Saturday, October 17, 2020

नारी संवेदना की कथाकार -शिवानी

 





हिंदी कथा साहित्य के इतिहास का एक अनूठा अध्याय है गौरा पंत शिवानी। उनकी कहानियों में पहाड़ व वहां का परिवेश अत्यंत मुखर रुप में सामने आया है इसीलिए उन्हें देव भूमि उत्तराखंड की लेखिका के रूप में भी जाना जाता है।इस ओर उनकी कहानियों पर कुमाऊं के प्रति विशेष लगाव दृष्टिगोचर होने के आरोप लगते रहे मगर यह भी सत्य है कि शिवानी हिन्दी की सबसे ज्यादा पड़ी जाने वाली लेखिकाओं में हैं।कहानी के क्षेत्र में पाठकों की रुचि को निर्मित करना तथा कहानी को केंद्रीय विधा के रूप में विकसित करने में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनकी कहानियों को बार-बार पढ़ने की जिज्ञासा होती है।

गौरा पंत शिवानी का जन्म १७ अक्टूबर १९२३ को राजकोट, गुजरात मे हुआ था। इनकी शिक्षा-दीक्षा शन्तिनिकेतन में हुई।शिवानी की कृतियों में अगर नारी चित्रण की बात की जाए तो उनकी कहानियों में स्त्री की व्यथा और सामाजिक बंधनों से जूझती स्त्रीयों को बड़े ही सजीवता व संजीदगी से उकेरा गया है।उनकी कलम मन की गहरे, भीतर तक जाकर अंदर की व्यथा, दर्द, प्रेम की पीर को आंखों तक पहुंचाने का काम करती है।
 शिवानी की कहानियों में विविधता होने के बावजूद भी उनकी कहानी के केंद्र में नारी ही रही है। चाहे वह नारी की सामाजिक दशा हो चाहे सांस्कृतिक, धार्मिक रुढ़ियों को झेलती स्त्री हो, चाहे पुरुष के अहंकार के आगे खड़ी विवश स्त्री।उनकी कहानियों में मुख्यतः मध्यम वर्गीय नारी चरित्रों का चित्रण अधिक मिलता है,चाहे वह कस्बाई हो , नगरीय या महानगरीय।

नारी सम्वेदनाओं को चित्रित करते हुए शिवानी के दो दर्जन से ज्यादा कृतियां हैं जिनमें सुरंगमा, भैरवी,कालंदी ,अपराधिनी,मायापुरी , चौदह फेरे, रतिविलाप, विषकन्या, कस्तूरी मणिमाला की हँसी, आदि प्रमुख हैं।
 शिवानी कृत "जिलाधीश"" अपराजिता" वह उपहार उनकी मुख्य कृतियों में से हैं, जिन में नारियों का चित्रण आर्थिक रुप से संपन्न, आत्मनिर्भर और शिक्षित के रूप में किया गया है फिर भी शिवानी ने अपनी कहानी के माध्यम से अनेक प्रकार की समस्याओं के बीच नारी की विवशता का बड़ी ही सजीवता से चित्रण किया है। उनकी 'जिलाधीश 'कहानी की पात्र 'सुमन 'भी अत्यधिक प्रतिभावान, शिक्षित ,आत्मनिर्भर होते हुए भी   विवाह संबंधी प्रश्नों से गुजरती विवश चित्रित हुई है, उसी प्रकार अपराजिता कहानी की नायिका आरती भी जिलाधिश की नायिका सुमन की भांति ही सामाजिक रुढ़ियों का दंश झेलती ही चित्रित हुई है। इन कहानियों की नायिकाएं शिक्षित होते हुए भी पुरुष के सम्मुख लाचार व विवश दिखाई दी हैं। पुरुषप्रधान समाज में  मात्र सेवा, त्याग, समर्पण की पर्याय समझी जाने वाली स्त्रियों की दशा को उन्होंने बखूबी अपनी कृतियों के माध्यम से पाठकों तक पहुंचाया है।शिवानी ने अपनी कहानियों में मध्यम एवं निम्न वर्गीय जीवन से संबंधित विभिन्न प्रकार की समस्याओं से दो -चार होती नारी पात्रों का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है। उनकी 'श्राप' कहानी की पात्र दिव्या भी कुछ ऐसे ही दंश को झेलकर दहेज की भेंट चढ़ जाती है। इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि शिवानी की कहानियां स्त्री को स्त्री होने का बोध कराती हैं। जिस रचनाकार का अनुभव क्षेत्र इतना व्यापक हो उनकी रचनाओं में विविधता सर्वाधिक स्वाभाविक है।

किरन पंत

Tuesday, October 13, 2020

अनुभव सम्पन्नता का कथासाहित्य


 

