शत प्रतिशत
लेखिका - डाॅ. हंसा दीप
प्रकाशक - किताबगंज प्रकाशन, राजस्थान
संस्करण - प्रथम, 2020
संपादन - डाॅं. प्रमोद सागा
किताब शत प्रतिशत कहानियों पर आधारित किताब है। यह किताब संवेदनशीलता, भावनात्मकता के विभकन्न रंगों को दर्शाती है। समाज के आयाम बताती है। अहसासों जज्बातों को उजागर करती है।
कहानी 'शत प्रतिशत' में साशा नाम का किरदार है। कहानी में पात्र व्यथित है, परेशान है। एकमात्र उसकी मित्र लीसा ही उसे दिलासा देती है। लीसा को अपनी बांहों मे भरकर साशा रोता है। वह भी रोती है जोर-जोर से। दिल दहल रहा था उसका। दोनों के कांपते शरीर एक दूसरे को सांत्वना देते हैं। एक ट्रक एक्सीडेंट के बाद साशा के व्यवहार में परिवर्तन आता है। अब एक नयी सोच के साथ शत प्रतिशत परिवर्तित व्यक्ति था साशा। कहानी इंसान की जिंदगी में परिवर्तन की बात कहती है। कहानी 'पन्ने जो पढ़े नहीं, में बताया गया है कि इंसान किस प्रकार से अपने अहसानों का प्रतिफल लेता है अपनी ही शिष्या के जिस्म से खेलकर। कहानी समझाती है कि इंसान वक्त आने पर अपने अहसानों का स्वयं ही चुकता कर लेता है। कहानी 'पूर्णविराम से पहले' बताती है कि किस तरह बिना किसी जान पहचान के भी बस परिचालिका एक शिक्षिका यात्री से टिकिट के पैसे नहीं लेती है। रोचक है जानना कि वह पैसे क्यों नहीं लेती है। 'कहानी 'कुकडँ कूँ' का अंदाज जुदा है। कहानी में मुस्कुराता चेहरा है। विशेष अभी शेष है' में लगता है कि जीवन में भले ही बहुत कुछ किया गया है फिर भी विशेष अभी शेष है, यानि काफी कुछ करने के लिए छूटा हुआ है। यह एक अलग तरह की काफी रोचक कहानी है। कहानी एक टुकड़ा समय का' में अपने पिता की चिता को अग्नि देते हुए, उसकी आंखों में जीत को बताया है। 'रायता' कहानी काफी रोचक व पठनीय है एक अलग पहलू को दर्शाती है। कहानी 'उसकी मुस्कान' मुस्कुराती हुए अपनी बात रखती है। कहानी 'प्रोफेसर साहब बताती है कि हमे अपने राइटस और डयूटीज के बारे में समझना चाहिए व जागरूक नागरिक बनना चाहिए। कहानी में एक प्रोफेसर साहब व छात्रा है जिसका नाम रश्मि है। वह प्रोफेसर साहब से शि़क्षा पाती है। एक दिन प्रोफेसर साहब ही उसकी अस्मिता को तार-तार कर देते है। और अहसानों के बोझ तले दबी रश्मि उस अनुचित व गलत का विरोध भी नहीं कर पाती। कहानी 'पूर्णविराम' में दो महिलाओं की बातों को दर्शाया गया है। कैसे हम किसी को भी बिना उसके जाने पहचाने गलत समझ लेते है। कुछ भी आखिर क्यों, क्यों जरूरत होती है इन सबकी। कहानी कुकडँ कूँ में गोलू ओर आलिया नाम के किरदार है। माही मां का मुस्कुराता हुआ चेहरा जो कह रहा था - यह कुकडूँ कूँ है बहू, इसे कोई सिखाता नहीं सब अपने आप सीख जाते हैं। कहानी विशेष अभी शेष है में सत्तर साल के आदेश बाबू सोच रहे है कि इतने साल कैसे निकले। कहानी में आदेश बाबू खुश थे। अब उन्होंने उम्र के नंबरों को दोहराना बंद कर दिया था। चिकू के चिकूपन से उन्हें प्यार हो जाता है। बहू के चिड़चिड़ाहट की वजह समझने लगे थे वे। डुग्गू के फोन से चिपकने की आदत को वक्त की