Friday, September 22, 2017

अल्मोड़ा  की  रामलीला और दर्शक दीर्घा



जनक राजा बता जल्दी 
किसने ये शिव धनुष तोडा। 

अतीत के झरोखे से  रामलीला को देखती हूँ तो कुमाऊं की सांस्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में शरद ऋतु  की गुदगुदाती ठण्ड में साँझ ढलते ही शाल और टॉर्च थामे टोलियों का रामलीला का आनंद लेने निकल पड़ना याद आता है। भुनी मूंगफली की पुड़पुड़ाहट  के मध्य राम -लक्ष्मण के लम्बे -लम्बे संवादों का आनंद लेने की तन्मयता को  शब्दों में बयां कर पाना कठिन है। पहले रामलीला देखने का चाव ये था की घरों में शाम से ही तैयारियाँ शुरू हो जाया करती थी।  रात्रि भोजन समय से कुछ पहले ही कर मोहल्ले के मोहल्ले निकल पड़ते  रामलीला का आनंद लेने। आस्था -विश्वास  की सीमा यह की मान्यता थी,  जिसने वनवास लीला देखी  उसका मिलाप देखना भी आवश्यक है कौन जाने ये रामलीला देखने की निरंतरता बनाये रखने का तब का भावनात्मक स्टंट ही हो ?बहरहाल आस्था के सागर में गोते लगाते बच्चों, युवाओं ,प्रोढ़ों  यहाँ तक की बुजुर्गों का भी लीला समापन तक मंच को निहारते रहना रामकथा के प्रति दर्शकों की श्रद्धा व् कलाकारों  की मंचीय प्रतिबद्धता को दर्शाता। पर्दे के पीछे से बीच -बीच में  'राम के पात्र को ५  /-, लक्ष्मण  के पात्र को  २ /- फलां -फलां  द्वारा देने की वक्त -बेवक्त की घोषणाएं भी तब दर्शकों को उनके  स्व-आरक्षित स्थान से विचलित नहीं कर पाती थीं। 

 राम भारतीय संस्कृति के आदर्श पुरुष माने जाते हैं और रामलीला संसार का सबसे बड़ा ऑपेरा। यद्यपि रामलीला का मंचन सम्पूर्ण भारत में होता है मगर बात यदि कुमाउनी रामलीला की हो तो उसका  रंग रूप , छटा  सवांद शैली  अपने आप में एक पृथक पहचान रखती है। कुमाउँनी  रामलीला का उदभव अल्मोड़ा में ही हुआप्. देवी दत्त जोशी  जी को इसका श्रेय दिया जाता है।  बताया जाता है पंडित जी  विभिन्न नगरों  की रामलीला शैली देख चुके थे, सन  १८६० में उन्होंने अल्मोड़ा  नगर के प्रसिद्ध बद्रेश्वर मंदिर में सर्वप्रथम  कुमाउनी शैली की रामलीला का मंचन करवाया। कुमाउनी रामलीला की मुख्य विशेषता विभिन्न राग -रागिनियों में निबद्ध मानस की गेय चौपाइयां हैं। पात्र लम्बे अभ्यास के बाद मंच से स्वयं पद गाते हैं। यद्यपि कलाकारों के चयन में उत्तम स्वर को महत्ता दी जाती है तथापि कलाकारों के पास  संगीत का विधिवत ज्ञान होने के कारण रागों के मूल स्वरुप में कुछ भिन्नता दृष्टिगोचर होती है जिसने कुमाउनी रामलीला की एक पृथक पहचान विकसित की है।  बताते हैं कि पहले जब तकनिकी का  इतना विकास नहीं था मंच पर प्रकाश की व्यवस्था मशालें जलाकर की जाती  थीं और माइक का काम कलाकारों  की बुलंद आवाज करती। 

रामलीला की तालीम यहाँ दो माह पूर्व से प्राम्भ हो जाती है।  तालीम के दौरान कलाकारों को तामसी खान -पान का परहेज करना होता है। रामलीला में सहभागिता के लिए लोग अपनी स्वेच्छा से आगे आते हैं।, संगीत की समझ रखने वाले संगीत पक्ष देखते हैं, अभिनय में रूचि रखने वाले अभिनय तथा कलाकारों की साज -सज्जा और मंच सज्जा का कार्य भी इसी तरह सामूहिक प्रयास से होता है। तब रामलीला के प्रति लगाव का आलम ये था की कुछ कलाकार अपने पात्र विशेष के पर्याय बन गए थे तथा उस रूप में ही नगर भर में पहचाने जाने लगे थे। मोहल्ला विशेष की रामलीला वहां मोहल्ला विशेष की गरिमा होती है।  बद्रेश्वर मंदिर से प्रारम्भ हुई कुमाउनी रामलीला आज अल्मोड़ा के विभिन्न स्थानों के अतिरिक्त अन्य नगरों में भी खेली जाती है। 