   
शैलेश मटियानी का जन्म 14 अक्टूबर, 1931 को अल्मोड़ा जिले के बाड़ेछीना गांव में हुआ था। उनका मूल नाम रमेशचंद्र सिंह मटियानी था। मटियानी जी जब बारह वर्ष (1943) के ही थे तभी उनके माता-पिता का देहांत हो गया। माता-पिता की मृत्यु के बाद वे चाचा के बूचड़ खाने  में काम करने लगे। बहुत संघर्षों के बाद उन्होंने हाईस्कूल तक की अपनी पढ़ाई किसी तरह पूरी की‌। बचपन से ही वे  लेखक बनना चाहते थे। सन 1950 से उन्होंने कविताएं, कहानियां लिखना शुरू कर दिया। शुरुआत कविताओं से की फिर कहानियां लिखने लगे। जीवन के संघर्षों और उज्जवल भविष्य की चाह में एक दिन अचानक अल्मोड़ा में अपने छोटे भाई-बहन को अकेला छोड़ बालक रमेश मटियानी 1951 में दिल्ली आ गए और ‘अमर कहानी’ के संपादक आचार्य ओमप्रकाश गुप्ता के यहां रुके। उसके बाद कई शहरों में किस्मत आजमाने के बाद वे बंबई चले गए।  फिर पांच-छह वर्षों तक उन्हें फुटपाथों पर सोना, फेंके हुए भोजन खाना,  भिखांड़यों व पाकेटमारों की संगत में बैठना जैसे कई अनुभवों से गुजरना पड़ा। वहां एक जगह प्लेटें साफ करने का काम मिला और अगले साढ़े तीन साल तक वे वहीं रहे और काम के साथ-साथ लिखते भी रहे। बाद में वे इलाहाबाद आ गए।
शैलेश मटियानी का आरंभिक जीवन किसानी और जुआरी के बेटे और बूचड़ के भतीजे होने के कारण संघर्ष और उपेक्षा के अनुभवों से संपन्न रहा। उसके बाद दिल्ली मुंबई में किए गए संघर्ष, आपराधिक और विभत्स दुनिया के अनुभव उनके अनुभव  जगत को  विकसित करते गए। इस क्रम में आर्थिक संकटों, भावनात्मक संघर्ष और प्रतिकार के कड़वे अनुभव उनके कथा साहित्य में सर्वथा व्याप्त हैं। उनके जैसी अनुभव संपन्नता और भोगे हुए यथार्थ का चित्रण हिंदी कथा साहित्य जगत में और कहीं मिलना दुर्लभ है। उनके कथा साहित्य की यही विशेषता उन्हें एक उत्कृष्ट लेखक के रूप में हिन्दी जगत में प्रतिस्थापित करती है। एक कथाकार के रूप में शैलेश मटियानी अपने कथा साहित्य के माध्यम से सामाजिक व आर्थिक रूप से शोषित और पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व करते दिखाई देते हैं। उनके कथा साहित्य में आर्थिक संकट भोंगते निम्नवर्गीय लोग, घर से प्रेम संबंधों में भागी स्त्रियों का दुर्भाग्य, जातिगत रूप से निम्न स्थिति प्राप्त पात्र और भुखमरी तथा अभावग्रस्त जीवन भोंगने को विवश अति निम्न स्तरीय लोग तथा अपराध जगत  के पीछे की दारूण सच्चाईयों से दो-चार होते लोगों का यथार्थ अभिव्यक्त हुआ है। उनकी कहानियों और उपन्यासों में उन्होंने शोषित और पीड़ित आम आदमी को चित्रित किया है। उनका पहला उपन्यास 'बोरीवली से बोरीबंदर तक'  निम्न स्तरीय आम आदमी के संघर्ष और बम्बई की झुग्गी बस्तियों से जुड़े अनुभव की गाथा बनकर उभरा है। वहां घर से भगा कर लाई गई और बेच दी गई स्त्रियों का त्रासद जीवन है तो अपराध जगत में लिप्त गंदी गलियों की सच्चाई भी। उपन्यास बताता है कि गंदी गलियों और अपराधिक जीवन के पीछे का सच हमेशा गंदा नहीं होता। 'हौलदार' उपन्यास के माध्यम से वे कुमाऊंनी समाज में गहरे तक उतरे जातिवाद और वर्णवाद के संस्कारों को उजागर करते हैं और सदियों से चले आ रहे ब्राह्मण तथा क्षत्रिय समाज के मध्य उपजे अंतर्द्वंद को रेखांकित करने का प्रयास करते हैं। 'सावित्तरी' उपन्यास की सावित्तरी भी एक निम्न वर्गीय स्त्री का प्रतिनिधित्व करती है जो सिर्फ इसलिए लोगों की गंदी नजर और फब्बतियों का शिकार बनती है क्योंकि वह दिखने में आकर्षक है और लोगों के घरों में काम करती है।
शैलेश मटियानी के कथा साहित्य  में संवेदना और मार्मिकता का एक अलग स्तर दिखाई देता है। यही उनकी विशेषता भी है और कुछ आलोचकों की नजर में यही उनकी सीमा भी। शैलेश मटियानी के कथा साहित्य की एक और बड़ी विशेषता है कि वे अपनी कहानियों और उपन्यासों में स्त्री जीवन के विभिन्न पक्षों को सामने रखते हैं। 'बोरीवली से बोरबंदर तक' उपन्यास की नूर जो असल में रैवा है समाज में उन स्त्रियों का प्रतिनिधित्व करती है जो कि धूर्त पुरुषों द्वारा प्रेम में फांस कर पहाड़ों से शहर लाई जाती है और फिर वेश्यावृत्ति में धकेल दी जाती है। वहीं 'सावित्तरी' उपन्यास की सावित्तरी एक निम्न वर्गीय अभावग्रस्त स्त्री होते हुए भी एक स्वाभिमानी स्त्री है जो बड़े मन से मीत और उसके परिवार का ध्यान रखती है और उसके चरित्र की यही विलक्षणता नायक को मोह लेती है।
शैलेश की कहानियों में कुमाऊं का जनजीवन, परिवेश, संस्कृति और वहां का दुर्गम यथार्थ परिलक्षित होता है। 'हौलदार', 'चिट्ठी रसैन', 'गोपुली  गफुरन' इत्यादि इसी तरह के उपन्यास हैं जहां कुमाऊं का जनजीवन और वहां की जटिलताएं अपने पूरे विस्तार के साथ उपस्थित होती हैं। इसी तरह अर्धांगिनी, किसी से ना कहना, कालिका अवतार, लीक, पोस्टमैन, बाली-सुग्रीव, दशरथ, प्रेतात्मा इत्यादि उनकी ऐसी कहानियां हैं जो पहाड़ के जनजीवन को पाठकों के सम्मुख रखती हैं। शैलेश मटियानी उन गिने-चुने कथाकारों में है जो पहाड़ के बाहरी सौंदर्य, पर्वतों, नदियों और वनों पर मोहित नहीं होते बल्कि वहां के कड़वे यथार्थ को भी अपने कथा साहित्य के माध्यम से सामने रखते हैं। कुमाऊं के लोक जीवन में व्याप्त मान्यताएं, रूढ़िवादिता, वर्ण व जातिवाद के गहरी संस्कार बखूबी उनके कथा साहित्य में उभर कर आए हैं। शैलेश मटियानी कथाकार के रूप में संवेदनात्मक और भावनात्मक आधार पर पाठक को अपने साथ जोड़ते हैं। यह भावनात्मक आधार वह अपनी बेहद सरस और मार्मिक भाषा में सिद्धहस्तता से निर्मित करते हैं। आज उनका जंयती है।


मीना पाण्डेय 

Thursday, September 17, 2020

लोक



होना, सोचने से बेहतर है 

 'होने' की होती है एक जमीन

जिस पर पुरखों ने बोया अपने समय का सच

उस पीड़ा, उदेख, श्रमों के अंतराल को 

हमने 'लोक' कहा  

सैकड़ों मील दूर बैठे

गढ़ते रहे लोकजीवी होने का स्वांग


कमरतोड़ मेहनत के बाद 

लम्बी, उजाड़ रातों में वे-

 मिलजुल सुस्ताए भर

हमने उन्हें 'लोक गीत' कह सहेजा

 हमारे हाथ उस पसीने तक नहीं पहुंचे

जिसे सहेज निकाली जा सकती थी

एक राह पहाड़ों की तरफ

 

याद और आंसुओं से नहाई 'न्योली' से

 मिलाते रहे उस चिड़िया की शक्ल

हमने उस दर्द को नहीं पढ़ा 


कोहरे ढके पहाड़ों के पीछे से

चटकीले सूरज सी कौंधती लोककथाएं 

कथा भर होकर भी

जीवन से आगे दौडती रहीं 

 हवा,पानी, सुकून से होता हुआ

विकास का 'बिख्याती' हाथ हम तक पहुंचा 


पहाड झोड़़ा-चाचंरी, मडुवा भर नहीं है  

 पहाड़, श्रम के रास्ते 

 लोक को उसकी जटिलताओं के साथ जीना है


होना, सोचने से इसलिए बेहतर है

क्योंकि वहां से 

लोक के मोह में उलझे मस्तिष्क और

आधुनिक देह के मध्य

उभरने लगती है

द्वंद की एक बारीक रेखा।


#मीना पाण्डेय



(फोटो साभार गूगल) 

Tuesday, September 8, 2020

कोराना लाइव

 




कोरोनाकाल में लाकडाउन के चलते सड़कें जितनी वीरान और तन्हा नजर आयी, उतने ही भरेपूरे, चुहलक भरे नजर आए तमाम सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मस। मानो पूरा संसार हथेली जितने फोन में उमड़ आया हो। यूं तो पहले भी व्हाट्सएप, फेसबुकव ट्विटर के माध्यम से ज्ञान बघारने वालों की कमी ना थी मगर उनकी संख्या में इस दौर में जितना इजाफा हुआ है वो पहले कभी नहीं हुआ। कभी-कभी तो आश्चर्य होता है, ये वही दुनिया है जहां रोडरेज, धोखाधड़ी और चोरी की घटनाओं से हमारे अखबार भरे रहते थे। वे घटनाएं शायद मंगल ग्रह में होती रही हो। मगर सबसे ज्यादा उछाल आया है साहित्य और कलाओं की दुनिया में। जिस तरह दुनिया के अलग-अलग भागों में कोरोना से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है उसी तरह इस दौर को साहित्य के उत्कर्ष काल के रुप में भी याद किया जाएगा। इस अवधि में कवियों, साहित्यकारों, कलाकारों की संख्या में जो इजाफा हुआ है वह संसार को एक नई सांस्कृतिक क्रांति की ओर ले जाने में निश्चय ही बड़ी भूमिका निभाएगा। बहरहाल,  साहित्य की आधी दुनिया इस बीच सोशल मीडिया पर लाईव कार्यक्रमों में व्यस्त रही और शेष आधी दुनिया जिनको लाईव कार्यक्रमों का मौका नहीं मिल पाया इन कार्यक्रमों को  गलियाने में। कवियों की कल्याण समिति ने अपना विरोध दर्ज करते हुए कहा 'महिलाएं सज-धज कर बाकायदा रंग-बिरंगी पोशाकों में लाईव अवतरित होती हैं। उनके कजरे की धार से उत्तरोत्तर साहित्यिक विकास में खलल पड़ रहा है। उधर कवियत्री मुक्ति आंदोलन की प्रतिनिधि  महिलाओं ने प्रतिउत्तर में कह दिया 'पुरुषों को लाईव कार्यक्रम के तौर तरीके पता नहीं हैं। बाल-नाक-कान खुजाते हुए कविता पाठ करते पुरुष साहित्य को पतन की ओर ले जा रहे हैं।' ज्ञान को बुरी तरह पीट चुके, अकादमिक कवियों की टोलियों ने आनन-फानन में प्रस्ताव पारित कर दिया कि 'फेसबुक  कवियों को कवि ही नहीं माना जाएगा और न ही फेसबुक में डाली जाने वाली कविताओं को कविता ही।'  दूसरी तरफ नए-नए अवतरित फेसबुक कवियों ने भी दो-टूक कह दिया- 'बर्तन, घंटियों की आवाज से बच गए कोरोना को कविताएं सुना-सुना कर भगाएंगे।' अब हम से पूछो, तब बात तो भैया दोनों की ही सही है। अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग।
 अब भैया एक सिद्धहस्त लाईव कार्यक्रम के प्रणेता जिनके इन दिनों लगभग हर पोस्ट पर अप्रत्याशित रूप से टिप्पणियों की झड़ी लग रही थी, उन्हें समझ नहीं आया, इसकी वजह क्या है? पहले-पहल उनका शक अभी-अभी बदल दी गई उनकी प्रोफाइल पिक्चर पर गया। मगर  उनका ये शक बिल्कुल बेबुनियाद निकला। तब एक मित्र ने उन्हें आईना दिखाते हुए कहा- "यार! कोरोनाकाल में ईश्वर के बाद तुम जैसे लाईव कार्यक्रम के आयोजकों का ही सहारा रह गया है। कभी हमें भी याद किजिए।" तब असल बात उनके गले उतरी।

