'भूख'
मैं अब तक हिंदी की कविताओं, कहानियों और उपन्यासों की लगभग तीन सौ पुस्तकें पढ़ चुका हूँ और इतनी बड़ी फ़ेहरिस्त में से किसी एक किताब का नाम बता पाना यद्यपि कोई आसान काम नहीं है, तथापि यदि किसी एक ही किताब का नाम लेना हो तो मैं हिंदी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार अमृतलाल नागर जी के उपन्यास 'भूख' का नाम लूँगा। क्योंकि मुझे लगता है भूख ही वह पुस्तक हो सकती है जिसे मैं अपनी पसंद की पुस्तकों में सर्वोपरि रख सकता हूँ। आज से दस वर्ष पहले अपनी स्नातक की पढ़ाई के दौरान मैंने यह उपन्यास पढ़ा था और तब से अब तक लगभग पाँच बार इस उपन्यास को पढ़ चुका हूँ। इस उपन्यास का कथानक सन् 43 के बंग-दुर्भिक्ष पर आधारित है। उन दिनों जब बंगाल में यह भीषण अकाल पड़ा था, नागर जी बम्बई में अपने फ़िल्म लेखन के कार्य में व्यस्त थे। लेकिन प्रतिदिन समाचार पत्रों में बंगाल के अकाल की झकझोर कर रख देने वाली ख़बरों को पढ़-पढ़कर नागर जी इतने द्रवित हो उठे थे कि उन्होंने बंगाल जाकर स्वयं वहां की स्थिति को अपनी आँखों से देखने का निर्णय लिया। तदुपरांत उस अकाल में मनुष्य की चरम दयनीयता और परम दानवता के दृश्य नागर जी ने कलकत्ता जाकर वहां की सड़कों पर अपनी आँखों से देखे थे।
द्वितीय महायुद्ध में उलझी हुई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और निहित स्वार्थों से परे अफ़सरों और व्यापारियों के षड्यंत्रों के चलते हज़ारों लोग भूखों तड़प-तड़पकर मरने को विवश हुए, सैकड़ों गृहिणियाँ वैश्याएँ बना दी गईं और सैकड़ों बच्चे गुलामों की तरह दो मुट्ठी चावल के मोल बिक गये। इस उपन्यास में नागर जी ने यह सब कुछ अंकित किया है। यह उपन्यास आपको अंत तक बाँधे रखेगा और इसे पढ़ते समय आपको लगेगा कि सब कुछ आपकी आँखों के सामने ही घटित हो रहा है। साथ ही इस उपन्यास में ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जिन्हें पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएँगे और कई जगहों पर आपकी आँखें छलक उठेंगी। इस उपन्यास को पढ़कर आप समझ पाएँगे कि भूख में कितनी ताकत होती है। भूख बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को भी उन्मादी बनाकर उससे कैसे-कैसे कुकृत्य करवा सकती है? देखें -
'अकाल शुरू होने से दो महीने पहले बेनी का विवाह हुआ था। वह अपनी पत्नी के सौंदर्य पर मुग्ध था। उसकी पत्नी भी उसे जी जान से चाहती थी। लेकिन ब्याह की मेहंदी का रंग अभी फीका भी नहीं पड़ा था कि अकाल शुरू हो गया और मृत्यु की विभीषिका सारे गाँव को निगलने लगी। फिर एक दिन जब निरन्तर चार दिनों तक भूख से लड़ने के बाद उसकी पत्नी अपनी मृत्यु की अंतिम साँसें ले रही थी तो बेनी ने सोचा कि यदि यह मर गई तो मुझसे सदा के लिए बिछड़ जाएगी और इसे कुत्ते खा जाएँगे। अतः मुझे इसे ऐसी जगह छिपाकर रखना चाहिए जहाँ इसे कुत्ते न देख पाएँ। फिर अचानक बेनी को खयाल आता है कि मुझे इसे अपने कलेजे में ही छिपाकर रखना चाहिए। यह विचार आते ही बेनी गंडासा उठाता है और मृत्यु शय्या पर पड़ी अपनी पत्नी के प्राण निकलने से पूर्व ही उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर डालता है। फिर पत्नी को कलेजे में छिपाकर रखने के लिए उसके शव के छोटे-छोटे टुकड़ों को मुँह में भरकर उन्हें चबाने लग जाता है।;
