Friday, December 11, 2020

ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा

 किताब का नाम-ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारा’   मूल्य-250/  प्रकाशक- प्रखर गूँज




शिखर चंद जैन जी की रचनाएँ  प्रखरगूँज पब्लिकेशन की पत्रिका साहित्यनामामें पढ़कर मैं पहले से ही उनकी प्रशंसक  थी. जब मुझे पता चला  कि उनकी एक किताब ज़िंदगी ना मिलेगी दोबाराछपने वाली है, तो मैं उसके प्रकाशन की बेसब्री से प्रतीक्षा करने लगी और जैसे ही यह अमाजोंन पर उपलब्ध होने की सूचना मिली, तो मैंने तुरंत ऑर्डर कर दिया.मेरे हाथ में किताब के आते ही  सबसे पहले तो मैं उसके फूलों से सजे मैरून रंग के कवर की  सुन्दरता को देखकर ही सुखद एहसास से घिर गई. फिर किताब के अन्दर शब्दों की छपाई, जो कि सामान्य से अधिक बड़े अक्षरों में है  और जहां किसी मुख्य बात को लिखना  था, वहां उसे बोल्ड शब्दों में उभारा गया है, जिससे पढ़ने  वालों को तनिक भी अतिरिक्त  प्रयास नहीं करना पड़ता.उसके बाद हम आते हैं,पृष्ट की गुणवत्ता पर, बिलकुल दूधिया रंग के मोटे और चमकदार पृष्ट, जिसको पलटने में आपस में चिपकने की जरा भी असुविधा नहीं होती और पाठक के पढने का उत्साह दोगुना कर देती है. किताब की प्रेजेंटेशन ने उसमें चार चांद लगा दिए हैं. वैसे ही जैसे हम किसी रेस्टोरेंट के खाने की तारीफ़ सुनकर जाते हैं और  वहां के रख रखाव,सज्जा,वातावरण और अच्छी सर्विस होने से खाना चौगुना स्वादिष्ट लगता है.

  .किताब का शीर्षक ज़िंदगी ना मिलेगी दोबारासे ही यह स्पष्ट है कि इस किताब का सार है कि यह ज़िंदगी  दोबारा नहीं मिलेगी,यह अनमोल है, इसलिए हमें इसे बोझ समझ कर नहीं काटना चाहिए, बल्कि इसके एक-एक पल को  भरपूर आनंद लेकर जीना चाहिए. यह किताब जीवन अच्छी तरह और भरपूर जीने की प्रेरणा देने के उद्देश्य से लिखी गई है.

अब शिखर चंद जी की  किताब के अन्दर लिखे विषय सूची  पर आती हूँ, जिसमें एकतीस विषय  हैं और  हर विषय में भिन्नता और विविधता देखते ही बन पड़ रही है.लेखक ने  जीवन के प्रत्येक पहलू पर  विचार करके सुझाव लिखे हैं, जबकि मैंने बहुत सी किताबों में हमारे व्यक्तित्व के एक ही पहलू पर पूरी किताब लिखी हुई पढी है. इसमें सबसे पहले विषय आपकी ज़िंदगी को बदल देंगे ये विचारका पृष्ट खोलते ही बोल्ड शब्दों में लिखे बोझिल रिश्तों को तोड़ देंपर मेरी नज़र पड़ी. उसमें एक वाक्य ने यदि कोई व्यक्ति आपके आंसुओं की वजह बनता है तो बार-बार आंसू पोंछने के बजाय उस व्यक्ति को ही अपने से दूर कर दें, पढ़ते ही मुझे कुछ पारिवारिक दुखदाई  रिश्तों को तोड़ने पर मेरी इस  सोच से कि आखिर खून के रिश्ते तो खून के ही होते हैं,दुविधा की स्थिति से मुक्ति मिल गई.जब मुझे मेरी उलझन से इस किताब में दिए गए सुझाव से मुक्ति मिल सकती है तो आपको क्यों नहीं...! किताब के दूसरे अध्याय में  कैसे बढाएं विलपावरपर आपको तथ्यपरक सुझाव मिलेंगे. तीसरे अध्याय में हम सभी खुश तो रहना चाहते हैं,लेकिन कैसे रहें,इसका जवाब आपको खुशी ऐसे मिलती हैशीर्षक के अंतर्गत मिलेगा. ऐसी बहुत सारे कार्य  हैं जिनके नुकसान  न जानने  के कारण हम उसमें लिप्त रहते हैं और  अपनी ऊर्जा और समय बारबाद करते हैं,इन सबका जवाब इस किताब में है. चावल का एक दाना पका देखकर हम समझ जाते हैं कि सारे चावल पक गए हैं,इसलिए इतने उदाहरणों से ही पूरी किताब समझ में आ जानी चाहिए, क्योंकि प्रत्येक विषय के बारे में जानकारी देना संभव नहीं है.

