Tuesday, May 5, 2020

घर पर रहने और फंसे होने का अन्तर

एक पुराने गीत की पंक्तियां स्मरण हो आई हैं 'हम-तुम एक कमरे में बंद हो और चाबी खो जाए....!' लाकडाउन के दौरान ये पंक्तियां काफी रिलेट करती प्रतीत होती हैं। मगर आप मानेंगे कि सभी सुविधाओं के साथ अपनी मर्जी से घर में बंद होने और बगैर आवश्यक चीजों के दुर्भाग्यवश घर में बंद हो जाने में बड़ा अंतर है। कभी सोचा है ये अंतर किस हद तक दुरह हो सकता है? 


 तो हुआ ये है जनाब के 2016 की रिलीज हुई फिल्म ' ट्रैप्ड'(trapped) मुझ तक 2020 में पहुंची और पहुंची तो इस कदर पहुंची कि फिर उससे बाहर निकलना आसान नहीं रहा। विक्रमादित्य मोटवान निर्देशित, अमित पांडेय व हार्दिक मेहता लिखित इस फिल्म का नायक अपनी गर्लफ्रेंड के साथ रहने के लिए बहुत सीमित समय में और सीमित पैसों के साथ एक घर किराए पर लेना चाहता है। उसकी मजबूरी उसे एक ऐसी नवनिर्मित सोसाइटी में ले जाती है जहां अभी कोई  रहने नहीं आया। नायक बिल्डिंग के 35 वें माले पर घर किराए पर ले लेता है। स्थितियां कुछ ऐसे मोड़ लेती हैं कि अगले दिन गर्लफ्रेंड को लेने निकलने की जल्दी में नायक से फ्लैट का दरवाजा लॉक हो जाता है और चाबी दरवाजे के बाहर लगी रह जाती है।  वायर शॉट की वजह से बिजली और पानी का न रहना और फोन डिस्चार्ज जैसी स्थितियों ने उसे हर तरफ से  असहाय कर दिया है। बस इतना ही, इसके बाद फ्लैट से बाहर निकलने के लिए नायक के प्रयास, उसकी छटपटाहट। उसके बाद नायक की विवशता उसकी अपनी नहीं रह जाती। पूरी फिल्म के दौरान जीवित रहने और वहां से निकलने की जद्दोजहद में उपजती नायक की अजीबोगरीब स्थितियां हैं और दर्शक की दो आंखें । जैसे वह सब कुछ अपने ऊपर भोग रहा है। लगभग चार वर्ष पहले आई ये फिल्म दुनियादारी में उलझे हमारे मस्तिष्क को कुछ ऐसी स्थितियों की तरफ केन्द्रित करती है जहां से हम अपने लिए जीवन, आदमी,साधन, आवश्यकता और इच्छाओं की नई परिभाषा गढ़ने को मजबूर हो जाते हैं।  फिल्म के बाद जाने अंजाने कुछ प्रश्न आप के साथ हो लेते हैं। जैसे... विपरीत परिस्थितियों में तमाम ओढ़ी हुई सभ्यता के साथ कितनी देर तक इंसान बना रहा जा सकता है? कौन सा ऐसा बिंदु है जहां पर प्राणी के रूप में मनुष्य-श्रेष्ठ होने का आखिरी भ्रम भी उतर जाता है‌‌?  और ये भी कि जीवन के लिए सबसे जरूरी चीजें क्या हैं। एक ऐसी स्थिति जहां पर भूख और प्यास की जद्दोजहद स्वाद, स्वच्छता और सुगंध की सीमा से पार हो जाती है और सामने पड़ी गंदी से गंदी चीज हमारे हलक के नीचे उतरने को आतुर हो जाती है। वह बिंदु जहां पर शुद्ध शाकाहारी नायक का अंतर्मन कॉकरोच खा लेने को जायज ठहराने लगता है और पानी के स्थान पर यूरिन तक का विकल्प उसके सामने खड़ा हो जाता है। ऐसी स्थितियां एक दर्शक के रूप हमें संवेदना के उस धरातल पर ले जाती है जहां पर मनुष्य होने की दयनीयता और असहायता से घृणा होने लगती है। मनुष्य होने का अभिमान जो संसार की हर वस्तु को अपनी मुट्ठी में करके एक आत्ममुग्धता की स्थिति में पहुंच चुका है अपने सबसे लाचार स्वरूप में कितना दीन-हीन और चीजों पर निर्भर दिखाई दे सकता है, यहां देखिए। 
जीवन के छोटे-छोटे अभाव का रोना रोते हुए कहीं हम भूल जाते हैं कि जो चीजें उपलब्ध हैं कितनी महत्वपूर्ण हैं। जीने मरने के सवाल के मध्य प्रेमिका के चेहरे से ज्यादा पाव भाजी की तस्वीर नायक की कल्पना को रोमांचित कर सकती है।
दो कमरे के फ्लैट में ढाई घंटे तक नायक और उसकी अजीबोगरीब स्थितियों के इर्द-गिर्द बुनी गई यह कहानी बहुत कुछ मिलते-जुलते आम आदमी की कहानी है जो बड़ी ही अजीब परिस्थितियों में फंस गया है। मुख्य किरदार राजकुमार राव जैसे मंझे हुए अभिनेता के द्वारा निभाया जाना फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। पूरी फिल्म के दौरान सिर्फ आपकी आंखें काम करती हैं। आपका दिमाग और दिल एक ऐसे निष्क्रियता की स्थिति में पहुंच जाता हैं जहां आपका अपना अस्तित्व प्रश्नचिन्ह बन जाता है। फिल्म के बाद भी आप उन प्रश्नों से जूझते हैं।

