संगीत सुविद्
पुस्तक - संगीत सुविद्
लेखक - श्रीश जोशी
प्रकाशक- नौघर , चीनाखान , अल्मोडा, उत्तराखंड
मूल्य- 310 /- रूपया मात्र
संगीत विशारद श्रीश जोशी द्वारा अपने पिता संगीत विद् पं0 नारायण दत्त जोशी की 50 वीं पुण्यतिथि पर प्रकाशित पुस्तक ”संगीत सुविद्" प्राप्त हुई। पुस्तक के प्रारम्भिक पृष्ठों को पढ़कर उनके द्वारा संगीत जगत को दिये गये योगदान के साथ उस कालखण्ड में घटित शास्त्रीय संगीत जगत के क्षेत्र की कई गूढ़ जानकारियाॅ प्राप्त हुई।
11 फरवरी 1885 में उत्तराखंड के अल्मोड़ा में जन्मे पं0 नारायण दत्त जोशी ऐसे संगीत मनीषी थे जिन्होने ऐसे समय में शास्त्रीय संगीत की अलख जगाई जब यह विद्या गुरू शिष्य परम्परा तक ही सीमित थी या यूँ कहा जाए कि संगीत अब तक उस्तादो की वंश परम्परागत विद्या थी। संगीत की विद्यालयीन शिक्षा प्रणाली का अभाव था। हालाकि सन् 1901 में पं0 विष्णु दिगम्बर पलुस्कर जी ने लाहौर में गंधर्व संगीत महाविद्यालय , भातखण्डे जी ने सन् 1916 में बड़ौदा में महाराज सयाजीराव संगीत महाविद्यालय, सन् 1918 में ग्वालियर में माधव संगीत महाविद्यालय , सन् 1926 लखनऊ में मैरिस कालेज आॅफ हिन्दुस्तानी म्यूजिक तथा 1926 में ही सत्यानन्द जोशी द्वारा अपने सहयोगियो के साथ इलाहाबाद में प्रयाग संगीत समिति की स्थापना हो चुकी थी। इसी क्रम में 1928 में पं0 नारायण दत्त जोशी के द्वारा शास्त्रीय संगीत को विद्यालयीन शिक्षा का अंग बनाने का महत्वपूर्ण कार्य किया और फिर धीरे -धीरे अन्य नगरो में भी विद्यालय में संगीत विषय के रूप में पढ़ाया जाने लगा ।
1925 तक तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (वर्तमान में उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड) में संगीत शिक्षण की कोई व्यवस्था नही थी सौभाग्यवश उन्ही दिनो ग्वालियर के महाराज माघवराव सिंधिया द्वारा उज्जैन में संगीत महाविद्यालय स्थापना की गई अतः पं0 जी ने वहाॅ से कड़ी मेहनत के बाद संगीतविद् की उपाधि प्राप्त की। अपने प्रारम्भिक जीवन में संगीत की शिक्षा के प्रति अगाध इच्छा होने पर भी जो समस्या उन्होने महसूस की थी अल्मोड़ा लौटने पर उसकी समाधान की दिशा में शास्त्रीय संगीत को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के लिए कठोर प्रयत्न किए। अंततः उनके अथक प्रयासो के फलस्वरूप शास्त्रीय संगीत को विषय के रूप में मान्यता मिली। सम्भवतः 1928 में रैमजे स्कूल उ0प्र0 का पहला विद्यालय था जहाॅ संगीत विषय के रूप में पं0 नारायण दत्त जोशी के प्रयासो पढाया जाने लगा था। पं0 नारायण दत्त के द्वारा संगीत पाठ्यक्रम व संगीत शिक्षण भाग -1 और भाग-2 पाठ्य पुस्तको की रचना भी की गई।
पं0 जी उच्चकोटी के गायक व वाग्येकार भी थे। देश की जानी मानी पत्रिका ”संगीत” के संपादक प्रभूलाल गर्ग पं0 जी के संगीत ज्ञान से अत्यधिक प्रभावित थे। अतः संगीत पत्रिका में उनके लेख ,रचनाऐ व स्वरलिपियाॅ प्रकाशित होती रहती थी।
पं0 जी प्रयाग संगीत समिति के पर्यवेक्षक भी रहे एक गायक के रूप में देश के प्रतिष्ठित समारोह ग्वालियर में संगीत सम्राट तानसेन संगीत गोष्ठी 1940 में गायन प्रस्तुत किया। संगीत जगत में अग्रणी योगदान के चलते उन्हे सरकार द्वारा तानसेन सम्मान व स्वामी हरिदास जयन्ती पर हरिदास सम्मान से नवाजा गया। सन् 1947 में रैमजे स्कूल से संगीत अध्यापक के पद से अवकाश प्राप्त हो वे दिल्ली चले गए जहाॅ पर उनकी संगीत साधना अनवरत रूप् से चलती रही यहाॅ पर उन्हे संगीत के प्रचार प्रसार के लिए वृहद क्षेत्र मिल गया अतः वे संगीत सेवा में जुट गये एक गायक के रूप में अपार ख्याति अर्जित की। 17 सितम्बर 1963 को बिमारी के कारण देहावसान हो गया। उनके 83 वर्षीय पुत्र श्रीश जोशी ने उनकी 3000 हजार (प्रकाशित व अप्रकाशित) स्वरलिपियो मे से 135 चुन्निदा को पुस्तक का आकार दिया। पुस्तक में बडे ख्याल, छोटे ख्याल , ध्रुपद , धमार , होली , मल्हार , चैती, कजरी, ठुमरी , दादरा, भजन आदि को मालकौस, पीलू, शंकरा, जैजैवन्ती , बहार,हंसध्वनी, यमन कल्याण, बागेश्री, हिन्डोल, काफी , सिंदूरा, भैरवी, मदमास सारंग, विभास, केदार, हमीर, तिलक कामोद , प्रदीप, वृन्दावनी सारंग, ललित, आभोगी, जयन्त मल्हार, जलधर केदार, हंस किंकिणी, मियाॅ की मल्हार, गौड मल्हार, सूर मल्हार, मारवा, दुर्गा, तिलंग, भीमपलासी आदि रागो व प्रचलित व अप्रचलित तालो में निबद्ध किया है। पुस्तक की पहली रचना तू ही सूर्य, तू ही चन्द्र, तू ही पवन, तू अगन
....। को पं0 जी ने पाॅच अलग अलग रागो मालकोस, पीलू, शंकरा, ख्माज, जैजैवन्ती तथा चैताल ,झपताल ,दादरा, रूपक में निबद्ध किया है। इस तरह का प्रयोग उनके संगीत के पांडित्य का सशक्त उदाहरण हैं ।
विडम्बना है कि शास्त्रीय संगीत जगत इस व्यक्ति के नाम व कार्य से आज भी अपरिचित है। श्रीश जोशी द्वारा संपादित पुस्तक संगीत सुविद् जहाॅ एक ओर पं0 नारायण दत्त जोशी को शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में पहचान दिलायेगी वहीं संगीत के विद्याथियों के लिए प्रायोगिक रूप में लाभकारी
सिद्ध होगी ।
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| समीक्षक- डा दीपा जोशी |
पुस्तक समीक्षक- डाॅ0 दीपा जोशी
