गाँव के बदलते यथार्थ की अन्तध्वनि
( सत्यनारायण पटेल का उपन्यास गाँव भीतर गाँव )
उपन्यास -गांव भीतर गांव
उपन्यासकार - सत्यनारायण पटेल
प्रकाशक -आधार प्रकाशन
पृष्ठ -320
सृजन एक ऎसी लेखन प्रक्रिया है जो जलसे-जुलूसों,
नारों-नक्कारों, फतवा-फरमानों दे शोरगुल में भी चलती रहती और अपनी लेखकीय स्वाधीनता
को बनाए रखती है। देवेन्द्र इस्सर
कोई समय वह था जब न्याय को राज्य की बुनियाद समझा
जाता था। अब वह जमाना नहीं है। अब व्यापार का राज्य है। जो इस राज्य को स्वीकार न करे।
उनके लिए तारों को निशाना मारने वाली तोपें हैं । प्रभुसेवक सूरदास से ( रंगभूमि उपन्यास
)
घर के बाहर निकलो तो बचो \ घर में रहो तो बचो
क्योंकि जो कुछ बचा हुआ है \ उसे नष्ट करने की कोशिश ज़ारी है।
इस शताब्दी में तमाम चीज़ें \ बचाने के अभियान चलाजा रहे हैं । ताज्जुब यह है
कि बचाव की इतनी कोशिशों के बावजूद न आदमी बच रहा है \ न जंगल। ( बचो- स्वप्निल श्रीवास्तव
)
सत्यनारायण पटेल के उपन्यास ‘ गाँव भीतर गाँव ’ का पहला दृश्य ही काफी दुःख
भरा और भारी है। घर-परिवार की गाड़ी धूप, मीह, कीच भरे रास्तों पर खींच ले जाने वाला
इस दुनिया को छोड़ गया। झब्बू दे सामने बड़ा सवालिया निशान है- ‘ कैसे पार करे ’ ज़िन्दगी एक काला समुद्र । टूटी
नाव-छितर-बितर । चप्पू भी छीना ज़ोर-जबर। तू बड़ा निर्दयी ईश्वर। कैसे जिये कोई प्राण
बग़ैर। झब्बू की आँखों में कुछ ऎसे ही भाव, आँसू की जगह बेआवाज़ बह रहे, और झब्बू निःशब्द
थी। झब्बू अकेली नहीं है। एक छोटी बच्ची भी है गोद में।
सुना है प्रकृति मानवीय संस्कृति से पहले भी थी। इसके बाद भी रहेगी।
सत्यनारायण पटेल इन ह्रदय विदारक मनो भावों, काव्यात्मक लयबद्धता के साथ पक्षियों
के साथ एकात्मक करने का करने का हुनर जानते
हैं-
नीम नीचे चालीस-पचास लोग जमा थे। नीम की डगालों पर मोर, होला, कबूतर, चिकी
आदि पक्षी बैठे थे। सभी शांत। चुप। गिलहरी भी एक कोचर में से टुकुर-टुकुर देखती रही।
शायद उन सबके मन में चल रहा – ‘ हमारे लिए ज्वार, बाजरा और मक्का के दाने बिखेरने वाला
आज खामोश क्यों है ? लेकिन वे किससे पूछे ! कौन उनकी भाषा समझे ! कौन उन्हें जवाब दे
! वे सभी दुःख से भरे और जैसे-तैसे खुद को संभाये डगालों पर बैठे रहे। ’ ( गाँव भीतर
गाँव प्रष्ठ संख्या- 7 )
झब्बू का दुःख बड़ा है जो पक्षियों तक में बयान हो रहा है। माँ कहती-‘ बेटी,
जीना तो पड़ेगा। तू अपनी तरफ़ न सही, गोदी में बैठी तेरी छोरी रोशनी की तरफ़ देख, उसकी
खातिर जी । मरे को रोये तो सही, पर मरे के साथ मरे कैसे । ’
जीवन जगत का यह कठोर सत्य है। मृत्यु का मातम मनाते हुए भी जीवन के सुराग तक
जाने का विकल्प खोजते रहना। बीस-इक्कीस की झब्बू। गोद में तीन-चार बरस की रोशनी’ आँखों में सपनों की किरिच और सामने पसरी अमावस की रात सरीकी ज़िन्दगी, जो अकेले अपने पैरों पर ढोनी
थी। उजाड़ ज़िन्दगी का बोझ भरी-पूरी ज़िन्दगी से बहुत भारी था, पर ढोना तो था, न ढोती
तो क्या करती ? उजाड़ ही सही, पर थी तो उसी
की ज़िन्दगी । ’
आगे का सफर उसके लिए आसान कहाँ था। पहले तो वह एक स्त्री है, दूसरे भारतीय
समाज की विधवा, तीसरे गोद में बच्ची और पर भी दलित जो लेख माथे पर लिखा है ।