 फिल्म अपने आप में खोए हुए मुंबई शहर या किसी भी महानगर की सच्चाई से भी पर्दा उठाती है जहां आदमी अपनी तमाम सहूलियतों या तमाम अभावों के साथ बिल्कुल अकेला है। उस शहर को अपनी व्यथा सुनाना बहरे के कान में फुसफुसाना भर है। गांव, मुहल्लों और पड़ोस की संस्कृति से निकलकर महानगर की आपाधापी, भीड़-भाड़ धक्कम धक्का के बावजूद हम कितने अकेले पड़ गए हैं। मगर प्रतिकूल परिस्थितियों से हमारे अपने प्रयास ही हमें बाहर ले जा सकते हैं। नायक अपनी वर्तमान परिस्थिति से निकलने के लिए हर क्षण जद्दोजहद करता है।कार्डबोर्ड के टुकड़ों पर टूथपेस्ट और बाद में अपने खून तक से लिखकर मदद के लिए गुहार लगाता है। कपड़ों में आग लगाकर लोगों का ध्यान खींचता है। गुलेल बनाता है। और अंततः बालकनी की ग्रिल काटकर अपने जिंदा रहने की जिद को पूरा करता है।
 फिल्म अच्छी है और शौर्य के रूप में राजकुमार राव का काम बेजोड़। लाकडाउन की परिस्थितियों में दो वक्त के खाने के लिए लंबी-लंबी लाइनों में लगते, गांवों की तरफ अपने  परिवार के साथ पैदल लौटते असहाय मजदूरों की परिस्थितियां से आप इसे काफी कुछ रिलेट कर सकते है। फंसे होने और सभी सुविधाओं के साथ घर पर होने का फर्क है ये। तो बंधुवर मैं सिनेमा विशेषज्ञ नहीं हूं। मैं मात्र इस फिल्म के सहारे इतना कहना चाहती हूं कि जीवन के प्राथमिक सवाल अब भी वही हैं। हम अपनी तमाम विचारधाराओं, दृष्टिकोणों में राजनीति, धर्म, अर्थव्यवस्था और कई अन्य मुद्दों पर बहस कर पाते हैं क्योंकि हमारे पेट भरे हुए हैं। जबकि एक बड़े तबके के लिए दो रोटी का सवाल अब भी सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।

मीना पाण्डेय
srujanse.patrika@gmail.com
#लाकडाउनअनलाक

2 comments:

  1. सच लॉकडाउन की वजह से हम भी कई फिल्म देख पाए हैं
    महानगरों की समस्याएं भी उन्हीं की तरह बड़ी-बड़ी होती हैं, जहाँ खुद ही झूझना होता है उनसे
    इंसान का कितना अस्तित्व है यह प्रकृति कई बार समझाती हैं हमें किन्तु हम है की समझ ही नहीं पाते और उसके कोप के भाजन हो जाते हैं
    बहुत अच्छी प्रस्तुति

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    1. शुक्रिया कविता जी 🙏

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