Saturday, August 26, 2017

किरन पांडेय पंत की दो कविताएँ

एक शब्द वक़्त बेवक़्त मेरे इर्द गिर्द रहता है| 
या टूट के बिखरा हुआ
या रूप सा निखरा हुए 
एक दर्द की बारिश मे सींचा हुआ गुलाब लगे 
तो एक प्रेम की बोछार मे भीगा हुआ गुलाब लगे ;
एक विगत स्वप्न से आहत सा 
एक भावी स्वप्न मे खोया सा ;
प्रेम को मैंने जीते देखा है 
प्रेम को मैंने मरते भी 
प्रेम को मैंने हँस ते देखा है 
प्रेम को मैंने रोते भी 
अगर माने यही प्रेम की सम्पूर्णता का सार है।
तो मान लीजिये ऐसा प्रेम कभी मरता नहीं।
जनम लेता हर युग मे सौ बार है।


2
अरुणा शानबाग को श्रद्धांजली -
क्या ज़िन्दगी थी वो, क्या मौत है
सब का साथ था ये और बात है
सोई रही मैं बरस के बरस
क्या जवानी थी वो,क्या बुढ़ापा है।
रूह कुचल चुकी थी 
साँस रह रह के चल रही थी
फिर भी मन के भीतर
कोई बात चल रही थी
क्या सैतान था वो,क्या इंसान है ये
जा रही हूँ छोड़ के मेरे अपने है कुछ 
खून का न सही रूह का रिश्ता है
मगर जा रही हूँ छोड़ के
क्या दुनिया थी वो, क्या दुनिया होगी वो।


किरन पांडेय पंत 
हल्द्वानी ,उत्तराखंड 

21 comments:

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  2. Beautiful.. lovely peace of work..
    Keep going..:)
    Full support from my side.. :)

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  3. Nice lines...gud going dear all d best..

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  4. Beautifully compose.
    Well done ki ki ki kiran
    Tu to hai kavita ki kiran

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  6. और अच्छी कविता बन सकती थी

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