एदुआर्दो गालेआनो ने 13 जुलाई 2003 को द प्रोग्रेसिव के लिए अल्टरनेटिव रेडियो
के डेविड बार्सामियन को साक्षात्कार देते हुए कहा- ‘ हम सबको जानने का और अपनी बात
कह करने का अधिकार है, जो आजकल बहुत मुश्किल है। जब तक हम एक छुपी हुई तानाशाही के
आदेशों को मानते रहेंगे, ऎसा ही रहेगा। यह एक शब्द, एक तस्वीर, एक सुर की तानाशाही
है और शायद यह दूसरी तानाशाहियों से अधिक ख़तरनाक है क्योंकि यह पूरी दुनिया के स्तर
पर काम करती है। यह ताक़त की अन्तराष्ट्रीय संरचना है जो उन सार्वभौम मूल्यों को थोपती
है जो उपभोक्तावाद और हिंसा पर आधारित है। इसका मतलब यह है कि आप वह है जिसके आप मालिक
है। अगर आपके पास कुछ नहीं है तो आप कुछ भी नहीं है। आपका अधिकार चीज़ों को ख़रीदने
की आपकी क्षमता पर निर्भर करता है ’ ( कथांतर \ अंक 19 )
‘ गाँव भीतर गाँव ’ उपन्यास के अध्याय चार में दर्ज़ है- उन दिनों एन जी ओ सेक्टर
बहुत तेज़ी से लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा था। मंत्री दहेज में एन जी ओ देने-लेने
लगे .. एन जी ओ की आँधी में मार्क्स, लेनिन, नेहरू, गाँधी, संघी एक घाट पर पानी पीने
लगे। ’
यह जटिल यथार्थ है । विचारधाराओं का सारतत्व बह जाता है। सिर्फ़ विचारकों के
नाम सिक्कों की तरह उछलते हैं। उन नामों को उछालकर वर्चस्ववादी एक पर्दा खड़ा करते हैं और उस पर्दे की आड़ में भोंडी राजनीति,
धन, माल, मिलकियत का खेल खेला जाता है।
झब्बू ने प्रतिकूल परिस्थितियों के विरुद्ध साहस से काम
लिया। कामयाबी की सीढ़ियों ने भी स्वागत किया। दम था अपने साथ दूसरों को आत्मनिर्भर
बनाने का।
‘गाँव भले ही इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खड़ा था । लेकिन
जात-पात छुआछुत अभी भी मुंशी प्रेमचंद के जमाने सी ही थी ’ डोकरा-डोकरी पर बोझ नहीं
बनी। मसीही सिलाई प्रशिक्षण केन्द्र से सिलाई सीखी। ससुराल के झोपड़े में जाकर रही
और सिलाई का काम संभाल लिया। ’ अख़बार बाँचने और ख़बरों पर बात करने की आदत उसने छोड़ी
नहीं।
झब्बू की पहली सार्वजनिक लड़ाई कलाली के ख़िलाफ़ शुरू हुई।
झब्बू के पति कैलास के रहते गाँव में कलाली न थी- झब्बू जब मायके में लौटी तब थी। गाँव
के इतिहास में पहली कलाली थी। अकेली झब्बू का नहीं, बल्कि पूरी बाखल की औरतों का सिर
दर्द थी। दारूकुट्टे आती-जाती पर फिकरा मारने से न चूकते । ‘ जब फिकरे की चोंट किसी
की छाती या कूल्हे पर पड़ती, काँटा सा चुभता।’
शराब बेचने के अड्डे हो या अफीम बेचने के अड्डा लगता हो या लूटतंत्र चल रहा हो, सभी की जड़ें जमीन के
नीचे ही नीचे पुलिस, प्रशासन से लेकर शक्ति केन्द्रों तक फैली रहती हैं। ‘ कलाली जाम
सिंह की। जाम सिंह के माथे पर राजा साब का हाथ गाँव में सरपंच भी तो जाम सिंह का बेटा।
कलेक्टर, एस पी, आबकारी के किन-किन को भोग चढ़ाया ’
झब्बू ने दारुबंदी पर फ़िल्म देखी थी। कलाली रोकने के लिए प्रदर्शन –धरने के
लिए आश्वासन मिला कि पूरी बाखल की औरतें आ जायेगी- ‘ सभी तो जूते खाती हैं।’
पच्चीस-तीस औरतें सुबह ही कलाली के किवाड़ के सामने जाकर बैठ गई। जाम सिंह
बड़बड़ाता रहा-चींटी हाथी का शिकार करने चली। थानेदार रमेश जाटव की थानेदारी न चल सकी।
