन्ह बन जाता है। फिल्म के बाद भी आप उन प्रश्नों से जूझते हैं।

 फिल्म अपने आप में खोए हुए मुंबई शहर या किसी भी महानगर की सच्चाई से भी पर्दा उठाती है जहां आदमी अपनी तमाम सहूलियतों या तमाम अभावों के साथ बिल्कुल अकेला है। उस शहर को अपनी व्यथा सुनाना बहरे के कान में फुसफुसाना भर है। गांव, मुहल्लों और पड़ोस की संस्कृति से निकलकर महानगर की आपाधापी, भीड़-भाड़ धक्कम धक्का के बावजूद हम कितने अकेले पड़ गए हैं। मगर प्रतिकूल परिस्थितियों से हमारे अपने प्रयास ही हमें बाहर ले जा सकते हैं। नायक अपनी वर्तमान परिस्थिति से निकलने के लिए हर क्षण जद्दोजहद करता है।कार्डबोर्ड के टुकड़ों पर टूथपेस्ट और बाद में अपने खून तक से लिखकर मदद के लिए गुहार लगाता है। कपड़ों में आग लगाकर लोगों का ध्यान खींचता है। गुलेल बनाता है। और अंततः बालकनी की ग्रिल काटकर अपने जिंदा रहने की जिद को पूरा करता है।
 फिल्म अच्छी है और शौर्य के रूप में राजकुमार राव का काम बेजोड़। लाकडाउन की परिस्थितियों में दो वक्त के खाने के लिए लंबी-लंबी लाइनों में लगते, गांवों की तरफ अपने  परिवार के साथ पैदल लौटते असहाय मजदूरों की परिस्थितियां से आप इसे काफी कुछ रिलेट कर सकते है। फंसे होने और सभी सुविधाओं के साथ घर पर होने का फर्क है ये। तो बंधुवर मैं सिनेमा विशेषज्ञ नहीं हूं। मैं मात्र इस फिल्म के सहारे इतना कहना चाहती हूं कि जीवन के प्राथमिक सवाल अब भी वही हैं। हम अपनी तमाम विचारधाराओं, दृष्टिकोणों में राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था और कई अन्य मुद्दों पर बहस कर पाते हैं क्योंकि हमारे पेट भरे हुए हैं। जबकि एक बड़े तबके के लिए दो रोटी का सवाल अब भी सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।

मीना पाण्डेय
srujanse.patrika@gmail.com
#लाकडाउनअनलाक

Sunday, May 3, 2020

एकलकट्टू, घरघुस्सु, एकांतप्रिय स्वैच्छिक आइसोलेट लोग😀



लाकडाउन, क्वारंटीन, आइसोलेशन जैसे शब्द इन दिनों काफी प्रचलन में हैं। अब बात घर में बंद होने या सोशल डिस्टेंसिंग की है तो बंधु एकांतप्रिय, एकलकट्टू,घरघूसु जमात के लिए यह कोई नई बात तो है नहीं। ये 'जमात' शब्द तो मियां सबसे ज्यादा डरावना है इन दिनों। जमात बोले तो वर्ग।

 खैर छोड़िए! शांतिप्रिय, अकेले पसंद, एकांतप्रिय, एकलकट्टू प्रजातियों के लिए यह कोरोना काल कोई खास बदलाव  लेकर नहीं आया। प्रवृत्तिवश क्वॉरेंटाइन लोगों के लिए यह कोई नई बात नहीं। जंगल में भी मंगल कर देने वाले इस दौर में भीड़ के बीचों-बीच अकेले होने का हुनर जानने वाले लोग एकाएक महत्वपूर्ण हो जाएंगे किसने सोचा था? ये स्मृतिजीवी लोग चैनलों की चकाचौंध भरी फेहरिस्त के मध्य भी कई बार दूरदर्शन तक होकर आ चुके थे। इसीलिए एकाएक दूरदर्शन की तरफ लौटना इनके लिए कोई नई चीज नहीं थी।
 किताबों, अखबारों,  बालकनियों से गुफ्तगू करने वाले ये लोग एक स्वैच्छिक आइसोलेशन में है मित्र। इन्हें कभी व्यवहार कुशल होना नहीं आया। बात को शुरू, समाप्त करना उनके लिए सदैव दुविधा का प्रसंग रहा है। मुस्कुराहट के पीछे की राजनीति और हंसी के पीछे का षड्यंत्र इन्हें नहीं सुहाता और बातों में से बात निकालने की कला इनके बस का रोग नहीं।
अव्यावहारिक लोगों के एकलकट्टू होने की वजह भी उतनी अव्यावहारिक होती हैं। दरअसल अकेलेपन की सुगंध, एकांत में विचरण और शांति का संगीत इन्हें अच्छा लगता है। ऐसे महामानवों के लिए यह कोरोना काल कोई बड़ी घटना नहीं है। प्रतिदिन कितनी ही महामारी इनके श्वसन तंत्र से होकर गुजरती हैं। हर रोज कितने वायरस इनकी इंद्रियां दूषित करते हैं। मगर यह बचे रहे। इन्होंने चलचित्र सा गुजर जाने दिया है दुनिया को सामने से। मगर ये अचल, अडोल व अप्रभावित ही रहे। ऐसे एकांतप्रिय, अधिक सामाजिक न हो पाए लोग समाज के लिए सैनिटाइजर हैं!