लेखक द्वारा  हर प्रकार की  आपकी  मानसिक और सामाजिक उलझनें जिनके सुझाव आप किसी पत्र- पत्रिका में भेजकर पूछते हैं या उनमें ढूंढते हैं, किसी काउंसलर या मनोचिकित्सक के पास जाते हैं, गुरुओं के प्रवचन सुनने जाते हैं, जिससे समय, ऊर्जा और धन की भी बरबादी होती है, वे सब  एक ही पुस्तक में लिखी हुई मिल जाए तो इससे अच्छी बात क्या है.पत्रिकाएँ या समाचार पत्र तो हम पढ़कर बेकार समझकर रद्दी में बेच देते हैं, लेकिन किताब तो आप जीवन-पर्यंत अपने पास रख सकते हैं.

हमें पता होना चाहिए कि यदि  हमारा मनोबल (विल पावर ) जो हमारे मन से जुड़ा है,मज़बूत हो तो शारीरिक बीमारियों का असर हमारे मन पर नहीं पड़ता और शारीरिक बीमारियों का इलाज पूरी तरह से डॉक्टर कर सकते हैं, लेकिन मानसिक बीमारी का इलाज पूरी तरह मनोचिकित्सक  नहीं कर सकता और इस बीमारी का  हमारे शरीर पर असर अवश्य पड़ता है.हम बड़ी  से बड़ी शारीरिक बीमारी को  और बड़ी से बड़ी तकलीफ को  अपने मजबूत मनोबल से ठीक कर  सकते हैं, उसके लिए हमें प्रयास करना पड़ता है. यह मेरा नहीं मनोचिकित्सकों का कहना है.हम मानसिक बीमारी अवसाद के  होने पर मनोचिकित्सक के पास जाते हैं तो वह दवा के साथ हमें अच्छी किताबें पढने के लिए और अच्छे मित्र बनाने की सलाह देते हैं,क्योंकि दवा कुछ  प्रतिशत ही असर करती है और अच्छी किताबें और मित्रों का साथ हमारा मनोबल बढाता है,जिससे  इस बीमारी को ठीक करने में अधिक योगदान  होता है, इसलिए हमें  किताबें अवश्य पढनी चाहिए , खासकर जो हमारी नकारात्मक सोच से उपजी समस्या को सकारात्मक सोच में बदलने के उपायों पर लिखी गयी हों.

अपनी  किताब में लेखक ने केवल अपने ही विचार नहीं रखे,बल्कि बहुत सारे  महान दार्शनिकों, मनोवैज्ञानिकों  के विचारों के साथ अनेक उदाहरणों को भी सम्मलित करके उसे तथ्यों समेत वास्तविकता की कसौटी पर भी खरा उतारा है. यही नहीं खुद की या अन्य किसी दूसरे के लिखे गए शेर, जिन्हें पढ़कर पाठक का भरपूर मनोरंजन भी होता है , इन सबको पढ़कर महसूस होता है कि लेखक ने लिखने से पहले सभी विषयों पर गहन अध्ययन किया है.

इस किताब की सबसे अच्छी बात तो यह है कि इसकी भाषा बोलचाल वाली सरल भाषा है,जिसमे क्लिष्टता नाम मात्र को भी नहीं है,इसलिए इसे साधारण से साधारण पढ़ा-लिखा इंसान भी पढ़ सकता है.मैंने और भी हिन्दी और अंग्रेज़ी में इस तरह की किताबें पढी हैं,लेकिन भाषा की क्लिष्टता के कारण पढना इतना सरल नहीं लगा.

 

 यह भी सर्वविदित है  कि किसी का भी जीवन हमेशा सामान्य  नहीं रहता.सभी के जीवन में कभी न कभी ऐसा समय आता है जब वह समस्याओं से घबडाकर अवसाद से घिर जाता है.मुझे एक व्यक्तिगत घटना याद आ गई है,जो मैं यहाँ साझा करना चाहूंगी.एक बार मुझे भी अवसाद ने घेर लिया था.मेरी बेटी ने एक किताब मेगालिविंग ( Megaliving ), जिसके लेखक रोबिन शर्माहैं,मुझे पढने को दी. उसका पहला पृष्ट खोलते ही मेरी नज़र बोल्ड शब्दों में लिखी एक पंक्ति पर पड़ी,कंट्रोल योर थॉट,इट विल कंट्रोल योर माइंड.कंट्रोल योर माइंड, इट विल कंट्रोल योर बौडी. अर्थात अपने विचारों को कंट्रोल कर लेंगे तो अपने शरीर पर भी हमारा कंट्रोल रहेगा.आपको जानकार आश्चर्य होगा कि यह  पढ़ते ही मेरे मन में सकारात्मक विचार आने के कारण  मैं ऊर्जा से भर उठी और थोड़ी देर पहले जिस शरीर की कमजोरी से मैं उठ नहीं पा रही थी उसमें ताकत आ गयी और मैं सामान्य हो गयी.इतनी ताकत होती है इस तरह की किताबों में.