कलेक्टर को अन्ततः कहना पड़ा- कलाली को गाँव से आधा कि.मी. दूर शिफ्ट करवाओ। ’
हालाँकि हमारा जनतंत्र वास्तविक कम छद्म ज्यादा, परन्तु जब प्रतिरोध प्रबल
हो तो लालफीताशाही को ऎसे फैसले लेने पड़ते हैं। ऎसे बेपरवाह लोकतंत्र में ‘ शिक्षित
बेरोज़गारों की भीड़ भेड़ों की तरह बढ़ रही थी। हरेक को काम की ज़रूरत थी। लेकिन प्रदेश
और देश की सरकार काम दे नहीं पा रही थी। सरकार चलाने वाले अपना पेट और घर भरने में
मगन थे। उनके पास काम सृजित करने वाली दृष्टि का अकाल था। वे धीरे-धीरे अपनी ज़िम्मेदारियों
को निजी संस्थानों को सौंपने में व्यस्त थे।’
उपन्यास का पहला हिस्सा हमें प्रजातंत्र के भीतरी तल पर पनपती शक्ति केन्द्रों
की निरंकुशता का परिचय दे रहा है, तो दूसरे हिस्से में दाखिल होते ई एन जी ओ जैसी नई
स्वयंसेवी संस्थाओं से परिचित करवाता है जो कथित रूप से मानवाधिकारों को बचा रही हैं।
’
उन दिनों एन जी ओ सेक्टर बहुत तेज़ी से लोगों को अपनी तरफ़ खींच रहा था। रफीक
भाई जैसे बेरोजगार ही नहीं, बल्कि आई ए एस, प्रोफ़ेसर, सम्पादक, पत्रकार और वकील जैसों
को भी । ‘ समाज में किसी मामूली से एन जी ओ
को कर्मी को भी मजदूर, किसान, शिक्षक, डॉक्टर, प्रोफ़ेसर की तुलना में ज्यादा इज़्ज़त
से देखा जाता। जैसे वह आम समाज का हिस्सा नहीं, बल्कि किसी विशेष ग्रह से आया हो। उसके
पास हर समस्या का हल हो। वह किसी को भी समझाने का अधिकार हो।’
क्योंकि समाज दिशाहीन स्थिति में पहुँच चुका था। इसलिए एन जी ओ कर्मी को इतनी
जगह मिलने कि क्रांतिकारी समझे जाने लगे। उस दौर में
अपने हित व ज़िन्दगी का दाँव खेलने वाले ‘ अमूलचूल परिवर्तन का सपना देखने वाले, हक
ईमान की बात करने वाले, लोगों को समझाने वाले कि एन जी ओ साम्राज्यवादी भुतालिया है।
ख़ून को भ्रष्ट करने की साज़िश है। जनता के आक्रोश को पंचर करने वाली कील है । एक साम्राज्यवादी
कुचक्र है।’
समाज के ठोस वैचारिक धरातल छीन जाने पर पैदा हुई शून्य की हालत में बाजीगरी
\ चम्तकार दिखाना आसान हो गया था। देशी-विदेशी एजेंसियाँ तरह-तरह के कामों के फँड बाट
रही थीं। ‘ कोई साम्प्रदायिक सोहार्द के लिए फंड देती, कोई सोहार्द भंग करने के लिए।
अगर लम्बे समय तक कहीं से साम्प्रदायिक तनाव की ख़बर न आती, तो एन जी ओ कर्मियों को
चिंता होने लगती। कुछ अपनी कल्पनाशक्ति का इस्तेमाल करते। किसी धर्मस्थल में माँस का
टुकड़ा फिंकवा देते। अख़बारी बाजी होती। तनाव होता। एन जी ओ एक समिति बनाते। जाँच करते।
रिपोर्ट बनाते कि देखो, समाज में किसी साम्प्रदायिकता भरी है। समाज को जाग्रत करने
की ज़रूरत है। ’( गाँव भीतर गाँव \ पृष्ठ सं 46 )
रफीक भाई झब्बू के गाँव मैला ढोने वालों के लिए काम करने आते हैं । ‘ आज न
गाँधी है, न अम्बेडकर हैं, लेकिन देश में यह कुप्रथा आज भी है। हज़ारों गाँवों में लाखों
लोग हैं जो मैला ढोते हैं। वे हमारे भाई-बहन हैं। इन सभी से ये काम छुड़ाना है । ’
ग्यान की तलाश छूटती चली गई है। सूचना का विस्फोट ग्यान
का रिक्त स्थान भरने लगा है- रफीक भाई पूरी संजीदगी से ग्यान कैप्सूल का उपयोग कर रहे
हैं- ‘ ग्यान कैप्सूल स्वनिर्मित था।’
उसे नागरिक सुरक्षा क़ानून ( 1955 ) अनुसूचित जाति और जनजाति ( अत्याचार निवारक