मीना पाण्डेय 😀
#लाकडाउनअनलाक

Saturday, May 2, 2020

मृत्यु या विश्राम स्थल



किसी ने सत्य कहा है-

न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ
 बस इतनी सी बात है
किसी कि आंख खुल गई
 किसी को नींद आ गई।

 इन दिनों जब न्यूज़ चैनलों पर कोरोनावायरस संक्रमितों का आंकड़ा तेजी से बढ़ता दिखाया जा रहा है। मन एक तरह की सिहरन से भरा जा रहा है।  अमेरिका में एक दिन में इतने... इटली में पिछले दस दिनों में इतने... और ब्रिटेन में बीते एक हफ्ते में इतने...! मौत जैसे विश्व के बेहतरीन क्रिकेट बल्लेबाजों का स्कोर बोर्ड हो गई है। किसी को नहीं पता कहां जाकर रुकेगा आंकड़ा। और अब 'पटरंगपुर पुराण' की आमा भी नहीं रही। न नहीं.. वहां कोरोना नहीं पहुंचा। घुटनों में पानी भर गया था उनके। वैसे मर तो बहुत पहले गई थी आमा। मगर मेरी दुनिया में कल ही मरी। इरफान और ऋषि कपूर के बाद उनकी मृत्यु की दुखद सूचना मुझ तक पहुंची और सूचना क्या उन्होंने तो दम ही सामने तोड़ा। क्या खूब वर्णन किया है मृणाल जी ने विष्णु कुटी की आमा की मृत्यु का। जीवित प्राणी भी यकीन कर लें कि निश्चय ही ऐसी ही होती होगी मृत्यु। .....जैसे धूल के कण का हवा में बिला जाना। तप्त सतह पर पड़ती पानी की बूंद, ये... गिरी और गायब। या रेत पर बनी आकृतियां, एक जोरदार झोंका और धत्त तेरे की।
एक कवि ने कहा है-
 मृत्यु एक विश्राम स्थल है

यानी मृत्यु के उस पार भी जीवन है। आत्मा तो अजर, अमर, अविनाशी है। ये तो कहा ही है गीता में। फिर उन दोनों के मध्य क्या है? इस विराम का क्या औचित्य है? क्या बीच का यह विराम एक परिक्रमा होगी? पूर्व स्मृतियों को वाष्पित हो जाना होता होगा और पांडवों की भांति किसी पेड़ पर रखे गए कर्म और संस्कारों के शस्त्र लेकर फिर कर्म युद्ध के लिए योद्धा का कर्मभूमि पर उतर आना। अब तक मृत्यु की वही सिनेमाई तस्वीर आंखों के सामने थी। मसलन भैंसें में सवार एक विशालकाय आकृति का आना और असहाय मृत शरीर की छाया उनके पीछे-पीछे चल देना या फिर किसी जोत का बुझ जाना भर। और तब स्वर्ग-नरक में लगने वाली लंबी लाइन। कर्मों के खाते, बहिखाते, सजाएं इत्यादि। मगर सत्य इससे पृथक है ये तो तय है और ये भी कि कोरोना की भांति मृत्यु भी धर्म निरपेक्ष है। ये धर्म, जाति या वर्ग देखकर अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति नहीं बदलती।