आज लॉकडाउन के समय घर में बंद रहने से  जो मनुष्य सोशल एनीमलमाना जाता है, अब सोशल डिस्टेंसिंग  के कारण सिर्फ पिंजरे में बंद एनीमल होकर  रह गया है, इसलिए  अकेलेपन और खालीपन  के कारण अवसाद से घिर रहा है,यहाँ तक कि आत्महत्या तक कर रहा है.ऐसे में इस तरह की मनोबल मजबूत करके के लिए प्रेरित करने वाली किताबें पढनी बहुत ज़रूरी है.लॉकडाउन खुलने के बाद भी अपनी खुशी के लिए किसी पर निर्भरता कभी सुखद परिणाम नहीं देती,इसलिए ऐसी किताबों से मित्रता करनी आवश्यक है,क्योंकि ये कभी हमारा साथ नहीं छोड़ेगी.बल्कि अपने किसी परिचित को भी किसी अवसर पर या वैसे ही यह किताब उपहार स्वरुप देंगे, तो उनके लिए इससे अधिक अनमोल उपहार कुछ भी नहीं होगा.

रही बात किताब के मूल्य की ,यह दो सौ पचास की किताब है,जिसमें कुल मिलाकर एक सौ दस पृष्ठ हैं, जो कि इसकी गुणवत्ता के सामने कुछ भी नहीं है.हम एक कपड़ा खरीदते हैं तो पसंद आने पर अधिक मूल्य होने पर भी खरीदने से अपने को रोक नहीं पाते,जो सिर्फ हमारे शरीर के बाहरी आवरण को खूबसूरत बनाता है,लेकिन   एक किताब, जिसके लिए कहा जाता है कि वह हमारा अकेलेपन का सबसे अच्छा मित्र है, जो हमारे मनोरंजन के साथ हमारे ज्ञान की भी वृद्धि करता है,उसे खरीदते समय हम उसके मूल्य के लिए, इतना सोच-विचार करते हैं, यह  हमारी गलत सोच का ही परिणाम है. सारी  समस्या तो  हमारे नकारात्मक सोच का ही परिणाम है, जिसको बदलने के लिए हमें सकारात्मक सोच पैदा करने की सीख देने वाली किताबें पढनी चाहिए.

 अभी तीन चार वर्षों में कई नई प्रकाशन संस्थाएं खुली हैं,लेकिन गुणवत्ता की दृष्टि से प्रखरगूंजप्रकाशन का कोई मुकाबला नहीं है.इस प्रकाशन की संचालिका  नीलू सिन्हा जीबहुत कर्मठ महिला हैं,जिन्होंने अपनी मेहनत, लगन और कार्य के प्रति सच्चाई और एकनिष्ठता के कारण बहुत थोड़े समय में प्रसिद्धि पा ली है.

 

सुधा कसेरा,

सिकंदराबाद   

 

Wednesday, November 18, 2020

"आधे अधूरे"-मोहन राकेश

  "आधे अधूरे"






मेरी प्रिय पुस्तक "आधे अधूरे"
नाटककार - मोहन राकेश
राधाकृष्ण प्रकाशन 1969

अभी तक के जीवन में मुझे सबसे उत्तम और सर्वश्रेष्ठ पुस्तक मोहन राकेश जी द्वारा रचित नाटक आधे अधूरे लगा। इसको पढ़ते हुए ऐसा महसूस होता है एक के बाद एक दृश्य आंखों के सामने घटित हो रहे हैं जैसे चलचित्र में नायक और नायिका का प्रेम प्रसंग और नोकझोंक के माध्यम से जो तकरार दिखाया जाता है ठीक उसी तरह हमें आधे अधूरे पढ़ते हुए आनंद आता है।
 यह एक ऐसी घटना है जो हमारे समाज में आसपास दिख जाती है। मध्यम वर्ग के घर में ऐसी स्थिति अकारण ही देखने को मिलती है । पूरे नाटक में भी सभी पात्रों में पूर्णता कहीं दिखाई नहीं देती है सभी अपूर्ण और विघटित ही नजर आते हैं। इस तरह हम कह सकते हैं मोहन राकेश जी का शीर्षक आधे अधूरे सार्थक है।
  आधे अधूरे का सर्वप्रथम मंचन दिल्ली में दिशांतर द्वारा ओम शिवपुरी के निर्देशन में फरवरी 1969 ईस्वी में हुआ।निर्देशक ओम शिवपुरी ने इस नाटक के विषय में इस नाट्य कृति के आमुख में लिखा है कि "आधे अधूरे मुझे समकालीन जिंदगी का पहला सार्थक हिंदी नाटक लगता है। यह मौजूदा जीवन की विडंबना के कुछ एक सघन बिंदुओं को रेखांकित करता है।"