आज महानगर में  आधुनिक प्रभाव  की रामलीला मंच पर चलताऊ नजर मार लेते दर्शकों की फेस्टिवल संस्कृति निभाते हुए अनायास मन उत्तराखंड में बसे अल्मोड़ा नगर की परम्परागत  कुमाउनी रामलीला व् आस्था, उत्साह से भरपूर दर्शक दीर्घा से जुड़ता चला जा रहा है। 


-मीना पांडेय 

Sunday, September 17, 2017

कुछ बात है की बात नहीं होती-मीना की मसखरी 😂😂



उस दिन एक मित्र के यहाँ से लौटकर मैंने अपनी पुस्तकों की सुसज्जित अलमारी अस्त-व्यस्त कर दी। यही होता है मेरे साथ, जब लोग बोलते हैं उन्हें चुपचाप सुनना अच्छा लगता है और ये सोचना भी की काश मैं भी ऐसे ही तरह -तरह की दुनियादारी की बातें इतने चुटीले अंदाज में कर पाती । शायद यही कारण  है की अपने उम्र की अन्य महिलाओं के लिए मेरी सीधी सपाट बातों में कोई रस नहीं होता।अब समझ में आने लगा है की लम्बी -लम्बी मसालेदार बातों को एक सपाट पंक्ति में बोल देने की मेरी आदत ही मुझे महिलाओं की टोली में अरोचक बना देती है।  कब ? क्या कहाँ से बात शुरू की जाये ?  मेरे लिए सबसे बड़ा प्रश्न रहा है। अतः कुछ 
आत्मीयजनों को छोड़कर क्या बोलूं वाली स्थिति मेरे साथ गाहे बगाहे  ही जाती है। अब कल की ही बात है बस स्टॉप पर स्कूल बस की प्रतीक्षा करती महिलाओं की टोली खूब हँस -हँस कर बतिया रही थी। हेलो -हाय के बाद जब मैंने बोलना शुरू कियातब पूछ बैठी -                                          'बस नहीं आयी अभी ?'  
'नहीं आयी भई ...... नहीं आयी। तुम्हें दिखता नहीं क्या तभी खड़ी है नहीं तो क्यों खड़ी रहती?'
नहीं! ये उत्तर उन महिलाओं का नहीं था। उन्होंने तो '' में सर हिला दिया। जवाब तो मेरी न समझी ने दिया मुझे पलटकर,  ये भी कोई पूछने की बात थी कुछ ढंग का पूछती ,कुछ ऐसा जिससे अगली किसी बात का सिरा खुलता, जिस पर सजी -संवरी बाफुरसत महिलाएं ठहाका लगा पाती  और बस के आने तक कुछ वक्त ही निकल जाता। 
बहरहाल , मैं  भी एक सामाजिक प्राणी हूँ ,समाज में उठना -बैठना ,लोगो से बात करना, घुलना -मिलना मुझे भी अच्छा  लगता है। पर जाने क्या बात है की बात नहीं हो पाती। अन्य औपचारिक मुलाकातों में तो में निर्भीकता से अपनी बात रखती रही हूँ ,महिलाओं की टोली में ही जाने क्यों हवा खराब हो जाती है? और ऐसी किसी भी मंडली से लौटकर सीधा अपनी पुस्तकों की अलमारी खंगालती हूँ। शायद कहीं ,किसी ने लिखा हो 'बात कहाँ से शुरू की जाये ?’
इस मामले में कुछ लोग बाजी मार गए हैं,बोलने बतियाने में इनका कोई जवाब नहीं होता। ऐसे लोग आपके मुँह से बातें उधार  लेकर भी अपना तमगा लगाकर बेच देते हैं। कुछ लोगो को ये गुण ईश्वर उपहार में मिलता है और कुछ एक को विरासत में। एक बात को तीन -तीन बार वो भी पूरे आत्मविश्वास से कहने के हुनर का जवाब नहीं। इन से बात बनाने में कोई दो हाथ कर के तो देखे ,मजाल है उनके बतियाते कोई अपनी बात बीच में घुसेड़ सके। गलती से कहीं फोन लगा बैठे तो जनाब किसकी मजाल के उनके बोलते एक शब्द भी बोल पाए, फोन रखने की घोषणा के बाद भी बोलते रहने का फितूर भी लाजवाव ही ठहरा। कभी- कभार उन्हें टोककर भी देखिए पूरी की पूरी मार्केटिंग तकनीक समझा देंगे आपको,'  अपनी बात पूरी रखनी है चाहे जैसे भी।  ' मगर हमारी तरह क्या बोलूं , और कब इस उलझन से तो ये खानदानी रोग बेहतर है और हमारे जैसे सामाजिक मौनियों के लिए तो ये रोग कहाँ हुआ ,खानदानी हुनर हुआ।