 बहरहाल..कुछ तो है जिसके बिना यह देह  एकाएक निर्थक हो जाती है। शरीर प्रियजनों का प्रिय नहीं रहता। कुछ तो है जो इस हाड़मांस के शरीर को अर्थ देता है। एक ज्योत, एक प्रकाश, एक ऊर्जा जिसके बिना ये कमनीय देह दुर्गंध का घर दिखाई पड़ती है। एक उर्जा जो जीवन भर हमारे साथ चलती है। गलत-सही का विवेक। आदतों संस्कारों और कर्मों का स्टोर हाउस। कुछ है जो हमारे चिंतन -मनन को पथ देता है। तब फिर यह प्रश्न कि दो जीवनों के मध्य के विश्राम के बाद नए जीवन की भूमिका कौन तय करता है? यह कर्म फल क्या है? कर्मों की गति क्या है? महाशय इसके लिए तो श्रीमद्भगवद्गीता है। वहां आत्मा-परमात्मा, कर्म-धर्म-अधर्म सब हैं। मैं तो बस मृणाल जी की बात के सहारे इन प्रश्नों तक उतर आई। मैं मात्र मृणाल जी के भाषा कौशल पर मुग्ध हुई जा रही हूं। तब ये भी दिमाग में आता है कि कथाकार होने के नाते कहानी या उपन्यास में कथाकार भी तो करन-करावनहार की भूमिका में होता है। एक रचनात्मक कृति। एक जीवन यात्रा। पात्रों के जन्म- मरण,दायित्व, चरित्रो का निर्धारण। तब दूसरी कृति की ओर बढ़ते हुए पूर्व की स्मृतियों से मुक्ति। जैसे उससे पहले कुछ था ही नहीं। और सब भूल जाने पर भी कुछ साथ हो ही जाता है। ये पूर्व के अनुभव की पूंजी पात्रों, चरित्रों, परिवेश वातावरण और घटनाओं के गठन के साथ एक कथाकार को भी समृद्ध करती चलती है। तब दो जीवन के मध्य का विश्राम स्थल चिंतन, मनन और पुराने से ग्रहण करने योग्य रख लेने की प्रक्रिया है? यहां यह कहना जाने कितना सही है कि एक जन्म जहां समाप्त होगा वहीं से नए जीवन की शुरुआत  होगी।

 मैं कोई आध्यात्मिक गुरु नहीं हूं। ना मेरे आध्यात्मिक चिंतन को कोई विशेष धारा प्रभावित कर रही है। मैं तो इसे चिंतन भी नहीं मानती। यह ऊटपटांग विचारों का एक प्रवाह मात्र कहा जा सकता है। यदि ऐसा है तो? यदि ऐसा होता तो? जैसे प्रश्नों के इर्द-गिर्द झरती आशंकाओं का एक पुंज।  अब जहां से बात शुरू की थी वहीं लौटती हूं। हां तो मृणाल पाण्डे जी के उपन्यास 'पटरंगपुर पुराण' में विष्णकुटि की आमा शरीर छोड़ रही हैं-
"आमा को झूम जैसी आ रही है। आमा आंखें खोलना चाहती है, पर सुर्र-सुर्र होश भीतर ही भीतर नी s s चे को सरक जैसा रहा है, जैसे भारी पीतल का लोटा बांध कर गिर्री से लंबी रस्सी कुएं में छोड़ दी हो किसी ने। गर-गर-गर।

 औरी जो शीतल अंधेरा है चंहु ओर आमा के। बासें हैं, पानी की, कच्ची हरी पत्तियों की नाने भाऊ के गलाड़े जैसी नरम हरी काई की।
 आमा के आखिरी सपने में आसमान कांसे की चमचमान थाली जैसा झक्क है।
 दू s र दो चीलें जैसी मंडरा रही हैं उस आसमान में। एक चील झपट्टा जैसा मार के ठिक्क आमा के मुख थिर आ जाती है, आमा को उसकी आंखें हरी-हरी दिखती हैं। उसके पांखों की हवा सुर्र-सुर्र आमा की कनपटी पर बजती है।
फिर लोटा पानी में धीs s रे से डूब जाता है, गुडुप्प।
पानी कुछ देर हिलता जैसा है फिर शांति ही शांति।"