ऐसा ही उन्माद भरा एक दूसरा उदाहरण देखिए -
'गाँव के मंदिर में एक पुजारी अपनी पत्नी, चार बच्चों, विधवा बहन, एक गाय और उसके बछड़े के साथ रहता था। अकाल पड़ने पर दाने-दाने को मोहताज पुजारी कई दिनों तक सपरिवार भूख से लड़ता रहा। लेकिन गाँव के दूसरे बच्चों की तरह अपने बच्चों को भी दिन पर दिन मौत के मुँह में जाता देख एक दिन साहस खो बैठता है और अपनी पत्नी और बहन को गाँव के अनाथालय, जहाँ से औरतें शहर ले जाकर बेच दी जाती थीं, में पहुँचाकर चार मुट्ठी चावल लाने का निश्चय करता है। इस बात का पता चलते ही पुजारी की पत्नी और विधवा बहन अपने तन की धोतियाँ उतारकर घर में फाँसी लगा लेती हैं। पुजारी जब अनाथालय के आदमियों के साथ घर लौटता है तो अपनी पत्नी और बहन के रूप में दो नंगी टंगी हुई लाशों को पाता है और पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है। वह मरना चाहता है, लेकिन बच्चों का मुँह देखकर उसे जीने के लिए बाध्य होना पड़ता है। इसी तरह लगातार भूख से लड़ते हुए कुछ और दिन बीत जाने पर जब एक दिन भूख असह्य हो उठती है और भूखे बच्चों का पेट भरने का पुजारी को कोई चारा नहीं दिखता तो घर में रखीं देवी-देवताओं की मूर्तियाँ फेंककर पुजारी अपनी गाय को ही मारकर उसके माँस से अपने बच्चों का पेट भरने का फ़ैसला करता है। युगों-युगों से बंधे मन को, हिंदुत्व और ब्राह्मणत्व की चेतना को पुजारी की भूख झटका देकर तोड़ देती है और पुजारी गंडासे के एक ही वार से गाय की गर्दन उसके धड़ से अलग कर देता है। लेकिन गो-वध के पश्चात उसकी चेतना लौट आती है और वह पुनः पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है और अपने बच्चों सहित स्वयं भी विष पीकर आत्महत्या का विचार कर बैठता है। चारों बच्चों को विष पिलाकर जैसे ही पुजारी विष पीने के लिए अपना मुँह खोलता है, भूख से वह बछड़ा रम्भाने लगता है जिसकी माँ की पुजारी हत्या कर चुका होता है। पुजारी विष नहीं पी पाता और ज़ोर से चीखता हुआ वहाँ से बाहर दौड़ पड़ता है। पुजारी विक्षिप्त हो जाता है।'
उपन्यास में इस तरह की उन्माद भरी अनेक घटनाएँ हैं। कई ऐसी घटनाएँ भी हैं, जिन्हें पढ़कर आप बुरी तरह संवेदना से भर उठेंगे। जैसे, एक आठ साल की बच्ची की मृत्यु पर जैसे ही उसके पिता और चाचा उसे चिता की लकड़ियों पर लिटाते हैं, अचानक गिद्धों का एक झुंड लड़की के शव पर टूट पड़ता है। पिता और चाचा को जान बचाने के लिए वहाँ से दौड़कर अलग होना पड़ता है। ऐसी ही एक दूसरी घटना में एक वृद्धा को कहीं से एक मुट्ठी चावल मिल जाते हैं। भूख से पीड़ित वह वृद्धा उन चावलों को कच्चा ही चबाने लग जाती है। लेकिन कई दिनों तक खाली पेट रहने के बाद कच्चे चावल उसे हजम नहीं होते और वह वमन कर देती है। लेकिन उन चावलों का मोह, जो उसने बड़ी मुश्किल से कहीं से पाए थे, वृद्धा नहीं छोड़ पाती और वमन किये गये चावलों को पुनः उदरस्थ करने लगती है।