अब बात जहाँ बात की है तब बात -बात में भी फर्क है जनाब। कुछ बातें तरकस में से तीर की तरह छूटती  हैं और जाकर बींध  देती है सामने वाले का सीना , कुछ बातें उबलते माड़ में से भाप सी उठकर पलभर में लोगो के नथुनों तक पहुंच जाती हैं। कुछ बातें गरीब की रोटी सी हलक में ही अटक कर  रह जाती हैं कभी नीचे नहीं उतरती और कुछ बातें पूराने संदूक के उजाड़ कोने में दुबकी पड़ी रहती हैं ताउम्र। बातें गुलाब होती हैं ,बातें काँटों सी चुभ भी जाती हैं और जुगनू की तरह अँधेरे में रास्ता भी दिखाती हैं। बात -बात में फर्क तो यक़ीनन है साहब। खैर बात कर पाने वालों को ईश्वर ने लिखने का हुनर बक्शा है। वहां नहीं तो यहीं दो -दो हाथ सही।

-मीना पाण्डेय

Saturday, September 9, 2017

सवाल ये है 


सवाल ये है

सवाल कुछ करने
न करने का 
कहाँ है  साहब 

सवाल ये भी नहीं
कि वो 
मदर टेरेसा थी 
या कुछ और 
 ,
वो  एक अच्छी 
पत्रकार भी  थी 
या नहीं।

सवाल तो ये  है 
असल सवाल ये है 

क्या बोलने पर 
हत्या हो जानी चाहिए ? 
कमजोरी पर बात
हो तो 
जुबान छीन ली 
जानी चाहिए  ,
 
उसकी मृत्यु पर
हम अफ़सोस करते 
न करते
हमारे संस्कार
 हमें हत्या पर
 बोलने को 
विवश करते हैं।  

    मीना पाण्डेय 

Wednesday, September 6, 2017

हाइकु -गौरी लंकेश के नाम



हाइकु 


तुम्हारा जाना
एक और आघात
सत्य जयते।

हत्या का दौर
सूरत सत्य की
रक्तरंजित।

ये उन्माद
बोलेगा कब तक
सरचढ़कर।

सब होकर
आसान नहीं होता
'गौरी' हो जाना।


कलम तोड़ी
गोलियों-बारूदों ने
केवल भ्रम।

नम आँखों से
अलविदा तुम्हें
गोरी लंकेश।


मीना पाण्डेय 

Tuesday, September 5, 2017

मीना के दोहे -शिक्षक दिवस पर

   
                   

                              दोहे 


नीरव अँधेरी रात  में   , दीपक  दिशा दिखाए। 
गुरूवर की महिमा कही,  शब्दों में न जाए।।



तमस  , झूठ , पाखण्ड से, सुंदर सत्य की ओर। 
गुरु  घने अंधेरे  में ,    जैसे उज्जवल भोर।।



उच्चतम हो चिंतन मनन , और  सादा संधान। 
लाखों में हो जाती है , सद्गुरु की पहचान।।



 शिक्षक जब से लोभी हुए , शिक्षा हुई व्यापार।
 सपनें बंजर हो गए ,   हुई उम्मीदें बाँझ।।