 *मीना पाण्डेय
शालीमार गार्डन, साहिबाबाद
गाजियाबाद*

Sunday, April 21, 2019

डॉ रमेश चन्द्र साह को पढ़ते हुए

                    अंतर्मुखी किंतु स्वयं से संवाद के स्तर पर बातूनी चरित्र


डॉ रमेश चन्द्र साह के कथा चरित्रों की विशेषता है कि वह अंतर्मुखी होते हुए भी  स्वयं से वार्तालाप के स्तर पर बेहद वाचाल प्रतीत होते हैं। उपन्यास आखरी दिन का नायक कथा के भीतर मुख से बहुत अधिक कुछ बोलता दिखाई नहीं देता परंतु स्वयं से उसका संवाद बिना किसी व्यवधान के निरंतर जारी रहता है। यही प्रवृत्ति हम उपन्यास आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू वह पुनर्वास में भी देखते हैं, जहां पर नायकों का स्वयं के साथ एक निरंतर संवाद चलता रहता है। मन व मस्तिष्क के मध्य यह संवाद चिंतन की कई परतें खोलता है। यह आत्मलाप कथा की आवश्यकता भी है। इसी के माध्यम से उपन्यास अपना रचनात्मक विस्तार पाता है। यह संवाद कभी स्थिति और परिस्थितियों को एक दर्शक के रूप में देखते हुए उन पर परिहास करता दिखाई देता है।यथा उपन्यास आखिरी दिन-

" मैं अपने को डराने की हरचंद कोशिश कर रहा हूं, यह देखकर मुझे हंसी आ रही है। पता नहीं, क्या बात है कि मुझे डर जैसा महसूस ही नहीं हो पा रहा है। यह मुझे भगवान जाने हो क्या गया है। मैं डर नहीं रहा हूं-  जबकि डरना स्वाभाविक है। क्या यह चिंता की बात नहीं है? क्या मुझे इस पर खुश होना चाहिए? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मेरी समझ भी जैसे मेरी घड़ी की तरह ही बंद हो गई है। जाने कैसे। अभी  पिछले माह ही तो मैंने नया सेल लगवाया था इसमें। हो सकता है, सीलन घुस गई हो इसमें या फिर बेहोशी के दौरान यह गिर पड़ी हो जमीन पर। मगर ताज्जुब की बात है कि वे और तो अपने जाने मुझे अच्छी तरह से नंगा कर गए। वो घड़ी ही जाने क्यों रह जाने दी मेरे पास उन्होंने। शायद उनका ध्यान ही नहीं गया इस पर,या भूल गए। या फिर जान-बूझकर छोड़ गए की घड़ी पास में ना होने से घड़ी पास में हो ना कहीं ज्यादा तकलीफ दे होगा इस आदमी के लिए। हथकड़ी का काम की इसकी घड़ी ही कर देगी देख देख कर तड़पेगा।"