) अधिनियम ( 1989 ) सफ़ाई कर्मचारी नियोजन एवं शुष्क शौचालय सन्निर्माण (प्रतिसंघ )
अधिनियम (1993 ) आदि के मिश्रण से बनाया था।
लोकतंत्र में लोकतांत्रिक ढाँचे को मजबूत करने तथा लोक की आवाज़ सुनाई देने
के क़ानूनों में कोई कमी नहीं परन्तु लागू करने वाली मशीनरी ही बीमार हो तो कोई क्या
करे। सभी क़ानून मिलकर भी इनसान को जीने का हक़ दिलाने में असमर्थ हैं।
झब्बू के गाँव की रामरति मैला ढोने का काम कर रही थी। रामरति कई बार बीमार
हुई। एक बार तो सिर के बाल तक झड़ गये। उसकी चमड़ी कई रोग का रैन बसेरा बनी, लेकिन
रामरति और जग्या ( उसका पति ) ने हिम्मत न हारी। जग्या झाड़ू बनाने का काम करता था।
नगर निगम के सफ़ाई कर्मियों को बेच देता था। दोनों ने ‘ मन में गाँठ बाँध ली । हम आत्मा
के माथे पर जो ढो रहे हैं, वो हमारी आत्मा को न ढोना पड़े। ’ शिविर से लौटकर वह मन
से मैला झाड़ना छोड़ चुकी थी ‘ मन में डर, संकोच, झिझक दे मैले-कचरे के कतरे-कतरे को
झाड़ झटकार चुकी। मन को काँच बना चुकी। ( गाँव भीतर गाँव \ पृ सं 55)
उसने झब्बू से मदद माँगी। गाँव प्रतिक्रिया के सूखे पत्तों से भर गया।
-क्या मालूम आज झब्बू किधर घाघरी घुमाने वाली है। एक आदमी ने कहा।
-आज तो लगता है झब्बू या श्यामू ही नी, बल्कि सभी भंगने घाघरी उतारकर घूमने
वाली हैं। दूसरा आदमी बोला।
-स्साला कैसा टैम आ गया। पटेल को पटेल कहो, बामण को बामण, ठाकुर को ठाकुर,
सरपंच को सरपंच, प्रधानमंत्री को प्रधानमंत्री, किसी को बुरा नी लगता। एक आदमी ने कहा,
और आँखें सिकोड़ता बोला- लेकिन भंगी को भंगी, चमार को चमार, या बलाई को बलाई कहो तो
ठेट सरकार के पिछवाड़े में मिर्चा लगती। ऎसा क्यों ?
माणक पटेल का तर्क ( कुतर्क ) है- काम कोई भी भुरा नी होता। फिर ये काम तो
ऎसा है, जैसे पुजारी पूजा से पहले मन्दिर साफ़-सुफ़
करता। ’
रामरति ने तल्ख स्वर में कहा- तो फिर पुजारी से ही झड़वा लो मैला।
( गाँव भीतर गाँव पृ सं 58 )
बात बदलाव की है। झब्बू कहती है- ‘ अगर हम दुनिया नी बदल सकती, तो हमारे बग़ैर
कोई और भी नी बदल सकता, हम यूँ ही जूती के नीचे दबे रहेंगे और दुनिया बदल जाएगी ?
’ झब्बू के स्वर से जैसे चिंगारियाँ झड़ीं ।
‘ गाँव भीतर गाँव ’ के उपन्यास के दलित विमर्श को उपन्यास में दलित चेतना दिखाने
भर का दलित विमर्श नहीं कह सकते। इसका तल काफी गहरा है। रचनाकार की गहरी संवेदना, मानवीय
दृष्टिकोण तथा परिवर्तनकामी चेतना के रसायन से बना है। सत्यनारायण पटेल का दलित विमर्श
उद्धृत किए सिलसिले से जातिगत विभेद, ऊँच-नीच अस्पृश्यता तथा विशेष हालात में प्रतिक्रियावाद,
कटाक्ष, सम्प्रदायवाद से टकराने और प्यार पाने का जज्बा नज़र आता है क्योंकि उपन्यासकार
की सरलीकरण में कोई दिलचस्पी नहीं। रचनाकार
समाजेतिहास के हाशिये पर पड़े दलित कैलास हम्माल को तवज्जो का केन्द्र बनाता है। उपन्यास
खुलता है तो उसकी ट्राली में लदी खाद की बोरियों के साथ टूटी-फूटी सड़क पर हिचकोले
खाती यात्रा से । ‘ टैक्टर की ट्राली कभी दाएँ, कभी बाएँ डोलती । हम्मालों का जी ऊपर-नीचे
होता। लगता- ट्राली अब पलटी कि तब पलटी। जैसे ट्राली नहीं, ठेके की सरकार हो । ’