 मोहन राकेश जी के नाटकों में हमें मध्यवर्ग की पारिवारिक बिखराव, द्वंद्व, कुंठा, घुटन, अधूरापन और विघटन देखने को मिलती है। 
  आधे अधूरे के बारे में महेश आनंद जी का कथन है कि "यह नाटक विघटित होते हुए मध्यवर्गीय परिवार में व्याप्त कुंठाजन्य घुटन और उससे मुक्त होने की विवशता को पेश करता है। इसी के माध्यम से राकेश ने स्त्री-पुरुष के संबंधों के साथ असामंजस्य के प्रश्नों को भी उभारा है।"




       सभी एक घर में रहने के बावजूद अलग-थलग पड़े हुए हैं इसी परिप्रेक्ष्य में सवित्री एक स्थान पर कहती है - "असल में आदमी होने के लिए यह जरूरी है कि उसमें अपना एक मादा अपनी एक शख्सियत हो उसका पति नाम के अलावा कुछ नहीं केवल मांस का लोथड़ा है।"
सावित्री के कथन में -" मेरे पास अब बहुत दिन नहीं है जीने को, पर जितने हैं उसे इसी तरह और निभाते हुए नहीं काटूंगी। मेरे करने से जो कुछ हो सकता था इस घर का वह हो चुका आजतक। मेरी ओर से यह अंत है उसका निश्चिंत अंत।"
महेंद्र नाथ नाटक में एक स्थान पर कहते हैं कि "मैं इस घर में एक रबड़ स्टैंप भी नहीं सिर्फ एक रबड़ का टुकड़ा हूं बार-बार घिस जाने वाला रबड़ का टुकड़ा इसके बाद क्या कोई मुझे बता सकता है ? एक भी ऐसी वजह क्यों मुझे रहना चाहिए इस घर में।"

 इस तरह हम पूरे नाटक में सभी पात्रों में एक अधूरापन और खोखलापन देखते हैं।

नाटक की सार्थकता की हम बात करें तो नाटक पढ़ते हुए हमें ऐसा लगता है कि हम आसपास की किसी घर में हो रही द्वंद्व स्थिति को देख रहे हैं। नाटक में कहीं भी उबाऊपन पढ़ने से महसूस नहीं होता है बल्कि जैसे-जैसे पढ़ते जाते हैं रोचकता तीव्र गति से और बढ़ती जाती है। शुरू में तो ऐसा लगता है कि महेंद्रनाथ ही सारा दोषी है जो घर में बैठा रहता है और सावित्री काम पर जाती है, घर भी संभालती है परंतु अंत तक जाते-जाते मालूम होता है कि सावित्री को महेंद्रनाथ में एक अधूरा पुरुष दिखाई देता है और वह सभी में एक पूर्ण पुरुष की तलाश करती रहती है परंतु उसे किसी में भी एक पूर्ण पुरुष नजर नहीं आता। यही कारण है कि वह अंत तक उसी घर में लड़ाई झगड़ा के बावजूद, मानसिक तनाव के बावजूद रह रही हैं।
परिवार जिससे चलती है स्त्री और पुरुष। जब उसी दोनों में संघर्ष हो तो परिवार का बिखरना लाजमी है और इसे ही मोहन राकेश जी ने आधे अधूरे नाटक में दिखाया है कि यहां पर सभी कुछ आधा अधूरा सा है। 
सबसे रोचक मुझे अशोक -किन्नी  और किन्नी- बिन्नी की बातों के संवाद में जब तर्क वितर्क होता है तब लगता किन्नी उस घर में रहकर जिद्दी हो गई है वहीं अशोक कुछ करना चाहता लेकिन कर नहीं पाता है, ठीक महेंद्रनाथ अपने पिता की तरह को शुरू में व्यवसाय शुरू किए जो डूब गया तो हार मान गए ।
इस तरह हम देखते हैं आधे अधूरे मोहन राकेश जी के द्वारा रचित नाटक आज भी प्रासंगिक है। यही कारण है कि आज भी नाटक मंच पर इसकी प्रस्तुति देखने को मिल जाती हैं। और यही कारण है कि मुझे लगता है इसे बार-बार पर हूं और अन्य लोगों को भी इस नाटक को अवश्य पढ़ा जाना चाहिए।