जरूरत समझ कर अपना लेते है। सोचते है कि जीवन मिला है तो हर पल क्यों न जी लिया जाए। वे मरना नहीं चाहते, अभी तो बहुत कुछ शेष है जो उन्हें करना है। अब हर एक दिना नया होता है। और अपनी उपयोगिता को समझना, अपने योगदान को सराहता, अपनी विवशताओं पर हंसाता। सच अलग रूप अब सबके सामने था। जो शेष था वह बहुत विशेष था। कहानी एक टुकड़ा समय का में अपने पिता की चिता को अग्नि देते हुए, उसकी आंखों में जीत बताया है। प्रयाग आंसुओं के बीच कह रहा था अपने मन में - ‘‘आप रूके थे क्या मेरे लिए पांच मिनट’’ उसकी आंखों में जीत थी। उसका अपना समय था यह, एक पल की जीत ने सारे जीवन भर का बदला ले लिया था। जीवन भर की हताशा को धो दिया था। अब वे पांच मिनट उसके अपने थे। कौन बड़ा, कौन छोटा, पिता की चिता की अग्नि में वह सब कुछ जल चुका था। कहानी भूमि पात्र के इर्द गिर्द घूमती है। संवाद बहुत अच्छे है। कसम से, मेरे जमाने में यह सब होता न तो मैं तो
विश्वसुंदरी बन जाती
.....ना ना अमेरिका की राष्ट्रपति बन जाती
और नहीं तो क्या।
कहीं दिल मिले थे कहीें दिल जले थे। बहुत कुछ कहा गया था, बहुत कुछ कहा जाएगा। बात जो निकली, लंबा सफर तय कर चुकी थी। कहानी उसकी मुस्कान बुलबुल नाम के पात्र के इर्द गिर्द घूमती है। पात्र अपने पिता को कहती है कि वह सामान्य बच्ची नहीं है वह पिता की और उस बूढ़े की बैसाखी है। शब्द एक सामान्य बच्ची के नहीं है। उनकी बेटी खास थी कि वे उसके सामने स्वयं को छोटा महसूस करने लगे। इतना छोटा कि वह उनका पिता हो और वे स्वयं उसकी संतान। बुलबुल मुस्कुराती है। वैसी ही मुस्कान जैसी बचपन मेें देती थी जब उसकी मनपसंद की कोई चीज उसके पप्पा के हाथों में होती थी। कहानी प्रोफेसर साहब दादाजी और उनकी पोती अनामिका की कहानी है बहुत ही रोचक और अनूठे अंदाज में लिखी गई है। कहानी में राइट्स और ड्यूटीज के मध्य अंतर समझाया गया है। प्रोफेसर साहब अपनी पोती को पढ़ाते है। प्रोफेसर साहब के सामने उनकी पीएच0डी0 की छात्रा नहीं थी बल्कि उनकी पोती थी। जो हाथ में काॅपी कलम लिए कुर्सी के हत्थे से सिर टिकाकर अपना झपकी लेने का अधिकार पा चुकी है। प्रोफेसर साहब लंबी सांस लेते हुए अपना कर्तव्य पूरा कर चुके थे।
यह किताब क्यों पढ़ी जानी चाहिएः-
किताब शत प्रतिशत सभी पाठकों को पढ़नी चाहिए। भावनाऐं , संवेदनशीलता, कलात्मकता, रोचकता, दिल में उमड़ती भावनाऐं, अहसासों की डोर थामें चलती जिंदगी को समझने के लिए, खिलखिलाती धूप जैसी कहानियां बीते वक्त के पन्नांे को पलटने में मदद करती है। जिससे पाठक अपना जुड़ाव महसूस करते है। पाठकों में यह किताब शुरूआत से अंत से रोचकता बनाए रखती है।
मनीष माना
अधिवक्ता व साहित्यकार
हनुमान नगर,
अग्रवाल गर्ल्स काॅलेज के पास,
गंगापुर सिटी - 322201
राजस्थान
मो0नं0 - 09928075267

लेखन का प्रवाह और प्रज्ञा दोनो का साथ एक ही व्यक्ति में साथ 2 चले तो संयुक्त असर दिखता है जेसा यहां डाॅ. हंसा दीप की पुस्तक में दिखा
ReplyDeleteजी धन्यवाद
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