 तो कहीं जीवन जगत की  परिघटनाओं को अत्यंत दार्शनिक चश्मे से देखने लगता है।यथा आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू उपन्यास में विभूति बाबू का यह अत्मसंवाद -
" अभी यह खामखयाली नहीं तो क्या है? आखिर किसने जिया यह जीवन- अगर, मैंने ही नहीं तो? और यह कह कौन रहा है? कौन है यह 'मैं ', जिसे अपना सारा जिया- करा भी अपना जिया- करा जैसा नहीं लगता? मैं अगर इतना ही अलग और ऊपर हूं तो फिर क्यों इतना कलप रहा हूं? क्यों अपने साथ एक घड़ी चैन से नहीं बीता पाता मैं? क्यों मैं इधर कुछ दिनों से रात में सोने जाते हुए भी डरने लगा हूं और सुबह जागते हुए भी? क्यों,आखिर क्यों, आजकल रोज बिला नागा अपने ही एक और बदसूरत चेहरे से मुठभेड़ होती है ? जैसे आज तक कभी अपनी शक्ल ही ना देखी हो आईने में। तो क्या यहीं हूं मैं कुल मिलाकर? अपना ही व्यंग-विद्रूप?
 स्वयं के साथ नायक का यह संवाद लेखक को यह अवकाश देता है कि वह अपने सांस्कृतिक संदर्भ व दर्शन संबंधित ज्ञान से उपन्यास की कथावस्तु को समृद्ध कर सके। अपने कथा साहित्य में दार्शनिक चिंतन के विषय में बोलते हुए  एक साक्षात्कार के दौरान डॉ साह कहते हैं - 
"आम हिंदुस्तानी के लिए ज्ञान का मतलब आत्मज्ञान होता है, नॉलेज इंडस्ट्री नहीं। सामान्य से सामान्य आदमी में भी दार्शनिक संस्कार होता ही है ।वही मुझमें भी है। जीवन की स्वाभाविक दिशा, परिणति के रूप में वह रचनाओं में भी आएगा ही।"
 चिंतन का यह विस्तार डॉ रमेश चंद्र शाह के कथा साहित्य में प्रमुखता से उभर कर आया है। यही बौद्धिक चेतना वह दार्शनिक दृष्टिकोण लेखक की अध्ययन शीलता, बौद्धिकता को रेखांकित करता है। डॉ साह के पास आलोचनात्मक दृष्टि है तथा चिंतनशील परंपरा भी। यही दो चीजें उनके संपूर्ण कथा साहित्य को एक अलग स्थान प्रदान करती हैं। अपने उपन्यासों में लेखक जीवन की छोटी -बड़ी स्थितियों व घटनाओं का बेहद गहराई से विश्लेषण करता हुआ चिंतन की जिस उच्चता का स्पर्श अपने उपन्यासों में करता है वह पाठक से भी उत्कृष्ट ज्ञान व चिंतनशीलता की अपेक्षा रखता है। दार्शनिक चेतना का यही विस्तार कहीं-कहीं उनके लेखन को सामान्य पाठक के लिए दुसाध्य भी बना देता है। परंतु यही रचनात्मकता की वास्तविक कसौटी भी है कि वह पाठक को हर बार और अधिक गहनता से चिंतन के लिए प्रेरित करें।यथा- उपन्यास आखिरी दिन का यह कथन-
"  वह मेरा सिर धड़ से अलग करने की सोच सकते हैं। सोच क्या, कर भी सकते हैं अपनी समझ से।उन्हें क्या पता मेरे सिर की सरहदें अब इस कदर फैल चुकी हैं कि उनके सिर के भी आर-पार होकर गुजर गई हैं। काश! मैं वो सब कुछ उन्हें बता सकता जो इस मकान ने मुझे बताया। काश, में उन्हें वह सब दिखा और सुना सकता।क्यों नहीं वह मुझे थोड़ी सी मोहलत और बख्श देते!"
 इसी तरह आप कहीं नहीं रहते विभूति बाबू उपन्यास का यह कथन उनकी दार्शनिक चिंतन शीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है-

" वह जन्मा, वह जिया वह मर गया'- देखा जाए तो हर जीवनी का कुल निचोड़ क्या इतना ही हाथ नहीं लगता? तो क्या यही आत्मकथा है? आखिर क्या कारण है कि हमें वही चीजें, वही लोग और वही जगहें अपनी तरफ खींचती हैं जो हमसे काफी अलग वह काफी दूर हों? यह बात दूसरी है कि लोट फिर कर हम आते तो अंततःअपने ही पास हैं। इसका मतलब.... क्या यही नहीं हुआ की  अपने में लौटने के लिए,अपना बासीपन झाड़ने के लिए भी, अपने से बाहर निकलना जरूरी होता है? पर क्या हम बाहर निकल कर भी सचमुच बाहर निकल पाते हैं? अपने को एकदम पीछे छोड़कर? अपने को एकदम भूल कर?"

मीना पांडेय


Wednesday, February 20, 2019

हिंदी आलोचना के शिखर पुरुष की स्मृति में अज्ञेय

प्रसंगवश






बड़ी अजीब स्थिति होती है जब आप साहित्य को पढ़ -समझ रहें हो और एक दिन अचानक हिंदी के शीर्षस्थ व्यक्तित्व से रूबरू भेंट हो जाए। बहुत सकुचाते हुए मैंने डोर बैल बजा दी, दरवाजे खुलने में कुछ विलम्ब हुआ किन्तु भीतर से आ रही खटर -पटर की ध्वनि बता रही थी की कोई है भीतर। कुछ ही देर में हिंदी के शिखर पुरुष नामवर सिंह जी ने दरवाजा खोल मेरी उत्सुकता को स्नेहिल विराम दिया। कमरे में प्रवेश करते ही मेरी नजर जिस चीज पर जाकर टिक गयी वो थी ठीक सामने टंगी  निराला जी की तस्वीर। उस तस्वीर के साथ उनकी अपनी  तस्वीर टंगी थी। कमरे के पूर्वी व् पश्चिमी छोर पर बुक सेल्फ से किताबें झांक रहीं थी और उनके ऊपर वाली शेल्फ पर उनके योगदान को रेखांकित करते सम्मान देदीप्यमान थे। नामवर सिंह जी की बेहद पतली -दुबली देह पर आयु की ढलान पूरी तरह पैर पसार गई है। चलना, उठना, बैठना कुछ बाधित हो गया है मगर स्मृतियाँ ज्यों की त्यों। मैंने अज्ञेय जी पर बात करनी चाही, एक सिरा पकड़ घंटाभर वो निर्बाध उन पर बोलते रहे। प्रस्तुत है अज्ञेय जी पर उनकी विस्तृत टिपण्णी का एक अंश --