 अब हुजूर! लाईव आइए। समय के साथ तो चलना ही हुआ। मगर अवतरण से पहले इस सुझाव पत्र पर एक नजर जरूर मार लिजियेगा।
 पहली बात, लाईव के लिए वहीं पर स्वीकृति दें जहां सदस्यों की संख्या पांच हजार या उसके पार हो। भले आप दस कवियों की एक-एक पंक्ति चुराकर नितान्त मौलिक कविताएं लिखते रहे हों मगर पेज या ग्रुप की सदस्य संख्या ही आपके साहित्यिक  कद को तय करेगी। दूसरे, कार्यक्रम के समय पर विशेष ध्यान दें। अपने अनुभव के आधार पर जब आपको लगे कि इस समय तक झाड़ू- फटके से निपटा जा चुका होगा , उस ही समय का चयन करें। यदि  प्राइम टाइम का समय मिल जाए तो वह तो सोने पर सुहागा है। तीसरा, लाईव आने के बाद किसी बेकार माईक को चेक करने के अंदाज में बार-बार 'हेलो- हेलो- हेलो- हेलो' करके अपना और अन्य लोगों की बेकारी का  उपहास न उड़ाएं। कान- नाक या माथा खुजाते हुए बार-बार आवाज आ रही है, हम दिखाई दे रहे हैं, यह पूछना भी लाईव के नियमों के विरुद्ध है। लाइव स्क्रीन पर नजर आ रही आंख में दस की संख्या आते ही अपना ज्ञान प्रारंभ कर दें। आंख के पास संख्या बढ़ने से ना तो फूल कर गुब्बारा होइए। न आंख पर संख्या कम होने पर चूसा हुआ आम। निष्काम भाव से अपना ज्ञान बघारते जाएं। परंतु इससे बहुत पहले मैं आपसे आशा करती हूं कि आपने अपने परिवार, रिश्तेदारों व मित्रों इत्यादि को अपनी तारीफ में कसीदे पढ़ने के लिए आमंत्रण पत्र भेज दिया होगा। वे शुभचिंतक पांच-पांच मिनट के अंतराल में लगातार आपको अपने होने की स्मृति कराते जाएंगे। इस दौरान कभी-कभार आपके मन में यह विचार भी आ सकता है कि 'इससे बेहतर तो अपने मुन्ना की शादी में  ज्ञान बघार दिए होते, कम से कम नहीं तो चालीस-पचास लोग तो सुनने वाले मिल ही जाते।' इस तरह की बातें सोच कर अपना मन छोटा ना करें। चौथी और सबसे महत्वपूर्ण बात, बार-बार कैमरे के पास आकर टिप्पणियों को आंखें फाड़ कर नहीं पढ़े ‌ इससे आपके ज्ञान से पके बैठे किसी दर्शक द्वारा फोन से बाहर आपकी गर्दन खींच लिए जाने का खतरा बना रहता है। पांचवी, बार-बार लाइव  की वीडियो भेज-भेज कर दहशत के इस माहौल को और ना बढ़ाएं। 

खैर दद्दू! हम तो मीडिया को खामखां बदनाम करते रहे। इस बीच साहित्य की दुनिया को करीब से देखा तब मीडिया के लिए चुनी हुई तमाम सम्मानजनक भाषा, उपमाओं को   साहित्य के दिग्गजों के लिए संभाल कर रख दिया है।अब हम झुझलाएं, खिसयाएं, मिमियाएं या हिनहिनाएं उन्हें इससे क्या फर्क पड़ना है? खींचातानी ही वर्तमान साहित्य का ग्लैमर है, यकीन न आए तब अगले लाईव का इंतजार कर खुद ही देख लीजिएगा।

मीना पाण्डेय
एम-3, सी-61 शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2, साहिबाबाद गाजियाबाद-201005
मोबाइल-9891542797

Sunday, August 9, 2020

एक अदभुत किस्सागो

मनोहर श्याम जोशी

        

हिंदी के मूर्धन्य लेखक मनोहर श्याम जोशी का जन्म 9 अगस्त, 1933 को अजमेर, राजस्थान में हुआ। प्रारंभिक शिक्षा अजमेर से ही पूर्ण करने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय से उन्होंने विज्ञान विषय में स्नातक किया। इसे मात्र एक संयोग ही कहा जा सकता है कि लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान कल का वैज्ञानिक की उपाधि प्राप्त करने के बावजूद भी वे पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में आए और प्रतिष्ठित भी हुए। अठारह वर्ष की उम्र में उनकी पहली कहानी प्रकाशित हुई। मगर पहला उपन्यास आते आते-आते लगभग 20 वर्षों का लंबा अंतराल हो गया। मनोहर श्याम जोशी जी अमृतलाल नागर व अज्ञेय को अपना साहित्य गुरु मानते थे। पढ़ाई के बाद एक स्कूल में अध्यापक और एक जगह क्लर्क की नौकरी करने के बाद अंततः वे पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में आ गए।


कुरु कुरु स्वाहा' मनोहर श्याम जोशी का पहला उपन्यास है जो सन 1980 में राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। लेखक इस उपन्यास को एक गप्प बायोस्कोप कहकर  संबोधित करता है।इस उपन्यास की भूमिका में वे लिखते हैं- 'कुरु कुरु स्वाहा' दृश्य और संवाद प्रधान गप्प-बायोस्कोप है। अतिरिक्त आग्रह करता है कि पढ़ते हुए देखा-सुना जाए।" 
कुरु कुरु स्वाहा' उपन्यास उत्तर आधुनिक समाज में तेजी से हो रहे नैतिक पतन और संवेदनहीनता को चित्रित करता है।
कसप उपन्यास उनका सबसे चर्चित उपन्यास है। 'कसप' उपन्यास (1982) एक अलग तरह की प्रेम कहानी है जिसमें उपन्यासकार समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता को चित्रित करता हुआ संबंधों के बनने बिगड़ने के लिए उत्तरदाई मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारणों की पड़ताल बड़ी संजीदगी से करता है। इनके अतिरिक्त 'ट टा प्रोफेसर' भी उनका एक बेहतरीन उपन्यास है। इसमें प्रेम, घृणा और संबंधों के अजीबोगरीब समीकरण और भविष्य की आकांक्षाओं से भरपूर मानव की हास्यास्पद और त्रासद नियति को इंगित करता है।

