समाज का प्रतिबिंब है 'दर्पण'।
पुस्तकः दर्पण
कवयित्रीः डा. निशि मोहन
प्रकाशनः महिन्द्रा पब्लिशिंग हाउस, चंडीगढ़।
मूल्यः ₹ 175:00
डा. निशि मोहन का प्रकाशित काव्य संकलन 'दर्पण' राजनीतिक व समाजिक घटनाओं, नारी विमर्श , कृषक व श्रमिक जीवन की दुखद स्थिति के साथ-साथ आधुनिक जीवन की समस्याओं को उजागर ही नहीं करता बल्कि उन पर कुठाराघात भी करता है।
काव्य संकलन की प्रथम कविता 'माँ' माँ के समर्पण व उसके वात्सल्य प्रेम को प्रस्तुत करती है। गुरु गोबिन्द सिंह की महिमा का गुणगान करती पंक्ति 'मनुष्य वेश में वह दिव्य आत्मा मानवधर्म सिखाने आया था' उनके जीवन की सटीक व्याख्या करती है।
'विकास बनाम विनाश', 'बस करो' तथा 'धरती का दम घुटता है' में प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता व हमारी आधुनिक जीवन शैली पर कड़ा प्रहार है। कविता की पंक्ति ''जितना ऊँचा उठता है तरु/ उसकी पैठ उतनी गहरी होती/ तभी तो झंझावात में सीना ताने रहता है खड़ा/पर, आधुनिकता वश इंसा अपनी जड़ों को खोद रहा'' अपनी प्रासंगिकता को खुद बयान कर रही है। '26/11की कहानी ताज की जुबानी' आतंकवाद की भयावहता , दहशत तथा सेना की अद्भुत शौर्य की गाथा है। कविता 'दुश्मन को सबक सिखाना है' कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद तथा वीर सैनिक व उनके परिवार के साहस व देश भक्ति को दर्शाती है। समझौता एक्सप्रेस में मारे गए लोगों के प्रति संवेदनशील कवयित्री ने 'क्या मिला' कविता में असमाजिक गतिविधियों में संलग्न तत्वों से बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रश्न पूछा है''क्या मिला बेगुनाहों को मौत की नींद सुला के'' ? 'मँहगाई और मज़बूरी' , 'पहचानो श्रम की महत्ता' तथा 'अमीरी - गरीबी' कविता देश के निम्न वर्ग(श्रमिक, कृषक) के जीवन की व्यथा को सुनाती है।"आँचल में शिशु का क्रन्दन/आँखों से टपक रही मज़बूरी" पंक्ति देश की निर्धन माताओं की विवशता और बदहाली की ओर ध्यान आकृष्ट करती है। 'काश! ऐसा ही होता' नेताओं की कभी न पूरे होने वाले वादों को दर्शाती है। सुनामी , बादल फटने तथा बाढ़ जैसी प्राकृतिक त्रासदी का वर्णन कवयित्री ने अपनी कविताओं में किया है। "जब जीवन ज्योति बुझने लगी तब/ वह घी डाल कहता जलने को " पंक्ति भयंकर तबाही के बीच गाहे- बगाहे होनेवाले नवागत के जन्म की दास्तां सुनाती है, जो कवयित्री की आशावादी सोच को दर्शाती है।
'माँ की ममता', 'दूर नहीं पास है तू' , 'आधी आबादी', 'माँ के दिल का खौफ','असुरक्षित मासूम', 'मुझे बचा लो' , 'नारी समाज की त्रासदी ', ' इक्कीसवीं सदी की बेटियाँ ' कविताएँ नारी जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती हैं। इनमें माँ की ममता से लेकर गर्भस्थ शिशु की पुकार के साथ आधुनिक समाज में कन्याओं के लिए बढ़ती असुरक्षा की अभिव्यक्त है।
" न चाहिए उपाधि , न चाहिए अलंकार/ बस एक सम्मानजनक जीवित प्राणी के समान /चाहिए उसे अपनी पहचान!" स्त्रियों का सम्मान ही मूल शर्त है; समाज की आधी आबादी को संतुष्ट व खुशहाल रखने की।
बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति से चिंतित कवयित्री ने 'मातृभूमि के लाल ' में जीवन की महत्ता को समझाते हुए लिखा है-
"तुम हो राष्ट्र के अनमोल धरोहर, तुम्हें इतिहास नया रचना है
अवनि क्या अंबर पर भी ध्वज तिरंगा लहराना है।"
'संदेशा युवा शक्ति के नाम' में देश के युवक- युवतियों को अपनी शक्ति को पहचानने व देश में फैली अशिक्षा, गरीबी, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए आह्वान किया है।अंतिम कविता साहित्य की उपयोगिता व उसकी प्रासंगिकता को दर्शाती है।
कवयित्री का प्रथम काव्य संकलन इस उक्ति को प्रासंगिक बनाता है कि 'साहित्य समाज का दर्पण है' समाज के हर पहलू की अच्छाई और बुराई को उन्होंने काव्यसंग्रह में दर्शाया है। साथ ही उन्होंने समाज की बुराइयों पर कटाक्ष करते हुए कहीं -कहीं इन्हें दूर करने का समाधान भी बताया है। काव्य संकलन 'दर्पण' अपने नाम को सार्थक करता है, बिना किसी लाग- लपेट के सहज सरल शब्दों में भावों की अभिव्यक्ति है।सच पूछा जाय तो समाज का प्रतिबिंब है 'दर्पण'।
