किसी ने सत्य कहा है-
न जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ
बस इतनी सी बात है
किसी कि आंख खुल गई
किसी को नींद आ गई।
इन दिनों जब न्यूज़ चैनलों पर कोरोनावायरस संक्रमितों का आंकड़ा तेजी से बढ़ता दिखाया जा रहा है। मन एक तरह की सिहरन से भरा जा रहा है। अमेरिका में एक दिन में इतने... इटली में पिछले दस दिनों में इतने... और ब्रिटेन में बीते एक हफ्ते में इतने...! मौत जैसे विश्व के बेहतरीन क्रिकेट बल्लेबाजों का स्कोर बोर्ड हो गई है। किसी को नहीं पता कहां जाकर रुकेगा आंकड़ा। और अब 'पटरंगपुर पुराण' की आमा भी नहीं रही। न नहीं.. वहां कोरोना नहीं पहुंचा। घुटनों में पानी भर गया था उनके। वैसे मर तो बहुत पहले गई थी आमा। मगर मेरी दुनिया में कल ही मरी। इरफान और ऋषि कपूर के बाद उनकी मृत्यु की दुखद सूचना मुझ तक पहुंची और सूचना क्या उन्होंने तो दम ही सामने तोड़ा। क्या खूब वर्णन किया है मृणाल जी ने विष्णु कुटी की आमा की मृत्यु का। जीवित प्राणी भी यकीन कर लें कि निश्चय ही ऐसी ही होती होगी मृत्यु। .....जैसे धूल के कण का हवा में बिला जाना। तप्त सतह पर पड़ती पानी की बूंद, ये... गिरी और गायब। या रेत पर बनी आकृतियां, एक जोरदार झोंका और धत्त तेरे की।
एक कवि ने कहा है-
मृत्यु एक विश्राम स्थल है
यानी मृत्यु के उस पार भी जीवन है। आत्मा तो अजर, अमर, अविनाशी है। ये तो कहा ही है गीता में। फिर उन दोनों के मध्य क्या है? इस विराम का क्या औचित्य है? क्या बीच का यह विराम एक परिक्रमा होगी? पूर्व स्मृतियों को वाष्पित हो जाना होता होगा और पांडवों की भांति किसी पेड़ पर रखे गए कर्म और संस्कारों के शस्त्र लेकर फिर कर्म युद्ध के लिए योद्धा का कर्मभूमि पर उतर आना। अब तक मृत्यु की वही सिनेमाई तस्वीर आंखों के सामने थी। मसलन भैंसें में सवार एक विशालकाय आकृति का आना और असहाय मृत शरीर की छाया उनके पीछे-पीछे चल देना या फिर किसी जोत का बुझ जाना भर। और तब स्वर्ग-नरक में लगने वाली लंबी लाइन। कर्मों के खाते, बहिखाते, सजाएं इत्यादि। मगर सत्य इससे पृथक है ये तो तय है और ये भी कि कोरोना की भांति मृत्यु भी धर्म निरपेक्ष है। ये धर्म, जाति या वर्ग देखकर अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति नहीं बदलती।
बहरहाल..कुछ तो है जिसके बिना यह देह एकाएक निर्थक हो जाती है। शरीर प्रियजनों का प्रिय नहीं रहता। कुछ तो है जो इस हाड़मांस के शरीर को अर्थ देता है। एक ज्योत, एक प्रकाश, एक ऊर्जा जिसके बिना ये कमनीय देह दुर्गंध का घर दिखाई पड़ती है। एक उर्जा जो जीवन भर हमारे साथ चलती है। गलत-सही का विवेक। आदतों संस्कारों और कर्मों का स्टोर हाउस। कुछ है जो हमारे चिंतन -मनन को पथ देता है। तब फिर यह प्रश्न कि दो जीवनों के मध्य के विश्राम के बाद नए जीवन की भूमिका कौन तय करता है? यह