बोरियों के भीतर भरे खाद के दाने भी लेखक को मुक्ति की जुगत तलाशते लगते हैं।
जैसे ‘बोरियों के भीतर खाद के दाने हम्मालों की तरह जीते-जागते आम-अवाम हों। वे भी
सामूहिक रूप से मुक्ति का सपना देख रहे हों। उन्हें इल्म हो गया हो कि देश और दुनिया
को चलाने वाली खाद के दाने हैं। लेकिन उन्हें ऎसे खेतों में बिखरने से एतराज हो, जो
कभी ग़रीबों ने, मेहनतकशों ने अपना ख़ून-पसीना एक कर दो जून रोटी, और चंद सपने बोने-उगाने
के लिए बनाए हों। लेकिन ज़मीन हड़पुओं ने, धरतीखोरों ने उन पर कब्जा कर लिया हो।’ खाद
के दाने समझ गए हैं कि जब वे बिखरेंगे, मिट्टी में घुलेंगे-मिलेंगे, फसल के दानों में
अपने प्राण भरेंगे। दानों को चमकीला व पौष्टिक बना देगें। एक तरह से ख़ुद अनाज का दाना
ही बन जाएँगे। तब उन्हें बाजार में बेचा जाएगा। ( गाँव भीतर गाँव / पृ सं )
कैलास हम्माल टूटी-फूटी सड़क पर ट्राली में लदी खाद की बोरियों के साथ यात्रा
में साथी हम्मालों को नगजी बा के गाये सिंगाजी और कबीर के भजन गाकर सुना रहा है। नगजी
बा के सुन्दर भजन सुन पाने के लिए उसे मन्दिर से बाहर बैठना पड़ता है। हाल ही में शनि
मन्दिर में दाखिल होने के लिए महिलाओं को संघर्ष करना पड़ा था। गाँव का मन्दिर यदि
साँस्कृतिक केन्द्र है तो कैलास हम्माल इसके बाहर ही रह सकता है। टूटी-फूटी सड़कें
हमारे लोकतंत्र का सच है तो दूसरी तरफ़ समाज व्यवस्था का जिसमें कैलास का मन्दिर में
जाना गाना वर्जित है। सामाजिक साँस्कृतिक व्यवस्था पर संतोष पटेल की टिप्पणी है- ‘
अब कोई सिंगा जी या कबीर हमारे बीच नहीं रह गया है। ’
गाँव में भेद-भाव की शिला बचपन में ही बांध दी जाती है। राधली रोज समय से थोड़ा
पहले स्कूल चली जाती है। स्कूल में झाड़ू लगाना, टाट पट्टी बिछाना। टट्टीघर साफ़ करने
जैसे सभी काम उसी को करने होते हैं। जब तक वह सारे कामों से फ़ारिग़ होती है। तब तक
जन गण मन हो जाता है- उसे देखकर बच्चे इस तरह मुँह बनाते हैं, जैसे टट्टीघर की गंदगी
उससे लिथड़ गयी हो।
राधली ने दबे सुर से कह दिया कि ‘ ये काम चपरासी वर्मा का है, वो करे या कोई
भी करे, मैं नहीं करूँगी। ’ नतीजा- राधली की उघड़ी पिंडलियों पर रेंगते लाल,नीले और
काले सँपोले मानो झब्बू और श्यामू को डंसने लगे। ’
( गाँव भीतर गाँव पृ सं 115 )
झब्बू ग्राम सभा में एक-एक बात रखने को कहती है- ‘ बोलते की बुरी ( ज्वार के
दाने का छिलका ) भी बिक जाती और गूँगे की ज्वार भी धरी रह जाती। अब चुप नी बैठेंगे,
बस. नुक्ता ( मृत्युभोज ) हो जाने दो। ’
रामरति ने मैला नहीं ढोने की बात गाँठ बाँध ली तो कुंडी के चाठ्ये पर मैला
झाड़ने का सामान जला दिया। अब वह रैलियों में
बोलने भी लगी थी। उसने इस कुप्रथा की होली जलाने का साहस किया था। कहती-‘ हम इंसानी
देश में हैं कि किसी सूअरबाड़े में ? मेरा तो यह कहना है कि अपने घरवाले के बच्चों
को कहो कि कोई हुनर सीखो।’ हालात बदलने लगे थे, परन्तु रफीक भाई जैसे लोगों के पास
बदले हालात का सामना करने की तैयारी नहीं होती। मैला ढोने वाले कहते-हम तो तैयार बैठे
हैं, लेकिन फिर करेंगे क्या? आप हमें कोई दूसरा काम सिखा दो। हमें देवास, पिथमपुर या
कहीं महानगर के किसी कारखाने या कहीं भी काम पर लगवा दो। अगर हाथ का काम छोड़ दिया