समीक्षक: डा.निरुपमा कपूर, 17,जसवंत स्टेट एक्सटेंशन, आगरा।
पुस्तकः दर्पण
कवयित्रीः डा. निशि मोहन
प्रकाशनः महिन्द्रा पब्लिशिंग हाउस, चंडीगढ़।
मूल्यः ₹ 175:00
डा. निशि मोहन का प्रकाशित काव्य संकलन 'दर्पण' राजनीतिक व समाजिक घटनाओं, नारी विमर्श , कृषक व श्रमिक जीवन की दुखद स्थिति के साथ-साथ आधुनिक जीवन की समस्याओं को उजागर ही नहीं करता बल्कि उन पर कुठाराघात भी करता है।
काव्य संकलन की प्रथम कविता 'माँ' माँ के समर्पण व उसके वात्सल्य प्रेम को प्रस्तुत करती है। गुरु गोबिन्द सिंह की महिमा का गुणगान करती पंक्ति 'मनुष्य वेश में वह दिव्य आत्मा मानवधर्म सिखाने आया था' उनके जीवन की सटीक व्याख्या करती है।
'विकास बनाम विनाश', 'बस करो' तथा 'धरती का दम घुटता है' में प्रकृति के प्रति असंवेदनशीलता व हमारी आधुनिक जीवन शैली पर कड़ा प्रहार है। कविता की पंक्ति ''जितना ऊँचा उठता है तरु/ उसकी पैठ उतनी गहरी होती/ तभी तो झंझावात में सीना ताने रहता है खड़ा/पर, आधुनिकता वश इंसा अपनी जड़ों को खोद रहा'' अपनी प्रासंगिकता को खुद बयान कर रही है। '26/11की कहानी ताज की जुबानी' आतंकवाद की भयावहता , दहशत तथा सेना की अद्भुत शौर्य की गाथा है। कविता 'दुश्मन को सबक सिखाना है' कश्मीर में बढ़ते आतंकवाद तथा वीर सैनिक व उनके परिवार के साहस व देश भक्ति को दर्शाती है। समझौता एक्सप्रेस में मारे गए लोगों के प्रति संवेदनशील कवयित्री ने 'क्या मिला' कविता में असमाजिक गतिविधियों में संलग्न तत्वों से बड़े ही मार्मिक ढंग से प्रश्न पूछा है''क्या मिला बेगुनाहों को मौत की नींद सुला के'' ? 'मँहगाई और मज़बूरी' , 'पहचानो श्रम की महत्ता' तथा 'अमीरी - गरीबी' कविता देश के निम्न वर्ग(श्रमिक, कृषक) के जीवन की व्यथा को सुनाती है।"आँचल में शिशु का क्रन्दन/आँखों से टपक रही मज़बूरी" पंक्ति देश की निर्धन माताओं की विवशता और बदहाली की ओर ध्यान आकृष्ट करती है। 'काश! ऐसा ही होता' नेताओं की कभी न पूरे होने वाले वादों को दर्शाती है। सुनामी , बादल फटने तथा बाढ़ जैसी प्राकृतिक त्रासदी का वर्णन कवयित्री ने अपनी कविताओं में किया है। "जब जीवन ज्योति बुझने लगी तब/ वह घी डाल कहता जलने को " पंक्ति भयंकर तबाही के बीच गाहे- बगाहे होनेवाले नवागत के जन्म की दास्तां सुनाती है, जो कवयित्री की आशावादी सोच को दर्शाती है।
'माँ की ममता', 'दूर नहीं पास है तू' , 'आधी आबादी', 'माँ के दिल का खौफ','असुरक्षित मासूम', 'मुझे बचा लो' , 'नारी समाज की त्रासदी ', ' इक्कीसवीं सदी की बेटियाँ ' कविताएँ नारी जीवन की सच्चाई से रूबरू कराती हैं। इनमें माँ की ममता से लेकर गर्भस्थ शिशु की पुकार के साथ आधुनिक समाज में कन्याओं के लिए बढ़ती असुरक्षा की अभिव्यक्त है।
" न चाहिए उपाधि , न चाहिए अलंकार/ बस एक सम्मानजनक जीवित प्राणी के समान /चाहिए उसे अपनी पहचान!" स्त्रियों का सम्मान ही मूल शर्त है; समाज की आधी आबादी को संतुष्ट व खुशहाल रखने की।
बच्चों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति से चिंतित कवयित्री ने 'मातृभूमि के लाल ' में जीवन की महत्ता को समझाते हुए लिखा है-
"तुम हो राष्ट्र के अनमोल धरोहर, तुम्हें इतिहास नया रचना है
अवनि क्या अंबर पर भी ध्वज तिरंगा लहराना है।"
'संदेशा युवा शक्ति के नाम' में देश के युवक- युवतियों को अपनी शक्ति को पहचानने व देश में फैली अशिक्षा, गरीबी, आतंकवाद, नक्सलवाद जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए आह्वान किया है।अंतिम कविता साहित्य की उपयोगिता व उसकी प्रासंगिकता को दर्शाती है।
कवयित्री का प्रथम काव्य संकलन इस उक्ति को प्रासंगिक बनाता है कि 'साहित्य समाज का दर्पण है' समाज के हर पहलू की अच्छाई और बुराई को उन्होंने काव्यसंग्रह में दर्शाया है। साथ ही उन्होंने समाज की बुराइयों पर कटाक्ष करते हुए कहीं -कहीं इन्हें दूर करने का समाधान भी बताया है। काव्य संकलन 'दर्पण' अपने नाम को सार्थक करता है, बिना किसी लाग- लपेट के सहज सरल शब्दों में भावों की अभिव्यक्ति है।सच पूछा जाय तो समाज का प्रतिबिंब है 'दर्पण'।
समीक्षक: डा.निरुपमा कपूर, 17,जसवंत स्टेट एक्सटेंशन, आगरा।