कर्म फल क्या है? कर्मों की गति क्या है? महाशय इसके लिए तो श्रीमद्भगवद्गीता है। वहां आत्मा-परमात्मा, कर्म-धर्म-अधर्म सब हैं। मैं तो बस मृणाल जी की बात के सहारे इन प्रश्नों तक उतर आई। मैं मात्र मृणाल जी के भाषा कौशल पर मुग्ध हुई जा रही हूं। तब ये भी दिमाग में आता है कि कथाकार होने के नाते कहानी या उपन्यास में कथाकार भी तो करन-करावनहार की भूमिका में होता है। एक रचनात्मक कृति। एक जीवन यात्रा। पात्रों के जन्म- मरण,दायित्व, चरित्रो का निर्धारण। तब दूसरी कृति की ओर बढ़ते हुए पूर्व की स्मृतियों से मुक्ति। जैसे उससे पहले कुछ था ही नहीं। और सब भूल जाने पर भी कुछ साथ हो ही जाता है। ये पूर्व के अनुभव की पूंजी पात्रों, चरित्रों, परिवेश वातावरण और घटनाओं के गठन के साथ एक कथाकार को भी समृद्ध करती चलती है। तब दो जीवन के मध्य का विश्राम स्थल चिंतन, मनन और पुराने से ग्रहण करने योग्य रख लेने की प्रक्रिया है? यहां यह कहना जाने कितना सही है कि एक जन्म जहां समाप्त होगा वहीं से नए जीवन की शुरुआत होगी।
मैं कोई आध्यात्मिक गुरु नहीं हूं। ना मेरे आध्यात्मिक चिंतन को कोई विशेष धारा प्रभावित कर रही है। मैं तो इसे चिंतन भी नहीं मानती। यह ऊटपटांग विचारों का एक प्रवाह मात्र कहा जा सकता है। यदि ऐसा है तो? यदि ऐसा होता तो? जैसे प्रश्नों के इर्द-गिर्द झरती आशंकाओं का एक पुंज। अब जहां से बात शुरू की थी वहीं लौटती हूं। हां तो मृणाल पाण्डे जी के उपन्यास 'पटरंगपुर पुराण' में विष्णकुटि की आमा शरीर छोड़ रही हैं-
"आमा को झूम जैसी आ रही है। आमा आंखें खोलना चाहती है, पर सुर्र-सुर्र होश भीतर ही भीतर नी s s चे को सरक जैसा रहा है, जैसे भारी पीतल का लोटा बांध कर गिर्री से लंबी रस्सी कुएं में छोड़ दी हो किसी ने। गर-गर-गर।
औरी जो शीतल अंधेरा है चंहु ओर आमा के। बासें हैं, पानी की, कच्ची हरी पत्तियों की नाने भाऊ के गलाड़े जैसी नरम हरी काई की।
आमा के आखिरी सपने में आसमान कांसे की चमचमान थाली जैसा झक्क है।
दू s र दो चीलें जैसी मंडरा रही हैं उस आसमान में। एक चील झपट्टा जैसा मार के ठिक्क आमा के मुख थिर आ जाती है, आमा को उसकी आंखें हरी-हरी दिखती हैं। उसके पांखों की हवा सुर्र-सुर्र आमा की कनपटी पर बजती है।
फिर लोटा पानी में धीs s रे से डूब जाता है, गुडुप्प।
पानी कुछ देर हिलता जैसा है फिर शांति ही शांति।"
*मीना पाण्डेय
शालीमार गार्डन, साहिबाबाद
गाजियाबाद*

बेहतरीन ��
ReplyDeleteन जन्म कुछ, न मृत्यु कुछ बस इतनी सी बात है किसी कि आंख खुल गई किसी को नींद आ गई.................................................
ReplyDeleteसही कहा मीना जी आपने इस अन्तर को समझ लिया तो जीवन जीने की कला सीख ली
Thanks
Deleteअच्छा लिखा है
ReplyDeleteहार्दिक आभार
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