(1)
लड़कियां आसमान की तहों से
लपक लेती हैं सपने
गुलाबी, हरे, सुर्ख लाल और नारंगी सपने
लड़कियां मेजकोशों,रूमालों पर
पिता -भाइयों के लिए उतार लाती हैं
गुलाब, मोगरे, चंपा की महक
शाम ढले प्रार्थनाओं में
वक्त के हाथों से छुड़ा लाती हैं
पिता की दहलीज़ पर एक और दिन अपने लिए
लड़कियां आंगन की मटमैली लकीरों पर
छुप्पन -छुपाई और मोसमपा जैसे खेल बोती हैं
और आखिरकार इंद्रधनुषी सपने बुनने वाली
रूमालों की सिलवटों में फ़िक्र बन महकने वाली
प्रार्थना के दीपक सी चढ़ती उतरती लड़कियां
हार -जीत ली जाती हैं
किसी खिलाडी के हाथों
चौपट के खेल में।
(2)
चींटियां
काली,भूरी
सलीके से चलती उतरती
अनुशासनप्रिय चींटियां
छोटी कुछ बड़ी कुछ उनसे बड़ी
हाथी के आँख
की किरकिरी चींटियां
अंधाधुन
खाए खिलाए गए
दम्भी ,मगरूर,बेखौफ,बड़बोले हाथियो
व्यर्थ व्यवधानों से
व्यथित न करो इनके संघर्ष
न छेड़ों इन्हें मेहनत कर जोड़ लेने दो
दो जून की रोटी
उलझाए रखो इन्हें बेफजूल बकवासों
में
लोकतंत्र, सविंधान,
संसद
मेरा गाँधी तुम्हारा
पटेल
भ्रमित रहने दो
विद्रोही न होने दो
जागकर ये तुम्हारे नथुनों से गुजर जाएँगी।
मीना पांडेय

बहुत सुन्दर कविताएं
ReplyDeleteWah Wah bahtar se bahtren Meena ji
ReplyDeleteWah Wah bahtar se bahtren Meena ji
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