संतोष कुमार वर्मा ' कविराज '
कांकिनाड़ा, कोलकाता
उत्तर 24 परगना
पश्चिम बंगाल
संपर्क सूत्र - 09681835197
ईमेल - skverma0531@gmail.com

मोहन राकेश कृत ' आषाढ का एक दिन '

 मोहन राकेश कृत ' आषाढ का एक दिन '




अपने जीवन के वर्तमान समय तक मैंने जितनी भी पुस्तकें पढ़ी है उनमें सबसे श्रेष्ठ और उत्तम किताब मोहन राकेश कृत ' आषाढ का एक दिन ' नाटक  मुझे बेहद आकर्षित करती है । इसका पहला कारण यह है कि ' आषाढ का एक दिन ' महाकवि कालिदास के निजी जीवन पर आधारित है साथ ही इस नाटक का परिवेश ऐतिहासिक होने के अतिरिक्त आज की आधुनिक समस्याओं से अवगत करवाने में पूर्ण रूप से सक्षम है । दूसरी बात यह है कि इस नाटक में कालिदास कोई तपस्वी साधु या संत नहीं है बल्कि वह एक दुर्बल और साधारण व्यक्ति है जो कर्तव्य हीन , ज्ञान शून्य, स्वार्थी , पलायनवादी, आत्मसीमित कवि के रूप प्रस्तुत होता है। नाटककार मोहन राकेश ने विश्व प्रसिद्ध कवि कालिदास को कल्पना और मिथ की मदद से एक आधुनिक सजीव चरित्र का निर्माण किया है जो सृजन शक्तियों का प्रतीक है।

प्रस्तुत नाटक तीन अंकों में विभाजित है। समय का अंतराल होने पर भी प्रहमयी कथानक में बनी है। जिज्ञासा और कौतूहल पाठको में बरकार बनी हुई है। नाटक की शुरूआत मल्लिका के झोपड़ी से होती है। आषाढ़ की पहली बारिश में भींग कर वह आती है और अपनी माँ से अपना अनुभव को बताती है : " मुझे भींगने का तनिक भी खेद नहीं है। भींगती नहीं तो आज मैं वंचित रह जाती.... मेरा तो शरीर भी निचुड़ रहा है। मां। कितना पानी इन वस्त्रों ने पिया है। ओह ! सौन्दर्य का ऐसा साक्षात्कार मैंने कभी नहीं किया। जैसे वह सौन्दर्य अस्पृश्य होते हुए भी मांसल हो ।" मल्लिका इस नाटक की नायिका कालिदास से बेहद प्रेम करती है। उसका प्रेम भावनामयी है। इसलिए वह कालिदास को उज्जैन भेजने के लिए प्रेरित करती है ताकि उसका सृजन क्षेत्र इस ग्रामीण क्षेत्र में संकुचित ना हो जाए। कालिदास उज्जैन जाकर एक महान कवि अवश्य बन जाता है वह अपनी प्रेयसी मल्लिका को केवल सहानुभूति ही दे पाता है और कुछ भी नहीं। वह गुप्त सम्राट का राज कवि और फिर कश्मीर का शासक बन जाता है। लेकिन गांव की सरस प्रकृति और मल्लिका का सहज स्वाभाविक प्रेम की मादक स्मृति उसे फिर से गांव की पर्वतीय प्रकृति में वापस ले आता है मल्लिका उस समय विलोम की पत्नी और एक बेटी की मां बन जाती है। वह कालिदास के साथ जाना चाहती है किन्तु मां की ममत्व उसे उसके घर में बांध देती है। उधर प्रियंगु मंजरी भी कालिदास की बेचैनी को समझती है पर वह इसे मल्लिका की तरह मन पर भावनाओं को नहीं आने देती है।




इस नाटक की प्रासंगिकता आज के सन्दर्भ में बहुत ही महत्वपूर्ण है। कालिदास के व्यक्तित्व और व्यवहार के माध्यम से नाटककार ने उसके अहम का विस्फोट बताया है यानि कि पुरुष स्वभाव से ही आत्मवादी और अहम पीड़ित रहा करता है। वह मात्र अपने लिए जीना जानता है। घर परिवार या स्त्री से सम्बन्ध भी वह अपने अहम की तृप्ति के लिए ही स्थापित किया करता है। इसी कारण कालिदास जैसा व्यक्ति अकेलेपन में जीने को मजबूर हो जाता है। दूसरी बात यह सामने आती है कि व्यक्ति का अन्तर्द्वन्द व्यक्ति को कुंठित बना देता है। नाटककार ने यह भी प्रकाश डालने का प्रयास किया है कि राज्यश्रय और राजनीति सर्जक कलाकार की सृजन प्रतिभा को न केवल कुंठित करके रख देती है, बल्कि तोड़कर रख देती है। इस नाटक में स्त्री सम्बन्धी समस्या आधुनिक युग बोध में सार्थक रूप से उभर कर सामने आई है। मल्लिका रूपी आधुनिक स्त्री का चित्रण हुआ है । वह कहती है : " मल्लिका का जीवन उसकी अपनी संपत्ति है। वह उसे नष्ट करना चाहती है तो किसी को उस पर आलोचना करने का क्या अधिकार है ? " जितना प्रेम वह कालिदास से करती है उतनी ही घृणा विलोम से करती है। परन्तु वह अपनी परिस्थिति के लिए कहीं भी कालिदास को नहीं ठहराती है।

