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मनोहर श्याम जोशी
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हिंदी के मूर्धन्य लेखक मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त, 1933 को अजमेर, राजस्थान में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा अजमेर से ही पूर्ण करने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने विज्ञान विषय में स्नातक किया। इसे मात्र एक संयोग ही कहा जा सकता है कि लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान कल का वैज्ञानिक की उपाधि प्राप्त करने के बावजूद भी वे पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में आए और प्रतिष्ठित भी हुए। अठारह वर्ष की उम्र में उनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई। मगर पहला उपन्यास आते आते-आते लगभग 20 वर्षों का लंबा अंतराल हो गया। मनोहर श्याम जोशी जी अमृतलाल नागर व अज्ञेय को अपना साहित्य गुरु मानते थे। पढ़ाई के बाद एक स्कूल में अध्यापक और एक जगह क्लर्क की नौकरी करने के बाद अंततः वे पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में आ गए।
कुरु कुरु स्वाहा' मनोहर श्याम जोशी का पहला उपन्यास है जो सन 1980 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। लेखक इस उपन्यास को एक गप्प बायोस्कोप कहकर संबोधित करता है।इस उपन्यास की भूमिका में वे लिखते हैं- 'कुरु कुरु स्वाहा' दृश्य और संवाद प्रधान गप्प-बायोस्कोप है। अतिरिक्त आग्रह करता है कि पढ़ते हुए देखा-सुना जाए।"
कुरु कुरु स्वाहा' उपन्यास उत्तर आधुनिक समाज में तेजी से हो रहे नैतिक पतन और संवेदनहीनता को चित्रित करता है।
कसप उपन्यास उनका सबसे चर्चित उपन्यास है। 'कसप' उपन्यास (1982) एक अलग तरह की प्रेम कहानी है जिसमें उपन्यासकार समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता को चित्रित करता हुआ संबंधों के बनने बिगड़ने के लिए उत्तरदाई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों की पड़ताल बड़ी संजीदगी से करता है। इनके अतिरिक्त 'ट टा प्रोफेसर' भी उनका एक बेहतरीन उपन्यास है। इसमें प्रेम, घृणा और संबंधों के अजीबोगरीब समीकरण और भविष्य की आकांक्षाओं से भरपूर मानव की हास्यास्पद और त्रासद नियति को इंगित करता है।
पात्रों और परिवेश के अनुकूल भाषा उनके कथा साहित्य को अलग रेखांकित करती है। अर्थपूर्ण संक्षिप्त संवाद उनकी भाषागत निजी विशेषता है। अपने कथा साहित्य में और विशेषकर उपन्यासों में वे सरल भाषा में जटिल चरित्र व घटनाओं का चित्रण करते दिखलाई पड़ते हैं। 'कुरु कुरु स्वाहा' में मुंबईया भाषा में वहां के फिल्म उद्योग का चित्रण उन्होंने बखूबी उतारा है।
मनोहर श्याम जोशी जी के कथा साहित्य में ग्रामीण तथा नगरीय दोनों जीवन स्थितियों का वर्णन हुआ है। उनके चरित्र अपनी एक अलग छाप छोड़ते हैं। वरिष्ठ कथाकार पंकज बिष्ट अपने आलेख 'मानव चरित्रों का विलक्षण चितेरा' में उनके पात्रों के विषय में बात करते हुए लिखते हैं - "असल में उनके पात्र वे पहाड़ी हैं जो प्रवासी हैं और जिन्होंने हरे-भरे पेड़, नदी-नालों और एक से एक सुंदर वादियों को छोड़कर अपनी जगह गर्मी और धूल भरे मैदानों में बना ली है।जोशी जी इन प्रवासी पहाड़ियों के जो अपनी स्मृतियों और विफलताओं के बीच झूल रहे हैं, रूढ़ियों से मुक्त होने और समकालीनता से जुड़ने का संघर्ष कर रहे हैं, सबसे बड़े चितेरे हैं। उनके सभी उपन्यासों की कथाओं में मूलतः इन्हीं चरित्रों की भरमार है। फिर चाहे वह 'कसप' हो, 'हरिया हरक्यूलिस' हो या 'ट टा प्रोफेसर षष्टि बल्लभ पंत हो। और इस अर्थ में वह एक नए मध्यवर्ग के उदय का चित्रण कर रहे होते हैं जो शहरों में पनप रहा है।"