और दूसरा काम नी मिला, फिर तो भूखे मरने की नोबत आ जायेगी। ’ रफीक भाई पास इस बात का
जवाब नहीं। उसे फंडिंग एजेंसियाँ काम छुड़वाने का फंड देती। नया काम सिखाने में मदद
नहीं करती। ’ यदि जटील स्थितियों का आपके पास
कोई हल समाधान नहीं तो आप रास्ता दिखाने का दायित्व कंधे पर नहीं उठा सकते। कार्ल मार्क्स
और फ्रेडरिक एंगल्स के पास यदि पुख्ता साँस्कृतिक धरातल और पारदर्शी समझ न होती, तो
सर्वहारा वर्ग के लिए प्रस्थान बिंदु तैयार करना उनकी बड़ी भूल होती। व्यवहार में लागू
करने आयी कमियों के कारण ही आज अमरीकी नेतृत्व
में साम्राज्यवादी खेमा अपनी भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था के आधार पर शोषण कर भारी मुनाफ़ा
कमा रहा है। सुनियोजित प्रचार तंर शोषणाधारित व्यवस्था को मानवीय चेहरा देने की विकृत
व्याख्याएँ कर रहा है।
सफलता की सीढ़ियाँ फलाँगते झब्बू जब पंच बन गई तो उसे जनतंत्र को गिरवी रखने
के नुस्खे बताए गये।
- देख झब्बू, तू भी एक पंच है। तू
ज़रा-ज़रा सी बात पर टाँग अड़ाएगी, फिर पंचायत कैसे चलेगी ? मैं सरपँच हूँ तो
क्या, प्रदेश का मुखिया तो जाम सिंह की पार्टी का राजा साब ही है। मैं ये मान लूँ कि
खेती-खेड़ो हरिनाम की जामे मुक्तो रे लाभ। क्या होगा ? मानकर मैं साधु तो बन सकता हूँ।
सरपँच बना नहीं रह सकता। - हरि नाम जपना ही होता, सरपँच क्यों बनता ? फिर मिलजुल कर
रहना पड़ता। ’ संतोष पटेल झब्बू और साथियों को समझा रहा था कि वे चाहे तो दस-बीस पट्टे
ले ले, अपनी मर्ज़ी के दाम पर बेचें । उसे रसीद के हिसाब से पैसे दे। ये भी नहीं दे। घर की बात समझ ।
झब्बू को एतराज है कि बीस बाय बीस के प्लाट के पट्टे की रसीद सात सौ की दी
जा रही है, परन्तु सात हज़ार रुपये लिये जा
रहे हैं ।’
सरपँच के व्यवस्थाजनित बंधन हैं । महँगाई के जमाने में सरपँच का चुनाव लड़ना-चुनाव
में ख़र्चा करना, उसे कवर भी करना। ‘ मैं कोई
संत सिंगाजी या फिर कबीर नहीं कि घर फूँक तमाशा देखूँ।’ इंसाफ़ की लड़ाई मुश्किल है ‘ जो आज हमारे देश में
भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू बनने की कोशिश करता है, राज्य की गोली उसके सीने से पार
हो जाती है। शंकर गुहा नियोगी का नाम सुना है तूने ? वह भी ग़रीबों की लड़ाई लड़ रहा
था। अभी कुछ बरस पहले ही पल्टन मल्लाह ने उसे गोली से उड़ा दिया। पलटन मल्लाह कौन
? वह भी किसी जाम सिंह के इशारे पर दया और दामू जैसा काम करने वाला था। उसके हाथ पिस्तौल पकड़ा कर शंकर गुहा जैसे ग़रीबों के
मसीहा को उड़वा दिया था।’
संतोष पटेल झब्बू के सामने लोकतंत्र की कई पर्ते उतार कर दिखा रहा है- ‘ झब्बू
जमाना जाम सिंह और राजा साब जैसों का है। राजा साब के राज में मुलताई में किसानों पर
गोली चली। गोली पुलिस ने चलायी। हत्या का मुक़दमा किसानों पर चला।’
( गाँव भीतर गाँव \ पृ सं 132 )
1970 में गार्सिया मार्खेस ने अपने उपन्यास ‘ वन हंडरेड इयर्स आॉफ़ सालिट्यूड
के माध्यम से अँग्रेज़ी पाठकों को जादुई यथार्थवाद से परिचित करवाया। कहतें हैं तब
से अब तक दुनिया काफी बदल गई है। स्थितियों में आमूल परिवर्तन आ गया है। भूमंडलीकरण