मैंने अज्ञेय जी पर बात शुरू की तब कुछ देर सोचते रहे और मुस्कुराते हुए बात शुरू की - सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय इतना लम्बा नाम हिंदी साहित्य में किसी का नहीं मिलता और लम्बे को यदि बड़ा समझो तो इतना बड़ा नाम भी कोई दूसरा नहीं। सच्चिदानंद उनका अपना नाम था पिता का दिया हुआ, हीरानंद उनके पिताजी का नाम और वात्स्यायन वत्स गोत्र होने के कारण और हिंदी जगत में अपना नाम उन्होंने अज्ञेय चुना। अज्ञेय पर उन्होंने कविता भी लिखी, तो वो अज्ञात नहीं कहते अज्ञेय कहते हैं अर्थात उन्हें कम लोग जानते हैं। ये लाहौर से आए हुए लोग थे। हिंदी वातावरण तब उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश तक सीमित था। तो एक तरह से कहें तो हिंदी जगत की दुनियां में वे अज्ञात पुरुष ही थे। ये गांधीवादी भी नहीं थे, प्रेमचंद्र की तरह उस दौर के जो क्रांतिकारी लोग थे हटे भगतसिंह व् अन्य उनसे बहुत प्रभावित थे। इस प्रकार उनकी राजनीति भी दूसरी थी। छायावाद व् प्रेमचंद्र का युग जब समाप्त हुआ  दौर की ऐसी बहुमुखी प्रतिभा  या कहे सर्वोत्मुखी प्रतिभा के बड़े लेखक का हिंदी जगत में प्रदार्पण हुआ। अज्ञेय ने छोटी कविताएं लिखी,बड़ी कविताएं लिखी , कहानी लिखी, उपन्यास लिखा नाटक काम लिखा मगर नाटक भी लिखा। 