 पात्रों और परिवेश के अनुकूल भाषा उनके कथा साहित्य को अलग रेखांकित करती है। अर्थपूर्ण संक्षिप्त संवाद उनकी भाषागत निजी विशेषता है। अपने कथा साहित्य में और विशेषकर उपन्यासों में वे सरल भाषा में जटिल चरित्र व घटनाओं का चित्रण करते दिखलाई पड़ते हैं। 'कुरु कुरु स्वाहा' में मुंबईया भाषा में वहां के फिल्म उद्योग का चित्रण उन्होंने बखूबी उतारा है।
मनोहर श्याम जोशी जी के कथा साहित्य में ग्रामीण तथा नगरीय दोनों जीवन स्थितियों का वर्णन हुआ है। उनके चरित्र अपनी एक अलग छाप छोड़ते हैं। वरिष्ठ कथाकार पंकज बिष्ट अपने आलेख 'मानव चरित्रों का विलक्षण  चितेरा' में उनके पात्रों के विषय में बात करते हुए लिखते हैं - "असल में उनके पात्र वे पहाड़ी हैं जो प्रवासी हैं और जिन्होंने हरे-भरे पेड़, नदी-नालों और एक से एक सुंदर वादियों को छोड़कर अपनी जगह गर्मी और धूल भरे मैदानों में बना ली है‌।जोशी जी इन प्रवासी पहाड़ियों के जो अपनी स्मृतियों और विफलताओं के बीच झूल रहे हैं, रूढ़ियों से मुक्त होने और समकालीनता से जुड़ने का संघर्ष कर रहे हैं, सबसे बड़े चितेरे हैं। उनके सभी उपन्यासों की कथाओं में  मूलतः इन्हीं चरित्रों की भरमार है। फिर चाहे वह 'कसप' हो, 'हरिया हरक्यूलिस' हो या  'ट टा प्रोफेसर षष्टि बल्लभ पंत हो‌। और इस अर्थ में वह एक नए मध्यवर्ग के उदय का चित्रण कर रहे होते हैं जो शहरों में पनप रहा है।" 

अपने उपन्यासों में चरित्रों के माध्यम से मनोहर श्याम जोशी समाज में फैले दोहरे चरित्रों को भी उजागर करते हैं। जैसे 'हमजाद' उपन्यास का टी के, टोपन दास खिल्लू राम जो हैवानियत से भरपूर आदमी है और सट्टेबाजी, जमीन खरीद-फरोख्त,धोखाधड़ी आदि से पैसा कमाता है। प्रेम के नाम पर लड़कियों से छल करता है। टी. के. के माध्यम से मनोहर श्याम जोशी इंसान के रूप में नर पिशाच बनते जा रहे हैं समाज को आईना दिखाते  प्रतीत होते हैं। जहां उनसे अपना हमजाद भी दूर भागता दिखाई देता है। 'हरिया हरक्यूलिस की हैरानी' उपन्यास  में हरिया के माध्यम से पित्तृ प्रेम में जीवन समर्पित कर देने वाले और परमार्थ में जीने वाले उस चरित्र को रेखांकित किया है जो समाज की दृष्टि में मजाक का पात्र बन कर रह जाता है। सन 1996 में किताब घर प्रकाशन से प्रकाशित यह उपन्यास आधुनिकता की सभी प्रतिमाओं को पीछे छोड़ उत्तर आधुनिक आचार-विचार को अभिव्यक्त करता है। 
 'क्याप' उपन्यास के लिए उन्हें 2005 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। क्याप' उपन्यास समाज में फैली असमानता, भेदभाव, जाति-पाति की जड़ों को अभिव्यक्ति प्रदान करता है।

मनोहर श्याम जोशी किस्सागोई में सिद्धहस्त कथाकार हैं। अपनी पृथक गप्प शैली में लिखे गए उनके उपन्यास विशेष प्रभावित करते हैं। उनके पास किस्सा कहने की अदभुत क्षमता है और उस किस्से के साथ पाठकों को जोड़ लेने का कौशल भी। एक साक्षात्कार में किस्सागोई की अपनी पारिवारिक परम्परा और पृष्ठभूमि पर बात करते हुए वे कहते हैं- "मेरे ननिहाल और ददिहाल दोनों ही तरफ़ किसी-न-किसी रूप में क़िस्सागोई की परंपरा रही। मेरी माँ भी किसी की नकल उतारने में और हँसी-मज़ाक करने में काफ़ी आगे रहती थी। मेरे पिता राय साहब प्रेमवल्लभ जोशी पढ़ने-लिखने के शौक़ीन तो ख़ैर थे ही, संगीत सहित कई विधाओं में उन्हें महारत हासिल थी।"

एक कथाकार के रूप में मनोहर श्याम जोशी ने हिंदी कथा साहित्य को नई भाषा व कलेवर तो दिया ही साथ ही उन्होंने समाज के उस सच को भी बेपर्दा  करने का प्रयास किया जो सामान्यतः छिपा रह जाता है। उनके उपन्यास 'कुरु कुरु स्वाहा', 'हमजाद' तथा 'ट टा प्रोफ़ेसर' 'क्याप', 'हरिया हरक्यूलिस की हैरानी' इत्यादि आधुनिक परिवेश में उत्तर आधुनिक समाज का निरीक्षण करते दिखाई पड़ते हैं।
मनोहर श्याम जोशी जी ने कहानियां बहुत कम लिखीं। मगर जितनी भी कहानियां उन्होंने लिखीं महत्वपूर्ण लिखीं। जिनमें गुड़िया, सिल्वर वेडिंग, मैडोरा मैरुन, धुआं, मंदिर घाट की पेडियां' और उसका बिस्तर इत्यादि महत्वपूर्ण हैं।

साहित्य के अतिरिक्त पत्रकारिता के क्षेत्र में भी उल्लेखनीय कार्य किया। 1964 में अज्ञेय जी के संपादन में निकलने वाले समाचार साप्ताहिक 'दिनमान' के मुख्य उप संपादक के रूप में उन्होंने कार्य किया। वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान के संपादक भी रहे।
हिन्दी टेलीविजन शॉप आपेरा के तो वे जनक ही माने जाते हैं। 1984 में भारतीय टीवी के पहले सॉप ओपेरा 'हम लोग' का लेखन कर उन्होंने टेलीविजन उद्योग में क्रांति का सूत्रपात किया। इसके बाद दूरदर्शन के लिए ही 'बुनियाद', 'मुंगेरीलाल के हसीन सपनें', 'हमराही', 'जमीन-आसमान' आदि लोकप्रिय धारावाहिकों का लेखन भी किया। उनके प्रमुख उपन्यासों में 'कुरु कुरु स्वाहा', 'कसप', 'हरिया हरक्यूलिस की हैरानी', 'हमजाद', 'ट टा प्रोफेसर' इत्यादि हैं। उनका कहानी संग्रह  'मंदिर घाट की पैंड़ियां' भी प्रकाशित हुआ।उपन्यास 'क्याप' के लिए 2005 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित  भी किया गया। सन 2000 में उन्हें व्यंग्य श्री सम्मान से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त भी उन्हें कई महत्वपूर्ण सम्मान से सम्मानित किया गया। सन 2006 में हिंदी का ये चमकता सितारा हमारे बीच से सदा के लिए चला गया।

मीना पाण्डेय

एम-3, सी-61, शालीमार गार्डन, एक्सटेंशन-2 साहिबाबाद, गाजियाबाद-201005


Sunday, July 5, 2020

पहाड़ी संस्कृति में गहरे उतरता संग्रह-नराई

                       


मीना पांडे के काव्य संग्रह 'नराई' को मैंने कई बार पढ़ा। हर बार पहाड़ की संस्कृति के सागर में और गहरे डूबती चली गई। काव्य संग्रह का शीर्षक ही अपने भीतर प्रेम, याद व कसक को समेटे हुए है। एक विरहणी की पीड़ा व बिछोह जनित नराई यहां साकार हो उठती है-
 .'तन मन किलमोड़ी के कांटे'

.'द्वार पर बिछी आंखें' 

.'तुम ले आना/ एक रोज/ उन्हें भी दरवाजे'।
 रोजगार के साधनों की कमी के कारण पलायन की पीड़ा सहते परिवार, मिलने की तीव्र उत्कंठा लिए मां, बहन, बेटी की व्यथा को लेखिका ने बड़े ही मार्मिक रूप से उभारा है-
 'कभी चिट्ठी के बदले
 किसी का अक्स उभरे।'

 अपनी वेदना को सबसे छुपाने के प्रयास में उसके हृदय की चुभन का सौन्दर्य देखिए -
'चुभन कोई हंसी के साथ उभरी'

 एक ओर विरह दग्ध हृदय तो दूसरी ओर श्रम की चक्की में पिसता शरीर। विवशता, विरह, वेदना व श्रम को कितना सटीक बिम्ब मिला है-
' सख्त हथेली
 योवन मुरझाया
 होठों पर एक प्यास।


 आज मोबाइल है। आने-जाने की सुविधा है। पर पहले तो चिट्ठी व मनीऑर्डर पर ही टिकी थी पहाड़ की संस्कृति। उसी की आस में अभाव व वियोग की पीड़ा कटती थी-
' मनीऑर्डर 
की शक्ल में 
जवाब भी कहां आया है।'