अपने उपन्यासों में चरित्रों के माध्यम से मनोहर श्याम जोशी समाज में फैले दोहरे चरित्रों को भी उजागर करते हैं। जैसे 'हमजाद' उपन्यास का टी के, टोपन दास खिल्लू राम जो हैवानियत से भरपूर आदमी है और सट्टेबाजी, जमीन खरीद-फरोख्त,धोखाधड़ी आदि से पैसा कमाता है। प्रेम के नाम पर लड़कियों से छल करता है। टी. के. के माध्यम से मनोहर श्याम जोशी इंसान के रूप में नर पिशाच बनते जा रहे हैं समाज को आईना दिखाते प्रतीत होते हैं। जहां उनसे अपना हमजाद भी दूर भागता दिखाई देता है। 'हरिया हरक्यूलिस की हैरानी' उपन्यास में हरिया के माध्यम से पित्तृ प्रेम में जीवन समर्पित कर देने वाले और परमार्थ में जीने वाले उस चरित्र को रेखांकित किया है जो समाज की दृष्टि में मजाक का पात्र बन कर रह जाता है। सन 1996 में किताब घर प्रकाशन से प्रकाशित यह उपन्यास आधुनिकता की सभी प्रतिमाओं को पीछे छोड़ उत्तर आधुनिक आचार-विचार को अभिव्यक्त करता है।
'क्याप' उपन्यास के लिए उन्हें 2005 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। क्याप' उपन्यास समाज में फैली असमानता, भेदभाव, जाति-पाति की जड़ों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।
मनोहर श्याम जोशी किस्सागोई में सिद्धहस्त कथाकार हैं। अपनी पृथक गप्प शैली में लिखे गए उनके उपन्यास विशेष प्रभावित करते हैं। उनके पास किस्सा कहने की अदभुत क्षमता है और उस किस्से के साथ पाठकों को जोड़ लेने का कौशल भी। एक साक्षात्कार में किस्सागोई की अपनी पारिवारिक परम्परा और पृष्ठभूमि पर बात करते हुए वे कहते हैं- "मेरे ननिहाल और ददिहाल दोनों ही तरफ़ किसी-न-किसी रूप में क़िस्सागोई की परंपरा रही। मेरी माँ भी किसी की नकल उतारने में और हँसी-मज़ाक करने में काफ़ी आगे रहती थी। मेरे पिता राय साहब प्रेमवल्लभ जोशी पढ़ने-लिखने के शौक़ीन तो ख़ैर थे ही, संगीत सहित कई विधाओं में उन्हें महारत हासिल थी।"
एक कथाकार के रूप में मनोहर श्याम जोशी ने हिंदी कथा साहित्य को नई भाषा व कलेवर तो दिया ही साथ ही उन्होंने समाज के उस सच को भी बेपर्दा करने का प्रयास किया जो सामान्यतः छिपा रह जाता है। उनके उपन्यास 'कुरु कुरु स्वाहा', 'हमजाद' तथा 'ट टा प्रोफ़ेसर' 'क्याप', 'हरिया हरक्यूलिस की हैरानी' इत्यादि आधुनिक परिवेश में उत्तर आधुनिक समाज का निरीक्षण करते दिखाई पड़ते हैं।
मनोहर श्याम जोशी जी ने कहानियां बहुत कम लिखीं। मगर जितनी भी कहानियां उन्होंने लिखीं महत्वपूर्ण लिखीं। जिनमें गुड़िया, सिल्वर वेडिंग, मैडोरा मैरुन, धुआं, मंदिर घाट की पेडियां' और उसका बिस्तर इत्यादि महत्वपूर्ण हैं।
साहित्य के अतिरिक्त पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया। 1964 में अज्ञेय जी के संपादन में निकलने वाले समाचार साप्ताहिक 'दिनमान' के मुख्य उप संपादक के रूप में उन्होंने कार्य किया। वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक भी रहे।
हिन्दी टेलीविजन शॉप आपेरा के तो वे जनक ही माने जाते हैं। 1984 में भारतीय टीवी के पहले सॉप ओपेरा 'हम लोग' का लेखन कर उन्होंने टेलीविजन उद्योग में क्रांति का सूत्रपात किया। इसके बाद दूरदर्शन के लिए ही 'बुनियाद', 'मुंगेरीलाल के हसीन सपनें', 'हमराही', 'जमीन-आसमान' आदि लोकप्रिय धारावाहिकों का लेखन भी किया। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'कुरु कुरु स्वाहा', 'कसप', 'हरिया हरक्यूलिस की हैरानी', 'हमजाद', 'ट टा प्रोफेसर' इत्यादि हैं। उनका कहानी संग्रह 'मंदिर घाट की पैंड़ियां' भी प्रकाशित हुआ।उपन्यास 'क्याप' के लिए 2005 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया। सन 2000 में उन्हें व्यंग्य श्री सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त भी उन्हें कई महत्वपूर्ण सम्मान से सम्मानित किया गया। सन 2006 में हिंदी का ये चमकता सितारा हमारे बीच से सदा के लिए चला गया।
मीना पाण्डेय
एम-3, सी-61, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2 साहिबाबाद, गाजियाबाद-201005