का पहिया दुनिया को रौंद रहा है। इस पहिए या कालचक्र को पीछे नहीं धकेला जा सकता। अतः
अपने को उसी के अनुरूप बनाना होगा।
भूमंडलीकरण ने राष्ट्र, समाज और समौदाय, सबको बेमानी बना दिया है। अभी प्रासंगिक
प्रश्न हैः मैं कौन हूँ ? न कि गार्सिया मार्खेस का ‘ हम कौन हैं ? ’ ( गिरीश मिश्र
/ कथांतर अंक 19 )
ऎसी परिस्थितियों में भी झब्बू की इच्छा है कि गाँव का पइसा वैध-अवैध किसी
भी रूप में गाँव से बाहर नहीं जाये ’ सारा पइसा गाँव के विकास दे लिए ख़र्च हो ’
राज्य चुनाव आयोग ने जब लाटरी पद्धति से पंचायत सीट दलित महिला के लिए आरक्षित
कर दी संतोष पटेल और गणपत का दुःख ग़ुस्सा, खीज असीम हो गया।
झब्बू के बारे मे सोचा जा रहा है कि वह अपने काम से काम रखती है। ‘ अभी पंच
होकर जब-तब नाक में दम करती। अगर सरपंच हो गयी, तो फिर मुट्ठी में बंद होने वाली तितली
नहीं। जो मन कहेगा वही करेगी, और ऎसी चंट है कि पंचों से भी वही मनवा लेगी। झब्बू को
सरपँच बनाना यानी अपने हाथ काटने की कोशिश करना। ’
संतोष पटेल ने श्यामू पर दाँव खेलना चाहा। श्यामू का जवाब था- ‘ मैं इस काबिल
नहीं हूँ। मैं और रामरति, चँदा, धापू, फूँदा या कोई भी हो.. हम तो सूरज की रोशनी में
चमकने वाली हैं, हमारा सूरज तो झब्बू है। ’
( गाँव भीतर गाँव / पृ सं 189 )
‘ गाँव भीतर गाँव ’ उपन्यास को एक
दलित स्त्री के आत्मसंघर्ष और अस्मिता के पात्र की तरह पढ़ा जा सकता है। कोई परेशानी
नहीं। परन्तु झब्बू एक स्त्री, वह भी विधवा, तिस पर दलित प्रत्येक क़दम, प्रत्येक मोड़
पर, प्रत्येक सामाजिक परीक्षा में सफ़ल क्योंकर होती जा रही है ? क्या इसलिए नहीं कि
उसे सफल होने दिया जा रहा है। संतोष पटेल चुनाव के लिए ख़र्च क्यों उठाना चाहता है
? इतना मात्र नहीं कि एक पल्ले पर उसकी तस्वीर हो, दूसरे पर झब्बू की। उसकी बेटी (
झब्बू की ) रोशनी, जो नई पीढ़ी की है, का कहना है- चुनाव मम्मी लड़ रही। उसमें किसी
पार्टी या संतोष पटेल का कोई लेना-देना नहीं। फिर वो क्यों आधी रोटी में दाल ले रहा
? क्यों बग़ैर माँगी मदद दे रहा ? कोई तो स्वार्थ होगा ।’
स्वार्थ है सत्ता केन्द्रीत व्यवस्था का। वा अपना पंजा कसे रखना चाहती है।
झब्बू एक तरह के मकड़जाल में फँसती चली जाती है। झब्बू में महत्त्वाकाँक्षा कौन जगा
रहा है ? उसे सत्ता का खुमार किसने दिया। उसकी बेटी रोशनी की माँ के प्रति उदासीनता,
आक्रोश कैसे और क्यों उत्पन्न हुआ ? सत्यनारायण पटेल इन सवालों की तरफ़ ले जाते हैं।
यह वही बेटी है, जो माँ को राजनीति के क्षेत्र में आने के लिए आग्रहशील थी।
रोशनी जानती है कि दलित एजेंडा कहने भर को दलित एजेंडा होता है। होता है वह
राजनीतिक एजेंडा। ‘ सिर्फ़ घोषणाओं से ग़ैरबराबरी की खाई एक इंच भी नहीं भरती जैसे ज़मीन
आवंटन वाले मामले में हुआ कि ज़मीन काग़ज़ों पर तो बँट गयी, लेकिन ज़मीन पर कब्ज़ा धनी
और प्रभावशाली किसानों का ही बना रहा। ( पृ सं 196 )
झब्बू बेशक पद पाने के लिए नहीं, गंदगी साफ़ करने के लिए राजनीति में उतरी हो।
परन्तु उस राजनीति की दलदल लम्बे क़दम बढ़ाने नहीं देती। युवा जोश से भरी रोशनी के साथ
क्या हुआ। झब्बू ने समझाया-भ्रष्टाचार लाखों छोटे-बड़े मुँह वाला एक जीव है और इसका