घृणा ,द्वैष ,अभिमान का , बीज कभी न बोए । 
प्रेम दीप  जब भी जले, जग उजियारा होय।।


 मीना पांडेय 





Monday, September 4, 2017

“पेड़ों की छांव तले रचना पाठ” की पैंतीसवीं साहित्य गोष्ठी सम्पन्न



दिनांक 27 अगस्त 2017 , रविवार, वैशाली,गाजियाबाद



“देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम पर” के ओजस्वी गीतों , छंदों और गजलों से परिपूर्ण “पेड़ों की छांव तले रचना पाठ” की पैंतीसवीं साहित्य गोष्ठी वैशाली सेक्टर चार, स्थित हरे भरे मनोरम सेंट्रल पार्क में सम्पन्न हुई । हिन्दी साहित्य से संबन्धित अभिनव प्रयोग की यह श्रंखला प्रत्येक माह के अंतिम रविवार को पूर्व निर्धारित कार्यक्रम अनुसार ही मध्यान्ह उपरांत 4 .30 बजे से प्रारंभ हुई।
घने गुलाचीन के पेड़ों और हरियाली के शीतल मनोरम सानिध्य में पार्क की हरी भरी दूब पर आयोजित इस साहित्य गोष्ठी में इस बार बाहर से पधारे नव गीत कारों और गजल कारों ने श्रोताओं को आनंदित किया और देर शाम तक चली गोष्ठी को “देश भक्ति और राष्ट्र प्रेम के शौर्य त्याग बलिदान से जुडी गाथा पर” नयी बुलंदियों से स्पर्श कराया ।
गोष्ठी में पधारे नवगीत विधा के सशक्त हस्ताक्षर वरिष्ठ नवगीत कार जगदीश पंकज ने सरहद की सरगर्मियों के बीच शहीदों की याद करते हुए कहा " कितना धैर्य रखें , कितना संयम बरते , दुश्मन सीमा लाँघ , हमें ललकार रहा "।
वहीं वरिष्ठ कवि ईश्वर सिंह तेवतिआ ने फौजी के त्याग और बलिदान को नए रूप से प्रस्तुत किया और कविता "आओ चलो मिलकर हम समझे / एक सैनिक के जज्बातों को / जो सरहद पर गुजरे / उसके उन लम्हों उन हालातों को " का पाठ किया।
इस क्रम में उमेश श्रीवास्तव "राही " ने पढ़ा " हजार रंग फूल हैं / मगर चमन तो एक है / सितारे हैं हजारों / पर गगन तो एक है / भिन्न भिन्न धर्म है / अलग अलग है साधना / अनेक जाति वर्ण हैं / मगर वतन तो एक है। "

गोष्ठी के संयोजक अवधेश सिंह ने ललकार की भाषा में कहा " गोली का गोली से बस आखिरी हो संवाद / पी ओ के पर कब्ज़ा कर भारत हो आबाद / भारत हो आबाद करे यहीं ख़त्म कहानी / आर पार की जंग लडें हम जंगी हिन्दुस्तानी "
मनोज दिवेदी ने देश प्रेम की भावना से ओत प्रोत गीत पढ़ा " ईमान पुकारे है / अभिमान पुकारे है / चेत जाओ देश का / सम्मान पुकारे है "

अन्य प्रमुख कवियों में परमजीत यादव "कम दिल " ने गजल पढ़ी " जश्न आजादी की शान तिरंगा है , खुद्दार वतन हर शख्स का अरमान तिरंगा है। ,
कार्यक्रम को गति प्रदान करते हुए कवि व टीवी एंकर अमर आनंद ने कविता “अँधेरों का , अंधेरगर्दी का ना कभी भी डेरा हो / ऐसा संदेश , ऐसा परिवेश ,ऐसा देश ही मेरा हो”पढ़ी , व पत्रिका सृजन से की संपादिका मीना पाण्डेय ने राष्ट्र प्रेम से ओत प्रोत गीत “आसमां छू कर पुकारें/ सर्व आजादी / हमारा मर्म
आजादी /मनाएँ पर्व आजादी ....” का पाठ किया तथा टीवी एंकर नवोदित रिंकू मिश्रा ने देश भक्ति की भावना से ओत प्रोत कविता “ मैं गीत हूँ संगीत हूँ मैं रीत हूँ और जीत हूँ मैं प्यार हूँ मैं भाव हूँ मैं प्रीत हूँ और शीत हूँ किस सोंच में पड़े हो .....” का पाठ किया।
अन्य प्रमुख कवियों में कृष्ण मोहन उपाध्याय , रामेश्वर दयाल शास्त्री , डॉ वरुण कुमार तिवारी ने भी काव्य पाठ किया इस अवसर पर प्रसिद्ध कहानी कार मनीष कुमार सिंह ने लघु कथा का वाचन किया और उनके नए उपन्यास "आँगन वाला घर " पर चर्चा हुई। गोस्ठी का सफल संचालन संयोजक अवधेश सिंह ने व अध्यक्षता डा वरुण कुमार तिवारी ने की ।
इस अवसर पर सर्व श्री कैलाश पांडेय प्रबंध संपादक सृजन से साहित्यिक पत्रिका , समाज सेवी दयाल चंद्र , राजदेव सिंह , शत्रुघ्न प्रसाद , शिव चरण कुशवाहा , आर के शर्मा , उमाशंकर प्रसाद गुप्त , जे बी सिंह ,गुप्तेश्वर प्रसाद ,लक्ष्मी नारायण गुप्त , ए.एस रमन , एस. पी त्यागी , आर पी सिंह आदि प्रबुध श्रोताओं ने रचनाकारों के उत्साह को बढ़ाया । गोस्ठी के समापन पर आभार व्यक्त करते हुए इस गोस्ठी के संयोजक कवि लेखक अवधेश सिंह ने इस गोष्ठी की निरंतरता को बनाए रखने का अनुरोध करते हुए सबको धन्यवाद दिया