 और जब खत व मनीऑर्डर आया तो मानो पूरा परिवेश ही नाच उठा‌। ह्रदय के इस उल्लास को लेखिका ने बड़ी ही सजीवता व नवीन बिम्बो के अद्भुत सौंदर्य के साथ अभिव्यक्ति दी है-
'फिर दोपहर खिलखिलाई/
 सांझ ने भगनौल गाया/
 सीमा से/ किसी को/ याद करता फिर किसी का/ खत है आया।'

 पलायन की यह पीड़ा एक तरफा नहीं है। घर से जाते समय परिवार व जाने वाले की पीड़ा को लेखिका के नए अंदाज ने कितना मार्मिक बना दिया है-
 'बारिश में
 नहा रहा है गांव
 कोई शहर को 
जा रहा है।'
 एक पति व बेटे की विवशता, सीमा पर तैनात सिपाही के अपनी पत्नी को भेजे गए पत्र में झलक रही है-
'एक बेरी यहां/ एक तेरा खिलखिलाना / छिड़ी है/ सीमा पर जंग /मुश्किल है /मेरा लौट के आना।' 
 'ईजा-बाबू हैं/तेरे भरोसे 
मेरे भरोसे/ मातृभूमि।'
 इस पीड़ा का अंदाजा वही लगा सकता है, जो पहाड़ की संस्कृति में रचा बसा हो। पत्नी वियोग की पीड़ा। वृद्ध माता-पिता की चिंता व मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने की भावना। कुछ पंक्तियों में लेखिका ने सब कुछ कहकर 'गागर में सागर' भर दिया है।
 नारी की विरह वेदना के साथ उसका मायके की याद में छटपटाते हृदय के गान को घुघूती के माध्यम से बड़ी खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है- 
'वह सजल/ सुंदर सी युवती/ एक न्योली गा रही है'
 'छैय्या में बैठी/ एक घुघुती गा रही है।'
आधुनिक युग में समय के साथ-साथ पहाड़ की नारी आकाश छूने का प्रयास भी कर रही है‌। देखिए परिश्रम और सपने का ताना-बाना लेखिका ने कितने कौशल से बुना है-
'सुबह स्कूल में उगती।
 शाम जंगल की ओर
 छीलती, बीनती लकड़ियां‌'।

 "स्कूल में उगती" एक नया प्रयोग है जो लड़कियों की उड़ान को भीतर समेट रहा है। 
पहाड़ का एक उज्जवल पक्ष वहां के मेले उत्सव हैं जो वहां के श्रम, विरह-वेदना व कष्टों को कुछ पल के लिए उल्लास में बदल देते हैं। प्रकृति के साथ मन भी नाच उठता है-
 'राई फूली/एपण झूले/ द्वार पर झूली बसंत धार।'



 इसी तरह 'हुड़के ने चैती गाई' बहुत सुंदर बिम्ब है। हुड़का पहाड़ की संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग है,  जिसकी थाप पर बच्चे से लेकर वृद्ध तक सभी थिरक उठते हैं। चैत का महीना बहनों के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता है। इसकी प्रतीक्षा वह साल भर करती है-
 'चैत ने आंगन बुहारा
 फिर बहन के/ द्वार पर/ भाई ने/ झूला उतारा‌।
 'आंगन बुहारा',  'झोला उतारा' में मानो बहन का सम्पूर्ण प्रेम व मायके का पूरा खजाना सिमट कर आ गया हो। यह पर्व त्यौहार, कौतिक पहाड़ की संस्कृति का उज्जवल पक्ष हैं। कौतिक(मेले) का आनंद उठाती बालिकाओं का उल्लास देखिए-
' 'तिले धारो बोला' / नाचती छपेलियां।'
मीना पाण्डेय ने एक ओर कविताओं के माध्यम से पहाड़ को उसके सौन्दर्य, श्रम, विरह- वेदना, हर्ष-उल्लास के साथ अभिव्यक्ति दी है तो कुछ कहानियों के माध्यम से एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे वृद्धों के जीवन के सूनेपन, 'बंजर मकान को घर बना। पुरखों का ऋण चुकाती' वृद्धा की पीड़ा, सामाजिक विषमता का दंश झेलती परित्यक्ता की वेदना को भी बड़ी कुशलता से अभिव्यक्ति दी है। 
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि यह काव्य संग्रह मीना पांडे के पहाड़ के प्रति प्रेम को दर्शाता है। वहां के जीवन और संस्कृति के छोटे से छोटे पहलुओं को इसमें स्थान मिला है। उन्होंने उत्तराखंड की संस्कृति के सागर में गहरे तक उतर कर वहां के लोक जीवन के इतने मोती हमारे हाथों में रख दिए हैं कि कहीं-कहीं लयात्मकता की एक-दो कमियां नजरंदाज की जा सकती हैं। लेखिका इसी तरह पहाड़ को अपनी कविताओं कहानियों में उतारती रहें,यही प्रार्थना है।

 डॉ पुष्पलता भट्ट 'पुष्प
एसोसिएट प्रोफेसर 
श्री वेंकटेश्वर कॉलेज
 धौला कुआं,नई दिल्ली

Monday, June 15, 2020

एक क्रांति का नाम - नईमा उप्रेती खान

एक क्रांति का नाम - नईमा उप्रेती खान 



नईमा उप्रेती खान एक क्रांति का नाम था। एक तरफ उत्तराखंड के लोक गीतों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पटल पर लाने के लिए उन्होंने मोहन उप्रेती जी के साथ मिलकर एक बड़ी भूमिका निभाई। दूसरी ओर रंगमंच और लोक कलाओं में महिला भागीदारी के प्रति तत्कालीन समाज की जड़ मान्यताओं को पीछे छोड़ पहले पहल एक जीता-जागता उदाहरण बनी।
मध्यम कद काठी, धुला रंग, छोटी पोनी में समेटे अर्द्ध खिचड़ी बाल और ऐनक से झांकती दो आँखों का पैनापन। उघड़ती सांसो के अवरोध के बावजूद वो एक बहाव में बोलतीं थीं। सत्तर की उम्र में भी उनके चेहरे मोहरे और अंदाज से अनायास ही नवयुवती के रूप में उनके अनुपम सौन्दर्य और जुझारू व्यक्तित्व का अनुमान लगाया जा सकता था।  
 सन 2000 या 2001 की बात रही होगी। मोहन उप्रेती शोध संस्थान, अल्मोड़ा के कार्यक्रम में उन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आना था। ख़राब स्वास्थ्य  के कारण उनके आने को लेकर अनिश्चितता बनी हुई थी। मगर वे आयीं और वहीँ पहली बार मैंने  उन्हें मंच  गाते  हुए सुना-

'पारा भिड़ा को छे भागि तू 
मुरली बाजी गे..... मुरली बाजी गे।'

उसके बाद तो वे मेरे सम्पादन में निकलने वाली पत्रिका 'सृजन से' की संरक्षिका भी रहीं। अक्सर उनसे उनके मयूर विहार, दिल्ली स्थित निवास पर मिलना होता था। करीब से उनके व्यक्तित्व और कार्यों को देखा और एक लम्बे सार्थक और उतने ही संघर्षपूर्ण जीवन के अनुभवों को सुनती रही।
नईमा खान उप्रेती का जन्म 25 मई, 1938 को अल्मोड़ा के एक कटटर मुस्लिम परिवार में हुआ।  उनका परिवार अल्मोड़ा के बड़े रईस परिवारों में एक था। उनके पिता शब्बीर मुहम्मद खान ने उस समय की तमाम सामजिक रूढ़ियों को दरकिनार कर एक क्रिस्चियन महिला से विवाह किया। पिता के प्रगतिशील विचारों का प्रभाव नईमा पर पड़ा। उन्हें बचपन से ही गाने का शौक था। परिवार में भी संगीत के प्रति अनुराग रहा। शुरुवाद में वे शौकिया फ़िल्मी गाने गुनगुनाया करती थीं। उन्होंने इंटर तक की शिक्षा अल्मोड़ा एडम्स गर्ल्स इंटर कॉलेज से पास की। वहीँ एक संगीत शिक्षक के रूप में मोहन उप्रेती जी से उनकी प्रथम भेंट हुई। मोहन जी को उनकी आवाज पसन्द आई। उसी दौरान प्रसिद्ध घसियारी गीत  "घा काटना जानू हो दीदी, घा कॉटन जानू हो' का संगीत भी मोहन जी ने बनाया और नईमा जी को ही वह गीत पहली बार गाने का अवसर मिला। यह महज संयोग ही कहा जा सकता है कि आगे चलकर जिस मोहन उप्रेती से उन्होने प्रेम विवाह किया, एक प्रतियोगिता के दौरान वे उनसे काफी रुष्ट हो गई थीं। हुआ यह था कि हमेशा गाने में प्रथम आने वाली नईमा  को निर्णायक के तौर पर मोहन जी ने द्वितीय स्थान दे दिया था। इस तरह दौनों सम्पर्क में आए और नजदिकियां बढ़ने लगी।
उसके बाद यूनाइटेड आर्टिस्ट संस्था और 1955 में लोक कलाकार संघ के साथ जुड़कर दोनों ने साथ में कई गाने गाये। उन्होंने आकाशवाणी के माध्यम से भी उनकी आवाज पसन्द की गई। लोक गायक के तौर पर नईमा व मोहन जी की जोड़ी उस समय की सबसे लोकप्रिय जोड़ी रही।  बाद में दिल्ली आकर उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में दाखिला लिया। आगे चलकर वे कई महत्वपूर्ण पदों पर रहीं।