पेट भी बहुत बड़ा और गहरा है। सरपँच भी इसका
एक छोटा सा मुँह है। सैकड़ों तालाब, सैकड़ों सड़के सिर्फ़ काग़जों पर ही बने, काग़जों
पर ही बह गये। ’
एक दिन रोशनी को माँ से कहना पड़ा- ‘ वाह मम्मी, तू तो बड़ी घाघ निकली। ’
रोशनी के समने दो तस्वीरें थीं, लेनिन
और भगत सिंह की। सवाल है लेनिन से- तूने कहा था कि क्राँति वहीं सम्भव है, जहाँ साम्राज्यवाद
की कड़ी कमज़ोर हो, यह भी कि क्राँति किसानों के सहयोग से होगी और हथियारबंद होगी, हथियार
क्या सिर्फ़ बन्दूक, गोली और बम ही होते हैं, विचार और शब्द नहीं ? ’ वह लेख लिख रही
है- आज हमें अपना वास्तविक हक़ और सम्मान पाने के लिए धन्ना सेठों की बंधक सत्ता और
व्यवस्था का तख्ता शीघ्र पलटने की ज़रूरत है ।
मातादीन पंचम पुलिस इन्सपेक्टर ने ‘ आॉपरेशन रोशनी ’ का काम पूरा कर डाला।
जब्तशुदा सामान में गोरख पाण्डे, पाश, सुखांत भट्टाचार्य, वरवर राव, विष्णु खरे, चंद्रकांत
देवताले के कविता संग्रह भी हैं ।
‘थाने का पूरा स्टॉफ़ दो रातों से उसकी ( रोशनी ) टाँगों के बीच गश्त करता रहा।’
( पृ सं 309) ‘ पंचम का मक़सद साफ़ था तीन दिन में झब्बू और रोशनी की इज़्ज़त गाँव और महानगर
में मटियामेट करनी थी (पृ सं 311 ) क्रू, अराजक, बदला लेने वाली राजनीति के लिए आज
यह इतना भी कठिन नहीं कि एक ट्रक झब्बू की नैनो गाड़ी को टक्कर मार दे। नैनो उछले उसमें झब्बू हो, नैनो नीचे आये तो झब्बू
की देह मात्र रह जाये। ज़मीन के अधिकारी रघु, रामरति और श्यामू को एक विवाह समारोह में
घटी झड़प के दौरान अर्जुन दंगे के बहाने मौत के घाट उतरवा देता है। रामरति का पति ज्ग्या
अपना संतुलन न रख पाया। झब्बू की जलती चिता देख प्रतिशोध में अर्जुन सिंह को खूँटे
के वार से मार डाला।
उपन्यास बखूबी सत्ता शक्ति का खेल दिखा पाया। वर्चस्वकादी राजनीति का अपराधीकरण किसी से छुपा नहीं। भ्रष्टतंत्र, शराबबंदी.
दलित विमर्श, पंचायती राज, जातिवाद, एन जी ओ …. क्या गाँव के भीतर गाँव में बदलते फैलते
सभी हालात और यथार्थ का कठोर चित्रांकन उपन्यास में है। पूर्वाग्रहों और अनेक कठोर
जकड़बंधियों के बीच झब्बू का खड़े होना आवाज़ उठाना और समवेत स्वर से बुलंद करना किसी
भी तरह आसान नहीं था। फिर उसे पुरुष मानसिकता से भी जूझना था जो स्वभाव से दमनकारी
है। ज़मीन को लेकर लिप्सा की हद पार करना सदा विनाशकारी रहा है। वर्चस्वी समाजेतिहास
का यह पहलू अनर्थकारी है। जगह-जगह मोर, मैना. चिकी, सूअर, नीम, बबूल की मौजूदगी मानवीय
सँस्कृति को प्राकृतिक आधार देती है। ‘गाँव भीतर गाँव ’ का गाँव प्रेमचँद के उपन्यासों
के गाँव से बदला हुआ है। यह वर्तमान दौर का गाँव है। विकास के नये दौर में भारतीय गाँव
की तरह स्वप्न और स्वप्न की खंडित अवस्था का चित्रांकन सत्यनारायण पटेल ने बखूबी किया।
झब्बू स्मृति में रह जाती है जो ‘ नित नया सोचती और करती। ’ वो जानती थी ग्यान ही वह
पँख है, जो उड़ाकर स्वर्ग में ले जाते ’ फिर रोशनी के ज़हन में मार्क्स की कविता थी-
‘ आओ \ बीहड़ और कठिन सुदूर \ यात्रा पर चलें । ’
तरसेम गुजराल
444 A रजा गार्डन
P.O बस्ती बावाखेल
जालंधर-144021
मोबाइल-09463632855

उपन्यास पढ़ने की उत्सुकता बढ़ाती सार्थक समीक्षा।
ReplyDelete