उनके बारे में ये कहा जाता और लिखा जाता रहा की वे बहुत चुप्पा थे, बचपन से ही काम बोलते थे। घर में भी नहीं। गोरा चिट्टा, लम्बा भरा हुआ बदन और यदि व्यक्तित्व की भी बात करें तो मुझे याद नहीं की हिंदी में वैसे भव्य व्यक्तित्व का कोई दूसरा साहित्यकार होगा। अज्ञेय जी के साथ ढेड़ -दो साल मुझे जोधपुर विश्विधालय में  रहने का मौका मिला। जोधपुर विश्वविधालय में बी बी जॉन समय वाईस चांसलर  हुआ करते थे ।हिन्दू नाम की पत्रिका जो हिंदी में निकलती है उसमे उनका कालम निकलता था तब। मेरे बारे में सुना होगा कहीं,मुझे ऑफर देकर वहां बुलाया। छः  महीने बाद उन्होंने मुझसे कहा की में वाईस चांसलर रहते अज्ञेय जी यहाँ प्रोफेसर  बुलाना चाहता हूँ। वो इंडियन लिटरेचर के प्रोफेसर होंगे। तुम्हें कैसा लगेगा ? मैंने कहा ख़ुशी होगी। बोले मै  जनता हूँ तुम्हारी विचारधारा से उनका मेल नहीं है। तुम कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े हो और वो ऍम एन राय वाली पार्टी से जुड़े हैं और मै  भी उसी  हूँ। तुम कार्यकारिणी के मेंबर हो  करने जा रहे हैं  प्रपोज़ करो। मैं वाईस चांसलर, मैं  प्रपोज़  करूँगा तो ठीक नहीं होगा। प्रपोज करो की इंडियन कल्चर नाम का हमारे यहाँ कोई डिपार्टमेंट नहीं है. एक नया डिपार्टमेंट होगा और उसके विजिटिंग  प्रोफेसर के   बुलाएँगे। क्योंकि  हिंदी में  बुलाऊँ  तो  तुम हिंदी के हेड हो वो तुम्हारे अण्डर  हो जायेंगे तुमको भी अच्छा नहीं लगेगा उनको भी अच्छा नहीं लगेगा। तो बी बी जॉन  ने अज्ञेय जी को वहां बुलाया। मैं दिल्ली आ रहा था तो मुझे लेटर दिया की उन्हें दे देना और अगर तुम्हारे साथ आ सके तो अच्छा क्योंकि जहाँ तक मैं जनता हूँ वो अकेले हैं। तो मैं तब प्लेन से अज्ञेय जी को वहां लेकर आया। तब कोई क़्वार्टर  खाली नहीं था तब एक हफ्ता वो मेरे साथ ही रहे। बाद में अज्ञेय जी की  नियुक्ति को लेकर कुछ विरोध होने लगा, बी. बी. जॉन का।  जोधपुर छोटा शहर है, तब लगा की वो रिजाइन करने वाले हैं। तब मुझसे अज्ञेय जी ने कहा कि ऐसा माहौल है, दोनों के लिए ही ठीक नहीं, चलो निकलें यहाँ से, तो हम दोनों दिल्ली आ गए। इस तरह से में मार्क्सवादी विचारधारा से और वो दूसरी विचारधारा से थे,  मगर एक लगाव है उनके साहित्य से, विचारधाराएं धरी रह जाती हैं। व्यक्ति के रूप में भी काम बोलने वाले गंभीर, प्रसन्न  मुद्रा में खूब हँसते भी थे। दिल्ली आकर संयोग से मुझे जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी में ऑफर मिल गया था। वे बहुत शौकीन मिज़ाज के थे, एक अच्छा मकान तब उन्होंने यहाँ ले लिया था।  मैं अक्सर उनके यहाँ जाता था, मिलते थे, कविताएँ सुनाते थे, जबकि हमारी विचारधारा धारा का उनकी विचारधारा का कोई मेल नहीं था। मैं मार्क्सवादी विचारधारा का था और कम्युनिस्ट पार्टी का मेम्बर रह चुका था जबकि वे एकदम विपरीत विचारधारा के थे।  बावजूद इसके एक साहित्यकार के रूप में, व्यक्ति के रूप में मैं उन्हें काफी पसंद करता था।  और जब उनका निधन हुआ तो कन्धा लगाने वालों में एक मैं भी था।  अपने दौर के वे सबसे बड़े कवि व कथाकार थे, इतिहास उन्हें कभी भुल नहीं सकता है, स्वयं मैं भी। अज्ञेय के साहित्य में दो रंग की भाषा दिखाई देती है जिसमे एक संस्कृत निष्ट क्योंकि उनके पिता संस्कृत के पंडित व शिक्षा विद्य थे और दूसरी बोलचाल गद्य एवं कविता तो भाषा की दृष्टि और विषय की दृष्टि से मैं समझता हूँ छायावाद के बाद यानि पंत, जयशंकर प्रसाद, निराला जैसे कवियों व प्रेम चंद्र के बाद जो युग गया उनके बाद हिन्दी में एक नये युग को जन्म देने वाला निर्विवाद रूप से सच्चिदानन्द वात्सायन 'अज्ञेय' हैं। उनके स्त्री पात्रों की बात करूँ तो यद्यपि शेखर एक जीवनी का नायक पुरुष है तथापि शशि (स्त्री पात्र) ज्यादा तेजस्वी होकर सामने आया। वह स्वयं एक पुरुष होते हुए मगर वो याद अपनी नायिकाओं के लिए किये जायेंगे।  स्त्री के बारे में जितने अंतरंग ढंग से उन्होंने लिखा है, मैं समझाता हूँ कि जयशंकर प्रसाद के बाद, जो वो युग था उसके बाद अज्ञेय जी हैं जिन्होंने अंतरंग ढंग से स्त्री  पात्रों को लिखा।  जयशंकर प्रसाद ने नाटक लिखे जबकि अज्ञेय ने नाटक काम लिखा।  पंत, निराला व प्रसाद जैसे विराट कवियों के बाद प्रसिद्ध कवियों में अज्ञेय का नाम सबसे आगे है।  


मीना पांडेय