आश्चर्य होता है जिस समाज में लड़कियों का नृत्य व् नाटक जैसे माध्यमों से जुड़ना गलत समझा जाता था उसी समाज में रहते हुए नईमा जी न केवल लोक गीत और रंगमंच के क्षेत्र में अपने लिए जगह बनाती हैं वरन अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बनती हैं। नईमा जी के प्रेम और उसके लिए किये गए लम्बे संघर्ष पर बात करते हुए एक पत्र के माध्यम से वरिष्ठ कथाकार और समयांतर के संपादक पंकज बिष्ट लिखते हैं -"मैंने उन्हें अल्मोड़े में जब पहली बार सुना था तब मैं 6 -7 वर्ष का रहा हूँगा। पर उनका सुरीला स्वर मेरी स्मृति में सदा बना रहा है। अपने प्रेम और कमिटमेंट के लिए उन्हें जिस पीड़ा और संत्रास से गुजरना पड़ा होगा, उसकी मात्र कल्पना की जा सकती है। जिस तरह चार दशक तक वह अपने प्रण पर अटल रहीं वह प्रेम की अद्भुत मिसाल है।  वह भी एक ऐसे समाज में जो अपने पाखण्ड और रूढ़िवादिता के लिए प्रसिद्ध है।"
  उन्होंने कटटरपंथी सोच को पीछे छोड़ एक हिन्दू ब्राह्मण से न केवल प्रेम किया बल्कि ताउम्र एक सच्ची सहधर्मिणी  की भांति उनके स्वपनों को जीती रही। इन दोनों के असाधारण प्रेम की अनूठी कथा सुनने-पढ़ने में चाहे कितनी ही रोचक लगे मगर उस प्रतिबद्धता के लिए 30 वर्षों के लम्बे संघर्ष और समर्पण की जिस ऊंचाई से उन्हें गुजरना पड़ा वो आसान नहीं था। अपने लम्बे चले  प्रेम के विवाह में परिवर्तित होने के सुख को सांझा करते हुए वे डॉ दीपा जोशी को दिए एक साक्षात्कार में बताती हैं   -
 "अक्टूबर 1979 को मेरे पिता का इंतकाल हो गया। मैं बिलकुल अकेली हो गई। उप्रेती जी भी कब्रिस्तान आए। मैं अपनी माँ और पिता की कब्रों  के पास बैठकर फुट-फूटकर रो रही थी तभी नजाने इनके दिल में क्या ख्याल आया, इन्होनें कब्र के सामने मेरे सर पर हाथ रखा और कहा हमें शादी कर लेनी चाहिए। मुझे उस समय ऐसा लगा मानो वो मेरी माँ और पिता से इस बात की इजाजत ले रहे हों।"
मगर विवाह के बाद जहाँ एक ओर विभिन्न प्रशासनिक पदों पर रहते हुए नईमा जी  संस्कृति व् रंगमंच के प्रति अपनी प्रतिबद्धता निभाती रहीं वहीँ दूसरी ओर व्यक्तिगत जीवन में उनका संघर्ष भी जारी रहा। मोहन उप्रेती के उनके प्रति अगाध प्रेम और समर्पण के बाद भी उनके परिवार ने नईमा जी को कभी  स्वीकार नहीं किया। पर्वतीय कला केंद्र में रहे सिने अभिनेता गोविन्द पांडे बताते हैं -" मुस्लिम होने के कारण उप्रेती जी के परिवार में उन्हें बहुत नाकारा गया, ये सच है। मोहन जी की माँ उनके यहां खाना नहीं खाया करती थीं। और उनके भाई वगैरह भी अच्छा व्यवहार नहीं करते थे। अंतिम समय तक भी उन्हें देखने कोई नहीं आता था।  तो ये दर्द तो नईमा जी के सीने में था कि मोहन उप्रेती जी के परिवार ने कभी उन्हें स्वीकार नहीं किया।'
उनके करीबी और अंतिम दिनों में उन्हें सहयोग करने वाले अभिनेता गोविंद पांडे आगे बताते हैं - "एक समय था की जब बड़े बड़े मंत्री, एन एस डी के प्रोफेसर, चेयरमैन इनके घर पर बैठे रहते थे, उनसे मिलने के लिए तरसते थे और एक समय ये आया की उनके अपने परिवार वालों ने भी उन्हें नहीं देखा।"
नईमा उप्रेती के व्यक्तित्व में शिक्षित, स्वावलम्बी, योग्य और समर्पित स्त्री के विविध शेड्स रहे जो एक साथ विरले ही मिलते हैं। यही समर्पण उनके काम में भी दिखाई देता है। मोहन उप्रेती जी के साथ वे एक कलाकार और सहधर्मिणी दोनों भूमिकाओं में शत प्रतिशत नजर आती हैं।
ये विडम्बना ही है कि एक सम्पूर्ण जीवन लोक गीतों और संस्कृति को समर्पित करते ये कलाकार अपने जीवन काल में ही भुला दिए जाते हैं। न सरकार सुध लेती है न संस्थाएं। उनकी दूसरी पुण्यतिथि पर पसरा ये शून्य अखरता है। विनम्र श्रद्धांजलि

मीना पाण्डेय
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Saturday, June 13, 2020

लोक की आवाज-हीरा सिंह राणा




आज से कुछ 18-20 साल पहले हीरा सिंह राणा जी से अल्मोड़ा के एक कार्यक्रम के दौरान पहली बार मिलना हुआ। ‌तब उनकी छवि मेरे किशोर मस्तिष्क में 'रंगीली बिंदी' के लोकप्रिय गायक के रूप में थी। उसके बाद दिल्ली आकर कई कार्यक्रमों में लगातार मिलना हुआ। मध्यम कद-काठी पर मटमैला कुर्ता और गहरे रंग के चेहरे को आधा ढ़ापती अर्द्ध-चंद्राकार दाड़ी। चेहरे-मोहरे और वेश भूषा में भी वे लोक के प्रतीक रहे। उनकी कविताओं और गीतों में पहाड़ के परिवेश व  संस्कृति के प्रति गहरा लगाव स्पष्ट दिखाई देता है। राणा जी की रचनाओं का वितान बहुत वृहद रहा। वहां श्रृंगार है, जन आंदोलनों को उत्साह से भर देने के गीत हैं, प्रकृति के प्रति अनुराग है और अपनी संस्कृति के प्रति अकाट्य प्रेम भी। 
हीरा सिंह राणा जी का जन्म  मनीला (भिकयासैण  अल्मोड़ा) के डढ़ोली गांव में 16 सितंबर सन 1942 को हुआ। वे दसवीं तक पढ़े थे। अपना रचना कर्म और गायिकी उन्होंने लंबे संघर्ष और अनुभव की अग्नि में तपाकर निखारे थे। उनके प्रमुख काव्य संग्रहों में 'प्योली और बुरांश', मनख्यों पड्यों मैं', मानिले डानि' सम्मिलित हैं। ये दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि हीरा सिंह राणा जी की एक लोकगायक के रूप में लोकप्रियता के प्रकाश में उनका कवि स्वरुप कहीं उपेक्षित सा रह गया। कुमाऊनी भाषा के एक सशक्त कवि के रूप में उनका आकलन होना अभी शेष है।
कुमाऊनी बोली-भाषा के लिए उनका योगदान अमूल्य है। उन्होंने लोक भाषा में लोकसंवेदना को गीतों के रूप में पिरोया। एक रचनाकार के रूप में उनका प्रेयसी के प्रति प्रेम जब अपने अनगढ़ और लोक ठसक के साथ प्रस्फुटित होता है तब कवि उसके हाव-भाव, वेशभूषा,नैन नक्श इत्यादि को अनेक उपमाओं से विभूषित करने लगता है। 'रंगिली बिन्दी' उनके सबसे चर्चित गीतों में एक है। गीत में अविस्मरणीय बोलों के साथ पहाड़ी ठसक में गायक का 'आय हाय हाय रे', 'ओय होय होय रे' टेक विशेष रूप से अपना ध्यान खींचता है।
 सरसरी तौर पर देखने पर उनका  गीत-कर्म नारी सौंदर्य वर्णन, मनुहार, प्रकृति के प्रति मुग्ध भाव लिए रुमानी दृष्टिगोचर होता है मगर उन्होंने बेहद संजीदा रचनाएं भी लिखी और गुनगुनाई।
पहाड़ों के संघर्ष और दुर्गम जनजीवन के केंद्र में वहां की परिश्रमी स्त्रियां हैं। उन स्त्रियों के दुख भी पहाड़ से हैं। उन मेहनतकश स्त्रियों की पीड़ा और श्रम को सार्थक शब्द देते हुए राणा जी लिखते हैं-
 'हे नारी नमन त्यहे, जग मौहतारी,
 त्वील अपणा आंस पीय उमरमा सारी।'