1959 ई. में इसे वर्ष का सर्वश्रेष्ठ नाटक होने  के लिए संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 1971 ई. में निर्देशक मनि कौल ने इस पर आधारित एक फिल्म बनाई जिसने आगे जाकर साल की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार जीत लिया। इस नाटक को आधुनिक युग का प्रथम नाटक भी कहा जाता है।

और अंत में गोविन्द चातक के शब्दों में मैं यही कहना चाहती हूं कि " आज के सन्दर्भ मे कालिदास इसलिए सार्थक लगता है उसे हम अपने युग की विडंबनाओ के बीच खड़ा पाते हैं। समस्या मूलतः अलगाव और विच्छिन्नता की है। अपने मूल और परिवेश से उखाड़ कर वह अकेलेपन, संत्रास और संबंधहीनता के जिस वातावरण में धकेल दिया जाता है, वह आधुनिक मानव की नियति बन गया है।"



अनीता कुमारी ठाकुर
कार्यरत : शिक्षिका ( मटिया बुर्ज कॉलेज, कोलकाता पश्चिम बंगाल )
पता : पी - 156, ब्रह्म समाज लेन
         कोलकाता 700024
          पश्चिम बंगाल
संपर्क नंबर : 9903196750
ईमेल आईडी : anitathakur45632@gmail.com

अमृतलाल नागर जी का उपन्यास 'भूख'


'भूख' 



मैं अब तक हिंदी की कविताओं, कहानियों और उपन्यासों की लगभग तीन सौ पुस्तकें पढ़ चुका हूँ और इतनी बड़ी फ़ेहरिस्त में से किसी एक किताब का नाम बता पाना यद्यपि कोई आसान काम नहीं है, तथापि यदि किसी एक ही किताब का नाम लेना हो तो मैं हिंदी के प्रतिष्ठित उपन्यासकार अमृतलाल नागर जी के उपन्यास 'भूख' का नाम लूँगा। क्योंकि मुझे लगता है भूख ही वह पुस्तक हो सकती है जिसे मैं अपनी पसंद की पुस्तकों में सर्वोपरि रख सकता हूँ। आज से दस वर्ष पहले अपनी स्नातक की पढ़ाई के दौरान मैंने यह उपन्यास पढ़ा था और तब से अब तक लगभग पाँच बार इस उपन्यास को पढ़ चुका हूँ। इस उपन्यास का कथानक सन् 43 के बंग-दुर्भिक्ष पर आधारित है। उन दिनों जब बंगाल में यह भीषण अकाल पड़ा था, नागर जी बम्बई में अपने फ़िल्म लेखन के कार्य में व्यस्त थे। लेकिन प्रतिदिन समाचार पत्रों में बंगाल के अकाल की झकझोर कर रख देने वाली ख़बरों को पढ़-पढ़कर नागर जी इतने द्रवित हो उठे थे कि उन्होंने बंगाल जाकर स्वयं वहां की स्थिति को अपनी आँखों से देखने का निर्णय लिया। तदुपरांत उस अकाल में मनुष्य की चरम दयनीयता और परम दानवता के दृश्य नागर जी ने कलकत्ता जाकर वहां की सड़कों पर अपनी आँखों से देखे थे।

द्वितीय महायुद्ध में उलझी हुई तत्कालीन ब्रिटिश सरकार और निहित स्वार्थों से परे अफ़सरों और व्यापारियों के षड्यंत्रों के चलते हज़ारों लोग भूखों तड़प-तड़पकर मरने को विवश हुए, सैकड़ों गृहिणियाँ वैश्याएँ बना दी गईं और सैकड़ों बच्चे गुलामों की तरह दो मुट्ठी चावल के मोल बिक गये। इस उपन्यास में नागर जी ने यह सब कुछ अंकित किया है। यह उपन्यास आपको अंत तक बाँधे रखेगा और इसे पढ़ते समय आपको लगेगा कि सब कुछ आपकी आँखों के सामने ही घटित हो रहा है। साथ ही इस उपन्यास में ऐसी अनेक घटनाएँ हैं, जिन्हें पढ़कर आपके रोंगटे खड़े हो जाएँगे और कई जगहों पर आपकी आँखें छलक उठेंगी। इस उपन्यास को पढ़कर आप समझ पाएँगे कि भूख में कितनी ताकत होती है। भूख बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति को भी उन्मादी बनाकर उससे कैसे-कैसे कुकृत्य करवा सकती है? देखें -

