Sunday, December 3, 2017

(पुस्तक चर्चा) अतीत के गर्भ में छिपे कल्पना तथा यथार्थ के सांझे मोतियों का चुनाव -'अवध -कुछ कहती है दीवारें '


उपन्यास -अवध -कुछ कहती हैं दीवारें 
उपन्यासकार -डा. वी. के. जोशी 
प्रकाशक -अंजुमन प्रकाशन
मूल्य -175 /-

भूगर्भवेत्ता व् लेखक डा. विजय कुमार जोशी का पहला उपन्यास 'अवध -कुछ कहती है दीवारें ' अंजुमन प्रकाशन से आया है। सुंदर आवरण व् उत्कृष्ट छपाई के साथ तीन सौ ग्यारह पृष्ठीय यह उपन्यास कई मायनों में पाठक की उत्सुकता बढ़ाता है।एक भूगर्भवेत्ता की कलम से अतीत के गर्भ में छिपे कल्पना तथा यथार्थ के सांझे मोतियों का चुनाव उपन्यास का रोचक बिंदु है। उपन्यास का सम्पूर्ण कथानक निम्न जाति में जन्मे युवक मंगल के जीवन संघर्ष व् उत्कर्ष के इर्द -गिर्द घूमता है। उपन्यासकार बड़ी ही कुशलता से तत्कालीन समाज में व्याप्त जाति प्रथा के वीभत्स स्वरुप का बड़ा ही मार्मिक चित्रण करते हुए आगे बढ़ता है। अतरौली ग्राम के स्वच्छाकार परिवार में जन्मा मंगल गरीबी से जूझते,माता -पिता को मैला ढोते देखता बड़ा होता है। गरीब व् उपेक्षित परिवार की दयनीयता का दारुण चित्रण कई जगहों पर पाठक को गहरे छूकर निकल जाता है। कथानायक मंगल को रास्ते में पड़ा हुआ शीशे का एक टुकड़ा मिलता है। नजर बचाकर पहले वो तथा बाद में उसके माता -पिता अपना चेहरा आईने के उस टुकड़े में देखते हैं। तब स्वयं के लिए ही अजनबी अपने चहेरे को अकस्मात् देख लेने के हर्ष को बड़ी ही कारीगरी से उपन्यासकार कथा में पिरोता हुआ आगे बढ़ता है। अतरौली की मेहतर बस्ती में ईंटों के काल्पनिक महल बनाने वाले मंगल के जीवन को पंख तब लग जाते है जब भाग्यवश उसकी भेंट दरबार के राज मिस्त्री अल्तमश से होती है। उपन्यासकार इतिहास के कुछ चर्चित चरित्रों के माध्यम से काल्पनिक कथानक को यथार्थ की पृष्टभूमि पर ला खड़ा करने का उपक्रम करता दिखाई दिया है। पात्रों के चरित्र के अनुरूप भाषाई विविधता पात्रों को जीवंत बनाती है। अवधिया बोली व् लोक मांगलिक गीतों की ठसक ने कथा की लोक भावभूमि को सम्पूर्ण किया है। उपन्यास का ग्रामीण विस्तार कहीं -कहीं क्षण भर के लिए 'रेणु' का सा लोक दृश्य प्रस्तुत करता आभाषित हुआ है। 
काकोरी तथा लख़नऊ में नवाब, उनके सिपहसलार व् अन्य मुस्लिम चरित्र यधपि कथानायक की संघर्ष गाथा व् कौशलात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं तथापि अल्तमश के आलावा इनमे से कोई भी पात्र पाठक के मस्तिष्क में देर तक नहीं ठहरता। परन्तु मंगल,मंगरु,विशनिया,बिन्दीकी बुआ,चंद्रा,रानो,आदि चरित्र अधिक प्रभावी होकर कथा को विस्तार देते दिखाई दिए हैं। कथानायक मंगल का अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में भी कल्पना के महल गढ़ना, अल्तमश की शागिर्दी में मन लगाकर भवन निर्माण की बारीकियां सीखना तथा निम्न जातियों के प्रति होने वाली तमाम उपेक्षाओं को भोगते हुए अपने हुनर व् लगन के बल पर दरबार के राजमिस्त्री के पद तक पहुँचाना, उसे कथा नायक के रूप में प्रविष्ट करता है। मंगल की पुत्री चंदा व् हैरिस का प्रेम प्रसंग कथा को एक श्रंगारिक भूमि सौंपता है। जो यदा -कदा मंगल व् रानो के मोहक पलों में भी पाठक के हाथ लग ही जाती है।  मंगल की नातिन मलीना के चरित्र के साथ कथा का उपसंहार होता है। 
कथावस्तु,संवाद व चरित्रचित्रण सभी कसौटियों पर उपन्यास अपनी महत्ता सिद्ध करता प्रतीत होता है। उपन्यासकार को साधुवाद।  

मीना पाण्डेय 

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