  प्रेम का सबसे सुंदर स्वरूप है  देशप्रेम। मातृभूमि के लिए अपने प्रगाढ़ प्रेम को जब कवि शब्दों में उड़ेल देता हैं तो ये गीत अपनी नियति लिखता है-
'गंगा जमुना बगनि, दादी हमर देश मा।
जनमा भगवान लिनी दादी हमर देश मा।'
एक जगह राज्य आन्दोलन के शहिदों का स्मरण करती उनकी  कविता की पंक्तियां हैं-
'पहाड़ा का वीर च्यलौ तुमु हैं प्रणाम,
हिमाले कि चार ऊंची करि गौछा नाम।'

 जीवन की विषमताओं से निराश,टूटे मन में उत्साह का अलख जगाते उनके गीत निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते रहे हैं-
'लस्का कमर बांधा,
हिम्मत का साथा,
फिर भोव उजाली हली
का रैली राता।'

आज विकसित तकनीक के साथ हर दिन एक कवि या गायक का जन्म होता है और रातों-रात प्रसिद्धि भी मिल जाती है। मगर  हीरा सिंह राणा जैसे लोक कवि और गायक कौतिक, मेले-ठेलों, जन आंदोलनों के माध्यम से लोक मानस में जगह बनाकर यहां तक पहुंचे हैं। यही वजह है कि उनकी आवाज पहाड़ की अपनी आवाज बन गई। हरदा लोक के ऐसे कवि और गायक थे जो बनाए नहीं जाते, अपने परिवेश के साथ बनते, संवरते हैं और लोक के संघर्षों से जिनका अनुभव जगत विकसित होता है। उनके गीतों में पहाड़ की गीली मिट्टी की गंध थी और वहां के दुर्गम जनजीवन की पीड़ा भी।   
हीरा सिंह राणा जैसे कलाकार मरते नहीं अपने गीतों के माध्यम से लोक की संवेदना से जुड़कर अमर हो जाते हैं।

मीना पाण्डेय
srujanse.patrika@gmail.com

Tuesday, June 9, 2020

काव्यांकुर- स्तुति सक्सेना सिंह की दो कविताएं



(1)

जिन्हें कहते थे, फक्र से अपना,
आज अपनो की भीड़ में  क्यूं ?
खुद को अकेला पाया।
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया!
अपनेपन में भी रूखापन पाया ,
"रियल" जैसे "कजिन्स"
"अपनो" ने जताया ।
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया !
रिश्तों में "अहंवाद","अहंकार",
"रोष' को सर्वोपरि पाया ,
"वात्सल्य", "अपनत्व",
"संरक्षण" का बोध भुलाया ।
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का एहसास कराया!!
टिक-टोक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और
 फेसबुक के दौर में,
अनजान लाइक और शेयर
ने ही मान बढ़ाया।
बिखरे रिश्तों की डोर को बांधने में 
किसने समय गवाया?
इस युग ने यह कैसी
दूरियों का बोध कराया!
विस्तृत जिसका सोशल औरा,
उनको सोशल एंटिटी बतलाया,
अंतर्मुखी,जो रहे स्वयं में
उनको रिश्तों से विरक्त। दिखाया
वह भी है इस समाज का संबल, 
 दूरियों ने क्यूं न समझाया?
इस युग ने यह कैसी 
दूरियों का बोध कराया !

                       (2).                                    


मानवता आज
फिर शर्मसार हो रही?
इस करोना काल में ,
क्यूं वन्य जीवन की हार हो रही?
विषम विपदाएं देख भी
 आंख क्यों खुली नहीं?
मानव की हास्य क्रीडा से
क्यों मातृत्वता तार-तार हो रही?
कैसा यह अभिमान,
कैसा यह अहंवाद है?
धरणी के अंचल में 
सबका आयुष्य समान है?
फिर क्यों मनुष्य को अपने ही
अस्तित्व पर इतना गुमान है?
इंसा की इंसानियत पर ,
क्यों आज शोध हो रहा?
अमानवीय क्रूरता, कृतघ्नता,
का बोध हो रहा।
जिस गज को गजराज,
की उपाधि मिली।
इस करोना काल में ,
वह भी तीव्र तृष्णा से ,
समनुग्य दिखी।
नव जीवन के "सृजन" को
मां कोख में संग्रहीत किए,
पग पग चले वह मतंग ,
आशा के दीप लिए।
बारूद से भरा वह अनन्नास
 था जघन्य, अमानुषिक प्रयास।
जो खाया "हस्ती मां"ने समझ "खाद्यपदार्थ",
कर, मानवता पर अखंड विश्वास
ना समझी वो
अमानवीय विश्वासघात ।
क्रंदन,रुदन ,कोलाहल करती, वेदनापूर्ण उसकी हर  श्वांस 
शायद कुछ देर से समझी,
मानवता का निष्ठुर आघात।
पूछता वह मूक जीवन 
पल रहा जो कोख में,
घुट रहा क्यूं अस्तित्व मेरा,
तेरे स्नेहिल पार्श्व में?
उस पीड़ा,जलन,करुणा को लिए,
खड़ी वह अपने ही अश्रुओं के सैलाब में
गिर गई निस्तेज मृत हो,
अमानवीय अवसाद में 
हस्ती की हस्ती मिट गई,
अमानुषिक गहन तालाब में।
देख में,सोचती हूं,
मानवता क्यूं ???
फिर शर्मसार हो रही?
क्यूं बने हम मूक दृष्टा,
क्रूरतापूर्ण कृत्य के?
क्या बन गया ....मानव
"विषाणु"?
अपने ही अभिवृत्य के?