'अकाल शुरू होने से दो महीने पहले बेनी का विवाह हुआ था। वह अपनी पत्नी के सौंदर्य पर मुग्ध था। उसकी पत्नी भी उसे जी जान से चाहती थी। लेकिन ब्याह की मेहंदी का रंग अभी फीका भी नहीं पड़ा था कि अकाल शुरू हो गया और मृत्यु की विभीषिका सारे गाँव को निगलने लगी। फिर एक दिन जब निरन्तर चार दिनों तक भूख से लड़ने के बाद उसकी पत्नी अपनी मृत्यु की अंतिम साँसें ले रही थी तो बेनी ने सोचा कि यदि यह मर गई तो मुझसे सदा के लिए बिछड़ जाएगी और इसे कुत्ते खा जाएँगे। अतः मुझे इसे ऐसी जगह छिपाकर रखना चाहिए जहाँ इसे कुत्ते न देख पाएँ। फिर अचानक बेनी को खयाल आता है कि मुझे इसे अपने कलेजे में ही छिपाकर रखना चाहिए। यह विचार आते ही बेनी गंडासा उठाता है और मृत्यु शय्या पर पड़ी अपनी पत्नी के प्राण निकलने से पूर्व ही उसके छोटे-छोटे टुकड़े कर डालता है। फिर पत्नी को कलेजे में छिपाकर रखने के लिए उसके शव के छोटे-छोटे टुकड़ों को मुँह में भरकर उन्हें चबाने लग जाता है।; 

ऐसा ही उन्माद भरा एक दूसरा उदाहरण देखिए -

'गाँव के मंदिर में एक पुजारी अपनी पत्नी, चार बच्चों, विधवा बहन, एक गाय और उसके बछड़े के साथ रहता था। अकाल पड़ने पर दाने-दाने को मोहताज पुजारी कई दिनों तक सपरिवार भूख से लड़ता रहा। लेकिन गाँव के दूसरे बच्चों की तरह अपने बच्चों को भी दिन पर दिन मौत के मुँह में जाता देख एक दिन साहस खो बैठता है और अपनी पत्नी और बहन को गाँव के अनाथालय, जहाँ से औरतें शहर ले जाकर बेच दी जाती थीं, में पहुँचाकर चार मुट्ठी चावल लाने का निश्चय करता है। इस बात का पता चलते ही पुजारी की पत्नी और विधवा बहन अपने तन की धोतियाँ उतारकर घर में फाँसी लगा लेती हैं। पुजारी जब अनाथालय के आदमियों के साथ घर लौटता है तो अपनी पत्नी और बहन के रूप में दो नंगी टंगी हुई लाशों को पाता है और पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है। वह मरना चाहता है, लेकिन बच्चों का मुँह देखकर उसे जीने के लिए बाध्य होना पड़ता है। इसी तरह लगातार भूख से लड़ते हुए कुछ और दिन बीत जाने पर जब एक दिन भूख असह्य हो उठती है और भूखे बच्चों का पेट भरने का पुजारी को कोई चारा नहीं दिखता तो घर में रखीं देवी-देवताओं की मूर्तियाँ फेंककर पुजारी अपनी गाय को ही मारकर उसके माँस से अपने बच्चों का पेट भरने का फ़ैसला करता है। युगों-युगों से बंधे मन को, हिंदुत्व और ब्राह्मणत्व की चेतना को पुजारी की भूख झटका देकर तोड़ देती है और पुजारी गंडासे के एक ही वार से गाय की गर्दन उसके धड़ से अलग कर देता है। लेकिन गो-वध के पश्चात उसकी चेतना लौट आती है और वह पुनः पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है और अपने बच्चों सहित स्वयं भी विष पीकर आत्महत्या का विचार कर बैठता है। चारों बच्चों को विष पिलाकर जैसे ही पुजारी विष पीने के लिए अपना मुँह खोलता है, भूख से वह बछड़ा रम्भाने लगता है जिसकी माँ की पुजारी हत्या कर चुका होता है। पुजारी विष नहीं पी पाता और ज़ोर से चीखता हुआ वहाँ से बाहर दौड़ पड़ता है। पुजारी विक्षिप्त हो जाता है।'