बंगाल के अकाल में भूख ने मौत का जो तांडव किया था, इस उपन्यास में नागर जी ने उसका सजीव चित्रण किया है। 'भूख' नागर जी का पहला उपन्यास है, जो सन् 1946 में 'महाकाल' शीर्षक से भारती भंडार, लीडर प्रेस, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था। इसके बाद सन् 1970 में 'भूख' शीर्षक के साथ राजपाल एण्ड सन्स से प्रकाशित हुआ। शीर्षक बदलने की वजह यह रही कि 'महाकाल' नाम सुनते ही बहुत से लोग इसे पौराणिक उपन्यास समझने लगते थे। अतः प्रकाशक के इस आग्रह पर कि शीर्षक बदल देना चाहिए, नागर जी ने इसे 'भूख' शीर्षक दिया।
'भूख' उपन्यास के रचनाकार
अमृतलाल नागर जी का जन्म एक सुसंस्कृत गुजराती
परिवार में 17 अगस्त, 1916 ई. को गोकुलपुरा, आगरा, उत्तर प्रदेश में उनकी ननिहाल में
हुआ था। उनके पितामह पण्डित शिवराम नागर 1895 ई. से लखनऊ आकर बस गए थे। उनके पिता पण्डित
राजाराम नागर की मृत्यु के समय नागर जी कुल 19 वर्ष के थे। नागर जी ने शुरुआत में
'मेघराज इंद्र' नाम से कविताएँ लिखीं, 'तसलीम लखनवी' नाम से व्यंग्यपूर्ण लेख व निबंध
लिखे। कहानियों के लिए अमृतलाल नागर मूल नाम रखा। नागर जी ने अनेक उपन्यास, कहानी-संग्रह,
नाटक व व्यंग्य लिखे। उन्होंने रेडियो-नाटक, रिपोर्ताज, निबन्ध, संस्मरण, अनुवाद, बाल
साहित्य आदि के क्षेत्र में भी बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। यद्यपि साहित्य जगत्
में उन्हें उपन्यासकार के रूप में ही सर्वाधिक ख्याति प्राप्त हुई तथापि उनका हास्य-व्यंग्य
लेखन भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। नागर जी को अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। उन्हें उनके
उपन्यास 'अमृत और विष' पर 1967 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। 23 फ़रवरी, 1990 को
नागर जी पंचतत्त्व में विलीन हो गये।
यदि आप यह लेख पढ़ रहे हैं तो मेरा आपसे आग्रह है कि आप एक बार इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ें। 'भूख' बंगाल के अकाल की समस्या का चित्रण करते हुए मृत्यु की रोमांचकारी गाथा के साथ जीवन की महत्ता का वर्णन करने वाला एक ऐसा उपन्यास है, जिसे न पढ़ना इस उपन्यास के साथ नहीं बल्कि बतौर पाठक आपका अपने ही साथ अन्याय होगा। मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि इस मर्मस्पर्शी उपन्यास को पढ़ने के बाद आप अपने घर में अन्न का एक भी दाना बर्बाद करने अथवा होने देने से पहले एक बार सोचेंगे ज़रूर। नागर जी की स्मृतियों को नमन !
आदित्य कुमार राय
कविताओं की दो किताबें व एक उपन्यास ‘श्वान पुराण’ प्रकाशित।
संप्रति : सेल्फ इम्प्लॉयड।
पता : ग्राम- सेमलपुरा, पोस्ट- शहदौरा,
तहसील- किच्छा, ज़िला- ऊधम सिंह नगर,
उत्तराखण्ड।
संपर्क :
06397518112
ई मेल : adityarai1008@gmail.com

बहुत अच्छा लिखा है मित्र इसी प्रकार अन्य उपन्यासों की जानकारी उपलब्ध कराते रहें।
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है मित्र इसी प्रकार अन्य उपन्यासों की जानकारी उपलब्ध कराते रहें।
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