परिचय
स्तुति सक्सेना सिंह
माता: श्रीमती अंजना सक्सेना
पिता: श्री दिलीप कुमार सक्सेना

स्नातक:  बायोटेक्नोलॉजी,
डिप्लोमा: क्लीनिकल ट्रायल   एंड डेटा रिसर्च मैनेजमेंट
स्नातकोत्तर : हॉस्पिटल एडमिनिस्ट्रेशन तथा ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट


प्रकाशित पुस्तकें
भारत- प्राचीन इतिहास की विसंगतियां
भारत- प्राचीन इतिहास की विसंगतियां ( अपडेटेड एडिशन) 
मां-काव्य संग्रह

प्रकाशनाधीन रचनाएं
-लघु कथाओं का संग्रह, 
-परिस्थितियां (काव्य संग्रह),
-मां- काव्य संग्रह का अंग्रेजी संस्करण


वर्तमान पता
डब्ल्यू जेड २०, रत्न पार्क, निकट रमेश नगर  मेट्रो स्टेशन।
नई दिल्ली(११००१५)
stuti_1127@rediffmail.com
मोबाइल न-ं 9917376748

Sunday, June 7, 2020

'क्या बहिरा हुआ खुदाय'-संत कबीर की याद


                      
 

बालपन की दृष्टि से कबीरदास जी को बांचने के प्रयास में पाठ्य पुस्तक के प्रथम अध्याय में सरल सुबोध और बिना किसी विशेष उपक्र के वाणी में बस जाने वाले दोहाकार के रूप में उनकी छवि उभरती है। मगर आज जब कबीरदास को उनके समग्र रूप में समझने का प्रयास किया तब वो साहित्य,दलितविमर्शसामाजिक चेतनासत्य -अहिंसा,समाज सुधार,अध्यात्म -दर्शन आदि चर्चाओं के केंद्र में दिखाई देते हैं। यधपि उन्होंने जो कहा अपनी फक्कड़ता में कहा जहाँ समाज सुधारक के रूप में प्रविष्ट होने की कोई पूर्वनियोजित सोच नहीं थी तथापि उनका रचनाकर्म उन्हें सामाजिक चेतना के अग्रदूत के रूप में प्रतिष्ठित कर गया। भारतवर्ष की सुदीर्घ काव्य परम्परा में इतना विराट व्यक्तित्व तुलसीदास के अतिरिक्त नहीं मिलता।

उनका जन्म जेष्ठ पूर्णिमा के दिन काशी में हुआ था। कबीरदास के जन्म के सम्बन्ध में कई किवदंतियां प्रचलित है ,जिनका उल्लेख उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना ये कि कबीरदास जुलाहे थे ,कपडा बुनते ,सूत कातते सर्वधर्म समभाव ,अध्यात्म,सात्विकता ,अहिंसा,इतियादी का जो सूत्र तत्कालीन समाज को दे गए वो आज भी उतना ही प्रासंगिक है। कबीरदास ऐसे समय में उभर कर आये जब भारत मुस्लिम शाषकों के अधीन था। हिंसा व् अत्याचार के बल पर आम जनता द्वारा अपने फरमान मनवाये जाते थे। मुसलमान शासकों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन कराया जाता व् और अवमानना होने पर मौत के घाट उतार दिया जाताआम हिन्दू जनता पर अत्याचार बढ़ते ही जा रहे थे। दूसरी तरफ अपनी धर्म विशेष पहचान बनाये रखने के लिए हिन्दुओं में धार्मिक कर्मकांड व् पाखंड का बोलबाला था। व्यभिचार से बचने के लिए कन्याओं की कम उम्र में शादियां की जाती जिससे बाल विवाह जैसी कुरुती समाज में बढ़ने लगी।समाज वर्णभेद ,पाखंड ,छुआछूत जैसी कुरीतियों में जकड़ा हुआ था। कबीर  का निरक्षर किन्तु  सवेदनशील मन केवल व्यथित हुआ वरन उस दर्द को आत्मसात कर जो कुछ जाना - चिंतन मनन किया दोहा ,सबद ,रमैनी रूप में बह गया। निम्न जातियों जैसे जुलाहा ,कारीगरों ,धोबी ,हरिजनों के प्रति उच्च जातियों की उपेक्षा व् शोषण एक नवीन आंदोलन का सूत्रपात कर गया। सभी निम्न जातियां   अपनी अस्मिता व् स्वाभिमान की बात किसी किसी रूप में उठा रहे थे कबीर की वाणी ने उसे केवल ऊर्जा प्रदान की बल्कि उनमे आत्मविश्वास की भावना का संचार भी किया। डा. राधेश्याम द्विवेदी लिखते हैं " महात्मा कबीर का जन्म ऐसे समय में हुआ ,जब भारतीय समाज और धर्म का स्वरुप अंधकारमय हो रहा था। "

कबीर मुसलमान धर्म के थे और स्वामी रामानंद का शिष्य बनकर  उन्हें हिन्दू धर्म की भी अच्छी समझ हुई। उन्होंने प्रत्येक धर्म की तर्कसंगत बातों को अपनाया तथा अन्धविश्वास व् ढकोसलों का जमकर विरोध भी किया। अपनी रचनाओं के माधयम से केवल वो धर्मान्धता में जकड़े मुस्लिम समाज पर खुलकर बोलते हैं साथ ही हिन्दुओं में प्रचलित धार्मिक कर्मकाण्ड व् पाखंड पर भी कड़ी चोट करते हैं

"कंकड़ पत्थर जोड़ के ,मस्जिद ली चिनाय।
चढ़ कर मुल्ला बांग दे ,क्या बहिरा हुआ खुदाय।

"माला फेरत जग भया ,फिरा मन का फेर।
 कर का मन का डार दे,मनका -मनका फेर।

कबीर राम की उपासना करते है ,मगर कबीर के राम धनुषधारी -रघुनन्दन राम नहीं हैं। उनके राम तो सत,चित,आनंद स्वरुप परमात्मा हैं जो आडम्बर से नहीं सत्कर्म व् आतंरिक पवित्रता से प्राप्त किये जा सकते हैं। अपनी रचनाओं में वे मूर्तिपूजा का खंडन करते भी नजर आते हैं। यथा -

"पाहन पूजे हरी मिलै ,तो मैं पूजों पहार।
वा ते ता चाकी भली, पीसी खाय संसार।




कबीरदास अपने हरि (परमात्मा ) तक पहुंचने का बहुत ही सुगम मार्ग बताते हैं,यही सुगमता और सरसता उनकी शब्दावली और भाषा में भी दिखाई देती है। भाषा की यही बोधगम्यता उन्हें जनमानस में लोकप्रिय बनाती है। यही कारण है की कबीरदास के दोहे साक्षर -निरक्षर गांव -नगर ,देश -विदेश सभी तक अपनी पहुंच बनाने में सर्वथा सफल दिखाई देते है। डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं "सहज सत्य को सहज ढंग से वर्णन करने में कबीर अपना प्रतिद्वन्दी नहीं जानते...... "

गृहस्थ जीवन जीते हुए ,अपने व्यवसाय से रिक्त समय में सत्संग व् मनन चिंतन के माध्यम से कबीर अध्यात्म व् सत्मार्ग की ओर समाज को ले जाने का उत्कृष्ट उदाहरण सामने रखने का जो कार्य करते है वो विरले ही देखने को मिलता है


सात्विक प्रवृतियों के प्रबल पक्षधर कबीर  हिंसा, पशु हत्या व् मांसहार का जमकर विरोध करते हैं और मन को नियंत्रित कर माया के जंजाल से बचाकर रखने की सीख देते हैं मांसहार का खंडन करते हुए वे लिखते हैं  -
"बकरी पाती खात है , ताकि काड़ी खाल।
जो नर बकरी खात है ,उनका कवन हवाल। "

'ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय " कहते हुए एक तरफ पुस्तक ज्ञान से अनुभव ज्ञान को अधिक महत्व देते नजर आते है तो दूसरी तरफ प्रेम की परिभाषा को असीमित विस्तार देते। मगर कबीर का प्रेम प्रेयसी को रिझाता पागल प्रेम भर नहीं वरन निर्बलों ,मूक पशुओं ,व् मानवजाति के प्रति प्रेम का पक्षधर है।
हिन्दुओं में प्रचलित वर्णव्यवस्था पर भी कबीर एक स्वभोगी की हैसियत से खुलकर बोलते है। उनका मानना था की जनम के आधार पर किसी को उच्च या निम्न नहीं कहा जा सकता , मानव कर्म ही है जो समाज में प्रतिष्ठा या पतन के लिए उत्तरदायी है। उन्होंने अपनी रचनाओं के द्वारा दलितों में स्वाभिमान जगाने का कार्य किया है।
अंत में जैसाकि प्रो. महावीर सरन जैन लिखते है " कबीर का सारा जीवन सत्य की खोज तथा असत्य के खंडन में व्यतीत हुआ है। " कबीर अपनी इस यात्रा में संतमति से मानवजाति को सदगति की तरफ ले जाने वाले विनम्र संत व् दिशाविहीन समाज को दिशा दिखाते एक श्रेष्ठ दोहाकार के रूप में नजर आते हैं। उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।





मीना पांडेय
एम् -3 ,सी -61 वैष्णव अपार्टमेंट
शालीमार गार्डन एक्स-2
साहिबाबाद ,गाज़ियाबाद -201005 (यू पी )