उपन्यास में इस तरह की उन्माद भरी अनेक घटनाएँ हैं। कई ऐसी घटनाएँ भी हैं, जिन्हें पढ़कर आप बुरी तरह संवेदना से भर उठेंगे। जैसे, एक आठ साल की बच्ची की मृत्यु पर जैसे ही उसके पिता और चाचा उसे चिता की लकड़ियों पर लिटाते हैं, अचानक गिद्धों का एक झुंड लड़की के शव पर टूट पड़ता है। पिता और चाचा को जान बचाने के लिए वहाँ से दौड़कर अलग होना पड़ता है। ऐसी ही एक दूसरी घटना में एक वृद्धा को कहीं से एक मुट्ठी चावल मिल जाते हैं। भूख से पीड़ित वह वृद्धा उन चावलों को कच्चा ही चबाने लग जाती है। लेकिन कई दिनों तक खाली पेट रहने के बाद कच्चे चावल उसे हजम नहीं होते और वह वमन कर देती है। लेकिन उन चावलों का मोह, जो उसने बड़ी मुश्किल से कहीं से पाए थे, वृद्धा नहीं छोड़ पाती और वमन किये गये चावलों को पुनः उदरस्थ करने लगती है।

बंगाल के अकाल में भूख ने मौत का जो तांडव किया था, इस उपन्यास में नागर जी ने उसका सजीव चित्रण किया है। 'भूख' नागर जी का पहला उपन्यास है, जो सन् 1946 में 'महाकाल' शीर्षक से भारती भंडार, लीडर प्रेस, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था। इसके बाद सन् 1970 में 'भूख' शीर्षक के साथ राजपाल एण्ड सन्स से प्रकाशित हुआ। शीर्षक बदलने की वजह यह रही कि 'महाकाल' नाम सुनते ही बहुत से लोग इसे पौराणिक उपन्यास समझने लगते थे। अतः प्रकाशक के इस आग्रह पर कि शीर्षक बदल देना चाहिए, नागर जी ने इसे 'भूख' शीर्षक दिया।

'भूख' उपन्यास के रचनाकार अमृतलाल नागर जी का जन्म एक  सुसंस्कृत गुजराती परिवार में 17 अगस्त, 1916 ई. को गोकुलपुरा, आगरा, उत्तर प्रदेश में उनकी ननिहाल में हुआ था। उनके पितामह पण्डित शिवराम नागर 1895 ई. से लखनऊ आकर बस गए थे। उनके पिता पण्डित राजाराम नागर की मृत्यु के समय नागर जी कुल 19 वर्ष के थे। नागर जी ने शुरुआत में 'मेघराज इंद्र' नाम से कविताएँ लिखीं, 'तसलीम लखनवी' नाम से व्यंग्यपूर्ण लेख व निबंध लिखे। कहानियों के लिए अमृतलाल नागर मूल नाम रखा। नागर जी ने अनेक उपन्यास, कहानी-संग्रह, नाटक व व्यंग्य लिखे। उन्होंने रेडियो-नाटक, रिपोर्ताज, निबन्ध, संस्मरण, अनुवाद, बाल साहित्य आदि के क्षेत्र में भी बहुत महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। यद्यपि साहित्य जगत् में उन्हें उपन्यासकार के रूप में ही सर्वाधिक ख्याति प्राप्त हुई तथापि उनका हास्य-व्यंग्य लेखन भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। नागर जी को अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। उन्हें उनके उपन्यास 'अमृत और विष' पर 1967 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिला। 23 फ़रवरी, 1990 को नागर जी पंचतत्त्व में विलीन हो गये।

 

यदि आप यह लेख पढ़ रहे हैं तो मेरा आपसे आग्रह है कि आप एक बार इस उपन्यास को ज़रूर पढ़ें। 'भूख' बंगाल के अकाल की समस्या का चित्रण करते हुए मृत्यु की रोमांचकारी गाथा के साथ जीवन की महत्ता का वर्णन करने वाला एक ऐसा उपन्यास है, जिसे न पढ़ना इस उपन्यास के साथ नहीं बल्कि बतौर पाठक आपका अपने ही साथ अन्याय होगा। मुझे इस बात का पूरा विश्वास है कि इस मर्मस्पर्शी उपन्यास को पढ़ने के बाद आप अपने घर में अन्न का एक भी दाना बर्बाद करने अथवा होने देने से पहले एक बार सोचेंगे ज़रूर। नागर जी की स्मृतियों को नमन !

     

आदित्य कुमार राय

कविताओं की दो किताबें एक उपन्यास ‘श्वान पुराण’ प्रकाशित।

संप्रति : सेल्फ इम्प्लॉयड।

पता : ग्राम- सेमलपुरा, पोस्ट- शहदौरा

तहसील- किच्छा, ज़िला- ऊधम सिंह नगर, उत्तराखण्ड

संपर्क : 06397518112

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