Wednesday, November 18, 2020

मोहन राकेश कृत ' आषाढ का एक दिन '

 मोहन राकेश कृत ' आषाढ का एक दिन '




अपने जीवन के वर्तमान समय तक मैंने जितनी भी पुस्तकें पढ़ी है उनमें सबसे श्रेष्ठ और उत्तम किताब मोहन राकेश कृत ' आषाढ का एक दिन ' नाटक  मुझे बेहद आकर्षित करती है । इसका पहला कारण यह है कि ' आषाढ का एक दिन ' महाकवि कालिदास के निजी जीवन पर आधारित है साथ ही इस नाटक का परिवेश ऐतिहासिक होने के अतिरिक्त आज की आधुनिक समस्याओं से अवगत करवाने में पूर्ण रूप से सक्षम है । दूसरी बात यह है कि इस नाटक में कालिदास कोई तपस्वी साधु या संत नहीं है बल्कि वह एक दुर्बल और साधारण व्यक्ति है जो कर्तव्य हीन , ज्ञान शून्य, स्वार्थी , पलायनवादी, आत्मसीमित कवि के रूप प्रस्तुत होता है। नाटककार मोहन राकेश ने विश्व प्रसिद्ध कवि कालिदास को कल्पना और मिथ की मदद से एक आधुनिक सजीव चरित्र का निर्माण किया है जो सृजन शक्तियों का प्रतीक है।

प्रस्तुत नाटक तीन अंकों में विभाजित है। समय का अंतराल होने पर भी प्रहमयी कथानक में बनी है। जिज्ञासा और कौतूहल पाठको में बरकार बनी हुई है। नाटक की शुरूआत मल्लिका के झोपड़ी से होती है। आषाढ़ की पहली बारिश में भींग कर वह आती है और अपनी माँ से अपना अनुभव को बताती है : " मुझे भींगने का तनिक भी खेद नहीं है। भींगती नहीं तो आज मैं वंचित रह जाती.... मेरा तो शरीर भी निचुड़ रहा है। मां। कितना पानी इन वस्त्रों ने पिया है। ओह ! सौन्दर्य का ऐसा साक्षात्कार मैंने कभी नहीं किया। जैसे वह सौन्दर्य अस्पृश्य होते हुए भी मांसल हो ।" मल्लिका इस नाटक की नायिका कालिदास से बेहद प्रेम करती है। उसका प्रेम भावनामयी है। इसलिए वह कालिदास को उज्जैन भेजने के लिए प्रेरित करती है ताकि उसका सृजन क्षेत्र इस ग्रामीण क्षेत्र में संकुचित ना हो जाए। कालिदास उज्जैन जाकर एक महान कवि अवश्य बन जाता है वह अपनी प्रेयसी मल्लिका को केवल सहानुभूति ही दे पाता है और कुछ भी नहीं। वह गुप्त सम्राट का राज कवि और फिर कश्मीर का शासक बन जाता है। लेकिन गांव की सरस प्रकृति और मल्लिका का सहज स्वाभाविक प्रेम की मादक स्मृति उसे फिर से गांव की पर्वतीय प्रकृति में वापस ले आता है मल्लिका उस समय विलोम की पत्नी और एक बेटी की मां बन जाती है। वह कालिदास के साथ जाना चाहती है किन्तु मां की ममत्व उसे उसके घर में बांध देती है। उधर प्रियंगु मंजरी भी कालिदास की बेचैनी को समझती है पर वह इसे मल्लिका की तरह मन पर भावनाओं को नहीं आने देती है।




इस नाटक की प्रासंगिकता आज के सन्दर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण है। कालिदास के व्यक्तित्व और व्यवहार के माध्यम से नाटककार ने उसके अहम का विस्फोट बताया है यानि कि पुरुष स्वभाव से ही आत्मवादी और अहम पीड़ित रहा करता है। वह मात्र अपने लिए जीना जानता है। घर परिवार या स्त्री से सम्बन्ध भी वह अपने अहम की तृप्ति के लिए ही स्थापित किया करता है। इसी कारण कालिदास जैसा व्यक्ति अकेलेपन में जीने को मजबूर हो जाता है। दूसरी बात यह सामने आती है कि व्यक्ति का अन्तर्द्वन्द व्यक्ति को कुंठित बना देता है। नाटककार ने यह भी प्रकाश डालने का प्रयास किया है कि राज्यश्रय और राजनीति सर्जक कलाकार की सृजन प्रतिभा को न केवल कुंठित करके रख देती है, बल्कि तोड़कर रख देती है। इस नाटक में स्त्री सम्बन्धी समस्या आधुनिक युग बोध में सार्थक रूप से उभर कर सामने आई है। मल्लिका रूपी आधुनिक स्त्री का चित्रण हुआ है । वह कहती है : " मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है। वह उसे नष्ट करना चाहती है तो किसी को उस पर आलोचना करने का क्या अधिकार है ? " जितना प्रेम वह कालिदास से करती है उतनी ही घृणा विलोम से करती है। परन्तु वह अपनी परिस्थिति के लिए कहीं भी कालिदास को नहीं ठहराती है।

1959 ई. में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नाटक होने  के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1971 ई. में निर्देशक मनि कौल ने इस पर आधारित एक फिल्म बनाई जिसने आगे जाकर साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार जीत लिया। इस नाटक को आधुनिक युग का प्रथम नाटक भी कहा जाता है।

और अंत में गोविन्द चातक के शब्दों में मैं यही कहना चाहती हूं कि " आज के सन्दर्भ मे कालिदास इसलिए सार्थक लगता है उसे हम अपने युग की विडंबनाओ के बीच खड़ा पाते हैं। समस्या मूलतः अलगाव और विच्छिन्नता की है। अपने मूल और परिवेश से उखाड़ कर वह अकेलेपन, संत्रास और संबंधहीनता के जिस वातावरण में धकेल दिया जाता है, वह आधुनिक मानव की नियति बन गया है।"



अनीता कुमारी ठाकुर
कार्यरत : शिक्षिका ( मटिया बुर्ज कॉलेज, कोलकाता पश्चिम बंगाल )
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